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बीकानेर का राठौड़ राजवंश

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बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना मारवाड़ के राव जोधा के प्रतापी पुत्र राव बीका द्वारा की गई थी। इस राजवंश के शासक स्वयं को ‘जय जांगलधर बादशाह’ कहते थे और इनका राजकीय राजचिन्ह “मच्यीव” (बाज़ पक्षी) था। इनका मूल मंत्र था— “जतो धर्मस्ततो जयः” (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है)।

1. राव बीका — बीकानेर के राठौड़ वंश के संस्थापक (1465 ई. – 1504 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के पाँचवें पुत्र थे। चाचा कांधल और पिता के व्यंग्य “लगता है बीका कोई नया राज्य बसाएगा” से प्रेरित होकर इन्होंने 1465 ई. में जोधपुर छोड़ दिया और नए राज्य की खोज में ‘जांगल प्रदेश’ (आधुनिक बीकानेर क्षेत्र) आ गए।
    • करणी माता का आशीर्वाद: बीका ने देशनोक की प्रसिद्ध लोक देवी श्री करणी माता को अपनी इष्टदेवी मानकर उनका आशीर्वाद लिया। माता ने आशीर्वाद दिया था: “बीको थारो बीकाणो, जोधाणो सूं सवायो होसी” (यानी बीका तेरा बीकानेर, जोधपुर से भी सवाया और प्रसिद्ध होगा)।
    • बीकानेर की स्थापना (1488 ई.): इन्होंने गोदारा और सारण जाटों के सहयोग से 1488 ई. (वैशाख शुक्ल तृतीया – आखा तीज) को बीकानेर शहर की स्थापना की और यहाँ राठौड़ वंश की स्वतंत्र शाखा की नींव रखी। आज भी बीकानेर का स्थापना दिवस आखा तीज को पतंग उड़ाकर मनाया जाता है।
    • जोधपुर पर आक्रमण: राव जोधा की मृत्यु के बाद जब इनके भाई राव सूजा ने पिता के शाही चिन्ह (ढाल, तलवार, पूज्य लक्ष्मी माता की मूर्ति) देने से मना किया, तो बीका ने जोधपुर पर चढ़ाई की और केवल वे पूजनीय शाही चिन्ह लेकर बीकानेर लौटे। इन्होंने बीकानेर में ‘कोडमदेसर भैरव मंदिर’ और ‘लक्ष्मीनाथ जी मंदिर’ का निर्माण करवाया था।

2. राव नारा — (1504 ई. – 1505 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये राव बीका के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनका शासनकाल मात्र एक वर्ष का रहा। सामरिक दृष्टि से ये स्थानीय भाटी और चाहाड़ शासकों के विद्रोह को दबाने में ही व्यस्त रहे और अल्पायु में ही इनका निधन हो गया।

3. राव लूणकरण — ‘कलयुग का कर्ण’ (1505 ई. – 1526 ई.)

  • उपनाम / उपाधि: कलयुग का कर्ण (मुंशी देवीप्रसाद के अनुसार, उनकी अत्यधिक दानशीलता के कारण)।
  • ऐतिहासिक योगदान व युद्ध:
    • साम्राज्य विस्तार: इन्होंने नागौर के खानों को पराजित किया और फतेहपुर के कायमखानियों को हराकर अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार किया।
    • लूणकरणसर झील की स्थापना: इन्होंने बीकानेर में मीठे पानी की कमी को देखते हुए अपने नाम पर ‘लूणकरणसर’ कस्बा बसाया और वहाँ लूणकरणसर झील (खारे पानी की) का निर्माण करवाया।
    • ढोसी का युद्ध (1526 ई.): नारनौल (हरियाणा) के नवाब सामी खान के खिलाफ लड़ते हुए ढोसी के युद्ध में राव लूणकरण वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। जयसोम के ग्रंथ ‘कर्मचन्द्र वंशोत्कीर्तनकं काव्यम्’ में इनकी दानशीलता की तुलना राजा कर्ण से की गई है।

4. राव जैतसी — (1526 ई. – 1542 ई.)

  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण युद्ध:
    • रातिघाटी का युद्ध (1534 ई.): मुग़ल सम्राट हुमायूं के भाई और काबुल के शासक कामरान ने बीकानेर पर भयंकर आक्रमण किया और भटनेर दुर्ग जीत लिया। राव जैतसी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए 26 अक्टूबर 1534 को रात्रि के समय कामरान की मुग़ल सेना पर अचानक छापामार हमला किया, जिसे ‘रातिघाटी का युद्ध’ कहते हैं। जैतसी ने कामरान को भागने पर मजबूर कर दिया। इस विजय का वर्णन बीठू सूजा ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘राव जैतसी रो छंद’ में किया है।
    • पाहोबा / साहेबा का युद्ध (1542 ई.): जोधपुर के प्रतापी शासक राव मालदेव ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत बीकानेर पर आक्रमण किया। फलोदी के पास साहेबा (पाहोबा) के मैदान में हुए इस भीषण युद्ध में राव जैतसी मालदेव की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया। जैतसी के पुत्र कल्याणमल ने बीकानेर छोड़ दिया।

5. राव कल्याणमल — मुगलों से संधि करने वाले प्रथम (1542 ई. – 1574 ई.)

  • ऐतिहासिक संघर्ष व मुग़ल अधीनता:
    • पिता की मृत्यु के बाद कल्याणमल ने अपने मंत्री कविराज जेता की सलाह पर दिल्ली के अफगान शासक शेरशाह सूरी से सहायता मांगी। इन्होंने गिरि-सुमेल के युद्ध (1544 ई.) में शेरशाह सूरी की ओर से राव मालदेव के खिलाफ भाग लिया। सूरी की जीत के बाद कल्याणमल को बीकानेर का राजपाठ वापस मिला।
    • नागौर दरबार (1570 ई.): जब मुग़ल सम्राट अकबर ने राजपूताना के राजाओं को अधीन करने के लिए नागौर में दरबार लगाया, तो राव कल्याणमल अपने दोनों पुत्रों (रायसिंह और पृथ्वीराज) के साथ वहाँ पहुँचे।
    • ये बीकानेर के पहले ऐसे राठौड़ शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार की और अकबर से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। अकबर ने इनके बड़े पुत्र रायसिंह को मुग़ल सेना में उच्च पद दिया।

6. वीर पृथ्वीराज राठौड़ — ‘पीथल’ व डींगल के हेरोस

  • ऐतिहासिक व साहित्यिक योगदान:
    • ये राव कल्याणमल के छोटे पुत्र और महाराजा रायसिंह के भाई थे। अकबर ने इनकी वीरता और काव्य कला से प्रसन्न होकर इन्हें गागरोण (झालावाड़) का किला जागीर में दिया था।
    • वेली क्रिसन रुक्मणी री: इन्होंने गागरोण दुर्ग में बैठकर डींगल भाषा में विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वेली क्रिसन रुक्मणी री’ की रचना की। इस ग्रंथ की महानता को देखकर कवि दुरसा आढ़ा ने इसे “पाँचवाँ वेद और उन्नीसवाँ पुराण” कहा था।
    • पीथल: इतालवी विद्वान एल.पी. टेसिटोरी ने इन्हें ‘डींगल भाषा का हेरोस’ (The Hero of Dingal) कहा है। कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध कविता ‘पीथल और पाथल’ में ‘पीथल’ शब्द इन्हीं पृथ्वीराज राठौड़ के लिए प्रयुक्त हुआ है (पाथल महाराणा प्रताप थे)।

7. महाराजा रायसिंह — ‘राजपूताने का कर्ण’ (1574 ई. – 1612 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: राजपूताने का कर्ण (मुंशी देवीप्रसाद के अनुसार), महाराजाधिराज (मुगलों द्वारा दी गई उपाधि)।
  • मुग़ल कूटनीति व साम्राज्य:
    • ये अकबर और जहांगीर के काल में मुग़ल साम्राज्य के स्तम्भ माने जाते थे। अकबर ने इन्हें 4000 और बाद में जहांगीर ने इनका मनसब बढ़ाकर 5000 कर दिया था। राजा मानसिंह कछवाहा के बाद ये मुग़ल दरबार के सबसे विश्वसनीय हिंदू सेनापति थे।
    • जोधपुर का प्रशासन: नागौर दरबार के बाद जब राव चन्द्रसेन ने विद्रोह किया, तो अकबर ने 1572 से 1574 ई. तक तीन वर्षों के लिए जोधपुर का प्रशासक महाराजा रायसिंह को ही नियुक्त किया था। इन्होंने मुगलों के काबुल, सिंध, और दक्षिण (बुरहानपुर) अभियानों का सफल नेतृत्व किया।
    • जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण: इन्होंने अपने बुद्धिमान मंत्री कर्मचन्द की देखरेख में बीकानेर के प्रसिद्ध जूनागढ़ दुर्ग (जमीन का जेवर) का निर्माण 1589-1594 ई. के मध्य करवाया। इसके मुख्य द्वार ‘सूरज पोल’ पर इन्होंने चित्तौड़ के वीर सेनापतियों जयमल और पत्ता की गजारूढ़ मूर्तियां लगवाईं और ‘रायसिंह प्रशस्ति’ लिखवाई।
    • साहित्यिक योगदान: ये स्वयं विद्वान थे। इन्होंने ‘रायसिंह महोत्सव’, ‘ज्योतिष रत्नमाला’ और ‘बाल बोधिनी’ (टीका) ग्रंथ लिखे। इनके काल को बीकानेर चित्रशैली का प्रारंभिक काल माना जाता है। इनका निधन दक्षिण भारत के बुरहानपुर में हुआ था।

8. राव दलपत सिंह — (1612 ई. – 1613 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये महाराजा रायसिंह के पुत्र थे। रायसिंह अपने छोटे पुत्र सूरसिंह को राजा बनाना चाहते थे, लेकिन मुग़ल कूटनीति के कारण जहांगीर ने दलपत सिंह को राजा बनाया। हालांकि, दलपत सिंह ने मुग़ल आदेशों की अवहेलना की और जहांगीर के खिलाफ विद्रोह कर दिया। जहांगीर ने इन्हें गद्दी से हटाकर बंदी बना लिया और बाद में मृत्युदंड दे दिया। बीकानेर के इतिहास में यह एक दुर्लभ घटना है।

9. महाराजा सूर सिंह — (1613 ई. – 1631 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: दलपत सिंह की मृत्यु के बाद मुग़ल बादशाह जहांगीर ने सूर सिंह को बीकानेर का शासक नियुक्त किया। इन्होंने शाहजहाँ के दक्षिण भारत के अभियानों में मुगलों की बड़ी सहायता की। इनके काल में बीकानेर की प्रसिद्ध ‘उस्ता कला’ (ऊँट की खाल पर सोने की नक्काशी) और ‘मथेरण कला’ का विकास होना प्रारंभ हुआ था।

10. महाराजा करण सिंह — ‘जंगलधर बादशाह’ (1631 ई. – 1669 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: जय जांगलधर बादशाह (राजपूताना के सभी राजाओं द्वारा दी गई उपाधि)।
  • ऐतिहासिक प्रसंग व मतीरे की राड़:
    • मतीरे की राड़ (1644 ई.): करनसिंह के काल की सबसे अनोखी घटना जोधपुर के अमर सिंह राठौड़ के साथ हुई। बीकानेर के ‘जाखणिया गांव’ की एक तरबूज (मतीरे) की बेल का फल नागौर की सीमा में चला गया था, जिस पर दोनों राज्यों की सेनाएं आपस में लड़ पड़ीं। इसे इतिहास में ‘मतीरे की राड़’ कहा जाता है।
    • जांगलधर बादशाह क्यों कहलाए?: मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के बेटों के बीच जब उत्तराधिकार युद्ध चल रहा था, तब औरंगजेब ने हिंदू राजाओं को नष्ट करने के लिए सिंध नदी पार करवाने की योजना बनाई। करनसिंह ने सभी हिंदू राजाओं को एकजुट किया और मुगलों की नावें तोड़ दीं। इस साहसिक कदम और हिंदू धर्म की रक्षा के कारण सभी राजाओं ने इन्हें ‘जय जांगलधर बादशाह’ की उपाधि दी, जिसे बाद में बीकानेर के राजकीय चिन्ह में शामिल किया गया। इन्होंने ‘साहित्य कल्पद्रुम’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी।

11. महाराजा अनूप सिंह — कला व साहित्य का स्वर्णकाल (1669 ई. – 1698 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: माही भरातिव (औरंगजेब द्वारा दक्षिण भारत में औरंगाबाद विजय के उपलक्ष्य में दी गई सर्वोच्च मुग़ल उपाधि)।
  • कला व साहित्य का स्वर्णिम युग:
    • अनूप सिंह का शासनकाल बीकानेर के इतिहास में साहित्य और कला का स्वर्णकाल माना जाता है। औरंगजेब जब उत्तर भारत में हिंदू मूर्तियों और प्राचीन ग्रंथों को नष्ट कर रहा था, तब अनूप सिंह ने दक्षिण भारत के अभियानों से लाखों दुर्लभ मूर्तियाँ और हस्तलिखित ग्रंथ खरीदकर बीकानेर लाए।
    • अनूप संस्कृत पुस्तकालय: इन्होंने जूनागढ़ दुर्ग में ‘अनूप संस्कृत पुस्तकालय’ की स्थापना की, जहाँ कुंभा के संगीत ग्रंथों और प्राचीन वेदों की पांडुलिपियों का विशाल संग्रह आज भी सुरक्षित है।
    • 33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर: इन्होंने दक्षिण से लाई गई मूर्तियों को सुरक्षित रखने के लिए जूनागढ़ में ’33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर’ बनवाया, जहाँ सिंह पर सवार गणेश जी (हेरम्ब गणपति) की अत्यंत दुर्लभ मूर्ति स्थापित है।
    • इनके काल में बीकानेर चित्रशैली का स्वर्णकाल रहा, जिसमें प्रसिद्ध उस्ता कलाकार ‘रुकनुद्दीन’ और ‘अली रज़ा’ ने काम किया। इनके दरबारी विद्वान भावभट्ट ने संगीत के कई प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे।

12. राव सरूप सिंह — (1698 ई. – 1700 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये महाराजा अनूप सिंह के पुत्र थे। जब ये गद्दी पर बैठे तब इनकी आयु मात्र 9 वर्ष की थी। औरंगजेब के आदेश पर इन्हें दक्षिण भारत के अभियानों पर भेजा गया था, जहाँ ‘अदौनी’ (आंध्र प्रदेश) नामक स्थान पर चेचक (स्मॉलपॉक्स) की बीमारी के कारण मात्र 11 वर्ष की आयु में इस बालक राजा का असामयिक निधन हो गया।

13. महाराजा सुजान सिंह — (1700 ई. – 1735 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सरूप सिंह की निःसंतान मृत्यु के बाद सुजान सिंह राजा बने। इनके काल में मारवाड़ (जोधपुर) के महाराजा अजीत सिंह और जयपुर के राजाओं ने बीकानेर पर कई आक्रमण किए, लेकिन सुजान सिंह ने अपनी कूटनीति से बीकानेर की रक्षा की। इन्होंने अपने नाम पर ‘सुजानगढ़’ कस्बे की स्थापना की थी, जो मारवाड़-बीकानेर सीमा पर एक प्रमुख सामरिक चौकी बना।

14. महाराजा जोरावर सिंह — (1735 ई. – 1746 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इनके काल में जोधपुर के महाराजा अभय सिंह ने बीकानेर पर एक बहुत बड़ा घेरा डाला था। जोरावर सिंह ने सहायता के लिए जयपुर के सवाई जयसिंह को पत्र लिखा। सवाई जयसिंह ने कूटनीति का परिचय देते हुए सीधे जोधपुर पर आक्रमण कर दिया, जिससे डरकर अभय सिंह को बीकानेर से अपना घेरा हटाकर तुरंत जोधपुर भागना पड़ा। जोरावर सिंह निःसंतान मरे, जिससे बीकानेर की राजनीति में उत्तराधिकार का मोड़ आया।

15. महाराजा गज सिंह — (1746 ई. – 1787 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व उपाधि:
    • ये जोरावर सिंह के भाई (आनंद सिंह के पुत्र) थे। मुग़ल सम्राट अहमदशाह ने इनकी कार्यकुशलता से प्रसन्न होकर इन्हें ‘श्री राजराजेश्वर’, ‘महाराजाधिराज’ और ‘महाराजा’ की वैध उपाधि दी थी। इससे पूर्व बीकानेर के शासक ‘राव’ शब्द का प्रयोग करते थे, गज सिंह के बाद से ‘महाराजा’ शब्द अनिवार्य हो गया।
    • इन्होंने बीकानेर में अपने नाम से ‘गजशाही सिक्के’ चलाए। इन्होंने जूनागढ़ के भीतर सुंदर ‘करण महल’ और ‘चाँद महल’ का निर्माण करवाया था।

16. महाराजा सूरत सिंह — अंग्रेजों से संधि करने वाले प्रथम (1787 ई. – 1828 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व हनुमानगढ़ का इतिहास:
    • भटनेर विजय (1805 ई.): सूरत सिंह ने सन 1805 ईस्वी में भटनेर के भाटी शासक जाब्ता खान को मंगलवार के दिन एक भीषण युद्ध में पराजित कर भटनेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। मंगलवार का दिन भगवान हनुमान जी का होने के कारण उन्होंने भटनेर का नाम बदलकर हमेशा के लिए ‘हनुमानगढ़’ रख दिया।
    • चूरू पर चांदी के गोले (1814 ई.): इन्होंने अपनी सेना को चूरू के किले को जीतने के लिए भेजा। चूरू के ठाकुर शिवसिंह ने बारूद खत्म होने पर अंग्रेजों और बीकानेर की सेना पर चांदी के गोले दागे थे, जो इतिहास की अनूठी घटना है।
    • अंग्रेजों से सहायक संधि (21 मार्च 1818): मारवाड़ और स्थानीय पिंडारियों के लूटपाट से तंग आकर महाराजा सूरत सिंह ने 21 मार्च 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के साथ सहायक संधि कर ली। बीकानेर की तरफ से इस संधि पर काशीनाथ ओझा ने हस्ताक्षर किए थे।

17. महाराजा रतन सिंह — (1828 ई. – 1551 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व सामाजिक सुधार:
    • बासनपी का युद्ध (1829 ई.): बीकानेर और जैसलमेर के बीच सीमाओं को लेकर बासनपी नामक स्थान पर अंतिम रियासती युद्ध हुआ, जिसमें मेवाड़ के महाराणा ने मध्यस्थता कर विवाद सुलझाया।
    • आनंदशपथ (कन्या वध पर रोक): सन 1844 ई. में महाराजा रतन सिंह ने गया (बिहार) की पवित्र भूमि पर बीकानेर के सभी सामंतों और राजपूतों को एकत्रित कर ‘कन्या वध’ (Female Infanticide) और ‘बाल विवाह’ न करने की पवित्र आन (शपथ) दिलवाई थी। इन्होंने अपने नाम पर बीकानेर में ‘रतन बिहारी मंदिर’ और ‘रतन सागर तालाब’ बनवाया था।

18. महाराजा सरदार सिंह — 1857 की क्रांति के रक्षक (1851 ई. – 1872 ई.)

  • 1857 की क्रांति में अनोखा योगदान:
    • 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय सरदार सिंह बीकानेर के महाराजा थे। ये संपूर्ण राजपूताना के एकमात्र ऐसे शासक थे जो अपनी सेना लेकर अंग्रेजों की सहायता के लिए अपनी रियासत (राजस्थान) से बाहर पंजाब और हरियाणा (हिसार, सिरसा, बाढ़लू) के मैदानों में गए थे
    • इन्होंने तात्या टोपे को पकड़वाने में भी अंग्रेजों की मदद की थी। इस अगाध राजभक्ति से प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने महाराजा सरदार सिंह को ‘टीबी’ परगने के 41 गांव उपहार (गिफ्ट) स्वरूप भेंट किए थे। ये निःसंतान मरे थे, जिससे अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र प्रथा के तहत अगले राजा का चुनाव किया।

19. महाराजा डूंगर सिंह — आधुनिक न्याय प्रणाली के जनक (1872 ई. – 1887 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व बीकानेरी भुजिया का इतिहास:
    • बीकानेरी भुजिया की शुरुआत: आज पूरी दुनिया में मशहूर ‘बीकानेरी भुजिया’ की शुरुआत सन 1877 ईस्वी में महाराजा डूंगर सिंह के शासनकाल में ही हुई थी। पहली बार मोठ के आटे से शाही रसोइया द्वारा भुजिया बनाई गई थी।
    • प्रशासनिक सुधार: इन्होंने बीकानेर में पहली बार आधुनिक न्याय व्यवस्था (Court System) और पुलिस प्रशासन की स्थापना की। सन 1885 ई. में बीकानेर में पहली बार बिजली और डाक-तार व्यवस्था की शुरुआत इन्हीं के काल में हुई थी। इन्होंने अपने छोटे भाई गंगा सिंह को गोद लिया था।

20. महाराजा गंगा सिंह — ‘आधुनिक भारत का भगीरथ’ (1887 ई. – 1943 ई.)

  • उपनाम / उपाधियाँ: आधुनिक भारत का भगीरथ, मरुधर का रक्षक, राजर्षि।
  • ऐतिहासिक प्रशासनिक सुधार व जलगंगा:
    • छप्पनिया अकाल (1899-1900 ई.): इनके शासनकाल के प्रारंभ में विक्रम संवत 1956 में भयंकर अकाल पड़ा, जिसे ‘छप्पनिया अकाल’ कहते हैं। गंगा सिंह ने अपनी जनता को भूखा मरने से बचाने के लिए अकाल राहत कार्यों की अद्भुत मिसाल पेश की, जिससे खुश होकर अंग्रेजों ने इन्हें ‘केसर-ए-हिंद’ पदक दिया।
    • गंग नहर का निर्माण (1927 ई.): मरुस्थल में पानी के स्थाई समाधान के लिए गंगा सिंह ने पंजाब के सतलज नदी के पानी को बीकानेर लाने की ऐतिहासिक योजना बनाई। 26 अक्टूबर 1927 को वायसराय लॉर्ड इर्विन ने ‘गंग नहर’ (Gang Canal) का उद्घाटन किया। यह विश्व की सबसे पहली और प्राचीनतम पक्की कंक्रीट से निर्मित नहर परियोजना है। मरुस्थल में सूखी धरती पर पानी लाने के इस अद्भुत कार्य के कारण इन्हें ‘आधुनिक भारत का भगीरथ’ कहा जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय कूटनीति व सैन्य गौरव:
    • गंगा रिसाला: इन्होंने ऊँटों की एक विशेष सैनिक टुकड़ी तैयार की थी, जिसे ‘गंगा रिसाला’ कहा जाता था। इस सेना ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन, मिस्र और फ्रांस के मैदानों में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था।
    • गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences): ये भारत के एकमात्र ऐसे राजा थे जिन्होंने लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930, 1931, 1932) में भाग लिया था। ये ‘चेम्बर ऑफ प्रिंसेस’ (नरेन्द्र मंडल – देशी राजाओं की संसद) के प्रथम चांसलर (अध्यक्ष) भी रहे। इन्होंने बीकानेर में भव्य ‘लालगढ़ पैलेस’ और गजनेर अभ्यारण्य का विकास करवाया।

21. महाराजा शार्दुल सिंह — भारत संघ में शामिल होने वाले प्रथम (1943 ई. – 1950 ई. / विलय तक)

  • भारत के एकीकरण में ऐतिहासिक रिकॉर्ड:
    • यह बीकानेर राजवंश के अंतिम शासक थे। भारत की आजादी और राजस्थान के एकीकरण के समय इनका कूटनीतिक योगदान अमर है।
    • देश की आजादी के समय जब कई राजा पाकिस्तान में मिलने की या स्वतंत्र रहने की साजिश रच रहे थे, तब महाराजा शार्दुल सिंह ने सबसे प्रबुद्ध देशभक्ति का परिचय दिया।
    • विलय पत्र पर प्रथम हस्ताक्षर: सरदार वल्लभभाई पटेल के आह्वान पर 7 अगस्त 1947 ई. को भारत के विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करने वाले संपूर्ण भारत के सबसे पहले शासक महाराजा शार्दुल सिंह ही थे। इनके इस त्वरित फैसले ने अन्य रियासतों को भी भारत में मिलने के लिए मजबूर किया। बाद में 30 मार्च 1949 को बीकानेर पूर्ण रूप से ‘बृहत् राजस्थान’ का हिस्सा बन गया।
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