अलवर का नरूका राजवंश मूल रूप से आमेर-जयपुर के कछवाहा राजवंश की ही एक उप-शाखा (Offshoot) है। आमेर के राजा उदयकरण (14वीं सदी) के पुत्र ‘राव नरू’ के नाम पर यह कबीला ‘नरूका’ कहलाया। नरूका शाखा के वीरों ने अपनी तलवार के बल पर जयपुर रियासत से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी। अलवर के शासकों की मूल उपाधि ‘राव राजा’ और बाद में ‘महाराजा’ हुई। इनका राजकीय चिन्ह कछवाहों की तरह ही पंचरंगा झंडा रहा है।
1. राव राजा प्रताप सिंह — अलवर साम्राज्य के दूरदर्शी संस्थापक (1775 ई. – 1791 ई.)
- शासनकाल: 1775 ईस्वी से 1791 ईस्वी तक।
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: ये कछवाहों की नरूका शाखा के अंतर्गत माचैड़ी (अलवर) के जागीरदार ‘राव मोहब्बत सिंह’ के पुत्र थे। प्रारंभ में ये जयपुर दरबार के अधीन एक निष्ठावान सामंत थे।
- स्वतंत्र अलवर राज्य की स्थापना का इतिहास:
- जयपुर से मतभेद: जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम के काल में प्रताप सिंह के बढ़ते सैन्य प्रभाव के कारण जयपुर दरबार के कुछ सामंत इनसे ईर्ष्या करने लगे। कूटनीतिक मतभेदों के चलते प्रताप सिंह जयपुर छोड़कर कुछ समय के लिए भरतपुर के जाट राजा जवाहर सिंह की शरण में चले गए।
- सामरिक कूटनीति: जब कछवाहा राजा पृथ्वी सिंह के काल में जयपुर रियासत मराठों के आक्रमणों और आंतरिक कलह से कमजोर हो गई, तो प्रताप सिंह ने वापस आकर जयपुर की सेना की मदद की। इस सहायता के बदले जयपुर ने इन्हें माचैड़ी की जागीर पुनः सौंप दी।
- मुग़ल सनद और स्वतंत्रता (1775 ई.): प्रताप सिंह ने मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय के वजीर ‘नजफ खां’ की सैन्य सहायता कर मुगलों का विश्वास जीता। मुग़ल सम्राट ने इनकी अदम्य सैन्य क्षमता से प्रभावित होकर इन्हें ‘राव राजा’ की प्रतिष्ठित वंशानुगत उपाधि दी और ‘पंचहजारी’ (5000) का मनसब प्रदान किया। इस मुग़ल मान्यता (सनद) का लाभ उठाकर 25 नवंबर 1775 ई. को प्रताप सिंह ने जयपुर की अधीनता को पूरी तरह खारिज करते हुए एक स्वतंत्र अलवर राज्य की घोषणा कर दी।
- साम्राज्य विस्तार व स्थापत्य:
- इन्होंने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘बाला किला’ (अलवर का मुख्य दुर्ग) पर पूर्ण अधिकार किया और अलवर को अपने नए राज्य की स्थाई राजधानी बनाया।
- इन्होंने अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए राजगढ़ और माचैड़ी में सुदृढ़ किलों का निर्माण करवाया। इनके शासनकाल में ही अलवर में स्वतंत्र प्रशासनिक और राजस्व प्रणाली की शुरुआत हुई। 26 नवंबर 1791 को राजगढ़ दुर्ग में इस महान दूरदर्शी संस्थापक का स्वर्गवास हुआ। चूंकि ये निःसंतान थे, इसलिए इनके भाई के पुत्र बख्तावर सिंह को उत्तराधिकारी चुना गया।
2. राव राजा बख्तावर सिंह — ब्रिटिश सत्ता से हाथ मिलाने वाले प्रथम (1791 ई. – 1815 ई.)
- शासनकाल: 1791 ईस्वी से 1815 ईस्वी तक।
- उपनाम व साहित्यिक परिचय: ये एक प्रकंड विद्वान और कवि थे। ये भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे और ब्रजभाषा में ‘बख्तेश’ उपनाम से अत्यंत सुंदर धार्मिक और श्रृंगारिक कविताओं की रचना करते थे। इनके लिखे पद आज भी प्रामाणिक माने जाते हैं।
- लसवारी का युद्ध और ऐतिहासिक अंग्रेज़ी संधि (1803 ई.):
- लसवारी का महायुद्ध (1 नवंबर 1803): इनके काल की सबसे बड़ी सामरिक घटना अलवर की धरती पर लड़ा गया ‘लसवारी का युद्ध’ था। इस युद्ध में दौलतराव सिंधिया की शक्तिशाली मराठा सेना और लॉर्ड लेक की ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) की सेना के बीच भयंकर आमना-सामना हुआ था। बख्तावर सिंह ने कूटनीति का परिचय देते हुए मराठों के विरुद्ध अंग्रेजों को रसद और सैन्य सहायता प्रदान की, जिससे मराठों की करारी हार हुई।
- राजपूताना की पहली रक्षात्मक संधि: इस सैन्य सहायता से गद्गद होकर ब्रिटिश सरकार ने 14 नवंबर 1803 ई. को अलवर रियासत के साथ ‘आक्रामक और रक्षात्मक सहायक संधि’ (Offensive and Defensive Treaty) की। संपूर्ण राजपूताना के इतिहास में अंग्रेजों के साथ इस प्रकार की विधिवत रक्षात्मक संधि करने वाली अलवर पहली रियासत बनी (चूंकि भरतपुर की संधि केवल व्यापारिक और सामान्य थी, जबकि अलवर की संधि पूर्ण सैन्य सुरक्षा की गारंटी थी)।
- धार्मिक सहिष्णुता व सामाजिक कार्य:
- बख्तावर सिंह ने अपनी सीमाओं का विस्तार कर तिजारा, शाहजहाँपुर और बानसूर को अलवर में मिलाया। इन्होंने जैन और हिंदू मंदिरों को जागीरें दान दीं।
- सती प्रथा की ऐतिहासिक घटना: सन 1815 ईस्वी में जब बख्तावर सिंह का निधन हुआ, तो उनकी अत्यधिक प्रिय पासवान (रानी) ‘मूसी महारानी’ तर्पण करते हुए उनकी चिता पर जीवित बैठकर सती (अनुमरण) हो गईं। यह घटना आगे चलकर अलवर के स्थापत्य का मुख्य केंद्र बनी।
3. महाराव राजा विनय सिंह — स्थापत्य, कला और न्याय का स्वर्णकाल (1815 ई. – 1857 ई.)
- शासनकाल: 1815 ईस्वी से 1857 ईस्वी तक।
- उपनाम: स्थानीय लोकमानस और इतिहास में इन्हें ‘बन्ने सिंह’ के नाम से भी जाना जाता है। ये राव राजा बख्तावर सिंह के दत्तक पुत्र थे। इनके प्रारंभिक शासनकाल में इनके चचेरे भाई बलवंत सिंह के साथ गद्दी को लेकर विवाद हुआ था, जिसे अंग्रेजों ने मध्यस्थता कर सुलझाया और विनय सिंह पूर्ण राजा बने।
- अलवर का सांस्कृतिक और स्थापत्य स्वर्णिम युग:
- विनय सिंह का काल अलवर के इतिहास में वास्तुकला, चित्रकला और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था का स्वर्णकाल माना जाता है।
- मूसी महारानी की छतरी (80 खंभों की छतरी): इन्होंने अपने पिता बख्तावर सिंह और उनकी सती हुई पासवान ‘मूसी महारानी’ की पावन स्मृति में अलवर राजप्रासाद (सिटी पैलेस) के ठीक पीछे 80 खंभों की एक अत्यंत भव्य दो-मंजिला छतरी का निर्माण करवाया। लाल बलुआ पत्थरों (प्रथम मंजिल) और सफेद संगमरमर (द्वितीय मंजिल) के बेजोड़ मेल से बनी इस छतरी की छतों पर सोने के पानी से रामायण और महाभारत के सजीव भित्ति चित्र (Frescoes) उकेरे गए हैं, जो पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है।
- सिलीसेढ़ झील का निर्माण (1845 ई.): इन्होंने अपनी बेहद खूबसूरत रानी ‘शीला’ के लिए अलवर की पहाड़ियों के पानी को रोककर प्रसिद्ध ‘सिलीसेढ़ झील’ का निर्माण करवाया और उसके किनारे 6 मंजिला भव्य समर पैलेस (शाही महल) बनवाया। इस प्राकृतिक और स्थापत्य वैभव के कारण ही इस झील को ‘राजस्थान का नंदनकानन’ कहा जाता है।
- चित्रकला व साहित्य का विकास:
- विनय सिंह को दुर्लभ और कीमती हस्तलिखित ग्रंथों का संग्रह करने का शौक था। इन्होंने अपने शाही पुस्तकालय (Library) के लिए प्रसिद्ध फारसी कवि शेख सादी द्वारा रचित ग्रंथ ‘गुलिस्तां’ (Gulistan) की एक अत्यंत दुर्लभ सचित्र प्रति तैयार करवाई। इस ग्रंथ को लिखने के लिए दिल्ली से महान सुलेखक (Calligraphers) बुलाए गए थे और इसके पन्नों पर सोने की शुद्ध स्याही और बेशकीमती हीरे-पन्ना के रंगों का प्रयोग किया गया था। उस दौर में इसकी निर्माण लागत एक लाख रुपये से अधिक आई थी।
- इनके दरबार में दिल्ली के प्रसिद्ध चित्रकार ‘गुलाम अली खां’ और ‘बलदेव’ रहते थे। इन्हीं के संरक्षण में ‘अलवर चित्रशैली’ में वेश्याओं (नर्तकियों) के चित्र, योगासन के चित्र और हाथियों के दांत की पट्टियों पर बारीक नक्काशी के चित्र बनाने की स्वतंत्र परंपरा शुरू हुई।
- 1857 की प्रथम क्रांति में योगदान:
- मई 1857 की क्रांति के समय विनय सिंह गंभीर रूप से बीमार और मृत्युशैया पर थे। इसके बावजूद, अंग्रेजों के साथ की गई संधि का पालन करते हुए इन्होंने अपने वफादार सैनिकों और तोपखाने की एक बड़ी टुकड़ी अंग्रेजों की रक्षा के लिए आगरा भेजी। हालांकि, रास्ते में ही अचनेरा (भरतपुर सीमा) के पास क्रांतिकारियों ने अलवर की इस सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। क्रांति के इसी दौर में, अगस्त 1857 में इस महान कला-पारखी शासक का निधन हो गया।
4. महाराव राजा शिवदान सिंह — विलासिता, कुप्रशासन और अंग्रेज़ी दखल (1857 ई. – 1874 ई.)
- शासनकाल: 1857 ईस्वी से 1874 ईस्वी तक।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व अंग्रेज़ी नियंत्रण:
- अपने पिता विनय सिंह की मृत्यु के बाद जब शिवदान सिंह गद्दी पर बैठे, तो उनकी आयु मात्र 12 वर्ष की थी। राजा के अल्पायु होने का लाभ उठाकर ब्रिटिश सरकार ने अलवर के प्रशासन को पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया और वहाँ के पोलिटिकल एजेंट ‘कैप्टन इम्पे’ (Captain Impey) को सर्वेसर्वा बना दिया।
- कैप्टन इम्पे ने चालाकी से अलवर के प्रशासनिक ढांचे में अंग्रेज़ी नियमों को लागू किया और उर्दू व फारसी को राजभाषा का मुख्य दर्जा दिलवाया, जिससे स्थानीय राजपूत सामंत अंग्रेजों के विरोधी हो गए।
- विलासिता और सामंती दमन का इतिहास:
- वयस्क होने पर महाराव राजा शिवदान सिंह ने राजपाठ पर ध्यान देने के बजाय खुद को पूरी तरह विलासिता और कामुक आमोद-प्रमोद में झोंक दिया। वे दिल्ली और मुग़ल दरबार के पतन के बाद आई वेश्याओं और मुस्लिम नर्तकियों के प्रभाव में इस कदर आ गए कि राज्य का खजाना पानी की तरह बहा दिया गया।
- इनके कुप्रशासन और अत्यधिक टैक्स लगाने के विरोध में अलवर की मूल नरूका और कछवाहा जागीरदारों (जैसे— माचैड़ी, थाना और नीमराणा के सामंतों) ने 1870 ई. में राजा के खिलाफ एक खुला हिंसक विद्रोह कर दिया।
- स्थिति को नियंत्रण से बाहर जाते देख ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप किया। औरंगजेब की तर्ज पर अंग्रेज़ों ने शिवदान सिंह के सभी प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार छीन लिए और राज्य का शासन चलाने के लिए ‘काउंसिल ऑफ रीजेंसी’ (Council of Regency) नामक एक अंग्रेज़ी प्रशासनिक समिति की स्थापना कर दी। राजा नाममात्र के रह गए और इसी मानसिक अवसाद व अत्यधिक विलासिता के कारण 1874 ई. में बिना किसी संतान के इनका निधन हो गया।
5. महाराजा मंगल सिंह — आधुनिक मेयो कॉलेज के प्रथम छात्र (1874 ई. – 1592 ई.)
- शासनकाल: 1874 ईस्वी से 1892 ईस्वी तक।
- उपनाम व ‘महाराजा’ की उपाधि:
- शिवदान सिंह की निःसंतान मृत्यु के बाद, अलवर के प्रमुख जागीरदारों और अंग्रेज़ों की सहमति से ‘थाना’ जागीर के कुंवर मंगल सिंह को गोद लेकर अलवर का नया राजा चुना गया। चूंकि ये अंग्रेज़ों की देखरेख में राजा बने थे, इसलिए ये ब्रिटिश साम्राज्य के पक्के वफादार रहे।
- ‘महाराजा’ की उपाधि: इनकी वफादारी और कूटनीतिक सेवाओं से अत्यधिक प्रसन्न होकर सन 1889 ईस्वी में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने इन्हें ‘महाराजा’ की सर्वोच्च, स्थाई और वंशानुगत उपाधि प्रदान की। इससे पूर्व अलवर के सभी शासक अपने नाम के आगे ‘राव राजा’ या ‘महाराव राजा’ लिखते थे, लेकिन मंगल सिंह के बाद से वे ‘महाराजा’ कहलाने लगे।
- मेयो कॉलेज (अजमेर) का ऐतिहासिक रिकॉर्ड:
- अंग्रेज़ों ने भारत के राजा-महाराजाओं के बेटों को पाश्चात्य (Western) शिक्षा देने के लिए अजमेर में प्रसिद्ध मेयो कॉलेज (Mayo College) की स्थापना की थी। सन 1875 ईस्वी में जब इस कॉलेज की शुरुआत हुई, तो इसमें प्रवेश लेने वाले (Roll Number 1) और वहाँ शिक्षा ग्रहण करने वाले संपूर्ण भारतवर्ष के सबसे पहले छात्र महाराजा मंगल सिंह ही थे। मेयो कॉलेज के मुख्य भवन में आज भी उनकी स्मृति सुरक्षित है।
- प्रशासनिक व आधुनिक सुधार:
- इन्होंने अलवर में शिक्षा और न्याय व्यवस्था का आधुनिकरण किया। सन 1888 ई. में इन्होंने भारत के गवर्नर जनरल के सम्मान में अलवर में प्रसिद्ध ‘लंदन लॉर्ड लैंड्सडाउन हॉस्पिटल’ और स्कूलों की स्थापना की।
- इन्होंने अंग्रेज़ों के साथ ‘इम्पीरियल सर्विस ट्रूप्स’ (Imperial Service Troops) की संधि की, जिसके तहत अलवर की सेना को आधुनिक अंग्रेज़ी हथियारों से लैस किया गया। सन 1892 ई. में इनका अचानक निधन हो गया।
6. महाराजा जय सिंह — राजपूताना का सबसे बुद्धिमान, राष्ट्रवादी और विद्रोही राजा (1892 ई. – 1937 ई.)
- शासनकाल: 1892 ईस्वी से 1937 ईस्वी तक।
- ऐतिहासिक परिचय व ओजस्वी राष्ट्रवाद:
- महाराजा जय सिंह का नाम आते ही राजपूताना का एक ऐसा प्रखर चेहरा सामने आता है जो प्रकांड विद्वान, अद्भुत वक्ता (Orator), परम सनातनी और अंग्रेज़ों की आँखों में आँखें डालकर बात करने वाला शासक था। वे अंग्रेज़ी और संस्कृत के इतने बड़े विद्वान थे कि लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों (Round Table Conferences) में जब वे अंग्रेज़ी में भाषण देते थे, तो ब्रिटिश प्रधानमंत्री और जज खड़े होकर तालियाँ बजाने पर मजबूर हो जाते थे। वे खुद को स्वामी विवेकानंद के विचारों का सच्चा अनुयायी मानते थे।
- रोल्स रॉयस (Rolls Royce) कार और झाड़ू का प्रसिद्ध इतिहास:
- महाराजा जय सिंह से जुड़ा एक अंतरराष्ट्रीय प्रसंग पूरी दुनिया के ऑटोमोबाइल इतिहास में अमर है। सन 1920 के दशक में लंदन यात्रा के दौरान जय सिंह बिल्कुल साधारण कपड़ों में बांड स्ट्रीट स्थित दुनिया की सबसे महंगी कार कंपनी ‘रोल्स रॉयस’ (Rolls Royce) के शोरूम में गए। वहाँ तैनात अंग्रेज़ सेल्समैन ने इन्हें एक साधारण और गरीब भारतीय समझकर अपमानित किया और शोरूम से बाहर निकाल दिया।
- महाराजा चुपचाप अपने होटल लौटे। अगले दिन इन्होंने राजा की शाही पोशाक पहनी, अपने नौकरों के साथ पूरे ठाट-बाट से उसी शोरूम में पहुँचे। अंग्रेज़ों ने इन्हें पहचान नहीं पाया और रेड कार्पेट बिछाया। जय सिंह ने एक साथ शोरूम में खड़ी सभी 6 आलीशान रोल्स रॉयस कारें नगद भुगतान करके खरीद लीं और उन्हें तुरंत अलवर मंगवाया।
- कारें जैसे ही अलवर पहुँचीं, महाराजा ने अपनी संप्रभुता दिखाते हुए आदेश जारी किया कि इन सभी छह लग्जरी कारों का उपयोग राजा की सवारी के लिए नहीं, बल्कि अलवर नगर परिषद का कचरा (कूड़ा-करकट) और मैला साफ करने के काम में किया जाए। कारों के आगे बड़े-बड़े झाड़ू बांध दिए गए। जब यह खबर लंदन के अखबारों और पूरी दुनिया में फैली, तो रोल्स रॉयस कंपनी की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। अमीर लोगों ने रोल्स रॉयस खरीदना बंद कर दिया क्योंकि भारत में इसका उपयोग कचरा उठाने के लिए हो रहा था। अंततः कंपनी के मालिकों ने लिखित में महाराजा जय सिंह से माफी मांगी और मुफ्त में 6 नई कारें देने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद ही महाराजा ने कारों को कचरा साफ करने के काम से हटाया।
- नीमूचाणा किसान आंदोलन (14 मई 1925) — राजस्थान का जलियांवाला:
- जय सिंह के शासनकाल का सबसे काला और वीभत्स अध्याय सन 1925 में दर्ज हुआ। महाराजा ने अपनी विलासिता और निर्माण कार्यों के लिए राजपूत और अन्य किसानों पर अचानक लगान (भू-राजस्व) की दरें अत्यधिक बढ़ा दीं और जंगलों में सूअरों को पालने पर रोक लगा दी जो किसानों की फसलें बर्बाद करते थे।
- इसके विरोध में 14 मई 1925 ई. को अलवर की बानसूर तहसील के ‘नीमूचाणा’ (Nimuchana) गांव में हजारों किसान एक शांतिपूर्ण आम सभा कर रहे थे। महाराजा के क्रूर और निर्दयी सैन्य कमांडर ‘कमांडिंग जनरल छज्जू सिंह’ ने बिना किसी चेतावनी के पूरे गांव को घेर लिया और मशीनगनों से निहत्थे किसानों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। इस भीषण गोलाबारी में 150 से अधिक किसान मौके पर ही शहीद हो गए और पूरा गांव जलकर खाक हो गया।
- इस भयंकर नरसंहार की गूंज पूरे देश में हुई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ में इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे “जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी अधिक वीभत्स और दोहरी डायरशाही” (Dyrism Double Distilled) की संज्ञा दी थी। इतिहास में जनरल छज्जू सिंह को ‘राजस्थान का जनरल डायर’ कहा जाता है। इस कांड के बाद महाराजा को चौतरफा विरोध का सामना करना पड़ा।
- सांप्रदायिक दंगे और अंग्रेज़ों द्वारा देश-निकाला (1933 ई.):
- महाराजा जय सिंह अंग्रेज़ अधिकारियों से हाथ मिलाते समय हमेशा दस्ताने (Gloves) पहनते थे क्योंकि वे अंग्रेज़ों को ‘म्लेच्छ’ (अछूत) समझते थे, जिससे ब्रिटिश सरकार इनसे अंदर ही अंदर भयंकर चिढ़ती थी और इन्हें हटाने का मौका ढूंढ रही थी।
- सन 1932-33 ई. में अलवर के ‘तिजारा’ (Tijara) कस्बे में अचानक भयंकर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगे भड़क गए, जिसे दबाने में अलवर प्रशासन असफल रहा। अंग्रेज़ों ने कूटनीति का सहारा लेते हुए दंगों का पूरा दोष महाराजा की हिंदूवादी नीतियों पर मढ़ दिया।
- मई 1933 में ब्रिटिश सेना ने अलवर को अपने सैन्य नियंत्रण में ले लिया और महाराजा जय सिंह को हमेशा के लिए अलवर से निष्कासित (देश-निकाला) कर यूरोप भेज दिया। सन 1937 ई. में पेरिस (फ्रांस) में अत्यंत रहस्यमयी और दुखद परिस्थितियों में इस प्रखर, स्वाभिमानी महाराजा का निधन हुआ। इनकी अंतिम इच्छा के अनुसार इनकी पार्थिव देह को हवाई जहाज से अलवर लाया गया और यहाँ राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की गई।
7. महाराजा तेज सिंह — अंतिम शासक व महात्मा गांधी हत्याकांड का विवाद (1937 ई. – 1948 ई. / विलय तक)
- शासनकाल: 1437 ईस्वी से 1948 ईस्वी (राजस्थान के एकीकरण के प्रथम चरण तक)।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: महाराजा जय सिंह के पेरिस में निःसंतान और निर्वासित मरने के बाद, ब्रिटिश सरकार ने कूटनीति के तहत थाना जागीर के कुंवर तेज सिंह को अलवर की गद्दी पर बिठाया। ये अलवर रियासत के अंतिम आधिकारिक शासक साबित हुए। इनके काल में अलवर में ‘अलवर प्रजामंडल’ आंदोलन (कुंज बिहारी लाल मोदी और हरिनारायण शर्मा के नेतृत्व में) चरम पर पहुँचा, जिन्होंने रियासत में उत्तरदायी शासन की मांग की।
- महात्मा गांधी की हत्या की साजिश का भयंकर आरोप:
- 30 जनवरी 1948 को जब नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गोली मारकर क्रूर हत्या कर दी, तो पूरे देश का प्रशासन हिल गया। भारत सरकार की खुफिया एजेंसियों (IB) ने जब इस हत्याकांड के गुप्त कड़ियों की जांच की, तो एक अत्यंत चौंकाने वाला और भयंकर खुलासा हुआ।
- जांच में यह पाया गया कि महात्मा गांधी की हत्या की साजिश रचने वाला मुख्य आरोपी नाथूराम गोडसे और उसका सहयोगी नारायण आप्टे हत्या से कुछ सप्ताह पहले अलवर आए थे। वे दोनों अलवर के महाराजा तेज सिंह के परम रूढ़िवादी प्रधानमंत्री (दीवान) डॉ. एन.बी. खरे (Dr. N.B. Khare) के सरकारी बंगले पर रुके थे। वहाँ उन्होंने गुप्त बैठकें की थीं और अलवर रियासत के हथियारों व कारतूसों का परीक्षण भी किया था। यह भी आरोप लगा कि अलवर प्रजामंडल के नेताओं को दबाने के लिए राजा और दीवान ने गोडसे के संगठन को वित्तीय सहायता दी थी।
- दिल्ली में नजरबंदी (House Arrest): इस संवेदनशील इनपुट मिलते ही भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया। 7 फरवरी 1948 ई. को भारत सरकार के आदेश पर महाराजा तेज सिंह और उनके दीवान डॉ. एन.बी. खरे को तुरंत दिल्ली बुलाकर नजरबंद (House Arrest) कर लिया गया। अलवर रियासत का पूरा प्रशासनिक नियंत्रण और खजाना सीधे भारत सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि, बाद में दिल्ली की अदालत में चली लंबी कानूनी जांच और मुकदमों में महाराजा तेज सिंह के खिलाफ गांधी जी की हत्या की साजिश में शामिल होने का कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिला, जिसके बाद कोर्ट ने इन्हें ससम्मान बरी कर दिया, लेकिन इनका राजनीतिक रसूख पूरी तरह समाप्त हो चुका था।
- मत्स्य संघ का गठन और भारत संघ में पूर्ण विलय (18 मार्च 1948):
- इस भयंकर विवाद के तुरंत बाद, राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया को तेज किया गया। एकीकरण के प्रथम चरण के तहत 18 मार्च 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली इन चार बड़ी मेवात रियासतों को मिलाकर ‘मत्स्य संघ’ (Matsya Sangha) का ऐतिहासिक गठन किया गया।
- कूटनीतिक और रणनीतिक कारणों से ‘अलवर’ को इस मत्स्य संघ की स्थाई राजधानी बनाया गया। हालांकि, गांधी जी की हत्या के हालिया विवाद और नजरबंदी के कारण महाराजा तेज सिंह को मत्स्य संघ के सर्वोच्च पद ‘राजप्रमुख’ से वंचित कर दिया गया (धौलपुर के महाराजा उदयभान सिंह को राजप्रमुख बनाया गया)।
- बाद में, 15 मई 1949 को ‘के.एम. मुंशी समिति’ की सिफारिशों के आधार पर मत्स्य संघ का पूर्ण विलय ‘संयुक्त बृहत् राजस्थान’ में कर दिया गया। इसी के साथ अलवर का एक स्वतंत्र रियासत के रूप में अस्तित्व हमेशा के लिए समाप्त हो गया और यह आधुनिक राजस्थान राज्य का एक अत्यंत समृद्ध और औद्योगिक रूप से अग्रणी जिला बन गया।
