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कंप्यूटर नेटवर्क और इंटरनेट : Network Basic, LAN/WAN और टोपोलॉजी

जब दो या दो से अधिक स्वतंत्र कंप्यूटरों को आपस में इस तरह जोड़ दिया जाए कि वे आपस में डेटा, फाइल और रिसोर्सेज (जैसे प्रिंटर) को शेयर कर सकें, तो इस सिस्टम को हम Computer Network कहते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा कंप्यूटर नेटवर्क इंटरनेट (Internet) है।


1. नेटवर्क का इतिहास (The Origin of Networking)

आज जो हम इंटरनेट पर रील्स देख रहे हैं या ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं, उसकी शुरुआत आज से कई दशक पहले अमेरिकी सेना के एक सीक्रेट प्रोजेक्ट से हुई थी।

📌 इतिहास का पन्ना बॉक्स (परीक्षा का फेवरेट पॉइंट)

  • ARPANET (अर्पानेट): यह दुनिया का सबसे पहला कंप्यूटर नेटवर्क था, जिसे 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग (US Department of Defense) ने बनाया था।
  • Full Form: Advanced Research Projects Agency Network.
  • NSFNET: 1980 के दशक में नेशनल साइंस फाउंडेशन ने एक नया हाई-स्पीड नेटवर्क बनाया, जो आगे चलकर इंटरनेट का मुख्य आधार (Backbone) बना।

2. भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर नेटवर्क के प्रकार (Types of Network)

कंप्यूटर कितनी दूरी पर रखे हैं और उनका नेटवर्क कितना बड़ा है, इस आधार पर इसे मुख्य रूप से चार भागों में बांटा जाता है:

A. PAN (Personal Area Network) — ‘आपका अपना पर्सनल नेटवर्क’

  • रेंज: यह मात्र 10 मीटर (लगभग 30 फीट) के दायरे में काम करता है।
  • उपयोग: जब आप अपने मोबाइल से ब्लूटूथ (Bluetooth) के जरिए ईयरफोन कनेक्ट करते हैं या हॉटस्पॉट से लैपटॉप जोड़ते हैं, तो वह PAN कहलाता है।
  • तकनीक: यह वायरलेस तकनीक WPAN पर काम करता है।

B. LAN (Local Area Network) — ‘एक बिल्डिंग का नेटवर्क’

  • रेंज: यह 1 किलोमीटर के दायरे में काम करता है।
  • उपयोग: किसी एक स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, बैंक या घर के अंदर के सारे कंप्यूटरों को आपस में जोड़ने के लिए LAN का उपयोग होता है।
  • तकनीक: इसमें कंप्यूटरों को तारों (केबल्स) से जोड़ा जाता है। इसे बनाने के लिए Ethernet (इथरनेट / RJ45 केबल) तकनीक और Wi-Fi का सबसे ज्यादा उपयोग होता है। इसकी डेटा ट्रांसफर स्पीड बहुत तेज होती है।

C. MAN (Metropolitan Area Network) — ‘पूरे शहर का नेटवर्क’

  • रेंज: यह 10 से 50 किलोमीटर के दायरे में काम करता है।
  • उपयोग: जब एक ही शहर के अंदर स्थित अलग-अलग बैंकों की ब्रांचों को या किसी कंपनी के अलग-अलग ऑफिसों को आपस में जोड़ना हो, तो MAN का उपयोग होता है।
  • लाइव उदाहरण: आपके शहर का लोकल केबल टीवी नेटवर्क या शहर की नगर निगम का फ्री वाई-फाई नेटवर्क MAN का सबसे बेस्ट उदाहरण है।

D. WAN (Wide Area Network) — ‘पूरी दुनिया का नेटवर्क’

  • रेंज: इसकी कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। यह पूरे देश, महाद्वीप या पूरी दुनिया में फैला होता है।
  • उपयोग: इंटरनेट (Internet) दुनिया का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध WAN है।
  • तकनीक: इसमें कंप्यूटर आपस में तारों से नहीं, बल्कि सैटेलाइट (उपग्रह) और समुद्र के नीचे बिछी ऑप्टिकल फाइबर केबल्स (Submarine Cables) के जरिए जुड़े होते हैं। एटीएम (ATM) नेटवर्क और रेलवे रिजर्वेशन सिस्टम इसी पर चलते हैं।

📊 एग्जाम स्पेशल हैक बॉक्स (दूरी का सही क्रम)
PAN (सबसे छोटा) ➔ LAN ➔ MAN ➔ WAN (सबसे बड़ा)


3. नेटवर्क टोपोलॉजी (Network Topology) — ‘कंप्यूटरों को बिठाने का तरीका’

यह परीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और गहरा टॉपिक है।

  • सरल भाषा में समझें: किसी नेटवर्क में कंप्यूटर और तारों (cables) को फिजिकल रूप से किस डिजाइन या लेआउट में अरेंज किया जाएगा (यानी उन्हें कैसे बिठाया जाएगा), उस ज्योमेट्रिकल अरेंजमेंट को ही Topology कहते हैं।

ये मुख्य रूप से पांच प्रकार की होती हैं:

A. बस टोपोलॉजी (Bus Topology)

  • डिजाइन: इसमें एक सीधी लंबी मुख्य केबल होती है, जिसे Bus या Backbone Cable कहते हैं। नेटवर्क के सारे कंप्यूटर इसी एक मुख्य तार से ‘ड्रॉप लाइन्स’ के जरिए जुड़े होते हैं। इसके दोनों कोनों पर Terminators लगे होते हैं जो सिग्नल्स को खत्म करते हैं।
  • फायदा: इसे बनाना बहुत सस्ता और आसान है क्योंकि इसमें तार बहुत कम लगता है।
  • नुकसान (एग्जाम फैक्ट): अगर इसकी मुख्य बैकबोन केबल बीच में से कहीं से भी टूट गई, तो पूरा का पूरा नेटवर्क एक झटके में बंद (क्रैश) हो जाएगा।

B. स्टार टोपोलॉजी (Star Topology — सबसे ज्यादा उपयोग होने वाली)

  • डिज자인: इसमें बीच में एक मुख्य सेंट्रल डिवाइस होता है (जिसे Hub या Switch कहते हैं)। नेटवर्क के सारे कंप्यूटर इस सेंट्रल डिवाइस से अलग-अलग तारों के जरिए जुड़े होते हैं, जिससे यह एक तारे (Star) जैसा दिखता है।
  • फायदा: अगर कोई एक कंप्यूटर या उसका तार खराब हो जाए, तो बाकी के नेटवर्क पर कोई फर्क नहीं पड़ता, वह आराम से चलता रहता है।
  • नुकसान: अगर बीच का मुख्य डिवाइस (Hub/Switch) खराब हो गया, तो पूरा नेटवर्क ठप हो जाएगा।

C. रिंग टोपोलॉजी (Ring Topology)

  • डिजाइन: इसमें कोई शुरुआत या अंत नहीं होता। सारे कंप्यूटर आपस में एक गोलाकार छल्ले (Ring) के रूप में जुड़े होते हैं। इसमें हर कंप्यूटर अपने दाएं और बाएं वाले कंप्यूटर से जुड़ा होता है।
  • डेटा फ्लो: इसमें डेटा हमेशा एक ही दिशा (Unidirectional) में घूमता है।
  • टोकन तकनीक: इसमें डेटा ट्रांसफर करने के लिए एक विशेष फ्रेम का उपयोग होता है, जिसे Token (टोकन) कहते हैं। इसीलिए इसे Token Ring भी कहा जाता है। इसमें भी एक कंप्यूटर खराब होने पर पूरा रिंग टूट जाता है और नेटवर्क बंद हो जाता है।

D. मेश टोपोलॉजी (Mesh Topology — सबसे अभेद्य और सुरक्षित)

  • डिजाइन: यह सबसे खूंखार और मजबूत टोपोलॉजी है। इसमें नेटवर्क का हर एक कंप्यूटर, बाकी के सभी कंप्यूटरों से अलग से सीधे (Dedicated Link) जुड़ा होता है। यानी इसमें तारों का एक पूरा जाल बिछ जाता है।
  • फायदा: यह 100% सुरक्षित और भरोसेमंद है। अगर एक रास्ता बंद हो जाए, तो डेटा दूसरे रास्ते से चला जाता है। इसमें प्राइवेसी सबसे ज्यादा होती है।
  • नुकसान: इसमें तार बहुत ज्यादा लगता है, इसलिए यह बहुत महंगी और जटिल (Complex) होती है।
क्विक मैथ्स हैक बॉक्स (मेश टोपोलॉजी फॉर्मूला)

परीक्षा में सीधे पूछा जाता है कि यदि मेश टोपोलॉजी में N कंप्यूटर हैं, तो नेटवर्क को जोड़ने के लिए कुल कितने तारों (केबल्स) की जरूरत होगी?

कुल तारों की संख्या = [ N × (N – 1) ] ÷ 2

उदाहरण: अगर नेटवर्क में कुल 5 कंप्यूटर हैं (N = 5), तो इस फॉर्मूले के अनुसार:
[ 5 × (5 – 1) ] ÷ 2 ➔ [ 5 × 4 ] ÷ 2 ➔ 20 ÷ 2 = 10 तारों की जरूरत होगी।

E. हाइब्रिड टोपोलॉजी (Hybrid Topology)

  • डिजाइन: जब दो या दो से अधिक अलग-अलग टोपोलॉजी (जैसे— एक बस टोपोलॉजी और एक स्टार टोपोलॉजी) को आपस में मिला दिया जाता है, तो बनने वाले मिक्स डिजाइन को Hybrid Topology कहते हैं। बड़े-बड़े ऑफिसों और इंटरनेट में इसी का उपयोग होता है।

4. नेटवर्क हार्डवेयर डिवाइसेज (Network Devices)

नेटवर्क में डेटा को सही जगह पहुँचाने के लिए कुछ मशीनों की ज़रूरत होती है, जिनसे सीधे टेक्निकल सवाल बनते हैं:

  • 1. NIC (Network Interface Card): यह मदरबोर्ड पर लगा एक छोटा सा कार्ड होता है। इसके बिना आपके कंप्यूटर में इंटरनेट का तार नहीं लग सकता। इसे LAN Card भी कहते हैं। इसी कार्ड के अंदर आपके कंप्यूटर का परमानेंट फिजिकल एड्रेस लिखा होता है, जिसे MAC Address कहते हैं।
  • 2. Hub (हब — डम्ब डिवाइस): यह स्टार टोपोलॉजी में यूज़ होने वाला एक साधारण कनेक्टिंग डिवाइस है। इसे Dumb (नासमझ) Device कहा जाता है क्योंकि इसके पास अपना कोई दिमाग नहीं होता। अगर कंप्यूटर ‘A’ सिर्फ कंप्यूटर ‘B’ को कोई डेटा भेजना चाहता है, तो Hub उस डेटा को ‘B’ के साथ-साथ नेटवर्क के सभी कंप्यूटरों को भेज (Broadcasting) देता है, जिससे डेटा लीक होने का खतरा रहता है।
  • 3. Switch (स्विच — इंटेलिजेंट डिवाइस): यह Hub का सगा भाई है, लेकिन यह Intelligent (समझदार) Device है। इसके पास अपना दिमाग (MAC Address Table) होता है। यह डेटा को ब्रॉडकास्ट नहीं करता। अगर ‘A’ ने ‘B’ के लिए डेटा भेजा है, तो यह कूटनीति से सिर्फ ‘B’ को ही डेटा डिलीवर (Unicasting) करेगा।
  • 4. Repeater (रिपीटर): जब डेटा तारों में बहुत दूर तक ट्रेवल करता है, तो दूरी के कारण उसके सिग्नल्स कमजोर (Weak) होने लगते हैं (सिग्नल्स के कमजोर होने को कंप्यूटर साइंस में Attenuation कहते हैं)। रिपीटर का काम उन कमजोर सिग्नल्स को पकड़ना, उन्हें वापस शक्तिशाली (Regenerate) बनाना और आगे भेज देना है।
  • 5. Gateway (गेटवे): जब दो अलग-अलग प्रोटोकॉल (नियमों) पर चलने वाले असमान नेटवर्कों को आपस में जोड़ना हो, तो बीच में Gateway का उपयोग होता है। इसे नेटवर्क का प्रवेश द्वार भी कहते हैं।

🔥 महा-रट्टा बॉक्स

  • दुनिया का पहला नेटवर्क ➔ ARPANET (1969)
  • ब्लूटूथ से बनने वाला नेटवर्क ➔ PAN (10 मीटर)
  • एक बिल्डिंग या ऑफिस का नेटवर्क ➔ LAN (इथरनेट केबल)
  • सबसे ज्यादा यूज़ होने वाली टोपोलॉजी ➔ Star Topology (Hub/Switch का उपयोग)
  • वह टोपोलॉजी जिसका एक तार टूटने पर सब बंद हो जाए ➔ Bus Topology
  • मेश टोपोलॉजी के केबल्स का फार्मूला ➔ [N × (N – 1)] / 2
  • नासमझ डिवाइस ➔ Hub, समझदार डिवाइस ➔ Switch

Computer Network & Internet : OSI Model, IP Address, और साइबर सिक्योरिटी

इंटरनेट का बुनियादी ढांचा समझने के बाद अब हमें यह समझना होगा कि डेटा एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर तक हवा या तारों में बिना खोए, बिल्कुल सही पते पर कैसे पहुँचता है। इसके पीछे कुछ सख्त नियम और आर्किटेक्चर काम करते हैं, जिन्हें Protocols और Models कहा जाता है।


1. OSI मॉडल (OSI Model) — ‘डेटा भेजने का 7-मंजिला नियम’

जब भी इंटरनेट पर डेटा (जैसे व्हाट्सएप मैसेज या ईमेल) ट्रेवल करता है, तो वह एक तय नेटवर्क आर्किटेक्चर से होकर गुजरता है जिसे OSI Model कहते हैं। इसे 1984 में ISO (International Organization for Standardization) द्वारा बनाया गया था।

  • Full Form: Open Systems Interconnection.
  • विशेषता: यह एक तार्किक (Logical/Theoretical) मॉडल है। इसमें कुल 7 लेयर्स (परतें) होती हैं। परीक्षा में इन सातों लेयर्स का क्रम ऊपर से नीचे या नीचे से ऊपर की तरफ हर बार पूछा जाता है।

📊 जादुई रट्टा मार बॉक्स (7 लेयर्स याद रखने की देसी शॉर्ट-ट्रिक)
नीचे से ऊपर (Layer 1 से Layer 7) का सही क्रम याद रखने की लाइन:
“Please Do Not Throw Sausage Pizza Away”

  • Layer 1: PPhysical Layer (फिजिकल लेयर)
  • Layer 2: DData Link Layer (डेटा लिंक लेयर)
  • Layer 3: NNetwork Layer (नेटवर्क लेयर)
  • Layer 4: TTransport Layer (ट्रांसपोर्ट लेयर)
  • Layer 5: SSession Layer (सेशन लेयर)
  • Layer 6: PPresentation Layer (प्रस्तुति लेयर)
  • Layer 7: AApplication Layer (एप्लीकेशन लेयर)

सातों लेयर्स के मुख्य काम (Functions of OSI Layers – Deep Exam Facts):

  • Layer 7: Application Layer: यह यूजर के सबसे पास होती है। आप जो ब्राउज़र या ऐप चलाते हैं, वह इसी लेयर से बात करता है। इसमें HTTP, FTP, SMTP प्रोटोकॉल काम करते हैं.
  • Layer 6: Presentation Layer: इसका काम डेटा का रूप बदलना है। यह डेटा को Encryption (सुरक्षा के लिए कोड में बदलना), Decryption और Compression (साइज छोटा करना) का काम करती है.
  • Layer 5: Session Layer: यह दो कंप्यूटरों के बीच कनेक्शन (वार्तालाप) को शुरू करती है, उसे बनाए रखती है और काम खत्म होने पर बंद (Terminate) करती है.
  • Layer 4: Transport Layer — ‘OSI का दिल’: इसे Heart of OSI Model कहा जाता है। इसका काम एंड-टू-एंड डेटा को बिना किसी एरर के पहुँचाना है। यह बड़े डेटा को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ती है, जिन्हें Segments (सेगमेंट) कहते हैं। इसमें TCP और UDP प्रोटोकॉल चलते हैं.
  • Layer 3: Network Layer: यह डेटा को सबसे बेस्ट और छोटा रास्ता (Routing) दिखाती है। इस लेयर पर डेटा को Packets (पैकेट) कहा जाता है। इसी लेयर पर हमारा IP Address और Router मशीन काम करती है.
  • Layer 2: Data Link Layer: यह नेटवर्क लेयर से आए पैकेट्स को छोटे टुकड़ों में बांटती है जिन्हें Frames (फ्रेम) कहते हैं। इसका काम एरर ढूंढना (Error Detection) है। यहाँ MAC Address और Switch मशीन काम करती है.
  • Layer 1: Physical Layer: यह सबसे निचली लेयर है। यहाँ डेटा शुद्ध रूप से करंट या सिग्नल्स यानी Bits (0 और 1) के रूप में तारों या वाई-फाई तरंगों में बहता है। यहाँ Repeater, Hub और केबल्स काम करते हैं.

2. आईपी एड्रेस (IP Address) — ‘कंप्यूटर का डिजिटल आधार कार्ड’

इंटरनेट से जुड़ने वाले हर एक डिवाइस (मोबाइल, लैपटॉप, स्मार्ट टीवी) को दुनिया भर में पहचानने के लिए एक यूनिक नंबर दिया जाता है, जिसे IP (Internet Protocol) Address कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है:

A. IPv4 (Internet Protocol Version 4)

  • साइज: यह 32-बिट (Bits) का एड्रेस होता है।
  • बनावट: इसे 4 भागों (Octets) में बांटा जाता है, जो बिंदुओं (Dots .) से अलग होते हैं। जैसे- 192.168.1.1
  • टेक्निकल रेंज: इसमें इस्तेमाल होने वाले नंबरों की रेंज हमेशा 0 से 255 के बीच ही हो सकती है। (अगर एग्जाम में 256.1.2.3 लिखा आ जाए, तो वह गलत IP होगा)।

B. IPv6 (Internet Protocol Version 6)

  • साइज: चूँकि दुनिया में डिवाइस बहुत बढ़ गए और IPv4 कम पड़ गए, इसलिए 128-बिट (Bits) का नया वर्जन बनाया गया।
  • बनावट: इसे 8 भागों में बांटा जाता है, जो कोलन (Colon :) से अलग होते हैं। इसमें नंबरों के साथ-साथ अक्षरों (Hexadecimal) का भी उपयोग होता है। जैसे- 2001:db8:0:1234:0:567:8:1

🔍 एडवांस एग्जाम क्रैकर बॉक्स (IPv4 vs IPv6 का पोस्टमार्टम)

  • IPv4 = 32 Bits = 4 Bytes (क्योंकि 1 Byte = 8 Bits) ➔ डॉट्स (.) का उपयोग.
  • IPv6 = 128 Bits = 16 Bytes ➔ कोलन (:) का उपयोग.
  • MAC Address: यह कंप्यूटर का फिजिकल एड्रेस होता है जो बदला नहीं जा सकता। यह हमेशा 48-बिट (6 Bytes) का होता है।

3. इंटरनेट के कुछ प्रमुख शब्द और प्रोटोकॉल्स (Internet Terms)

  • 1. DNS (Domain Name System) — ‘इंटरनेट की फोनबुक’: कंप्यूटर सिर्फ नंबर (IP Address) समझता है, लेकिन इंसान के लिए नाम याद रखना आसान है (जैसे google.com)। जब आप ब्राउज़र में google.com लिखते हैं, तो DNS उसे कूटनीति से गूगल के असली सर्वर के IP एड्रेस (जैसे 142.250.190.46) में बदल देता है।
  • 2. URL (Uniform Resource Locator): इंटरनेट पर मौजूद किसी भी फाइल, फोटो या वेबसाइट का जो पूरा अनोखा पता होता है, उसे URL कहते हैं (जैसे- https://example.com)। इसके मुख्य तीन हिस्से होते हैं— Protocol (https), Domain Name (example.com), और Path (notes.html)
  • 3. HTTP / HTTPS: Hypertext Transfer Protocol। यह ब्राउज़र और सर्वर के बीच वेबसाइट का डेटा ट्रांसफर करता है। जब इसके पीछे ‘S’ लग जाता है, तो इसका मतलब होता है Secure। यह सुरक्षा के लिए SSL/TLS सर्टिफिकेट का उपयोग करता है जिससे हैकर्स आपका डेटा बीच में चुरा नहीं सकते।

4. साइबर सिक्योरिटी और मैलवेयर (Cyber Security & Malware)

इंटरनेट पर आपके कंप्यूटर को नुकसान पहुँचाने वाले हानिकारक प्रोग्राम्स को टेक्निकल भाषा में Malware (Malicious Software) कहा जाता है। एग्जाम्स में इनके बीच के बारीक अंतर पूछे जाते हैं:

  • A. Virus (वायरस): इसका फुल फॉर्म है— Vital Information Resources Under Siege। यह खुद से नहीं फैल सकता। जब यूजर किसी संक्रमित फाइल को डाउनलोड करता है या पेन ड्राइव लगाता है, तब यह कंप्यूटर में फैलता है और फाइलों को डिलीट या करप्ट कर देता है। (एग्जाम फैक्ट: दुनिया का पहला पीसी वायरस ‘Brain’ था और पहला नेटवर्क वायरस ‘Creeper’ था)।
  • B. Worm (वॉर्म — सबसे खतरनाक): यह वायरस का बड़ा भाई है, लेकिन यह बहुत शातिर है। इसे फैलने के लिए किसी इंसानी मदद या फाइल की जरूरत नहीं होती। यह नेटवर्क की कमियों को ढूंढकर खुद की लाखों कॉपियां (Self-Replicating) बनाता जाता है। यह फाइलों को डिलीट नहीं करता, बल्कि इतनी कॉपियां बना देता है कि कंप्यूटर की रैम और हार्ड डिस्क पूरी भर जाती है और कंप्यूटर एकदम हैंग या क्रैश हो जाता है।
  • C. Trojan Horse (ट्रोजन हॉर्स — बहरूपिया): यह एक ऐसा धोखा देने वाला सॉफ्टवेयर है जो बाहर से देखने पर बहुत ही उपयोगी और सुरक्षित लगता है (जैसे- कोई फ्री एंटीवायरस या गेम)। लेकिन जैसे ही यूजर इसे डाउनलोड करके इंस्टॉल करता है, यह बैकग्राउंड में कंप्यूटर का सारा गुप्त रास्ता हैकर्स के लिए खोल देता है।
  • D. Spyware (स्पाइवेयर / कीलोगर): यह कंप्यूटर में छिपकर बैठ जाता है और यूजर की जासूसी (Spying) करता है। इसका सबसे खतरनाक रूप है Keylogger। आप कीबोर्ड पर जो भी बटन दबाते हैं (जैसे आपका नेट बैंकिंग का पासवर्ड या यूजरनेम), यह उन सभी की-स्ट्रोक्स को रिकॉर्ड करके चुपके से हैकर के पास भेज देता है।

क्विक हैक बॉक्स (भाग-2 का सबसे इम्पॉर्टेंट मलाई मटीरियल)

  • OSI मॉडल का दिल ➔ Transport Layer (सेगमेंटेशन का काम)।
  • आईपी एड्रेस और रास्ता (Routing) दिखाने वाली लेयर ➔ Network Layer
  • IPv4 का साइज = 32 बिट, IPv6 का साइज = 128 बिट
  • कंप्यूटर का परमानेंट फिजिकल एड्रेस ➔ MAC Address (48 बिट)
  • बहरूपिया सॉफ्टवेयर ➔ Trojan Horse
  • खुद की कॉपियां बनाकर मेमोरी भरने वाला कीड़ा ➔ Worm

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