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समास, भेद और समास विग्रह

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1. समास किसे कहते हैं? (परिभाषा)

जब दो या दो से अधिक शब्द आपस में मिलकर एक नया और छोटा शब्द बनाते हैं, तो शब्दों को संक्षिप्त (छोटा) करने की इस विधि या प्रक्रिया को समास कहते हैं।

  • मुख्य उद्देश्य: कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ प्रकट करना।
  • उदाहरण: ‘राजा का पुत्र’ कहने के स्थान पर यदि हम ‘राजपुत्र’ कहते हैं, तो बात अधिक संक्षिप्त और सुंदर लगती है।

समास के दो मुख्य अंग (पद):

समास प्रक्रिया में मुख्य रूप से दो पद होते हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है:

  1. पूर्वपद: समास के पहले शब्द को पूर्वपद कहा जाता है।
  2. उत्तरपद: समास के दूसरे या अंतिम शब्द को उत्तरपद कहा जाता है।
  3. समस्त पद (सामासिक पद): इन दोनों पदों के मेल से जो नया और छोटा शब्द बनता है, उसे समस्त पद कहते हैं।

2. समास विग्रह क्या है?

सामासिक पद (समस्त पद) के सभी शब्दों को पुनः अलग-अलग करने और उनके बीच के संबंध को स्पष्ट करने की प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं।

  • उदाहरण 1: रसोईघर (समस्त पद) ➡️ विग्रह करने पर: रसोई के लिए घर
  • उदाहरण 2: चौराहा (समस्त पद) ➡️ विग्रह करने पर: चार राहों का समूह

3. समास के भेद

हिंदी व्याकरण में समास के मुख्य रूप से 6 भेद होते हैं। आइए, प्रत्येक भेद को उदाहरण और पहचान के नियमों के साथ विस्तार से समझते हैं:

                      ┌─────────────── समास के 6 भेद ───────────────┐
                      │                                             │
    ┌─────────────────┴─────────────────┐         ┌─────────────────┴─────────────────┐
    │ 1. अव्ययीभाव समास                 │         │ 4. द्वंद्व समास                  │
    │ 2. तत्पुरुष समास                  │         │ 5. कर्मधारय समास                 │
    │ 3. द्विगु समास                    │         │ 6. बहुव्रीहि समास                │
    └───────────────────────────────────┘         └───────────────────────────────────┘

1. अव्ययीभाव समास

पहचान का नियम: इस समास में पहचान का पहला पद (पूर्वपद) प्रधान होता है और वह कोई ‘अव्यय’ या ‘उपसर्ग’ होता है। इसके अतिरिक्त, यदि एक ही शब्द की बार-बार आवृत्ति (दोहराव) हो, तो वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है।

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • आजीवन ➡️ जीवन भर
  • प्रतिदिन ➡️ प्रत्येक दिन (हर दिन)
  • यथाशक्ति ➡️ शक्ति के अनुसार
  • रातोंरात ➡️ रात ही रात में
  • आमरण ➡️ मरण तक

2. तत्पुरुष समास

पहचान का नियम: इस समास में दूसरा पद (उत्तरपद) प्रधान होता है। सामासिक पद बनाते समय दोनों पदों के बीच की कारक-विभक्तियों (जैसे- को, से, के लिए, का, की, के, में, पर) का लोप (गायब) हो जाता है… विग्रह करने पर ये कारक चिह्न पुनः प्रकट हो जाते हैं।

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • राजपुत्र ➡️ राजा का पुत्र (संबंध तत्पुरुष)
  • देशभक्ति ➡️ देश के लिए भक्ति (सम्प्रदान तत्पुरुष)
  • घड़सवार ➡️ घोड़े पर सवार (अधिकरण तत्पुरुष)
  • रोगमुक्त ➡️ रोग से मुक्त (अपादान तत्पुरुष)
  • गगनचुंबी ➡️ गगन को चूमने वाला (कर्म तत्पुरुष)

3. द्विगु समास

पहचान का नियम: इस समास का पहचान का पहला पद (पूर्वपद) hamesha कोई संख्यावाचक विशेषण (नंबर) होता है। यह पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है।

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • नवग्रह ➡️ नौ ग्रहों का समूह
  • त्रिलोक ➡️ तीन लोकों का समाहार
  • चौराहा ➡️ चार राहों का मिलने का स्थान
  • तिरंगा ➡️ तीन रंगों का समूह
  • सप्ताह ➡️ सात दिनों का समूह

4. द्वंद्व समास

पहचान का नियम: इस समास में दोनों ही पद समान रूप से प्रधान होते हैं। इसमें कोई भी पद छोटा या बड़ा नहीं होता। सामासिक पदों के बीच में प्रायः योजक चिह्न (-) लगा होता है, और विग्रह करने पर बीच में ‘और’, ‘या’, अथवा ‘अथवा’ आता है। यह अधिकांशतः एक-दूसरे के विलोम (उल्टे) होते हैं।

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • माता-पिता ➡️ माता और पिता
  • पाप-पुण्य ➡️ पाप या पुण्य
  • दिन-रात ➡️ दिन और रात
  • खट्टा-मीठा ➡️ खट्टा और मीठा
  • सुख-दुःख ➡️ सुख और दुःख

कर्मधारय समास

पहचान का नियम: इस समास में एक पद ‘विशेषण’ (विशेषता बताने वाला) और दूसरा पद ‘विशेष्य’ (जिसकी विशेषता बताई जाए) होता है। अथवा इसमें एक पद की तुलना दूसरे पद से की जाती है (उपमेय और उपमान)। विग्रह करने पर दोनों पदों के बीच में ‘है जो’ या ‘के समान’ शब्द आते हैं।

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • नीलकमल ➡️ नीला है जो कमल (कमल की विशेषता है कि वह नीला है)
  • चरणकमल ➡️ कमल के समान चरण (चरणों की तुलना कमल से की गई है)
  • महात्मा ➡️ महान है जो आत्मा
  • चन्द्रमुख ➡️ चन्द्रमा के समान मुख
  • विद्याधन ➡️ विद्या रूपी धन

बहुव्रीहि समास

पहचान का नियम: इस समास में न तो पहला पद प्रधान होता है और न ही दूसरा पद। बल्कि ये दोनों पद मिलकर किसी तीसरे अन्य अर्थ (विशेष व्यक्ति या पौराणिक देवी-देवता) की ओर संकेत करते हैं

सामासिक पद और उनका विग्रह:

  • दशानन ➡️ दस हैं आनन (मुख) जिसके अर्थात—रावण
  • लंबोदर ➡️ लंबा है उदर (पेट) जिसका अर्थात—गणेश जी
  • पीताम्बर ➡️ पीले हैं वस्त्र जिसके अर्थात—श्री कृष्ण / विष्णु जी
  • गंगाधर ➡️ गंगा को धारण करने वाले हैं जो अर्थात—शिव जी
  • चतुर्भुज ➡️ चार हैं भुजाएँ जिसकी अर्थात—विष्णु जी

परीक्षार्थियों के लिए विशेष

परीक्षाओं में अक्सर कुछ सामासिक पदों को लेकर छात्र भ्रमित हो जाते हैं। इन मुख्य अंतरों को ध्यान से समझें:

अंतर 1: द्विगु समास और बहुव्रीहि समास में अंतर

  • उदाहरण: दशानन (इसमें पहला पद ‘दस’ संख्या है, तो यह द्विगु होना चाहिए, परंतु यह रावण के लिए रूढ़ है)।
  • नियम: यदि किसी पद में संख्या भी हो और उससे कोई तीसरा विशेष अर्थ भी निकल रहा हो, तो वहाँ हमेशा बहुव्रीहि समास ही सही माना जाएगा।

अंतर 2: कर्मधारय समास और बहुव्रीहि समास में अंतर

  • उदाहरण: पीताम्बर (यदि हम विग्रह करें ‘पीला है जो अम्बर/वस्त्र’ तो यह कर्मधारय है। यदि हम कहें ‘पीले हैं वस्त्र जिसके अर्थात कृष्ण’ तो यह बहुव्रीहि है)।
  • नियम: यदि परीक्षा के बहुविकल्पीय प्रश्नों में कर्मधारय और बहुव्रीहि दोनों विकल्प दिए हों, तो प्राथमिकता हमेशा बहुव्रीहि समास को ही दी जानी चाहिए।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिका (Quick Revision Table)

समास का नामसंक्षिप्त पहचान सूत्रसटीक उदाहरण
अव्ययीभाव समासप्रथम पद अव्यय, उपसर्ग या शब्द की पुनरावृत्तियथाशक्ति, रातोंरात
तत्पुरुष समासउत्तरपद प्रधान, विग्रह करने पर कारक चिह्नों का आगमनराजपुत्र, रोगमुक्त
द्विगु समासप्रथम पद अनिवार्य रूप से संख्यावाचक (नंबर)चौराहा, त्रिलोक
द्वंद्व समासदोनों पद प्रधान, योजक चिह्न (-), विग्रह में ‘और/या’माता-पिता, दिन-रात
कर्मधारय समासविशेषण-विशेष्य का संबंध, उपमा या तुलनानीलकमल, चन्द्रमुख
बहुव्रीहि समासदोनों पद अप्रधान, किसी तीसरे विशेष अर्थ का बोधलंबोदर, दशानन

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