राजस्थान की बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र : Quick Revision Notes
| नदी का नाम | उद्गम स्थल | सहायक नदियाँ | विशेष विवरण |
|---|---|---|---|
| बनास | खमनौर की पहाड़ियाँ (राजसमंद) | बेड़च, कोठारी, खारी, मैनाल, बांडी, धुंध, मोरेल | इसे ‘वन की आशा’ कहा जाता है। यह पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी (512 किमी) है। यह सवाई माधोपुर में चंबल में मिल जाती है। |
| चंबल | जनापाव की पहाड़ियाँ (म.प्र.) | बनास, कालीसिंध, पार्वती, बामनी, मेज, आलनिया | इसे ‘कामधेनु’ और ‘चर्मण्वती’ कहते हैं। यह राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी है। इस पर विश्व प्रसिद्ध चूलिया जलप्रपात (चित्तौड़गढ़) स्थित है। |
| कालीसिंध | बागली गाँव (देवास, म.प्र.) | परवन, उजाड़, निवाज, आहू | यह झालावाड़ और कोटा में बहती है। गागरोन का किला कालीसिंध और आहू नदी के संगम (सामेलजी) पर स्थित है। |
| आहू | सुसनेर (म.प्र.) | – | यह झालावाड़ के नंदपुर में राजस्थान में प्रवेश करती है और गागरोन में कालीसिंध नदी में मिल जाती है। |
| पार्वती | सिहोर क्षेत्र (विंध्याचल, म.प्र.) | लासी, अंधेरी, रेतरी | यह बारां जिले के करियाहट में प्रवेश करती है। यह कोटा और बारां की सीमा बनाते हुए चंबल में विलीन हो जाती है। |
| परवन | विंध्याचल श्रेणी (म.प्र.) | कालीखाड़, निवाज | यह झालावाड़ के खरीबोर में प्रवेश करती है। शेरगढ़ अभयारण्य और प्रसिद्ध शेरगढ़ किला इसी नदी के किनारे स्थित है। |
| बेड़च | गोगुन्दा की पहाड़ियाँ (उदयपुर) | गाम्भीरी, गुजरी, ओराई | उद्गम स्थल पर इसे ‘आयड़’ नदी कहते हैं। उदयसागर झील के बाद इसका नाम बेड़च हो जाता है। चित्तौड़गढ़ किला बेड़च और गाम्भीरी के संगम पर है। |
| बाणगंगा | बैराठ की पहाड़ियाँ (जयपुर) | पलासन, सूरी | इसे ‘अर्जुन की गंगा’ और ‘रुण्डित नदी’ भी कहते हैं। इसके किनारे मौर्यकालीन बैराठ सभ्यता विकसित हुई थी। |
राजस्थान की बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र : In Details Notes
1. चम्बल नदी : राजस्थान की एकमात्र नित्यवाही नदी
उपनाम : इसे चर्मण्वती, सदानीरा, राजस्थान की कामधेनु भी कहा जाता है।
उद्गम स्थल (Origin): मध्य प्रदेश के महु (इंदौर) के समीप विंध्याचल श्रेणी की जनापाव पहाड़ियों से इसका उद्गम होता है।
प्रवाह का रास्ता : यह नदी भारत की एकमात्र ऐसी नदी है जो दक्षिण से उत्तर की ओर ढाल की विपरीत दिशा में बहती है। मध्य प्रदेश के चार प्रमुख जिलों (महु, उज्जैन, रतलाम और मंदसौर) को सींचती हुई यह चित्तौड़गढ़ जिले के चौरासीगढ़ से राजस्थान की सीमा में प्रवेश करती है।
बहाव वाले जिले: राजस्थान में यह चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली और धौलपुर से होकर गुजरती है।
यमुना में विलय : राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच एक लंबी सीमा बनाने के बाद यह नदी अंत में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के मुरादगंज नामक स्थान पर यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।
लंबाई के आंकड़े: चम्बल की कुल लंबाई 966 किलोमीटर मानी जाती है। इसमें से राजस्थान के भीतर इसका शुद्ध प्रवाह 135 किलोमीटर का है, जबकि यह राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर 250 किलोमीटर तक अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के तहत अंतर-राज्यीय बॉर्डर बनाती है।
चम्बल नदी घाटी परियोजना और इसके 4 प्रमुख बांध
बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए राजस्थान और मध्य प्रदेश की संयुक्त भागीदारी से चम्बल नदी पर चार बड़े बांध बनाए गए हैं। नदी के उद्गम से लेकर समाप्ति की दिशा में (दक्षिण से उत्तर की ओर) इन बांधों का सही क्रम इस प्रकार है:
1. गांधी सागर बांध (मंदसौर, मध्य प्रदेश)
- विशेषता: यह चम्बल श्रृंखला का पहला और एकमात्र ऐसा बांध है जो भौगोलिक रूप से राजस्थान से बाहर (मध्य प्रदेश) स्थित है।
- ऐतिहासिक तथ्य: इस विशाल बांध की नींव देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 7 मार्च 1954 को रखी गई थी और यह 1960 में पूरी तरह क्रियाशील हुआ था।
- बजट और निर्माण: इस बांध के निर्माण का जिम्मा विख्यात कॉन्ट्रैक्टर द्वारका दास अग्रवाल को दिया गया था, जिन्होंने अपनी बेहतरीन इंजीनियरिंग से इसे एशिया का सबसे किफायती (सस्ता) बांध बनाया था। इसमें कुल 19 जल निकासी गेट हैं और यहाँ 23-23 मेगावाट की 5 यूनिट्स से कुल 115 मेगावाट पनबिजली (Hydroelectricity) बनाई जाती है।
2. राणा प्रताप सागर बांध (रावतभाटा, चित्तौड़गढ़)
- विशेषता: राजस्थान की सीमा के भीतर बना यह बांध जल भराव क्षमता और कुल क्षेत्रफल की दृष्टि से पूरे राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है।
- ऊँचाई की तुलना: जहाँ मध्य प्रदेश के गांधी सागर बांध की ऊँचाई 62.17 मीटर (204 फीट) और जल क्षमता 7,322 लाख घन मीटर है, वहीं राणा प्रताप सागर राजस्थान के लिए पानी का सबसे बड़ा बैकअप स्रोत है।
3. जवाहर सागर बांध (कोटा / बूंदी सीमा)
- यह श्रृंखला का तीसरा बांध है जो मुख्य रूप से एक पिक-अप बांध (Pre-dam control) के रूप में कार्य करता है और यहाँ भी पानी के वेग से बिजली बनाई जाती है।
4. कोटा बैराज (कोटा शहर)
- सिंचाई विशेष बांध: चम्बल तंत्र का यह अंतिम बांध केवल और केवल सिंचाई व्यवस्था (Canal System) के लिए आरक्षित है। ध्यान रहे, यहाँ से किसी भी प्रकार की विद्युत (बिजली) का उत्पादन नहीं किया जाता, केवल नहरों द्वारा खेतों तक पानी पहुँचाया जाता है।
चम्बल नदी का विस्तृत जलप्रवाह तंत्र: सहायक नदियाँ, प्रमुख दुर्ग, बांध एवं त्रिवेणी संगम
चम्बल नदी केवल राजस्थान की एकमात्र बारहमासी नदी ही नहीं है, बल्कि इसका अपवाह तंत्र (Drainage System) राज्य में सबसे जटिल और विशाल है। इसकी सहायक नदियाँ मध्य प्रदेश और राजस्थान के विभिन्न जिलों से बहकर इसमें मिलती हैं, जिससे कई ऐतिहासिक दुर्गों, जलप्रपातों और पवित्र संगमों का निर्माण होता है।
1. चम्बल नदी तंत्र के मुख्य भौगोलिक एवं ऐतिहासिक स्थल
- चूलिया जलप्रपात (Chulia Waterfall): चित्तौड़गढ़ जिले के भैंसरोडगढ़ के समीप जब चम्बल नदी में बामनी (ब्राह्मणी) नदी आकर मिलती है, तो वहाँ प्रसिद्ध ‘चूलिया जलप्रपात’ का निर्माण होता है। यह 18 मीटर की ऊँचाई के साथ राजस्थान का सबसे ऊँचा जलप्रपात है।
- गागरोन का किला (जल दुर्ग): झालावाड़ जिले में स्थित यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल ‘गागरोन दुर्ग’ कालीसिंध और आहू नदियों के पवित्र संगम (सामेला) पर बिना किसी नींव के एक सीधी चट्टान पर बना हुआ है। यह राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जल दुर्ग माना जाता है।
- शेरगढ़ का किला: बारां जिले में स्थित ऐतिहासिक ‘शेरगढ़ दुर्ग’ (कोशवर्द्धन किला) परवन नदी के किनारे पर बसा हुआ है।
- रामेश्वरम त्रिवेणी संगम: सवाई माधोपुर जिले के पदरा/पालिया गांव के पास रामेश्वरम नामक धार्मिक स्थल पर तीन नदियां — चम्बल, बनास और सीप आपस में मिलकर एक भव्य ‘त्रिवेणी संगम’ का निर्माण करती हैं।
2. चम्बल की प्रमुख सहायक नदियों का विस्तृत विवरण
A. कालीसिंध नदी
- उद्गम (Origin): मध्य प्रदेश के देवास के निकट बागली गाँव की पहाड़ियों से।
- राजस्थान में प्रवाह: यह झालावाड़ से प्रवेश कर कोटा जिले के नोनेरा (नवनेरा) गाँव में चम्बल नदी में विलीन हो जाती है।
- विशेष बांध: कोटा जिले में इसी नदी पर हरिश्चंद्र सागर बांध परियोजना निर्मित की गई है।
- मुख्य सहायक नदियाँ: आहू, परवन, निवाज, उजाड़, चोली और सोली इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।
- प्रमुख बांध: कोटा संभाग में सिंचाई के लिए इस नदी पर हरिश्चंद्र सागर बांध बनाया गया है।
B. आहू नदी
- उद्गम (Origin): मध्य प्रदेश के सुसनेर (मेहन्दी गाँव) के पास से।
- विलय व सीमा: यह झालावाड़ और कोटा जिले की सीमा पर बहती हुई झालावाड़ के ऐतिहासिक गागरोन के समीप कालीसिंध नदी में मिल जाती है। इसी संगम पर बिना नींव का प्रसिद्ध गागरोन जल दुर्ग स्थित है।
C. परवन नदी
- उद्गम (Origin): मध्य प्रदेश की विंध्याचल श्रेणियों में झालावाड़ जिले (मालवा के पठार मनोहरथाना क्षेत्र) से।
- प्रवाह व विलय: बारां जिले के पलायता/अटा क्षेत्र से होकर गुजरती है और अंत में कालीसिंध की सहायक बनती है। इसी के तट पर शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य और दुर्ग स्थित हैं।
- सहायक नदियाँ: निवाज (नेवज), छापी, कालीखाड़ (घोड़ा पछाड़) और धार इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
- शेरगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य: यह सुरक्षित वन क्षेत्र बारां जिले में परवन नदी के दाएं किनारे पर स्थित है।
- शेरगढ़ दुर्ग (कोशवर्द्धन): यह प्रसिद्ध जल दुर्ग भी इसी अभ्यारण्य के पास परवन नदी के बाएं किनारे पर बना हुआ है।
D. पार्वती नदी
- उद्गम (Origin): मध्य प्रदेश के सिहोर क्षेत्र की विंध्याचल पहाड़ियों से।
- प्रवाह व विलय: बारां के करयाहट नामक स्थान से राजस्थान में प्रवेश करती है और सवाई माधोपुर के पालिया गाँव के पास चम्बल नदी में समाहित हो जाती है।
- सहायक नदियाँ: इसकी मुख्य सहायक नदियाँ अंधेरी, रेतीली, अहेली, ल्हासी, बैथली, विलास और कूल हैं।
- पार्वती परियोजना: ध्यान रहे, ‘पार्वती सिंचाई परियोजना’ राजस्थान के धौलपुर जिले में संचालित है (नदी बारां में बहती है, पर परियोजना धौलपुर में है, इसे परीक्षा के लिए विशेष याद रखें).
E. बनास नदी (वन की आशा)
- उद्गम (Origin): राजसमंद जिले की खमनौर पहाड़ियों से।
- विशेषता: यह चम्बल की सबसे बड़ी सहायक नदी है। टोंक जिले में इस नदी पर राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना बीसलपुर बांध बनी हुई है।
चम्बल नदी तंत्र के प्रमुख बांध एवं परियोजनाएं
| क्र.सं. | परियोजना / बांध / संगम का नाम | संबंधित मुख्य नदी | संबंधित जिला / स्थान | विशेष परीक्षा उपयोगी तथ्य |
|---|---|---|---|---|
| 1 | गांधी सागर बांध | चम्बल नदी | मंदसौर (मध्य प्रदेश) | चम्बल परियोजना का पहला और सबसे बड़ा बांध। |
| 2 | राणा प्रताप सागर बांध | चम्बल नदी | रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) | भराव क्षमता में राजस्थान का प्रथम बांध। |
| 3 | जवाहर सागर बांध | चम्बल नदी | कोटा | यह एक मुख्य पिकअप बांध व जल विद्युत केंद्र है। |
| 4 | कोटा बैराज | चम्बल नदी | कोटा | केवल सिंचाई और नहर प्रणाली के लिए उपयोगी बांध। |
| 5 | बीसलपुर बांध | बनास नदी | टोंक | जयपुर, अजमेर और टोंक की मुख्य पेयजल जीवन रेखा। |
| 6 | हरिश्चंद्र सागर परियोजना | कालीसिंध नदी | कोटा | कोटा संभाग के खेतों के लिए महत्वपूर्ण सिंचाई योजना। |
| 7 | गागरोन दुर्ग (संगम) | कालीसिंध + आहू | झालावाड़ | राजस्थान का प्रसिद्ध बिना नींव वाला जल दुर्ग। |
| 8 | शेरगढ़ दुर्ग | परवन नदी | बारां | इसे ऐतिहासिक रूप से ‘कोशवर्द्धनगढ़’ भी कहते हैं। |
| 9 | रामेश्वरम संगम | चम्बल + बनास + सीप | सवाई माधोपुर | राजस्थान के प्रसिद्ध त्रिवेणी संगमों में से एक। |
चम्बल का डांग एवं बीहड़ क्षेत्र
- परिभाषा: चम्बल नदी के बहाव क्षेत्र में मिट्टी के भारी कटाव के कारण बनी गहरी कंदराओं (खाइयों) और घने वृक्षों वाले ऊंचे-नीचे क्षेत्रों को डांग या बीहड़ क्षेत्र कहा जाता है।
- ऐतिहासिक तथ्य: विगत 30-35 वर्षों में ये दुर्गम बीहड़ क्षेत्र स्थानीय ‘दस्युओं’ (डाकुओं) की सुरक्षित शरणस्थली के रूप में कुख्यात रहे हैं, इसलिए इन्हें ‘दस्यु प्रभावित क्षेत्र’ भी कहा जाता है।
चम्बल नदी तंत्र से जुड़े मुख्य परीक्षा उपयोगी तथ्य
- सर्वाधिक सतही जल वाली नदियाँ (क्रम): राजस्थान में सबसे ज्यादा सतही जल चम्बल नदी में है। इसके बाद जल मात्रा के घटते क्रम में क्रमशः बनास, माही और लूणी नदी का स्थान आता है।
- प्राकृतिक जिला सीमाएं: चम्बल नदी कोटा और सवाई माधोपुर जिलों के बीच, तथा कोटा और बूंदी जिलों के बीच प्राकृतिक प्रशासनिक सीमा का निर्धारण करती है।
- वाटर सफारी नदी: चम्बल नदी अपनी गहरी घाटियों और तीव्र वेग से बहने के कारण ‘वाटर सफारी नदी’ के नाम से भी जानी जाती है।
- सर्वाधिक अवनलिका अपरदन: भारत में बड़े स्तर पर अवनलिका अपरदन (Gully Erosion) यानी मिट्टी का गहरा कटाव करने वाली यह सबसे मुख्य नदी है।
- सबसे गहरा स्थान: बूंदी जिले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल केशोरायपाटन के समीप चम्बल नदी का पाट सबसे गहरा (Deepest Point) हो जाता है।
- विश्व धरोहर नामांकन: राजस्थान की एकमात्र नदी चम्बल है, जिसे यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए नामित (Nominate) किया गया है।
- सर्वाधिक प्रदूषित/सतही प्रदूषित: यह राजस्थान में सर्वाधिक सतही जल प्रवाह वाली और सबसे लंबी नदी तंत्र का हिस्सा है।
- राष्ट्रीय उद्यान के नाम वाली सहायक नदी: चम्बल की एक सहायक नदी का नाम ‘कुनु’ है, जिसके नाम पर मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित प्रसिद्ध ‘कुनो राष्ट्रीय उद्यान’ (जहाँ अफ्रीका से चीते लाए गए थे) का नामकरण हुआ है।
- जलीय जीव ‘गांगेय सूस’: चम्बल नदी के साफ पानी में स्तनपायी जीव गांगेय सूस (Gangetic Dolphin) पाया जाता है, जो भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है।
- तट पर स्थित प्रमुख शिव मंदिर: चम्बल के किनारे कोटा का प्रसिद्ध गरड़िया महादेव मंदिर (जो अपने विहंगम दृश्य के लिए प्रसिद्ध है) तथा धौलपुर में स्थित ऐतिहासिक अचलेश्वर महादेव मंदिर स्थित हैं।
पीपलाज नदी (Piplaj River)
- उद्गम (Origin): यह छोटी नदी झालावाड़ जिले की पचपहाड़ तहसील की पहाड़ियों से निकलती है।
- प्रवाह व विलय: यह उत्तर की ओर बहती हुई झालावाड़ जिले में ही आहू नदी के बाईं ओर (Left Bank) आकर मिल जाती है।
कुनु नदी (Kunu River)
- उद्गम व प्रवेश: मध्य प्रदेश के गुना क्षेत्र से निकलकर यह बारां जिले के मुसेरी गाँव (शाहबाद) के पास से राजस्थान में प्रवेश करती है।
- विशेष प्रवाह: यह बारां जिले से बहकर पुनः मध्य प्रदेश में चली जाती है और अंत में करौली की सीमा पर चम्बल नदी में विलीन हो जाती है। कराई और रेम्पी इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।
- कुराल नदी: यह पूर्ण रूप से बूंदी जिले में ही प्रवाहित होती है।
चाकण नदी (Chakan River)
- विवरण: यह बूंदी जिले के कई छोटे नदी-नालों के मिलने से बनती है, जो अंत में सवाई माधोपुर के करणपुरा गाँव में जाकर चम्बल नदी में मिल जाती है।
मेज नदी (Mej River)
- उद्गम व विलय: यह भीलवाड़ा के मांडलगढ़ क्षेत्र से निकलकर बूंदी जिले में प्रवेश करती है और बूंदी के लाखेरी के निकट चम्बल नदी में समाहित हो जाती है।
- सहायक नदियाँ: बाजन, कुराल और मांगली इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं। घोड़ा पछाड़ नदी भी मांगली की सहायक है।
- भीमलता जलप्रपात: बूंदी जिले में स्थित यह खूबसूरत जलप्रपात मांगली नदी पर बना हुआ है।
वन की आशा: बनास नदी
बनास नदी (वन की आशा) का अपवाह तंत्र राजस्थान में आंतरिक रूप से बहने वाली नदियों में सबसे विशाल है। इसकी अनेक सहायक नदियाँ अरावली पर्वतमाला से निकलकर इसमें समाहित होती हैं, जिससे राज्य में महत्वपूर्ण पेयजल और सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण होता है।
उपनाम : वन की आशा, वर्णाशा, वशिष्ठी
- उद्गम (Origin): राजस्थान में पूर्णतः प्रवाह की दृष्टि से सबसे लंबी नदी बनास का उद्गम राजसमंद जिले में कुम्भलगढ़ के पास खमनौर की पहाड़ियों से होता है।
- बहाव क्षेत्र :
यह नदी अब राजस्थान के मुख्य जिलों — राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी, टोंक और सवाई माधोपुर से होकर गुजरती है - चम्बल में विलय: यह अंत में सवाई माधोपुर जिले के रामेश्वरम नामक स्थान पर चम्बल और सीप नदी के साथ मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती हुई चम्बल में विलीन हो जाती है।
- कुल लंबाई: इसकी कुल लंबाई लगभग 480 कि.मी. से 512 कि.मी. (नवीनतम डेटा) मानी जाती है, जो पूरी तरह से राजस्थान के भीतर ही प्रवाहित होती है।
बनास नदी पर स्थित प्रमुख बांध परियोजनाएं
पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली बनास नदी के जल को नियंत्रित करने के लिए इस पर दो मुख्य बांध बनाए गए हैं:
- (अ) बीसलपुर बांध (टोंक): टोंक जिले के देवली के पास स्थित यह राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है। इससे मुख्य रूप से जयपुर, अजमेर और टोंक जिलों को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जाती है।
- (ब) ईसरदा बांध (सवाई माधोपुर): यह बनास नदी पर सवाई माधोपुर जिले में निर्मित एक अन्य महत्वपूर्ण बांध परियोजना है, जो आसपास के क्षेत्रों में जल स्तर सुधारने और सिंचाई के लिए उपयोगी है।
जलग्रहण क्षेत्र एवं त्रिवेणी विशेष तथ्य
- सर्वाधिक जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area): राजस्थान में पूर्ण रूप से बनास नदी का जलग्रहण क्षेत्र सबसे बड़ा है, जो लगभग 46,570 वर्ग किमी है।
- नोट (घटता क्रम): बनास (46,570 वर्ग किमी) ➡️ लूणी (34,250 वर्ग किमी) ➡️ चम्बल (29,110 वर्ग किमी) ➡️ माही (16,030 वर्ग किमी)।
- नोट (घटता क्रम): बनास (46,570 वर्ग किमी) ➡️ लूणी (34,250 वर्ग किमी) ➡️ चम्बल (29,110 वर्ग किमी) ➡️ माही (16,030 वर्ग किमी)।
- बिगोद त्रिवेणी संगम (भीलवाड़ा): भीलवाड़ा जिले के बिगोद नामक स्थान पर बनास नदी में बेड़च और मैनाल नदियाँ आकर मिलती हैं।
- परीक्षा विशेष: बनास में दाईं तरफ (Right Bank) से मिलने वाली मुख्य नदियाँ केवल बेड़च और मैनाल ही हैं।
- परीक्षा विशेष: बनास में दाईं तरफ (Right Bank) से मिलने वाली मुख्य नदियाँ केवल बेड़च और मैनाल ही हैं।
- सहायक नदियों की पूर्ण सूची: बेड़च, कोठारी, मैनाल, खारी, डाई, माशी, मानसी, बांडी, सोहादरा (सोडरा), मोरेल, ढूंढ, ढील और कालीसिल इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।
बनास की प्रमुख सहायक नदियों का विस्तृत विवरण
1. बेड़च नदी (प्राचीन नाम: आयड़ नदी)
- उद्गम (Origin): इस नदी का उद्गम उदयपुर जिले में गोगुंदा की पहाड़ियों से होता है।
- नाम परिवर्तन का रहस्य: अपने उद्गम स्थल से लेकर उदयसागर झील तक इस नदी को ‘आयड़ नदी’ के नाम से जाना जाता है। किन्तु उदयसागर झील से निकलने के पश्चात इसका नाम बदलकर ‘बेड़च नदी’ हो जाता है।
- कुल लंबाई व विलय: इसकी कुल लंबाई लगभग 190 किमी है। यह उदयपुर, चित्तौड़गढ़ जिलों से बहती हुई अंत में भीलवाड़ा के बिगोद के पास बनास में मिल जाती है।
- ऐतिहासिक सभ्यता व दुर्ग:
- लगभग 4000 वर्ष पुरानी ताम्रयुगीन ‘आहाड़ (आयड़) सभ्यता’ का विकास उदयपुर में इसी नदी के तट पर हुआ था।
- चित्तौड़गढ़ जिले में इस नदी में गम्भीरी नदी आकर मिलती है। इसी बेड़च और गम्भीरी नदियों के पठारी संगम पर ऐतिहासिक चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित है।
2. गम्भीरी नदी
- उद्गम व विलय: यह मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में स्थित जावरा की पहाड़ियों से निकलती है। यह चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा क्षेत्र से राजस्थान में प्रवेश करती है और चित्तौड़गढ़ शहर के पास बेड़च नदी में मिल जाती है।
3. कोठारी नदी
- उद्गम व विलय: यह राजसमंद जिले के दिवेर क्षेत्र से निकलती है। राजसमंद और भीलवाड़ा जिलों में बहती हुई यह भीलवाड़ा के नन्दराय नामक स्थान पर बनास नदी में विलीन हो जाती है।
- मेजा बांध : भीलवाड़ा के मांडलगढ़ कस्बे के पास कोठारी नदी पर प्रसिद्ध ‘मेजा बांध’ बनाया गया है, जो भीलवाड़ा शहर की पेयजल व्यवस्था का मुख्य आधार रहा है।
4. खारी नदी
- उद्गम व विलय: यह राजसमंद जिले के देवगढ़ के पास बिजराल गाँव की पहाड़ी से निकलती है। यह राजसमंद, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी और टोंक जिलों से बहती हुई टोंक के देवली नामक स्थान पर बनास में मिल जाती है।
- विशेष तथ्य: भीलवाड़ा का प्रसिद्ध आसिंद कस्बा (सवाई भोज/देवनारायण जी की स्थली) इसी खारी नदी के किनारे स्थित है। शाहपुरा में इसमें मानसी नदी आकर मिलती है।
- नोट: राजस्थान में ‘खारी’ नाम की तीन नदियाँ हैं— (i) बनास की सहायक जो बिजराल पहाड़ी से निकलती है, (ii) लूणी की सहायक जो सिरोही से निकलती है, और (iii) सांभर झील में गिरने वाली नदी जो डीडवाना-कुचामन क्षेत्र से आती है।
5. मानसी नदी
- विवरण: यह भीलवाड़ा जिले के करेरा गाँव के पास से निकलकर केकड़ी और शाहपुरा की सीमा पर खारी नदी में मिल जाती है।
6. डाई नदी
- उद्गम व विलय: यह अजमेर जिले की नसीराबाद तहसील की अरावली पहाड़ियों से निकलती है। अजमेर, केकड़ी और टोंक में बहती हुई यह राजमहल (बीसलपुर) के निकट बनास में मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है।
7. माशी नदी
- उद्गम व विलय: यह अजमेर के किशनगढ़ की पहाड़ियों से निकलकर अजमेर और दूदू जिलों से बहती हुई टोंक के गलोद गाँव के पास बनास में मिल जाती है। टोंक में इसमें बांडी नदी (जो जयपुर के समोद पहाड़ियों से आती है) और सोहादरा (सोडरा) नदी आकर मिलती हैं। बीसलपुर बांध के बाद बनास में मिलने वाली यह पहली मुख्य नदी है।
8. ढील नदी
- विवरण: यह टोंक जिले की बावली गाँव की पहाड़ियों से निकलकर सवाई माधोपुर जिले में बनास नदी में मिल जाती है। गुढ़िया इसकी प्रमुख सहायक नदी है।
9. मोरेल नदी
- उद्गम व विलय: यह जयपुर जिले के चैनपुरा (बस्सी) गाँव से निकलती है। जयपुर, दौसा, गंगापुर सिटी और सवाई माधोपुर में बहती हुई यह सवाई माधोपुर के हाडोती गाँव के पास बनास में मिल जाती है। सवाई माधोपुर के पिलूखेड़ा गाँव में इस नदी पर प्रसिद्ध मोरेल बांध बना हुआ है।
10. कालीसिल नदी
- विवरण: यह मोरेल नदी की एक मुख्य सहायक नदी है। इसका उद्गम करौली जिले से होता है और यह सवाई माधोपुर में जाकर मोरेल नदी में विलीन हो जाती है।
- धार्मिक महत्व (Most Important): करौली का विश्व प्रसिद्ध ‘कैला देवी मंदिर’ इसी कालीसिल नदी के तट पर स्थित है।
- परीक्षा नोट ध्यान रहे, कालीसिल मोरेल की सहायक नदी है, जबकि कालीसिंध चम्बल की एक मुख्य सहायक नदी है। दोनों अलग-अलग हैं।
11. चंद्रभागा नदी
- विवरण: यह नदी राजसमंद जिले के आमेट क्षेत्र से निकलती है और आगे बढ़कर भीलवाड़ा जिले में बनास नदी में मिल जाती है।
12. ढूंढ नदी
- उद्गम व विलय: यह नदी जयपुर ग्रामीण के अचरोल क्षेत्र से निकलती है। जयपुर और दौसा जिलों में बहती हुई यह दौसा के लालसोट के पास मोरेल नदी में समाहित हो जाती है।
- सांस्कृतिक तथ्य: इसी नदी के प्रवाह क्षेत्र के कारण जयपुर और उसके आस-पास के ऐतिहासिक क्षेत्र को ‘ढूंढाड़’ कहा जाता है।
अर्जुन की गंगा : बाणगंगा नदी
उपनाम: अर्जुन की गंगा, खण्डित नदी, रुण्डित नदी, ताला नदी
- पौराणिक मान्यता: माना जाता है कि महाभारत काल में अर्जुन ने अपने एक बाण से इस नदी की जलधारा निकाली थी, जिसके कारण इसे ‘अर्जुन की गंगा’ भी कहा जाता है।
- उद्गम (Origin): इस नदी का उद्गम कोटपुतली-बहरोड़ जिले में स्थित बैराठ की पहाड़ियों से होता है।
- प्रवाह व समाप्ति: लगभग 380 किमी लंबी यह नदी जयपुर, दौसा और भरतपुर जिलों में बहने के बाद उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती है और आगरा के समीप फतेहाबाद नामक स्थान पर यमुना नदी में विलीन हो जाती है।
- सहायक नदियाँ: इसकी मुख्य सहायक नदी गुमती नाला और सूरी नदी हैं, जो इसके दाहिने (Right Bank) किनारे पर मिलती हैं। इसके अतिरिक्त सांवन और पलासन नदियाँ इसके बाएं किनारे पर आकर मिलती हैं।
- ऐतिहासिक सभ्यता: इसके तट पर प्राचीन ‘बैराठ सभ्यता’ (कोटपुतली-बहरोड़) का विकास हुआ था। इसी स्थान से ऐतिहासिक मौर्य युग के अवशेष (अशोक का भाब्रू शिलालेख) प्राप्त हुए हैं।
गंभीर नदी (ऊटंगन नदी)
- उद्गम व विलय: इसे स्थानीय रूप से ‘ऊटंगन नदी’ भी कहा जाता है। इसका उद्गम करौली जिले के महू के लांगरा गाँव की पहाड़ियों से होता है।
- प्रवाह क्षेत्र: यह करौली से निकलकर भरतपुर जिले में बहती है। इसके बाद उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सीमा से लगती हुई अंत में फतेहाबाद (उत्तर प्रदेश) के रिहोली गाँव के पास यमुना नदी में मिल जाती है।
पुनर्जीवित धारा: अरवरी नदी
- उद्गम (Origin): इस नदी का उद्गम अलवर जिले में सरिस्का की पहाड़ियों में स्थित सकरा बांध से होता है।
- ऐतिहासिक पुनरुद्धार (Extra Fact): यह नदी पूरी तरह से सूखकर मृतप्राय (विलुप्त) हो चुकी थी। लेकिन ‘तरुण भारत संघ’ संस्था और भारत के जल पुरुष राजेन्द्र सिंह (Waterman of India) के सामुदायिक प्रयासों और जल संरक्षण (जोहड़ निर्माण) के कारण इसे वापस पुनर्जीवित किया गया है।
- प्रवाह: इस नदी की दो धाराएँ अजजबगढ़-प्रतापगढ़ के पास पलसाना के पहाड़ नामक स्थान पर मिलकर आगे प्रवाहित होती हैं। यह आगे जाकर ऊटंगन (गंभीर नदी) में मिल जाती है।
