राजस्थान के प्रमुख दुर्ग : Quick Revision Notes
| दुर्ग का नाम | उपनाम | पहाड़ी / स्थान | निर्माता | स्थान (जिला) |
|---|---|---|---|---|
| चित्तौड़गढ़ | राजस्थान का गौरव, सिरमौर | मेसा का पठार (गंभीरी व बेड़च संगम) | चित्रांगद मौर्य | चित्तौड़गढ़ |
| कुंभलगढ़ | मेवाड़ की आँख | जरगा पहाड़ी | महाराणा कुंभा | राजसमंद |
| मेहरानगढ़ | मयूरध्वजगढ़, गढ़ चिंतामणि | चिड़ियाटूंक पहाड़ी | राव जोधा | जोधपुर |
| जूनागढ़ | जमीन का जेवर | समतल भूमि पर | महाराजा रायसिंह | बीकानेर |
| गागरोण दुर्ग | डोडगढ़, धुलरगढ़ | कालीसिंध व आहू नदी संगम | डोड परमार | झालावाड़ |
| जयगढ़ | संकटमोचक दुर्ग | ईगल की पहाड़ी (चिल का टीला) | मिर्जा राजा जयसिंह | जयपुर |
| नाहरगढ़ | सुदर्शनगढ़ | अरावली की पहाड़ी | सवाई जयसिंह | जयपुर |
| आमेर दुर्ग | अंबावती नगरी | काली खोह पहाड़ी | दुल्हाराय / मानसिंह I | जयपुर |
| तारागढ़ (अजमेर) | राजस्थान का जिब्राल्टर, गढ़ बीठली | बीठली पहाड़ी | अजयराज चौहान | अजमेर |
| तारागढ़ (बूंदी) | तिलिस्मी किला | पहाड़ी क्षेत्र | बरसिंह हाड़ा | बूंदी |
| रणथंभौर | हम्मीर की आन-बान का प्रतीक | अंडाकार 7 पहाड़ियाँ | रणथंभन देव | सवाई माधोपुर |
| भटनेर दुर्ग | उत्तरी सीमा का प्रहरी | घग्गर नदी के किनारे | भूपत भाटी | हनुमानगढ़ |
| लोहागढ़ | अजय दुर्ग | समतल मैदान (खाई युक्त) | महाराजा सूरजमल | भरतपुर |
| भैंसरोड़गढ़ | राजस्थान का वेल्लोर | चंबल व बामनी नदी संगम | भैंसाशाह व रोड़ा चारण | चित्तौड़गढ़ |
| अचलगढ़ | अर्बुद दुर्ग | आबू पर्वत | महाराणा कुंभा (पुनर्निर्माण) | सिरोही |
| सोनारगढ़ | जैसलमेर दुर्ग, स्वर्णगिरी | त्रिकुटा पहाड़ी | राव जैसल | जैसलमेर |
| जालौर दुर्ग | सुवर्णगिरी, जाबालिपुर | सोनगिरी पहाड़ी | नागभट्ट प्रथम (प्रतिहार) | जालौर |
| मैजीन दुर्ग | अकबर का किला | समतल भूमि | सम्राट अकबर | अजमेर |
| बयाना दुर्ग | विजयमंदिर गढ़, बादशाह दुर्ग | मानी पहाड़ी | विजयपाल यादव | भरतपुर |
| सिवाना दुर्ग | कुमट दुर्ग, मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली | छप्पन की पहाड़ियाँ | वीरनारायण पंवार | बालोतरा (बाड़मेर) |
| माण्डलगढ़ | – | बनास, बेड़च, मेनाल संगम | महाराणा कुंभा (पुनर्निर्माण) | भीलवाड़ा |
| चूरू का किला | चाँदी के गोले दागने वाला किला | समतल भूमि | ठाकुर कुशल सिंह | चूरू |
| शेरगढ़ (बारां) | कोषवर्धन दुर्ग | परवन नदी के किनारे | मालदेव (शासक) | बारां |
| शेरगढ़ (धौलपुर) | दक्षिण का द्वारगढ़ | चंबल नदी के किनारे | राजा मालदेव / शेरशाह | धौलपुर |
| चोमू का किला | धाराधारगढ़, रघुनाथगढ़ | समतल भूमि | ठाकुर करण सिंह | जयपुर (ग्रामीण) |
| कांकणबाड़ी किला | – | सरिस्का अभयारण्य | सवाई जयसिंह | अलवर |
| बनेड़ा दुर्ग | – | – | सरदार अक्षय सिंह | भीलवाड़ा |
| बसंतगढ़ दुर्ग | बसंती दुर्ग | पिण्डवाड़ा (पहाड़ी) | महाराणा कुंभा | सिरोही |
| तिमनगढ़ | – | – | तिमनपाल यादव | करौली |
| बाला दुर्ग | कुंवारा किला, अलवर किला | पहाड़ी पर | अलघुराय / हसन खां मेवाती | अलवर |
| माधोराजपुरा किला | – | समतल भूमि | सवाई माधोसिंह I | जयपुर |
| अहिच्छत्रपुर किला | नागौर का किला | समतल भूमि | अमर सिंह राठौड़ (शौर्य हेतु प्रसिद्ध) | नागौर |
1. चित्तौड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़) — किलों का सिरमौर
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: राजस्थान का गौरव, किलों का सिरमौर, चित्रकुट दुर्ग, दक्षिण-पूर्वी द्वार का प्रहरी, खिज्राबाद, त्याग व बलिदान का पावन तीर्थ।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह मुख्य रूप से गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है, लेकिन इसमें धान्वन (मरुस्थल) श्रेणी को छोड़कर शेष सभी 8 श्रेणियों के लक्षण विद्यमान हैं।
- अवस्थिति: यह किला गंभीर और बेड़च नदियों के पवित्र संगम स्थल के निकट, मेसा के पठार पर समुद्र तल से लगभग 1850 फीट की ऊंचाई पर निर्मित है।
- आकृति: ऊपर (आकाश) से देखने पर इस संपूर्ण दुर्ग की बनावट एक विशाल ‘व्हेल मछली’ के समान दिखाई देती है। यह लगभग 7 किलोमीटर लंबा और 1.5 किलोमीटर चौड़ा है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- मूल निर्माता: वीर विनोद ग्रंथ के अनुसार, इसका निर्माण 7वीं शताब्दी में मौर्य वंश के प्रतापी शासक चित्रांगद मौर्य ने करवाया था और इसका मूल नाम ‘चित्रकूट’ रखा था।
- गुहिल राजवंश का अधिकार: सन 734 ईस्वी में कालभोज (बप्पा रावल) ने मौर्य शासक मानमोरी को पराजित कर इस ऐतिहासिक दुर्ग पर गुहिल (मेवाड़) वंश का आधिपत्य स्थापित किया।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- सात प्रवेश द्वार: इस दुर्ग में प्रवेश करने के लिए सर्पिलाकार मार्ग पर 7 विशाल पोल (दरवाजे) बने हैं— पाडन पोल, भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल।
- विजय स्तम्भ: मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में महाराणा कुंभा ने 1440-1448 ई. के मध्य इसका निर्माण करवाया। यह 9 मंजिला, 122 फीट ऊंचा स्थापत्य है, जिसे ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ और ‘विष्णुध्वज’ भी कहा जाता है। इसके मुख्य शिल्पी जैता और उनके पुत्र नापा, पोमा, पुंजा थे।
- जैन कीर्ति स्तम्भ: यह 7 मंजिला (75 फीट ऊंचा) स्तम्भ दिगंबर जैन संप्रदाय के बघेरवाल जैन व्यापारी जीजाशाह द्वारा निर्मित है, जो जैन तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है।
- अन्य प्रमुख स्थल: महारानी पद्मिनी का महल, कुंभा महल (मेवाड़ का सबसे प्राचीन महल), फतेह प्रकाश महल (वर्तमान राजकीय संग्रहालय), कालिका माता मंदिर (मूल रूप से 8वीं सदी का सूर्य मंदिर), समिधेश्वर (त्रिभुवन नारायण) मंदिर, कुंभश्याम मंदिर और रैदास की छतरी।
- इतिहास के तीन अमर साके (जौहर):
- प्रथम साका (1303 ई.): दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के कपटपूर्ण आक्रमण के समय हुआ। रावल रतन सिंह के नेतृत्व में वीरों ने केसरिया किया और रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 वीरांगनाओं ने इतिहास का सबसे विशाल जौहर किया। विजय के बाद खिलजी ने इसका नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर ‘खिज्राबाद’ कर दिया था।
- द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ। इस दौरान राजमाता कर्मावती ने हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। सहायता न मिलने पर कर्मावती के नेतृत्व में जौहर हुआ और देवलिया के ठाकुर बाघसिंह ने पाडन पोल पर केसरिया का नेतृत्व किया।
- तृतीय साका (1567-68 ई.): मुगल सम्राट अकबर के क्रूर आक्रमण के समय हुआ। महाराणा उदयसिंह दुर्ग का भार वीर सेनापतियों पर छोड़कर जंगलों में चले गए। वीर जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया ने अद्भुत शौर्य दिखाते हुए केसरिया किया और पत्ता की पत्नी फूलकंवर के नेतृत्व में जौहर हुआ। अकबर इनकी वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने आगरा के किले के द्वार पर जयमल और पत्ता की गजारूढ़ (हाथी पर सवार) पाषाण मूर्तियां लगवाईं।
- प्रसिद्ध लोकोक्ति: इसके महात्म्य के लिए इतिहास में कहा जाता है— “गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया।” यह राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट (आवासीय किला) है जहाँ आज भी आबादी निवास करती है और खेती की जाती है।
2. कुंभलगढ़ दुर्ग (राजसमंद) — मेवाड़ की संकटकालीन आंख
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: मेवाड़ की आँख, कुंभलमेर, संकटकालीन मेवाड़ राजमुकुट, कुंभलपुर, मछीन्द्रपुर, मेवाड़-मारवाड़ सीमा का प्रहरी।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूर्ण रूप से एक सुदृढ़ गिरि दुर्ग (पहाड़ी किला) है।
- अवस्थिति: यह राजसमंद जिले में सादड़ी गांव के पास अरावली की दुर्गम जरगा पहाड़ियों के मध्य ‘हेमकूट’, ‘नील’ और ‘गंधमादन’ शिखरों से घिरा हुआ है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: मेवाड़ के महान निर्माता महाराणा कुंभा ने मौर्य शासक संप्रति के प्राचीन ध्वस्त किले के अवशेषों पर अपनी रानी कुंभल देवी की स्मृति में इसका निर्माण करवाया था।
- निर्माण काल: इसका निर्माण कार्य 1448 ई. में प्रारंभ हुआ और 10 वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद 1458 ई. में पूर्ण हुआ।
- प्रधान वास्तुकार: इस दुर्ग का मुख्य सूत्रधार/शिल्पी मंडन था, जो गुजरात का रहने वाला एक प्रकांड विद्वान था।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं महान दीवार:
- ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया: इस दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राचीर (बाहरी दीवार) है। यह 36 किलोमीटर लंबी है, जो चीन की दीवार के बाद विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार मानी जाती है। इसकी चौड़ाई लगभग 7 मीटर (21 फीट) है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस पर 4 घुड़सवार एक साथ समानांतर दौड़ सकते हैं।
- अंतःदुर्ग ‘कटारगढ़’: इस किले के भीतर सबसे ऊंचे शीर्ष भाग पर एक और छोटा अंतःदुर्ग बना है जिसे ‘कटारगढ़’ कहते हैं। यह महाराणा कुंभा का निजी निवास स्थान (सैन्य मुख्यालय) था। अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण इसे “मेवाड़ की आँख” कहा जाता है क्योंकि यहाँ से पूरे मेवाड़ और मारवाड़ की गतिविधियों पर नजर रखी जाती था।
- ऐतिहासिक कथन: मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने कटारगढ़ की अविश्वसनीय ऊंचाई को देखकर लिखा था: “यह दुर्ग इतनी बुलंदी (ऊंचाई) पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की ओर देखने पर सिर से पगड़ी भी गिर जाती है।”
- बादल महल: कटारगढ़ के शीर्ष पर स्थित ‘बादल महल’ (जूनी कचहरी) ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी स्थान पर 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया) को इतिहास प्रसिद्ध वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था।
- अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- झाली रानी का माळिया: दुर्ग के भीतर बना झाली रानी का महल।
- कुंभस्वामी विष्णु मंदिर: महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित कलात्मक मंदिर।
- मामादेव का कुंड: इसी कुंड के पास बैठे महाराणा कुंभा की उनके ही पुत्र ऊदा (उदयकरण) ने 1468 ई. में सत्ता के लालच में हत्या कर दी थी (ऊदा को मेवाड़ का प्रथम पितृहंता कहा जाता है)।
- पृथ्वीराज सिसोदिया की छतरी: यहाँ कुंवर पृथ्वीराज (उड़ना राजकुमार) की 12 खंभों की भव्य छतरी स्थित है, जिसके शिल्पी घाघन थे।
3. मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) — मयूरध्वजगढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: मयूरध्वजगढ़, मोरध्वजगढ़, गढ़ चिंतामणि, चिड़ियाटूंंक दुर्ग, कागमुखी किला, सूर्यगढ़, जोधाणा का किला।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक उच्च श्रेणी का गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: जोधपुर शहर के मध्य में स्थित यह किला अरावली की ‘चिड़ियाटूंंक पहाड़ी’ पर समुद्र तल से 400 फीट की सीधी खड़ी ऊंचाई पर स्थित है।
- आकृति: इस किले का भौगोलिक विस्तार इस प्रकार है कि इसका आकार पंख फैलाए हुए मयूर (मोर) के समान दिखाई देता है, इसलिए इसे ‘मयूरध्वजगढ़’ कहा गया। इसके आगे का हिस्सा संकरा और पीछे का चौड़ा होने के कारण इसे ‘कागमुखी’ भी कहते हैं।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: मारवाड़ के राठौड़ वंश के प्रतापी शासक राव जोधा ने मंडोर के स्थान पर नई राजधानी सुरक्षित करने के उद्देश्य से 12 मई 1459 (जेठ सुदी एकादशी) को इसकी नींव रखी थी।
- पवित्र नींव: लोक मान्यताओं के अनुसार, इस दुर्ग की मुख्य नींव प्रसिद्ध लोक देवी रिद्धि बाई (श्री करणी माता) के हाथों से रखवाई गई थी।
- राजिया भील का बलिदान: दुर्ग की सामरिक मजबूती और कल्पित शाप से मुक्ति के लिए तत्कालीन तांत्रिक विद्या के अनुसार ‘राजाराम मेघवाल’ (राजिया भील) नामक व्यक्ति ने स्वेच्छा से किले की नींव में जीवित समाधि (बलिदान) दी थी। आज भी किले में उनके स्मारक बने हैं।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- ऐतिहासिक तोपें: मेहरानगढ़ अपनी प्राचीर पर रखी मध्यकालीन तोपों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इनमें किलकिला तोप (अजीत सिंह द्वारा अहमदाबाद से लाई गई), शंभूबाण तोप (सरबुलंद खां से छीनी गई), गजनी खां तोप, कड़क बिजली, गुब्बार, नुसरत, नागपली और जमजमा तोपें प्रमुख हैं।
- चामुंडा माता मंदिर: यह राव जोधा द्वारा स्थापित जोधपुर के राठौड़ों की इष्टदेवी का मंदिर है। यहाँ सितंबर 2008 में आश्विन नवरात्रि के दौरान भयंकर भगदड़ (दुखांतिका) हुई थी, जिसकी जांच के लिए सरकार ने ‘जसराज चोपड़ा समिति’ का गठन किया था।
- जसवंत थड़ा: किले की तलहटी में सफेद संगमरमर से निर्मित महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय का भव्य स्मारक है, जिसे ‘राजस्थान का ताजमहल’ कहा जाता है।
- शाही महल: मोती महल (सोने की बारीक नक्काशी युक्त), फूल महल (महाराजा अभयसिंह द्वारा निर्मित नृत्य कक्ष), शीश महल, चोखेलाव महल (जहाँ मारवाड़ चित्रशैली के प्राचीन चित्र हैं) और श्रृंगार चौकी (जहाँ जोधपुर के राजाओं का राजतिलक होता था)।
- विदेशी इतिहासकारों के कथन: ब्रिटिश पत्रकार और नोबेल पुरस्कार विजेता रडयार्ड किपलिंग ने इस अभेद्य किले को देखकर विस्मित होकर कहा था: “शायद इस अलौकिक दुर्ग का निर्माण मनुष्यों ने नहीं, बल्कि परियों, फरिश्तों और देवताओं द्वारा किया गया है।” जैकलिन कैनेडी ने इसे ‘विश्व का आठवां अजूबा’ कहा था।
4. जूनागढ़ दुर्ग (बीकानेर) — जमीन का जेवर
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: जमीन का जेवर, बीकानेर का किला, राती घाटी का किला, चिंतामणि दुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूर्ण रूप से धान्वन दुर्ग (मरुस्थलीय किला) एवं भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है, क्योंकि यह किसी ऊंचे पर्वत पर नहीं बल्कि समतल मैदान पर बना है।
- अवस्थिति: यह बीकानेर शहर के ऐतिहासिक ‘राती घाटी’ नामक स्थान पर स्थित है। इसके चारों ओर सुरक्षा के लिए एक गहरी खाई खोदी गई है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इस भव्य आधुनिक दुर्ग का निर्माण बीकानेर के प्रतापी महाराजा रायसिंह (अकबर के विश्वस्त सेनापति) ने अपने दूरदर्शी प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में करवाया था।
- निर्माण काल: इसकी नींव 30 जनवरी 1589 को रखी गई और यह 17 जनवरी 1594 ई. को बनकर तैयार हुआ। इससे पूर्व यहाँ राव बीका द्वारा निर्मित एक छोटा कच्चा गढ़ था, जिसे ‘बीका की टेकरी’ कहते थे। पुराना किला होने के कारण ही इसका नाम ‘जूनागढ़’ (पुराना गढ़) पड़ा।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- आकृति व शैली: यह किला चतुष्कोणीय (आयतकार) आकृति में बना है। इसकी स्थापत्य कला में हिंदू (राजपूत) और मुगल (मुस्लिम) शैली का एक अत्यंत सुंदर और दुर्लभ समन्वय देखने को मिलता है। इसमें लाल बलुआ पत्थरों का प्रयोग किया गया है।
- सूरज पोल (मुख्य द्वार): इसके मुख्य प्रवेश द्वार ‘सूरज पोल’ पर 1567 ई. के चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए अद्भुत शौर्य दिखाने वाले दो अमर वीरों— जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया की गजारूढ़ (हाथी पर सवार) पाषाण मूर्तियां महाराजा रायसिंह द्वारा स्थापित करवाई गई हैं। इसी द्वार पर ऐतिहासिक ‘रायसिंह प्रशस्ति’ (उत्कीर्णक- जैन मुनि जैता) उत्कीर्ण है।
- अनूप महल: यह जूनागढ़ का सबसे वैभवशाली महल है, जिसमें सोने की कलई और कांच का बारीक काम (उस्ता कला) किया गया है। यहाँ बीकानेर के राजाओं का राजतिलक होता था।
- गंगा निवास महल: महाराजा गंगासिंह द्वारा निर्मित इस महल का अग्रभाग लाल पत्थरों की बारीक जालीदार कटाई के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ गंगासिंह का ऐतिहासिक ‘हेवीलैंड विमान’ (प्रथम विश्व युद्ध का लड़ाकू विमान) आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।
- अन्य दर्शनीय स्थल: करण महल, फूल महल, चंद्र महल, हर मंदिर (जहाँ राजपरिवार के लोग पूजा करते थे) और 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर (जहाँ हेरम्ब गणपति यानी सिंह पर सवार गणेश जी की दुर्लभ मूर्ति है)।
- प्रसिद्ध लोकोक्ति: इस किले की विशालता और नक्काशी के लिए राजस्थान में एक प्रसिद्ध कहावत है: “हमने सुना है कि दीवारों के भी कान होते हैं, लेकिन जूनागढ़ की दीवारें तो साक्षात बोलती हैं।”
5. गागरोण दुर्ग (झालावाड़) — राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ जलदुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: डोडगढ़, धूलरगढ़, जलदुर्ग (औदक दुर्ग), मुस्तफाबाद, गरगराठपुर।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह राजस्थान का सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रमुख जल दुर्ग (औदक दुर्ग) है।
- अवस्थिति: यह झालावाड़ जिले में आहू और कालीसिंध नदियों के पवित्र संगम (जिस स्थान को स्थानीय भाषा में ‘सामेलजी’ या सामेला कहा जाता है) पर स्थित है।
- बिना नींव का किला: यह भारत का एकमात्र ऐसा अनूठा दुर्ग है जो बिना किसी कृत्रिम नींव के, सीधे विंध्याचल पर्वतमाला की एक ठोस प्राकृतिक चट्टान पर खड़ा किया गया है। यह तीन ओर से पानी की विशाल चादर से घिरा हुआ है और इसके पीछे ‘मुकंदरा’ की पहाड़ियां स्थित हैं।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इसका मूल निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी के आसपास डोड राजवंश के प्रतापी परमार राजा बीजलदेव (या देवसिंह डोड) ने करवाया था। डोड राजाओं के कारण ही इसे प्राचीन काल में ‘डोडगढ़’ या ‘धूलरगढ़’ कहा जाता था।
- खींची राजवंश का अधिकार: बाद में देवसिंह खींची ने डोड शासकों को पराजित कर यहाँ ‘खींची चौहान राजवंश’ की स्थापना की और इसका नाम गागरोण रखा।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- सूफी संत मीठे शाह की दरगाह: दुर्ग के ठीक बाहर प्रसिद्ध सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती की दरगाह स्थित है, जो ‘मीठे शाह’ के नाम से लोकप्रिय हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भव्य उर्स भरता है, जो सांप्रदायिक सौहार्द का केंद्र है।
- संत पीपा की छतरी: गागरोण के प्रतापी शासक प्रतापसिंह खींची, जो बाद में राजपाठ त्यागकर स्वामी रामानंद के शिष्य बने और ‘संत पीपा’ के नाम से विख्यात हुए, उनकी पवित्र समाधि और छतरी इसी दुर्ग के समीप स्थित है। वे दर्जी समुदाय के आराध्य देव हैं।
- गीध कराई: किले के पीछे मुकंदरा पहाड़ी की तरफ एक सीधी खड़ी तीखी चट्टान है, जिसे ‘गीध कराई’ कहा जाता है। मध्यकाल में राजनीतिक कैदियों और देशद्रोहियों को मृत्युदंड देने के लिए इसी चट्टान से नीचे गहरी खाई में फेंक दिया जाता था।
- कोटा रियासत का टंकशाल: इस किले के भीतर कोटा राज्य के ‘सिक्के’ ढालने का प्राचीन टंकशाल भी स्थित था।
- इतिहास के दो प्रसिद्ध साके:
- प्रथम साका (1423 ई.): मांडू (मालवा) के सुल्तान होशंगशाह (अल्प खां) ने जब गागरोण पर आक्रमण किया, तब यहाँ के परम प्रतापी शासक अचलदास खींची ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए केसरिया किया और राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया। इस युद्ध का सजीव वर्णन प्रसिद्ध विद्वान शिवदास गाडण ने अपने ग्रंथ ‘अचलदास खींची री वचनिका’ में किया है।
- द्वितीय साका (1444 ई.): मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम ने आक्रमण किया। तत्कालीन शासक पाल्हणसी (अचलदास के पुत्र) लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। विजय के बाद महमूद खिलजी ने इस दुर्ग का नाम बदलकर ‘मुस्तफाबाद’ रख दिया था और यहाँ एक मरुकोटा का निर्माण करवाया था।
6. जयगढ़ दुर्ग (जयपुर) — संकटमोचक दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: संकटमोचक दुर्ग, चील का टोला (इगल्स हिल), विजयगढ़, रहस्यमयी दुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक सुदृढ़ गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
- अवस्थिति: यह जयपुर की अरावली पर्वतमाला में आमेर के ठीक पीछे ‘चील का टोला’ (ईगल की पहाड़ी) पर समुद्र तल से लगभग 500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह आमेर किले के साथ गुप्त भूमिगत सुरंगों से जुड़ा हुआ है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इस दुर्ग का प्रारंभिक (कच्चा) निर्माण कछवाहा शासक मिर्जा राजा जयसिंह ने शुरू करवाया था, लेकिन इसका अधिकांश वर्तमान पक्का स्वरूप और विस्तार सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में करवाया। उन्हीं के नाम पर इस दुर्ग का नाम ‘जयगढ़’ पड़ा।
- उद्देश्य: इसका निर्माण कछवाहा राजवंश के ‘शाही खजाने’ को गुप्त रखने, संकटकाल में राजपरिवार के छिपने और सैन्य हथियारों के निर्माण के लिए एक सुरक्षित अभेद्य केंद्र के रूप में किया गया था।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं सैन्य वैभव:
- जयबाण तोप: यह जयगढ़ का सबसे बड़ा गौरव है। यह दुनिया की पहियों पर चलने वाली मध्यकाल की सबसे विशाल तोप है। इसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1720 ई. में अपने ही कारखाने में करवाया था। इसकी मारक क्षमता लगभग 35 किलोमीटर है। इतिहास के अनुसार, इसे परीक्षण के लिए केवल एक बार चलाया गया था, तब इसका गोला जयपुर के पास ‘चाकसू’ नामक स्थान पर गिरा, जहाँ भयंकर विस्फोट से एक विशाल तालाब बन गया, जिसे आज ‘गोलेलाव तालाब’ कहा जाता है।
- तोप ढलाई का कारखाना: मध्यकाल में उत्तर भारत का सबसे बड़ा ‘तोप बनाने का राजकीय कारखाना’ इसी किले के भीतर स्थित था। यहाँ तोप की नाल में छेद करने की प्राचीन मशीन (जो बैलों से चलती थी) आज भी अपने मूल स्वरूप में देखी जा सकती है।
- दिया बुर्ज: यह जयगढ़ का सबसे ऊंचा 7 मंजिला प्रकाश स्तम्भ (वॉच टॉवर) है, जहाँ से पूरे जयपुर शहर और आमेर की घाटियों पर कड़ी नजर रखी जाती थी।
- विशाल पानी के टांके: पानी के संरक्षण के लिए इस किले में स्थापत्य का अद्भुत इंजीनियरिंग नमूना देखने को मिलता है। इसके भीतर विशालकाय भूमिगत पानी के टांके (कुंड) बने हैं, जिनमें वर्षा का जल एकत्रित करने के लिए पहाड़ों पर बारीक नहरें बनाई गई थीं। इनमें से सबसे बड़े टांके की क्षमता इतनी है कि उसमें कई लाख गैलन पानी आ सकता है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल (1975-76 के आपातकाल) के दौरान कछवाहा वंश के छिपे हुए ‘शाही खजाने’ की खोज के लिए सेना द्वारा इस किले में व्यापक खुदाई करवाई गई थी, जो देश भर में चर्चा का विषय रही थी।
- विजयगढ़ी: किले के भीतर स्थित एक छोटा अंतःदुर्ग (जेल), जहाँ सवाई जयसिंह ने अपने छोटे भाई ‘विजयसिंह’ (चीमा जी) को कैद करके रखा था।
7. नाहरगढ़ दुर्ग (जयपुर) — सुदर्शनगढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: सुदर्शनगढ़, मीठड़ी का किला, जयपुर का मुकुट, महलों का दुर्ग, टाइगर फोर्ट, सुलक्षण गढ़।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूरी तरह से अरावली की पर्वत शृंखला पर निर्मित एक गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह जयपुर शहर की उत्तरी पहाड़ियों पर मुकुट के समान स्थित है, जहाँ से संपूर्ण पिंक सिटी (जयपुर शहर) का विहंगम और अत्यंत सुंदर नजारा दिखाई देता है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: कछवाहा वंश के महान खगोलशास्त्री और राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने इस किले का निर्माण करवाया था।
- निर्माण का वर्ष: इसका निर्माण सन 1734 ईस्वी में करवाया गया था।
- निर्माण का मुख्य उद्देश्य: 18वीं शताब्दी में मराठा शक्ति (मल्हारराव होल्कर आदि) के लगातार हो रहे आक्रमणों से जयपुर शहर की सुरक्षा के लिए एक मजबूत सैन्य चौकी और पीछे से रक्षा कवच तैयार करना था।
- नामकरण के पीछे की रहस्यमयी कहानी:
- नाहर सिंह भोमिया का साया: इस किले का मूल नाम सवाई जयसिंह ने ‘सुदर्शनगढ़’ (भगवान कृष्ण के चक्र के नाम पर) रखा था। लोक मान्यताओं के अनुसार, जब दिनभर मजदूर दीवारें बनाते थे, तो रात में वे अपने आप ढह जाती थीं। तांत्रिकों ने बताया कि यहाँ ‘नाहर सिंह भोमिया’ नामक एक मृत कछवाहा राजकुमार की प्रेतात्मा का वास है, जो अपनी भूमि पर निर्माण से नाराज हैं।
- इसके बाद तांत्रिक रत्नाकर पुंडरीक ने मंत्रोच्चार द्वारा नाहर सिंह के साये को अंबाबाड़ी (जयपुर) के पास एक अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया। भोमिया जी के सम्मान में ही इस किले का नाम बदलकर ‘नाहरगढ़’ रख दिया गया और किले के भीतर उनका एक छोटा मंदिर भी बनवाया गया।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- एक जैसे 9 महल (माधवेन्द्र भवन): नाहरगढ़ का सबसे मुख्य और अनूठा स्थापत्य आकर्षण महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा बनवाया गया ‘माधवेन्द्र भवन’ है। माधोसिंह जी ने अपनी 9 प्रिय पासवान रानियों (जैसे— सूरज प्रकाश, खुशहाल प्रकाश, जवाहर प्रकाश, ललित प्रकाश, आनंद प्रकाश, चांद प्रकाश, लक्ष्मी प्रकाश, फूल प्रकाश और बसंत प्रकाश) के लिए बिल्कुल एक जैसे नौ दो-मंजिला महलों का निर्माण करवाया। इन्हें विक्टोरिया स्थापत्य शैली में इस तरह कूटनीतिक रूप से डिजाइन किया गया है कि राजा जब एक रानी के महल में गुप्त मार्ग से जाए, तो दूसरी रानियों को इसकी भनक तक न लगे।
- बावड़ियाँ व टांके: पहाड़ी पर पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यहाँ पत्थरों को काटकर सुंदर सीढ़ीदार बावड़ियाँ (जैसे नाहरगढ़ की मुख्य बावड़ी) बनाई गई हैं, जो बॉलीवुड की कई फिल्मों (जैसे रंग दे बसंती) की शूटिंग का केंद्र रही हैं।
- जैविक उद्यान (Biological Park): इस किले की तलहटी में राजस्थान का प्रसिद्ध नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क स्थित है, जो वन्यजीव संरक्षण का प्रमुख केंद्र है।
8. आमेर दुर्ग (जयपुर) — कछवाहा स्थापत्य का वैभव
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: अम्बावती नगरी, अमरगढ़, काकियलगढ़, सुदर्शनपुर।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पहाड़ी ढलान और घाटी पर स्थित एक उत्कृष्ट गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: जयपुर शहर से लगभग 11 किलोमीटर दूर, दिल्ली रोड पर स्थित आमेर की ‘काली खोह’ पहाड़ी पर यह किला स्थित है। इसके ठीक नीचे ‘मावठा झील’ और ‘केसर क्यारी’ बनी हुई है, जिसमें किले का भव्य प्रतिबिंब दिखाई देता है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- प्रारंभिक निर्माता: मूल रूप से इस स्थान पर मीना शासकों का अधिकार था, जिन्हें पराजित कर कछवाहा वंश के दूलेहराय और काकिलदेव ने आमेर को अपनी राजधानी बनाया।
- आधुनिक निर्माता: वर्तमान भव्य प्रासाद और महलों वाले मुख्य दुर्ग का निर्माण राजा मानसिंह प्रथम ने सन 1592 ईस्वी में शुरू करवाया था। इसके बाद सवाई जयसिंह द्वितीय और मिर्जा राजा जयसिंह ने इसमें समय-समय पर कई ऐतिहासिक विस्तार किए।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- मिश्रित स्थापत्य शैली: आमेर का किला अपनी अत्यधिक कलात्मक और कोमल नक्काशी के लिए जाना जाता है। इसमें ठेठ राजपूत स्थापत्य शैली और मुगल वास्तुकला का सबसे सुंदर, भव्य और गहरा समन्वय देखने को मिलता है।
- गणेश पोल: यह किले के आंतरिक महलों का मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके ऊपर बारीक नक्काशी और भित्ति चित्र बने हैं। इसके अद्भुत स्थापत्य को देखकर विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन ने कहा था कि: “यह दुनिया का सबसे सुंदर और सर्वश्रेष्ठ प्रवेश द्वार है।”
- शीश महल (दीवान-ए-खास): यह राजा मिर्जा राजा जयसिंह द्वारा निर्मित बेजोड़ महल है, जिसकी दीवारों और छतों पर बेल्जियम से मंगाए गए छोटे-छोटे कांच (दर्पण) के टुकड़ों को बारीक नक्काशी के साथ फिट किया गया है। अंधेरे कमरे में केवल एक मोमबत्ती जलाने पर पूरा महल तारों की तरह जगमगा उठता है। महाकवि बिहारी ने इसकी सुंदरता से सम्मोहित होकर इसे ‘दर्पण धाम’ नाम दिया था।
- शीला देवी मंदिर: कछवाहा राजपरिवार की कुलदेवी (इष्टदेवी) शीला माता का यह अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर किले के ‘जलेब चौक’ के पास स्थित है। इस काले संगमरमर की चमत्कारी मूर्ति को राजा मानसिंह प्रथम 1604 ई. में पूर्वी बंगाल के राजा केदार को पराजित कर ‘जसोर’ (वर्तमान बांग्लादेश) से आमेर लाए थे।
- दीवान-ए-आम: राजा मानसिंह द्वारा निर्मित एक विशाल हॉल, जो 40 नक्काशीदार खंभों पर टिका है, जहाँ राजा आम जनता की फरियाद सुनते थे।
- सुख महल व सुहाग मंदिर: रानियों के विश्राम और आमोद-प्रमोद के लिए ठंडी हवा के झरोखों वाले विशेष वातानुकूलित महल।
- ऐतिहासिक घटना: सन 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने आमेर पर अधिकार कर लिया था और कुछ समय के लिए आमेर दुर्ग का नाम बदलकर ‘मोमिनाबाद’ या ‘इस्लामाबाद’ रख दिया था।
9. तारागढ़ दुर्ग (अजमेर) — राजपूताना की अरावली कुंजी
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: राजस्थान का जिब्राल्टर, गढ़ बीठली, राजपूताना की कुंजी, अरावली का अरमान, अजयमेरु दुर्ग, पूर्व का जिब्राल्टर।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह अरावली की अत्यंत संकरी और तीखी ढलान पर बना एक सामरिक गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: अजमेर शहर के पास अरावली पर्वतमाला की ‘बीठली पहाड़ी’ पर समुद्र तल से लगभग 2855 फीट की विशाल ऊंचाई पर यह किला स्थित है। पहाड़ी के नाम पर ही इसे ‘गढ़ बीठली’ कहा जाता है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: चौहान राजवंश के प्रतापी और प्रबुद्ध राजा अजयराज चौहान ने सन 1113 ईस्वी में अजमेर नगर बसाने के साथ ही इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण किले का निर्माण करवाया था, इसलिए इसे प्राचीन काल में ‘अजयमेरु दुर्ग’ कहा जाता था।
- नामकरण ‘तारागढ़’ कैसे पड़ा?: 15वीं शताब्दी के अंत में मेवाड़ के महाराणा रायमल के वीर पुत्र कुंवर पृथ्वीराज सिसोदिया (जिन्हें इतिहास में अपनी तेज गति के कारण ‘उड़ना राजकुमार’ कहा जाता है) ने इस किले पर अधिकार कर लिया था। उन्होंने अपनी अत्यंत सुंदर और वीर पत्नी ‘तारा’ के रहने के लिए इस किले के भीतर कई नए महलों का निर्माण करवाया और दुर्ग की सुरक्षा प्राचीर को मजबूत किया। अपनी पत्नी के प्रति अगाध प्रेम के कारण ही उन्होंने इसका नाम बदलकर ‘तारागढ़’ रख दिया।
- सामरिक महत्व एवं विदेशी इतिहासकारों के कथन:
- राजस्थान का जिब्राल्टर: यह किला भौगोलिक रूप से राजस्थान के बिल्कुल केंद्र (हृदय स्थल) में स्थित है। यहाँ से संपूर्ण राजपूताना की रियासतों के मार्गों पर नियंत्रण रखा जा सकता था, इसलिए इसे ‘राजपूताना की कुंजी’ कहा गया। 1825 ई. में भारत के गवर्नर जनरल के साथ आए प्रसिद्ध ब्रिटिश बिशप हेबर ने इस किले की अभेद्य भौगोलिक बनावट और सुरक्षा को देखकर इसे “पूर्व का दूसरा जिब्राल्टर” (Gibraltar of the East) की संज्ञा दी थी।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- मीरान साहब की दरगाह: तारागढ़ के पहले गवर्नर (किलेदार) सूफी संत मीर सैयद हुसैन चिंग (मीरान साहब) की पवित्र दरगाह इसी किले के शीर्ष पर स्थित है, जो 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक के समय हुए एक युद्ध में शहीद हो गए थे।
- घोड़े की मजार: मीरान साहब की दरगाह के परिसर में ही उनके सबसे प्रिय घोड़े की मजार बनी हुई है। यह पूरे हिंदुस्तान में एकमात्र ऐसी अनोखी मजार है जहाँ मन्नत पूरी होने के लिए ‘चने की दाल’ चढ़ाई जाती है।
- दारा शिकोह की शरणस्थली: मुगल सम्राट शाहजहाँ के सबसे बड़े और विद्वान पुत्र दारा शिकोह का जन्म इसी तारागढ़ दुर्ग में हुआ था। बाद में औरंगजेब से ‘दोराई के युद्ध’ (1659 ई.) में पराजित होने के बाद दारा शिकोह ने भागकर इसी किले में सुरक्षित शरण ली थी।
- नाना साहब का झालरा व इब्राहिम का झालरा: पहाड़ी पर पेयजल संकट को दूर करने के लिए चट्टानों को काटकर बनाए गए विशाल और गहरे पानी के प्राचीन जलकुंड (झालरे)।
- रूठी रानी का महल: मारवाड़ के प्रतापी राजा राव मालदेव की पत्नी रानी उमादे (जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री) विवाह की पहली रात को ही राजा से किसी बात पर नाराज (रूठ) गई थीं। वे जीवनभर राजा से अलग रहीं और उन्होंने अपना अधिकांश निर्वासित जीवन इसी तारागढ़ दुर्ग के महलों में व्यतीत किया, इसलिए इतिहास में उन्हें ‘रूठी रानी’ कहा जाता है।
- 14 विशाल बुर्ज: इस किले की बाहरी प्राचीर में सुरक्षा के लिए 14 अभेद्य बुर्ज बनाए गए हैं, जिनमें— घूंघट बुर्ज, बांद्रा बुर्ज, इमली बुर्ज, फूटा बुर्ज, और नगाड़ची बुर्ज प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
10. तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) — तिलिस्मी किला
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: तिलिस्मी किला (जादुई किला), स्टार फोर्ट, बूंदी का किला।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक उच्च श्रेणी का गिरि दुर्ग (पहाड़ी किला) है।
- अवस्थिति: यह बूंदी जिले में अरावली की एक ऊँची पहाड़ी की ढलान पर समुद्र तल से लगभग 1426 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: हाड़ा चौहान राजवंश के प्रतापी शासक राव बरसिंह (या वीरसिंह) हाड़ा ने सन 1354 ईस्वी में इस किले का निर्माण करवाया था।
- नामकरण: पहाड़ी की ऊँची चोटी पर तीखे ढलान पर बने होने के कारण, नीचे मैदानी भाग से दूर से देखने पर इस संपूर्ण दुर्ग की आकृति आकाश में टिमटिमाते हुए तारे (Star) के समान दिखाई देती है, इसलिए इसे ‘तaraगढ़’ कहा गया।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- तिलिस्मी (जादुई) बनावट: इस किले के भीतर गुप्त सुरंगों, भूलभुलैया जैसे रास्तों और विशाल भूमिगत पानी के टैंकों का ऐसा जाल बिछा हुआ है कि अजनबी व्यक्ति इसमें खो सकता है। इसकी इसी रहस्यमयी बनावट के कारण इसे ‘तिलिस्मी किला’ कहा जाता है। प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक रडयार्ड किपलिंग ने इस किले को देखकर लिखा था कि: “यह किला मानव निर्मित नहीं बल्कि भूत-प्रेतों और जिन्नों द्वारा बनाया गया प्रतीत होता है।”
- गर्भ गुंजन तोप: इस किले के सबसे ऊंचे बुर्ज (भीम बुर्ज) पर मध्यकाल की अत्यंत विनाशकारी और विशाल तोप रखी है, जिसे ‘गर्भ गुंजन तोप’ कहा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, जब इस तोप को चलाया जाता था, तो उसकी भयंकर गर्जना से पशु-पक्षियों और महिलाओं के गर्भ गिर जाते थे।
- चित्रशाला (उम्मेद महल): महाराजा उम्मेद सिंह द्वारा निर्मित यह स्थान ‘भित्ति चित्रों का स्वर्ग’ कहलाता है। यहाँ की दीवारों पर राजस्थानी (बूंदी) चित्रशैली के विश्व प्रसिद्ध और अत्यंत सजीव भित्ति चित्र (Frascoes) उकेरे गए हैं, जिनमें मुख्य रूप से भगवान कृष्ण की लीलाओं और शिकार के दृश्यों को दर्शाया गया है।
- विशाल बावड़ियाँ और महल: सुख महल, छत्र महल, बादल महल और अनिरुद्ध महल। पानी के संरक्षण के लिए यहाँ ‘फूल सागर’, ‘नवल सागर’ और ‘धाभाई जी का कुंड’ जैसी विशाल बावड़ियाँ बनी हैं।
- मिट्टी का तारागढ़: इतिहास के अनुसार, मेवाड़ के राणा लाखा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वे बूंदी के तारागढ़ को जीत नहीं लेंगे, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए उदयपुर में ‘मिट्टी का नकली तारागढ़’ बनाया गया। जब राणा लाखा उसे तोड़ने गए, तो उस नकली मलबे की रक्षा के लिए भी कुंभा हाड़ा नामक वीर ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था।
11. रणथंभौर दुर्ग (सवाई माधोपुर) — हम्मीर की आन-बान का प्रतीक
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: हम्मीर की आन-बान-शान का प्रतीक, बख्तरबंद दुर्ग, रणतपुर, चित्तौड़गढ़ का छोटा भाई, दुर्गाधिराज।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह गिरि दुर्ग और वन दुर्ग (एरण दुर्ग) का सबसे सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
- अवस्थिति: यह सवाई माधोपुर जिले में ‘रण’ और ‘थंभ’ नामक दो पहाड़ियों के मध्य स्थित है। यह किला सात विशाल और अंडाकार पहाड़ियों से इस तरह प्राकृतिक रूप से घिरा हुआ है कि दूर से देखने पर बिल्कुल दिखाई नहीं देता, लेकिन किले के ऊपर से नीचे की घाटी साफ दिखाई देती है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: आधुनिक शोधों के अनुसार, इसका निर्माण 8वीं शताब्दी (944 ई. के आसपास) में चौहान वंश के राजा रणथंन देव चौहान ने करवाया था।
- रणनीतिक बनावट: पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच छिपे होने के कारण मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने इसके बारे में ऐतिहासिक वाक्य लिखा था: “राजस्थान के अन्य सभी दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग पूरी तरह बख्तरबंद (कवच युक्त) है।”
- इतिहास का प्रथम साका (1301 ई.):
- यह किला चौहान राजा हम्मीर देव चौहान की वीरता और उनके ‘हठ’ के लिए अमर है। हम्मीर ने मंगोल विद्रोही मोहम्मद शाह को अपने यहाँ शरण दी थी, जिसे वापस सौंपने से मना करने पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने दुर्ग पर घेरा डाला।
- हम्मीर के दो सेनापतियों (रणमल और रतिपाल) के विश्वासघात के कारण खिलजी ने गुप्त मार्ग से प्रवेश किया। 11 जुलाई 1301 ई. को राजा हम्मीर के नेतृत्व में वीरों ने केसरिया किया और उनकी रानी रंगदेवी तथा पुत्री पदमला ने किले के भीतर स्थित ‘पदमला तालाब’ में कूदकर राजस्थान के इतिहास का पहला साका (जल जौहर) किया।
- हम्मीर की इसी जिद्द के लिए इतिहास में यह दोहा अमर है: “सिंह सुवन सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार। तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।” खिलजी की विजय के बाद उसके मंत्री अमीर खुसरो ने कहा था: “आज कुफ्र (धर्म विरोध) का गढ़ इस्लाम का घर हो गया।”
- प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- त्रिनेत्र गणेश मंदिर: भारत का एकमात्र ऐसा अनोखा मंदिर जहाँ भगवान गणेश जी के तीन नेत्रों वाली मूर्ति स्थापित है। यहाँ कोई धड़ या सूंड नहीं है, केवल मुख की पूजा होती है। पूरे देश से लोग अपनी शादी का पहला निमंत्रण पत्र (कार्ड) इसी मंदिर के पते पर डाक द्वारा भेजते हैं।
- 32 खंभों की छतरी: राजा हम्मीर देव ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के सफल शासनकाल की स्मृति में इसका निर्माण करवाया था। यहाँ बैठकर हम्मीर प्रजा का न्याय करते थे, इसलिए इसे ‘न्याय की छतरी’ भी कहते हैं।
- सुपारी महल: स्थापत्य का एक अद्भुत उदाहरण, जहाँ एक ही प्रांगण के भीतर मंदिर, मस्जिद और चर्च (गिरजाघर) तीनों के अवशेष मिलते हैं, जो सांप्रदायिक सौहार्द को दर्शाता है।
- अन्य स्थल: जोगी महल (वर्तमान में पर्यटकों के विश्राम का केंद्र), पीर सदरुद्दीन की दरगाह, रनिहाड़ तालाब, गुप्त गंगा और अंधरी दरवाजा।
12. भटनेर दुर्ग (हनुमानगढ़) — उत्तरी सीमा का प्रहरी
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: उत्तरी सीमा का प्रहरी, उत्तरी भड़ किवाड़, भट्टी नरेश का किला, हनुमानगढ़ का किला।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह मुख्य रूप से धान्वन दुर्ग (मरुस्थलीय) और भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
- अवस्थिति: यह हनुमानगढ़ जिले में प्राचीन सरस्वती (वर्तमान घग्गर नदी) के मुहाने पर समतल मैदानी भाग पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: यह राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग माना जाता है। इसका निर्माण तीसरी शताब्दी के अंत में (लगभग 295 ईस्वी या 285 ईस्वी) जैसलमेर के भाटी राजवंश के आदि पुरुष राजा भूपत भाटी ने करवाया था।
- शिल्पी: इस ऐतिहासिक किले का मुख्य वास्तुकार (शिल्पी) केकेया था। यह पूरा किला पक्की ईंटों, चूने और मिट्टी के गारे से निर्मित है।
- नामकरण: सन 1805 ईस्वी में बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह ने यहाँ के भाटी शासक जाब्ता खान को मंगलवार के दिन पराजित कर इस किले पर अधिकार कर लिया था। मंगलवार का दिन भगवान हनुमान जी का होने के कारण उन्होंने इसका नाम बदलकर ‘हनुमानगढ़’ रख दिया।
- सामरिक महत्व एवं विदेशी आक्रमण:
- भौगोलिक रूप से यह किला मध्य एशिया और मुल्तान से दिल्ली आने वाले व्यापारिक व सैन्य मार्ग पर स्थित था। इसी कारण राजस्थान में सर्वाधिक विदेशी आक्रमण इसी भटनेर दुर्ग पर हुए हैं।
- इस पर महमूद गजनवी (1001 ई.), गुलाम वंश के सुल्तान बलबन के भाई शेरखां (जिन्होंने यहाँ शासन किया और उनकी मजार भी यहीं है), और क्रूर तैमूर लंग ने आक्रमण किए।
- इतिहास का सबसे अनोखा जौहर (1398 ई.):
- सन 1398 ईस्वी में जब क्रूर तुर्क आक्रमणकारी तैमूर लंग ने भटनेर पर भयंकर आक्रमण किया, तब यहाँ के शासक राव दुलचंद भाटी ने वीरतापूर्वक युद्ध किया।
- इस युद्ध के दौरान अपनी अस्मत की रक्षा के लिए इतिहास में एकमात्र बार हिंदू महिलाओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी एक साथ ‘जौहर’ की अग्नि में प्रवेश किया था। तैमूर लंग ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-तैमुरी’ में इस किले की मजबूती के बारे में लिखा था: “मैंने पूरे हिंदुस्तान में भटनेर जैसा मजबूत और महफूज किला कहीं और नहीं देखा।”
13. लोहागढ़ दुर्ग (भरतपुर) — अजय दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: अजय दुर्ग (अभेद्य किला), मिट्टी का किला, पूर्वी सीमा का प्रहरी, भरतपुर दुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह राजस्थान का सबसे सर्वश्रेष्ठ पारिख दुर्ग (जिसके चारों ओर गहरी खाई हो) और भूमि दुर्ग (समतल मैदान पर बना किला) है।
- अवस्थिति: यह भरतपुर शहर के बिल्कुल मध्य में समतल मैदानी भूभाग पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इस अभेद्य दुर्ग का निर्माण जाट राजवंश के सबसे प्रतापी और बुद्धिमान शासक महाराजा सूरजमल जाट (जिन्हें जाटों का प्लेटो या अफलातून कहा जाता है) ने सन 1733 ईस्वी में करवाया था। इससे पहले यहाँ ‘खेमकरण जाट’ की एक छोटी मिट्टी की गढ़ी थी।
- अभेद्य बनावट और विज्ञान (लोहागढ़ क्यों कहलाया?):
- इस किले की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दोहरी प्राचीर (दीवारें) हैं। भीतर की दीवार ईंट और पत्थरों की है, जबकि बाहरी दीवार मिट्टी की अत्यंत चौड़ी और विशाल परत से बनी है।
- मध्यकाल में जब दुश्मन सेना इस पर तोप से भारी गोले दागती थी, तो वे गोले मिट्टी की मोटी दीवार में धंस जाते थे और उनकी बारूद की आग शांत हो जाती थी, जिससे किले को कोई नुकसान नहीं होता था। इसी कारण इस किले को ‘लोहागढ़’ या ‘अजय दुर्ग’ कहा गया क्योंकि इसे कोई जीत नहीं सका।
- सुजान गंगा नहर: किले की सुरक्षा के लिए इसके चारों ओर एक विशाल और गहरी खाई खोदी गई है। इस खाई में पानी की आपूर्ति के लिए पास में स्थित ‘मोती झील’ (भरतपुर की लाइफलाइन) से ‘सुजान गंगा’ नामक नहर निकाली गई है, जिसके जरिए खाई में हमेशा पानी भरा रहता था ताकि दुश्मन सीधे दीवार तक न पहुंच सके।
- ऐतिहासिक विजय और अष्टधातु दरवाजा:
- लॉर्ड लेक की पराजय: सन 1805 ईस्वी में अंग्रेज जनरल लॉर्ड लेक ने अपनी विशाल बारूदी सेना और आधुनिक तोपों के साथ इस किले को जीतने के लिए लगातार 5 बार भयंकर आक्रमण किए। अंग्रेजों ने लाखों गोले दागे, लेकिन वे हर बार मिट्टी की प्राचीर के कारण असफल रहे और अंततः अंग्रेजों को संधि करके पीछे हटना पड़ा। इस विजय पर राजस्थान में यह कहावत प्रसिद्ध हुई: “आठ फिरंगी नौ गोरे, लड़ें जाट के दो छोरे (दुर्जनसाल और माधोसिंह)।”
- अष्टधातु दरवाजा: इस किले के मुख्य द्वार पर एक विशाल अष्टधातु का दरवाजा लगा है। इस दरवाजे का इतिहास यह है कि इसे मूल रूप से चित्तौड़गढ़ किले से अलाउद्दीन खिलजी उखाड़कर दिल्ली ले गया था। सन 1765 ईस्वी में महाराजा सूरजमल के वीर पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की और वे इस बेशकीमती अष्टधातु के दरवाजे को मुगल लाल किले से उखाड़कर सम्मान सहित भरतपुर ले आए और लोहागढ़ में स्थापित किया।
- जवाहर लाट: दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में किले के भीतर एक सुंदर विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया गया, जिसे ‘जवाहर लाट’ कहा जाता है। यहाँ भरतपुर के जाट राजाओं का राजतिलक होता था।
14. भैंसरोड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़) — राजस्थान का वेल्लोर
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: राजस्थान का वेल्लोर, व्यापारियों का किला, जलदुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक उच्च श्रेणी का जल दुर्ग (औदक दुर्ग) है।
- अवस्थिति: यह चित्तौड़गढ़ जिले में चम्बल और बामणी (ब्राह्मणी) नदियों के पवित्र संगम पर, तीखी खड़ी चट्टानों के ऊपर स्थित है। यह तीन ओर से पानी की अगाध जलराशि से सुरक्षित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- व्यापारियों द्वारा निर्मित: राजस्थान के इतिहास का यह एकमात्र ऐसा अनोखा दुर्ग है जिसका निर्माण किसी राजा या सामंत ने नहीं करवाया, बल्कि इसका निर्माण ‘भैंसाशाह’ नामक एक प्रसिद्ध धनी व्यापारी और ‘रोड़ा’ नामक चारण बंजारे ने मिलकर करवाया था।
- उद्देश्य: प्राचीन काल में यह क्षेत्र घने जंगलों और लुटेरों से घिरा था। व्यापारियों ने अपने कीमती व्यापारिक काफिलों (सार्थवाह) को लुटेरों से सुरक्षित रखने और रात्रि विश्राम के लिए इस सुदृढ़ जल दुर्ग का निर्माण करवाया था। दोनों के नाम पर ही इसका नाम ‘भैंसरोड़गढ़’ पड़ा।
- कर्नल जेम्स टॉड का ऐतिहासिक कथन:
- राजस्थान के इतिहास के जनक कर्नल जेम्स टॉड इस किले की प्राकृतिक बनावट, नदियों के संगम और सामरिक सुदृढ़ता से इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि उन्होंने ऐतिहासिक वाक्य कहा था: “यदि मुझे संपूर्ण राजस्थान में कोई एक जागीर या किला चुनने का प्रस्ताव दिया जाए, तो मैं बिना एक क्षण गंवाए निसंकोच भैंसरोड़गढ़ के किले को चुनूंगा।”
- वेल्लोर से तुलना: दक्षिण भारत (तमिलनाडु) के प्रसिद्ध ‘वेल्लोर दुर्ग’ के समान पानी से घिरे होने और इसकी स्थापत्य बनावट के कारण ही इसे ‘ can राजस्थान का वेल्लोर’ कहा जाता है। यह किला आज भी राजपूत स्थापत्य की सादगी और मजबूती का प्रतीक है।
15. अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही) — अर्बुद दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: अर्बुद दुर्ग, भोराथल, परमारों का किला, अचलगढ़।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह अरावली की सर्वोच्च चोटियों पर स्थित एक प्रसिद्ध गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह सिरोही जिले में स्थित प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल माउंट आबू (अर्बुदांचल पर्वत) की पहाड़ियों पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- मूल निर्माता: इस दुर्ग का प्रारंभिक और मूल निर्माण 9वीं-10वीं शताब्दी के दौरान आबू के परमार शासकों ने अपनी सुरक्षा के लिए करवाया था।
- पुनर्निर्माता: सन 1452 ईस्वी में मेवाड़ के महान निर्माता महाराणा कुंभा ने गुजरात की सीमा की ओर से होने वाले संभावित विदेशी आक्रमणों को रोकने और सामरिक नियंत्रण रखने के लिए इस प्राचीन परमार दुर्ग के खंडहरों पर एक नए अभेद्य दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- भंवराथल (महमूद बेगड़ा की पराजय): इस किले से जुड़ी एक अत्यंत चमत्कारी लोक कथा प्रसिद्ध है। गुजरात के क्रूर सुल्तान महमूद बेगड़ा ने जब अचलगढ़ पर आक्रमण किया, तो उसने यहाँ स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर और जैन मंदिरों की पवित्र मूर्तियों को तोड़ना शुरू कर दिया। लोक मान्यताओं के अनुसार, जैसे ही उसने मूर्तियों पर प्रहार किया, अचानक पर्वत के छिद्रों से लाखों विशालकाय मधुमक्खियां (भंवरे) निकल पड़ीं। इन मधुमक्खियों ने बेगड़ा की सेना पर ऐसा भीषण हमला किया कि सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई। उस ऐतिहासिक स्थान को आज भी ‘भंवराथल’ या ‘भोराथल’ कहा जाता है।
- अचलेश्वर महादेव मंदिर: किले की तलहटी में स्थित भगवान शिव का प्राचीन मंदिर, जहाँ किसी शिवलिंग की पूजा नहीं होती, बल्कि भगवान शिव के पैर के दाहिने अंगूठे के निशान (चरण खड्ड) की पूजा की जाती है। मंदिर के पास एक विशाल पाषाण नंदी की मूर्ति भी स्थापित है।
- ओखा रानी का माळिया: दुर्ग के शीर्ष भाग पर स्थित ओखा रानी का सुंदर महल।
- कुंभा और उदा की मूर्तियां: किले के भीतर ‘सावन-भादो झील’ के किनारे महाराणा कुंभा और उनके पुत्र उदा की पीतल की सुंदर पाषाण प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहाँ प्रसिद्ध ‘मंदाकिनी कुंड’ भी स्थित है, जिसके किनारे तीन विशाल पाषाण भैंसों की मूर्तियां बनी हैं।
16. सोनारगढ़ दुर्ग (जैसलमेर) — स्वर्णगिरि
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: सोनार किला, स्वर्णगिरि, जैसलमेर दुर्ग, रेगिस्तान का गुलाब, पश्चिमी सीमा का प्रहरी, लंगर डाले हुए जहाज के समान, गोरागढ़।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह राजस्थान का सबसे आदर्श और सर्वप्रमुख धान्वन दुर्ग (मरुस्थलीय किला) है।
- अवस्थिति: यह थार के मरुस्थल के बीचों-बीच स्थित ‘त्रिकूट पहाड़ी’ (गोरहरा पहाड़ी) पर निर्मित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इस भव्य और ऐतिहासिक दुर्ग की नींव यदुवंशी भाटी राजा रावल जैसल ने 12 जुलाई 1155 ईस्वी (श्रावण शुक्ल द्वादशी) को रखी थी। इसका अधिकांश निर्माण कार्य उनके पुत्र शालीवाहन द्वितीय के काल में पूर्ण हुआ।
- अद्वितीय स्थापत्य कला और स्वर्ण आभा:
- बिना चूने का किला: इस संपूर्ण किले के निर्माण में कहीं भी चूने, सीमेंट या गारे का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया गया है। पीले बलुआ पत्थरों को विशेष रूप से काटकर केवल खांचे (इंटरलॉकिंग या पिन पद्धति) के द्वारा आपस में जोड़ा गया है। इसकी छत को दीमक से बचाने के लिए पूरी तरह लकड़ी से निर्मित किया गया है, जिस पर प्रतिवर्ष गोमूत्र का लेप किया जाता है।
- स्वर्णगिरि क्यों कहलाया?: सुबह और शाम के समय जब सूर्य की सुनहरी किरणें इसके पीले पत्थरों पर पड़ती हैं, तो यह पूरा किला सोने की तरह चमकने लगता है। इसी कारण इसे ‘सोनार किला’ या ‘स्वर्णगिरि’ कहा जाता है। दूर से देखने पर यह ऐसा प्रतीत होता है मानो मरुस्थल के विशाल समंदर में कोई बहुत बड़ा जहाज अपनी लंगर डाले खड़ा हो।
- 99 बुर्ज: इस किले की दोहरी रक्षा प्राचीर (जिसे कमरकोट या पाडा कहा जाता है) में सुरक्षा के लिए 99 विशाल बुर्ज बनाए गए हैं, जो पूरे राजस्थान में किसी भी किले में सर्वाधिक हैं। सत्यजीत रे ने इस किले पर ‘सोनार किला’ नामक एक प्रसिद्ध फिल्म भी बनाई थी।
- जैसलमेर के प्रसिद्ध ढाई (2.5) साके:
- यह किला अपने इतिहास के ढाई साकों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है:
- प्रथम साका (13वीं सदी के अंत में): रावल मूलराज के समय दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान हुआ। वीरों ने केसरिया और महिलाओं ने जौहर किया।
- द्वितीय साका (14वीं सदी): रावल दूदा के समय फिरोजशाह तुगलक के आक्रमण के दौरान हुआ।
- तृतीय अर्ध-साका (1550 ई.): यह इतिहास का सबसे अनोखा साका है। कंधार के अमीर अली ने जब यहाँ के राव लूणकरण पर विश्वासघात करके आक्रमण किया, तो युद्ध में राजपूत वीरों ने अद्भुत वीरता दिखाते हुए केसरिया तो किया (दुश्मनों को मार गिराया), लेकिन अचानक युद्ध जीतने के कारण महिलाओं का ‘जौहर’ नहीं हो पाया। चूँकि इसमें केवल केसरिया हुआ और जौहर नहीं, इसलिए इसे ‘अर्ध-साका’ (आधा साका) कहा जाता है।
- यह किला अपने इतिहास के ढाई साकों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है:
- दर्शनीय स्थल:
- जैन ज्ञान भंडार: किले के भूमिगत तहखानों में प्राचीन जैन आचार्यों के हस्तलिखित ग्रंथों का सबसे दुर्लभ और विशालतम संग्रह स्थित है, जिसे ‘जैन भद्र सूरी ज्ञान भंडार’ कहा जाता है। यहाँ ताड़पत्रों पर लिखी गई अमूल्य पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं।
- राजमहल व सर्वोत्तम विलास: गज विलास, जवाहर महल और बादल महल (जो राजस्थान का सबसे ऊंचा बादल महल है)। किले के भीतर ‘पगल्या जी’ और लक्ष्मीनाथ जी का प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित है।
17. जालोर दुर्ग (जालोर) — सुवर्णगिरी
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: सुवर्णगिरी, जाबालिपुर दुर्ग, सोनगढ़, कंचनगिरि।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक सामरिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह जालोर जिले में सुकड़ी नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित ‘सोनगिरि पहाड़ी’ (या कनकाचल पहाड़ी) पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: आधुनिक इतिहासकारों (जैसे डॉ. दशरथ शर्मा) के अनुसार, इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण 8वीं शताब्दी में प्रतिहार राजवंश के प्रतापी राजा नागभट्ट प्रथम ने करवाया था। बाद में इस पर परमारों और फिर चौहानों का अधिकार हुआ।
- नामकरण: महर्षि जाबालि की तपोभूमि होने के कारण इस क्षेत्र का प्राचीन नाम ‘जाबालिपुर’ था और पहाड़ी के नाम पर इस किले को ‘सुवर्णगिरी’ कहा गया। (विशेष ध्यान दें: जैसलमेर का किला ‘स्वर्णगिरी’ है, जबकि जालोर का किला ‘सुवर्णगिरी’ है।)
- इतिहासकार हसन निजामी का ऐतिहासिक कथन:
- अपनी अभेद्य बनावट के कारण यह किला मध्यकाल में अजेय माना जाता था। प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने अपने ग्रंथ ‘ताज-उल-मासीर’ में लिखा था: “जालोर का किला एक ऐसा शक्तिशाली और सुदृढ़ दुर्ग है, जिसका मुख्य दरवाजा आज तक कोई भी बाहरी आक्रमणकारी अपने बाहुबल या हथियारों के बल पर नहीं खोल पाया।” (अलाउद्दीन खिलजी ने भी इसे सामने से नहीं, बल्कि एक गद्दार के कपट के कारण जीता था)।
- जालोर का प्रसिद्ध साका (1311-12 ई.):
- यह किला चौहान शासक कान्हड़देव चौहान और उनके अत्यंत वीर पुत्र वीरमदेव के अमर बलिदान के लिए जाना जाता है।
- सन 1311 ईस्वी में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ जालोर को घेरा। ‘बीका दहिया’ नामक एक राजपूत सेनापति ने लालच में आकर किले के एक गुप्त कच्चे मार्ग का भेद खिलजी को बता दिया। दुश्मन सेना रात के अंधेरे में दीवार तोड़कर भीतर घुस गई। कान्हड़देव और वीरमदेव ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ते हुए केसरिया किया और वीरांगनाओं ने जौहर की अग्नि में आत्मोत्सर्ग किया। विजय के बाद खिलजी ने इसका नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ रख दिया था।
- प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- तोपखाना मस्जिद: यह मूल रूप से प्रतिहार राजा भोज द्वारा निर्मित एक भव्य ‘संस्कृत पाठशाला’ थी। अलाउद्दीन खिलजी ने इसे तुड़वाकर एक मस्जिद का रूप दे दिया, जिसे आज ‘तोपखाना मस्जिद’ कहा जाता है। इसकी वास्तुकला अत्यंत सुंदर है।
- मलिक शाह की दरगाह: किले के भीतर स्थित प्रसिद्ध बग़दाद के सुल्तान मलिक शाह की पवित्र मजार।
- अन्य स्थल: वीरमदेव की चौकी, चामुंडा माता मंदिर, जैन मंदिर, और ‘नाथावत की छतरी’।
18. मैगजीन दुर्ग (अजमेर) — अकबर का किला
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: अकबर का किला, अकबर का दौलतखाना, मुगल शस्त्रागार (मैगजीन), राजपूताना संग्रहालय।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूर्ण रूप से एक स्थल दुर्ग (भूमि दुर्ग) है, जो समतल भूमि पर चारों ओर ऊँची प्राचीर से घिरा है।
- अवस्थिति: यह अजमेर शहर के बिल्कुल मध्य भाग में स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: मुगल सम्राट जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने सन 1570 ईस्वी में इस किले का निर्माण करवाया था।
- पूर्णतः मुगल शैली: यह संपूर्ण राजस्थान का एकमात्र ऐसा अनोखा दुर्ग है, जो शत-प्रतिशत ‘मुगल स्थापत्य और वास्तुकला शैली’ पर निर्मित है। इसमें राजपूत शैली का प्रभाव बिल्कुल नहीं है। अकबर प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के परम भक्त थे। वे जब जियारत के लिए अजमेर आते थे, तो उनके शाही ठहरने और राजपूताना की रियासतों पर सामरिक नियंत्रण रखने के लिए इस किले को ‘दौलतखाने’ (शाही खजाने) के रूप में बनवाया गया था।
- ऐतिहासिक घटना जिसने भारत का भाग्य बदल दिया:
- सर थॉमस रो की मुलाकात (10 जनवरी 1616): इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के शाही दूत सर थॉमस रो व्यापारिक अनुमति प्राप्त करने के लिए भारत आए थे। 10 जनवरी 1616 ईस्वी को इसी मैगजीन दुर्ग के मुख्य शाही झरोखे में ब्रिटिश दूत थॉमस रो की मुलाकात मुगल बादशाह जहांगीर से हुई थी। जहांगीर ने इसी किले में अंग्रेजों को भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के बैनर तले व्यापार करने की पहली औपचारिक लिखित अनुमति दी थी, जिसने आगे चलकर भारत को गुलामी की कड़ियों में जकड़ दिया।
- हल्दीघाटी युद्ध की योजना: सन 1576 ईस्वी के प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध से ठीक पहले, मुगल सेनापति कुंवर मानसिंह प्रथम और आसफ खान ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध की पूरी सैन्य रणनीति और चक्रव्यूह की योजना इसी किले में बैठकर तैयार की थी।
- मैगजीन नाम कैसे पड़ा?: सन 1801 ईस्वी में अंग्रेजों ने इस किले पर अधिकार कर लिया। सामरिक स्थिति को देखते हुए अंग्रेजों ने इसे अपना ‘मुगल शस्त्रागार’ (Magazine/मैगजीन) बना दिया, जहाँ वे अपने हथियार और बारूद जमा करते थे। तब से इसका नाम ‘मैगजीन किला’ पड़ गया। वर्तमान में यहाँ सरकार द्वारा ‘राजपूताना राजकीय संग्रहालय’ संचालित किया जा रहा है।
19. बयाना दुर्ग (भरतपुर) — विजयमंदिर गढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: विजयमंदिर गढ़, बादशाह दुर्ग, बाणासुर की नगरी, श्रीपंथ, शोणितपुर, सुल्तानकोट।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह अरावली की एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
- अवस्थिति: यह भरतपुर जिले के बयाना कस्बे के पास ‘दमदमा पहाड़ी’ (या मानी पहाड़ी) के ऊंचे शिखर पर स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: प्राचीन काल में यह क्षेत्र बाणासुर की नगरी कहलाता था। इतिहास के अनुसार, इस सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कछवाहा राजवंश के आदि पुरुष राजा विजयपाल ने सन 1040 ईस्वी में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इस पहाड़ी दुर्ग को ‘विजयमंदिर गढ़’ कहा गया।
- प्राचीन भारत का इतिहास और नील की खेती:
- बयाना का इतिहास गुप्तकाल और महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। गुप्त राजवंश के समय यह क्षेत्र उत्तर भारत का एक प्रमुख रणनीतिक केंद्र था। मध्यकाल और प्राचीन काल में बयाना पूरे हिंदुस्तान में ‘सर्वश्रेष्ठ नील की खेती’ (Indigo Cultivation) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध था। विदेशी व्यापारी यहाँ से नील खरीदने आते थे।
- अद्वितीय स्थापत्य कला एवं प्रमुख दर्शनीय स्थल:
- राजस्थान का प्रथम विजय स्तम्भ (भीम लाट): इस किले के भीतर लाल बलुआ पत्थर से निर्मित एक विशाल और ऊँचा लाट (स्तम्भ) स्थित है, जिसे ‘भीम लाट’ कहा जाता है। इसका निर्माण गुप्त वंश के प्रतापी राजा समुद्रगुप्त के सामंत विष्णुवर्धन ने सन 371 ईस्वी के आसपास करवाया था। यह चित्तौड़गढ़ के विजय स्तम्भ से भी कई सौ साल पुराना है और इसे राजस्थान का सबसे पहला और प्राचीनतम ‘विजय स्तम्भ’ माना जाता है।
- ऊषा मंदिर और ऊषा मस्जिद: द्वापर युग में भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध का विवाह बाणासुर की पुत्री ‘ऊषा’ के साथ हुआ था, जिसकी स्मृति में यहाँ ‘ऊषा मंदिर’ बनवाया गया था। कछवाहा राजा लक्ष्मण सेन की पत्नी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। बाद में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने इस मंदिर को तुड़वाकर इसे ‘ऊषा मस्जिद’ का रूप दे दिया था।
- लोदी मीनार: दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी द्वारा निर्मित एक सुंदर ऐतिहासिक मीनार।
- अकबरी छतरी और जहांगीरी दरवाजा: मुगल काल में निर्मित स्थापत्य कला के सुंदर नमूने। इस किले के पास ही प्रसिद्ध ‘खानवा का मैदान’ स्थित है, जहाँ 1527 ई. में राणा सांगा और बाबर के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ था।
20. सिवाना दुर्ग (बालोतरा / पूर्व में बाड़मेर) — मारवाड़ की संकटकालीन शरणस्थली
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: कुमट दुर्ग, मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली, जालोर दुर्ग की कुंजी, अणखलो सिवाणो।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह गिरि दुर्ग और वन दुर्ग दोनों श्रेणियों के लक्षण रखता है।
- अवस्थिति: यह वर्तमान बालोतरा जिले (पूर्व में बाड़मेर) की छप्पन की पहाड़ियों में ‘हल्देश्वर पहाड़ी’ के ऊंचे शिखर पर स्थित है। इस किले के चारों ओर ‘कुमट’ नामक कंटीली झाड़ियाँ बहुत अधिक पाई जाती हैं, इसलिए इसे ‘कुमट दुर्ग’ भी कहते हैं।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- निर्माता: इस सामरिक किले का निर्माण 10वीं शताब्दी (954 ईस्वी) में परमार राजा भोज के प्रतापी पुत्र वीर नारायण परमार ने करवाया था।
- मारवाड़ की शरणस्थली और जालोर की कुंजी:
- इतिहास के अनुसार, जब भी जोधपुर (मारवाड़) के राठौड़ शासकों (जैसे राव मालदेव या मारवाड़ के चंद्रसेन) पर कोई बड़ा बाहरी संकट आता था, तो वे सुरक्षा के लिए इसी अभेद्य किले में आकर आश्रय लेते थे, इसलिए इसे ‘मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली’ कहा गया। इसके अलावा, यदि किसी आक्रमणकारी को जालोर के किले को जीतना होता था, तो उसे पहले सिवाना पर अधिकार करना अनिवार्य था, इसलिए इसे ‘जालोर दुर्ग की कुंजी’ कहा जाता है।
- इतिहास का प्रथम साका (1308 ई.):
- दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जब इस किले को घेरा, तब यहाँ के प्रतापी चौहान शासक सातलदेव (शीतलदेव) चौहान और उनके भाई सोम ने अद्भुत वीरता दिखाई। ‘भायला’ नामक एक गद्दार सेनापति ने किले के मुख्य जल स्रोत ‘भांडेलाव तालाब’ में गाय का रक्त मिलवाकर उसे दूषित कर दिया। पानी के संकट के कारण सातलदेव के नेतृत्व में वीरों ने केसरिया किया और राजपूत महिलाओं ने जौहर किया। विजय के बाद खिलजी ने इसका नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रख दिया था।
21. माण्डलगढ़ दुर्ग (भीलवाड़ा) — कटोरे नुमा दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: मन्दलाकृति दुर्ग (कटोरे नुमा किला), मांडू दुर्ग, मेवाड़ का पूर्वी प्रहरी।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक प्राचीन गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह भीलवाड़ा जिले में बनास, बेड़च और मेनाल नदियों के प्रसिद्ध त्रिवेणी संगम के निकट, बीजासण पहाड़ी पर स्थित है।
- निर्माण, आकृति एवं इतिहास:
- आकृति: इस किले का विस्तार और प्राचीर गोलाकार है, जिसकी बनावट एक मंडलाकार (कटोरे या थाली जैसी) दिखाई देती है, इसी कारण इसका नाम ‘माण्डलगढ़’ पड़ा।
- निर्माता: जनश्रुतियों के अनुसार, इसका निर्माण मांडू भील के नाम पर चौहान शासकों द्वारा करवाया गया था, जिसका बाद में महाराणा कुंभा ने पुनर्निर्माण करवाया।
- ऐतिहासिक प्रसंग: सन 1576 ईस्वी के प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध से ठीक पहले, मुगल सेनापति कुंवर मानसिंह प्रथम ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध का अभ्यास करने के लिए अपनी विशाल मुगल सेना को करीब एक महीने तक इसी माण्डलगढ़ किले में रोककर कड़ा सैन्य प्रशिक्षण दिया था। यहाँ शीतला माता मंदिर और 32 खंभों की जगन्नाथ कछवाहा की प्रसिद्ध छतरी स्थित है।
22. चूरू का किला (चूरू) — चाँदी के गोले दागने वाला किला
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: चाँदी के गोले दागने वाला ऐतिहासिक किला, चूरू गढ़ी।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूर्ण रूप से समतल रेतीले धरातल पर बना एक धान्वन दुर्ग (मरुस्थलीय किला) और भूमि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह चूरू शहर के मध्य भाग में स्थित है।
- निर्माण एवं इतिहास की अभूतपूर्व घटना:
- निर्माता: इस किले का निर्माण ठाकुर कुशाल सिंह ने सन 1739 ईस्वी में अपनी जनता की सुरक्षा और सैन्य चौकसी के लिए करवाया था।
- चाँदी के गोलों का इतिहास (1814 ई.): यह किला पूरे विश्व के इतिहास में अपनी तरह की एकमात्र और अलौकिक घटना के लिए अमर है। सन 1814 ईस्वी में बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह ने अपनी शक्तिशाली सेना के साथ चूरू के किले पर भीषण हमला कर दिया और उसे चारों तरफ से घेर लिया। उस समय किले के रक्षक ठाकुर शिवसिंह थे। चूरू की देशभक्त जनता और सैनिकों ने मिलकर दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया।
- युद्ध के दौरान अचानक किले के भीतर तोप के गोले बनाने के लिए आवश्यक सीसा (Lead) और बारूद समाप्त हो गया। राजा के संकट को देखकर किले के भीतर मौजूद सुनारों और आम जनता ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने घरों के सोने-चाँदी के आभूषण और बेशकीमती बर्तन राजा के राजकोष में लाकर समर्पित कर दिए। इसके बाद वैज्ञानिकों और लुहारों ने मिलकर चाँदी के तोप के गोले तैयार किए। जब किले की प्राचीर से दुश्मन सेना पर छम-छम करते हुए चाँदी के गोले दागे गए, तो बीकानेर की सेना भी दंग रह गई। जनता की इस अपार देशभक्ति को देखकर दुश्मन सेना ने सम्मान में किले का घेरा हटा लिया और युद्ध बंद कर दिया।
23. शेरगढ़ दुर्ग (बारां) — कोषवर्धन दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: कोषवर्धन दुर्ग, सांपों की शरणस्थली, हाड़ौती का प्रहरी।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक उच्च श्रेणी का जल दुर्ग (औदक दुर्ग) और गिरि दुर्ग का समन्वय है।
- अवस्थिति: यह बारां जिले में परवन नदी के बिल्कुल किनारे एक ऊंचे पर्वत शिखर पर स्थित है। यह तीन ओर से नदी के पानी और घने जंगलों से सुरक्षित है।
- निर्माण, नामकरण एवं सांपों का रहस्य:
- प्राचीन नाम: इस किले का मूल और प्राचीन नाम ‘कोषवर्धन’ था, जिसका उल्लेख प्राचीन शिलालेखों में मिलता है। इसका निर्माण मालवा के परमार शासकों द्वारा करवाया गया था।
- शेरशाह सूरी का अधिकार: मध्यकाल में जब अफगान शासक शेरशाह सूरी ने मालवा अभियान के दौरान इस अभेद्य किले पर अपना अधिकार कर लिया, तो उसने इसकी सामरिक स्थिति को देखकर इसका नाम अपने नाम पर बदलकर ‘शेरगढ़’ रख दिया था।
- सांपों की शरणस्थली: इस किले के चारों ओर स्थित ‘शेरगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य’ के घने जंगलों में अत्यंत दुर्लभ प्रजाति के विषैले सांप (विशेषकर पायथन और कोबरा) पाए जाते हैं, जिसके कारण इस राष्ट्रीय विरासत को स्थानीय भाषा में ‘सांपों की शरणस्थली’ भी कहा जाता है। किले के भीतर अमीर खां पिंडारी के महल और जाला जालिम सिंह की प्रसिद्ध हवेलियां स्थित हैं।
24. शेरगढ़ दुर्ग (धौलपुर) — दक्षिण का द्वारगढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: दक्षिण का द्वारगढ़, दक्खनी द्वार, धौलपुर का किला, तिमिरगढ़।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक सुदृढ़ स्थल दुर्ग (भूमि दुर्ग) और नदी दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह धौलपुर जिले में पवित्र चम्बल नदी के किनारे स्थित है। यह किला भौगोलिक रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश इन तीन राज्यों की सीमाओं के रणनीतिक त्रिकोण (जंक्शन) पर स्थित है।
- निर्माण, सामरिक महत्व एवं हुनहुंकार तोप:
- निर्माता: इसका मूल और प्रारंभिक निर्माण कुषाण वंश के राजा मालदेव ने करवाया था। बाद में सन 1540 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद इस किले का पूरी तरह से जीर्णोद्धार और पक्का पुनर्निर्माण करवाया।
- दक्षिण का द्वार: प्राचीन और मध्यकाल में मालवा, ग्वालियर और दक्षिण भारत की ओर जाने वाले या वहाँ से दिल्ली की ओर आने वाले सभी सैन्य और व्यापारिक मार्ग इसी किले के पास से गुजरते थे। दिल्ली सल्तनत के लिए यह दक्षिण का मुख्य प्रवेश द्वार था, इसलिए इसे ‘दक्षिण का द्वारगढ़’ कहा गया।
- हुनहुंकार तोप: इस किले का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ रखी मध्यकाल की प्रसिद्ध ‘हुनहुंकार तोप’ (Hunhunkar Cannon) है। यह तोप अपनी भयंकर और कान फाड़ देने वाली आवाज के लिए इतिहास में प्रसिद्ध थी। इसके अलावा किले के भीतर सैयद हुसैन की पवित्र मजार भी स्थित है।
25. चोमू का किला (जयपुर ग्रामीण) — धाराधारगढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: धाराधारगढ़, रघुनाथगढ़, चोमुहां गढ़, सामंती वास्तुकला का प्रतीक।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह राजस्थान के सबसे बेहतरीन धान्वन दुर्ग (समतल मैदान पर बना किला) और भूमि दुर्ग का उदाहरण है।
- अवस्थिति: यह जयपुर ग्रामीण जिले के चोमू कस्बे में बिल्कुल समतल मैदानी भूभाग पर स्थित है।
- निर्माण, वास्तुकला एवं विशेषता:
- निर्माता: इस किले की आधारशिला और निर्माण सन 1595 ईस्वी में चोमू के कछवाहा सामंत ठाकुर करणसिंह ने अपनी सुरक्षा के लिए रखी थी। बाद में ठाकुर रघुनाथ सिंह ने इसका विस्तार किया, जिसके कारण इसे ‘रघुनाथगढ़’ भी कहा जाता है।
- कूटनीतिक बनावट: सामंती स्थापत्य कला के इस बेजोड़ किले को इस तकनीकी और कूटनीतिक रूप से डिजाइन किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति किले के बाहर मैदान में खड़ा हो, तो उसे किले के ऊंचे और भव्य महल बिल्कुल दिखाई नहीं देते। यह सुरक्षा की दृष्टि से बेहद कारगर था। इसके भीतर बना ‘हवा मंदिर’ और सोने की बारीक नक्काशी वाला ‘शीश महल’ अपनी सुंदरता के लिए पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
26. कांकणबाड़ी किला (अलवर) — सरिस्का का नजरबंदी गढ़
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: सरिस्का का किला, नजरबंदी गढ़, काकनवाड़ी दुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक उत्कृष्ट वन दुर्ग (जंगली किला) और गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
- अवस्थिति: यह अलवर जिले में स्थित भारत के प्रसिद्ध ‘सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान’ (Sariska Tiger Reserve) के घने और बीहड़ जंगलों के बिल्कुल बीच में एक ऊंचे पठार पर स्थित है।
- निर्माण एवं मुगल इतिहास की ऐतिहासिक कैद:
- निर्माता: इसका निर्माण आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अकाल राहत कार्यों के दौरान और आपातकालीन सैन्य चौकियों के रूप में करवाया था।
- दारा शिकोह की कैद: मुगल साम्राज्य के इतिहास में इस किले का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। जब मुगल सम्राट शाहजहाँ के बीमार होने के बाद उनके बेटों के बीच दिल्ली के सिंहासन के लिए क्रूर उत्तराधिकार का युद्ध (सामूगढ़ का युद्ध) चल रहा था, तब क्रूर औरंगजेब ने चाल चलकर अपने सगे बड़े भाई और परम विद्वान कछवाहा शुभचिंतक दारा शिकोह को बंदी बना लिया था। औरंगजेब ने दारा शिकोह को दिल्ली से दूर इसी कांकणबाड़ी के घने जंगलों वाले किले में लाकर आजीवन नजरबंद (कैद) करके रखा था। दारा शिकोह ने अपने जीवन के अंतिम दिन इसी किले के झरोखों में सरिस्का के जंगलों को देखते हुए बिताए थे।
27. बनेड़ा दुर्ग (भीलवाड़ा) — मेवाड़ का सीमा प्रहरी
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: छोटा उदयपुर, मेवाड़ का पूर्वी सीमा प्रहरी, बनेड़ा गढ़।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक मजबूत गिरि दुर्ग है जो छोटी पहाड़ी पर स्थित है।
- अवस्थिति: यह भीलवाड़ा जिले के बनेड़ा कस्बे में स्थित है।
- निर्माण एवं अनोखा इतिहास (अखंडता का प्रतीक):
- निर्माता: इस किले का आधुनिक निर्माण मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के काल में राजा भीमसिंह द्वारा करवाया गया था।
- विशिष्ट फैक्ट: राजस्थान के इतिहास में बनेड़ा का किला अपनी एक बेहद अनूठी विशेषता के लिए जाना जाता है। अपने निर्माण के बाद से लेकर भारत की आजादी और रियासतों के विलय तक, यह किला कभी भी किसी भी विदेशी या बाहरी आक्रमणकारी (जैसे मुगल या मराठा) के अधीन नहीं हुआ और न ही कभी नष्ट हुआ। यह हमेशा अपने मूल कछवाहा/सिसोदिया सामंतों के पास ही सुरक्षित रहा। इसकी इसी अखंडता और उदयपुर के महलों जैसी स्थापत्य बनावट के कारण इसे स्थानीय भाषा में ‘छोटा उदयपुर’ भी कहा जाता था।
28. बसंतगढ़ दुर्ग (सिरोही) — बसंती दुर्ग
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: बसंती दुर्ग, पिंडवाड़ा का किला, अर्बुद रक्षक।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह पूरी तरह से अरावली की पहाड़ियों पर निर्मित एक गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह सिरोही जिले में पिंडवाड़ा कस्बे के पास पहाड़ियों के मध्य स्थित है।
- निर्माण एवं सामरिक उद्देश्य:
- निर्माता: मेवाड़ के महान स्थापत्य जनक महाराणा कुंभा ने 15वीं शताब्दी में इस किले का निर्माण करवाया था। वीर विनोद ग्रंथ के अनुसार कुंभा ने मेवाड़ की रक्षा के लिए 32 किलों का निर्माण करवाया था, जिनमें से यह एक है।
- सामरिक उद्देश्य: इस क्षेत्र में प्राचीन काल में ‘मेरो’ (एक स्थानीय लड़ाकू जनजाति) का बहुत अधिक प्रभाव था, जो अक्सर मेवाड़ी सीमाओं पर आक्रमण करते थे। मेरो के प्रभाव को पूरी तरह नियंत्रित करने और सिरोही की तरफ से होने वाले आक्रमणों को रोकने के लिए कुंभा ने इस ‘बसंती दुर्ग’ का निर्माण एक मजबूत रक्षा चौकी के रूप में करवाया था। इस किले के पास ही प्राचीन ‘वशिष्ठ मुनि का आश्रम’ और ‘क्षेमंकरी माता का मंदिर’ स्थित है।
29. तिमनगढ़ दुर्ग (करौली) — मूर्तियों का गुप्त खजाना
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: तवनगढ़, त्रिभुवनगढ़, प्राचीन मूर्तियों का अजायबघर।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक प्राचीन और सुदृढ़ गिरि दुर्ग है।
- अवस्थिति: यह करौली जिले के मासलपुर कस्बे के पास अरावली की ऊँची पहाड़ियों पर स्थित है।
- निर्माण एवं मूर्तियों की तस्करी का रहस्य:
- निर्माता: इस ऐतिहासिक किले का निर्माण यदुवंशी (यादव) राजा तिमनपाल (त्रिभुवनपाल) ने सन 1100 ईस्वी के आसपास करवाया था। उन्हीं के नाम पर इसे तिमनगढ़ या तवनगढ़ कहा गया।
- मूर्तियों का खजाना: यह किला अपनी वास्तुकला से ज्यादा प्राचीन और बेशकीमती पाषाण मूर्तियों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। किले के भीतर स्थित ‘नंद-भोजी के कुएं’ और तहखानों में प्राचीन काल की अद्भुत नक्काशीदार मूर्तियां छिपी हुई थीं। आधुनिक इतिहास में यह किला तब बहुत बड़ी चर्चा में आया जब यहाँ से दुर्लभ और करोड़ों रुपये की प्राचीन मूर्तियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तस्करी के मामलों का भंडाफोड़ हुआ था। इसके बाद सरकार ने यहाँ सुरक्षा बढ़ाई। किले के भीतर बना ‘सागर’ और ‘सूरज कुआं’ पानी के बेहतरीन स्रोत हैं।
30. बाला दुर्ग (अलवर) — कुंवारा किला
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: कुंवारा किला, अलवर का किला, बड़ा किला, अलघराय दुर्ग।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक अत्यंत विशाल और अभेद्य गिरि दुर्ग की श्रेणी में आता है।
- अवस्थिति: यह अलवर शहर के ठीक पीछे अरावली की तीखी खड़ी पहाड़ी पर समुद्र तल से लगभग 1960 फीट की विशाल ऊंचाई पर स्थित है।
- निर्माण एवं ‘कुंवारा किला’ कहलाने का रोचक रहस्य:
- निर्माता: इस किले का प्रारंभिक निर्माण हसन खां मेवाती और आमेर के राजा काकिलदेव के छोटे पुत्र अलघराय ने 1049 ई. के आसपास करवाया था। बाद में इसका पक्का पुनर्निर्माण निकुम्भ क्षत्रियों और खानजादा हसन खां मेवाती ने 1521 ई. में करवाया।
- कुंवारा किला क्यों कहा जाता है?: सैन्य इतिहास के अनुसार, इस विशाल और मजबूत किले पर इतिहास में कभी भी कोई बड़ा निर्णायक युद्ध या खून-खराबा नहीं हुआ, और न ही कोई बाहरी आक्रमणकारी इसे युद्ध में हरा कर जीत सका। राजपूती परंपरा में जिस किले पर कभी कोई युद्ध न हुआ हो या जिसे किसी दुश्मन ने फतह न किया हो, उसे ‘कुंवारा किला’ कहा जाता है।
- बाबर और जहांगीर का संबंध: मुगल बादशाह बाबर खानवा के युद्ध के बाद इस किले में आकर कुछ दिनों के लिए रुका था। इसके अलावा अकबर के विद्रोही पुत्र शहजादा सलीम (जहांगीर) को सजा के तौर पर 3 साल के लिए इसी किले में नजरबंद करके रखा गया था, जहाँ आज भी ‘सलीम महल’ और ‘सलीम सागर जलाशय’ बने हुए हैं। इसमें कुल 6 बड़े प्रवेश द्वार हैं— चांद पोल, सूरज पोल, कृष्ण पोल, लक्ष्मण पोल, अंधेरी पोल और जय पोल।
31. माधोराजपुरा किला (जयपुर ग्रामीण) — मराठों की पराजय का प्रतीक
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: मराठों की पराजय का प्रतीक, कछवाहा सैन्य गढ़, माधोसिंह का किला।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह एक मजबूत भूमि दुर्ग (स्थल दुर्ग) है।
- अवस्थिति: यह जयपुर ग्रामीण जिले की फागी तहसील के माधोराजपुरा गाँव में स्थित है।
- निर्माण एवं ऐतिहासिक गौरवशाली घटनाएं:
- निर्माता: इस किले का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम ने मराठों पर अपनी ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में इस पूरे कस्बे को बसाने के साथ करवाया था।
- मराठा सेनापति की कैद: यह किला जयपुर रियासत के आत्मसम्मान और मराठों की करारी हार का जीवंत गवाह है। इतिहास के अनुसार, भरतपुर के जाट महाराजा जवाहर सिंह की सहायता करते हुए जयपुर के वीर कछवाहा सैनिकों ने मराठा सेनापति को पराजित किया और उसे इसी किले के तहखाने में बंदी बनाकर कैद कर लिया था।
- भगतसिंह की शौर्य गाथा: इसके अलावा 1857 की क्रांति के समय टोंक के नवाब के अमीर खान के परिवारों को बंदी बनाने और क्रांतिकारी गतिविधियों को थामने में इस किले की रणनीतिक भूमिका रही थी।
32. अहिच्छत्रपुर किला (नागौर) — नागौर का किला
- प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपनाम: नागौर का किला, नागाणा दुर्ग, अहिच्छत्रपुर दुर्ग, अमर सिंह राठौड़ की शौर्यस्थली।
- भौगोलिक स्थिति एवं श्रेणी:
- श्रेणी: यह स्थापत्य कला की दृष्टि से एक सर्वश्रेष्ठ भूमि दुर्ग और धान्वन दुर्ग का मिश्रण है।
- अवस्थिति: यह नागौर शहर के बिल्कुल मध्य भाग में समतल मैदान पर स्थित है। नागौर का प्राचीन नाम ‘अहिच्छत्रपुर’ (चौहानों की प्रारंभिक राजधानी) था।
- निर्माण, अमर सिंह का शौर्य एवं अनूठी वाटर डक्ट प्रणाली:
- निर्माता: इस किले का प्रारंभिक निर्माण 4वीं शताब्दी में नागवंश के राजाओं ने करवाया था, लेकिन इसका आधुनिक सुदृढ़ पत्थरों का निर्माण 12वीं शताब्दी (1154 ईस्वी) में चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय के मुख्यमंत्री कैमास (कदम्बवास) की देखरेख में हुआ था।
- अमर सिंह राठौड़ की गाथा: यह किला मारवाड़ के परम प्रतापी और स्वाभिमानी वीर राव अमर सिंह राठौड़ की वीरता और उनकी ‘कटार’ के लिए इतिहास में अमर है। शाहजहाँ के साले सलावत खां को मुगल दरबार में सरेआम मौत के घाट उतारने वाले अमर सिंह राठौड़ ने इसी किले से नागौर का शासन चलाया था। किले के कंगूरों पर आज भी उनकी तलवारों और तोपों के निशान मौजूद हैं।
- अद्भुत वाटर डक्ट (फव्वारा) प्रणाली: स्थापत्य कला की दृष्टि से इस किले को यूनेस्को (UNESCO) द्वारा ‘अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस’ (Award of Excellence) से सम्मानित किया जा चुका है। इसकी सबसे बड़ी वैज्ञानिक विशेषता इसका प्राचीन वाटर मैनेजमेंट और फव्वारा प्रणाली है। किले के महलों के भीतर इस तरह से बारीक नालियां और फव्वारे बनाए गए थे कि ऊपर टैंक से पानी छोड़ते ही पूरे महल प्राकृतिक रूप से ठंडे (Air-Conditioned) हो जाते थे। इस किले पर दागे गए तोप के गोले महलों को नुकसान पहुंचाए बिना उनके ऊपर से निकल जाते थे, ऐसी इसकी बनावट थी। यहाँ प्रसिद्ध ‘बादल महल’, ‘शीश महल’ और सूफी संत काजी हमीदुद्दीन नागोरी की पवित्र दरगाह स्थित है।
