राजस्थान के प्रमुख पुरुष व्यक्तित्व : Quick Revision Notes
| व्यक्तित्व | मुख्य स्थान | उपनाम | विशेष कार्य एवं ऐतिहासिक तथ्य | ||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अमरचन्द बांठिया | बीकानेर | राजस्थान का मंगल पांडे, द्वितीय भामाशाह | 1857 की क्रांति में फाँसी पर लटकने वाले प्रथम राजस्थानी। इन्होंने ग्वालियर के खजाने से रानी लक्ष्मीबाई की मदद की थी। | ||||
| अर्जुन लाल सेठी | जयपुर | राजस्थान का दधीचि, जन-जागृति का जनक | जयपुर में ‘वर्धमान विद्यालय’ की स्थापना। इन्होंने कहा था- “अगर अर्जुन लाल नौकरी करेगा तो अंग्रेजों को भारत से बाहर कौन निकालेगा?” | ||||
| केसरी सिंह बारठ | शाहपुरा (भीलवाड़ा) | राजस्थान केसरी, योगी पुरुष | चेतावनी रा चूंगट्या’ (13 सोरठे) लिखकर मेवाड़ महाराणा को दिल्ली दरबार में जाने से रोका। वीर भारत सभा की स्थापना की। | ||||
| जोरावर सिंह बारठ | उदयपुर | राजस्थान का चंद्रशेखर | लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के बाद कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। ‘अमरदास वैरागी’ के छद्म नाम से जीवन बिताया। | ||||
| प्रताप सिंह बारठ | उदयपुर/शाहपुरा | – | केसरी सिंह के पुत्र। बरेली जेल में कठोर यातनाएँ सहीं। इनका प्रसिद्ध कथन- “मैं अपनी माँ को हँसाने के लिए हजारों माताओं को नहीं रुला सकता।” | ||||
| मोतीलाल तेजावत | उदयपुर | आदिवासियों का मसीहा, ‘बावजी’ | इन्होंने ‘एकी आंदोलन’ चलाया। “न हाकिम, न हुकुम” का नारा दिया। इनका संबंध ‘झाड़ोल’ और ‘नीमड़ा’ कांड से है। | ||||
| गोविंद गिरी | डूंगरपुर (बांसिया) | – | 1883 में सम्प सभा की स्थापना की। भगत आंदोलन चलाया। मानगढ़ धाम (बांसवाड़ा) हत्याकांड इन्हीं के समय हुआ। | ||||
| जयनारायण व्यास | जोधपुर | शेर-ए-राजस्थान, लोकनायक, लक्कड़ का फक्कड़ | अग्निबाण’ (राजस्थानी भाषा का प्रथम राजनीतिक समाचार पत्र) के संपादक। मारवाड़ हितकारिणी सभा की स्थापना। | ||||
| जमनालाल बजाज | सीकर | गांधी जी के 5वें पुत्र, गुलाम नंबर 4 | रायबहादुर की उपाधि लौटाई। वर्धा में सत्याग्रह आश्रम और जयपुर में चरखा संघ की स्थापना की। | ||||
| बालमुकुंद बिस्सा | जोधपुर (पीलवा) | राजस्थान का जतिन दास | 1942 में जोधपुर जेल में भूख हड़ताल के दौरान शहीद हुए। डीडवाना में खादी भंडार की स्थापना की। | ||||
| सागरमल गोपा | जैसलमेर | – | आजादी के दीवाने’ और ‘जैसलमेर का गुंडाराज’ पुस्तकें लिखीं। जेलर गुमान सिंह ने इन्हें जेल में जिंदा जला दिया था। | ||||
| सेठ दामोदर दास राठी | जैसलमेर (पोकरण) | सशस्त्र क्रांति का भामाशाह | ब्यावर में ‘द कृष्णा मिल्स’ (1889) की स्थापना। क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता प्रदान की। | ||||
| गौकुल भाई भट्ट | सिरोही (हाथल) | राजस्थान का गांधी | सिरोही प्रजामंडल की स्थापना की। सिरोही के राजस्थान में विलय में मुख्य भूमिका निभाई। | ||||
| स्वामी केशवानंद | सीकर (मंगलूणा) | – | ग्रामोत्थान विद्यापीठ (संगरिया) की स्थापना की। शिक्षा के प्रसार और हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया। | ||||
| तेज कवि | जैसलमेर | – | स्वतंत्रता बावनी’ ग्रंथ लिखा और गांधी जी को भेंट किया। इनकी रम्मतें आजादी की अलख जगाती थीं। | ||||
| श्याम जी कृष्ण वर्मा | – | क्रांतिकारियों का पितामह | अजमेर को कर्मस्थली बनाया। लंदन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की। | ||||
| हीरालाल शास्त्री | जोबनेर (जयपुर) | – | राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री। टोंक में ‘जीवन कुटीर’ (वनस्थली विद्यापीठ) की स्थापना की। | ||||
| बलवंत सिंह मेहता | उदयपुर | – | मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष। ‘प्रताप सभा’ की स्थापना की और संविधान सभा के सदस्य रहे। | ||||
राजस्थान के प्रमुख पुरुष व्यक्तित्व : In Details
1. अमरचन्द बांठिया (बीकानेर)
- उपनाम: राजस्थान का मंगल पांडे, द्वितीय भामाशाह
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- अमरचन्द बांठिया का जन्म बीकानेर के एक जैन ओसवाल परिवार में हुआ था, लेकिन इनका व्यापारिक केंद्र ग्वालियर था।
- ये ग्वालियर रियासत के नगर सेठ और राजकोष के प्रभारी (कोषाध्यक्ष) थे।
- 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन्होंने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए ग्वालियर का शाही खजाना क्रांतिकारी रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की सेना को सौंप दिया ताकि देश की आजादी की लड़ाई कमजोर न पड़े।
- इस आर्थिक सहायता के कारण इन्हें ‘द्वितीय भामाशाह’ कहा गया।
- अंग्रेजों ने राजद्रोह के आरोप में इन्हें 22 जून 1858 को ग्वालियर के सराफा बाजार में एक नीम के पेड़ पर लटकाकर सरेआम फांसी दे दी।
- 1857 की क्रांति में राजस्थान की तरफ से शहीद होने वाले ये प्रथम व्यक्ति थे, इसी कारण इन्हें ‘राजस्थान का मंगल पांडे’ कहा जाता है।
2. अर्जुन लाल सेठी (जयपुर)
- उपनाम: राजस्थान का दधीचि, राजस्थान में जन-जागृति के जनक
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- जयपुर के जैन परिवार में जन्मे सेठी जी राजस्थान के पहले क्रांतिकारी शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. किया था।
- जयपुर के महाराजा ने जब इन्हें राज्य का जिलाधीश (हाकिम) बनाने का प्रस्ताव दिया, तो इन्होंने देश सेवा को सर्वोपरि रखते हुए ऐतिहासिक कथन कहा था: “यदि अर्जुन लाल नौकरी करेगा, तो अंग्रेजों को भारत से बाहर कौन निकालेगा?”
- इन्होंने साल 1905-1906 में जयपुर में ‘वर्धमान पाठशाला’ (जैन वर्धमान विद्यालय) की नींव रखी। दिखने में यह एक धार्मिक और साधारण स्कूल था, लेकिन पर्दे के पीछे यहाँ युवाओं को सशस्त्र क्रांति और बम बनाने का गुप्त प्रशिक्षण दिया जाता था।
- 1912 के प्रसिद्ध लॉर्ड हार्डिंग बम कांड की योजना बनाने में इनकी मुख्य भूमिका थी।
- इन्हें ‘निमाज (आरा) हत्याकांड’ के आरोप में गिरफ्तार कर मद्रास की वेल्लोर जेल में कड़ी यातनाओं के बीच रखा गया था।
- जीवन के अंतिम दिनों में इन्होंने अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह में ‘करीम खान’ नाम से बच्चों को अरबी-फारसी पढ़ाई और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की।
3. केसरी सिंह बारठ (शाहपुरा, भीलवाड़ा)
- उपनाम: राजस्थान केसरी, योगी पुरुष (राजस्थान के अरविंद घोष)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- इनका जन्म शाहपुरा रियासत के देवपुरा (देवखेड़ा) गांव में चारण कुल में हुआ था। वे एक प्रखर कवि, महान विचारक और स्वतंत्रता सेनानी थे।
- साल 1903 में जब मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह दिल्ली दरबार में लॉर्ड कर्जन से मिलने जा रहे थे, तब केसरी सिंह ने महाराणा के स्वाभिमान को जगाने के लिए डिंगल भाषा में 13 सोरठे लिखे, जिन्हें ‘चेतावनी रा चूंगट्या’ कहा जाता है। इन्हें पढ़कर महाराणा का आत्मसम्मान जाग उठा और वे दिल्ली जाकर भी दरबार में शामिल नहीं हुए।
- इन्होंने 1910 में कोटा में साधु प्यारेलाल हत्याकांड और कोटा के क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ ‘वीर भारत सभा’ की स्थापना की थी।
- इन्हें ‘प्यारेलाल साधु मर्डर केस’ में 20 वर्ष की सजा देकर बिहार की हजारीबाग जेल में बंद किया गया था।
- रासबिहारी बोस ने इनके बारे में कहा था: “भारत में बारठ जी का परिवार एकमात्र ऐसा अनोखा परिवार है, जिसने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने पूरे परिवार को आग में झोंक दिया।”
4. जोरावर सिंह बारठ (उदयपुर/शाहपुरा)
- उपनाम: राजस्थान का चंद्रशेखर
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- ये ठाकुर केसरी सिंह बारठ के छोटे भाई थे, जिनका पैतृक स्थान शाहपुरा (देवखेड़ा) था और जन्म उदयपुर में हुआ था।
- 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के जुलूस पर बम फेंकने का साहसिक कार्य जोरावर सिंह ने ही किया था। वे महिला के भेष (बुर्के में) मारवाड़ी कॉलेज की छत पर छिपे थे。
- इसके बाद बिहार के आरा (निमाज) हत्याकांड में भी इनका नाम आया।
- ब्रिटिश सरकार इन्हें जीवनभर कभी गिरफ्तार नहीं कर पाई। चंद्रशेखर आज़ाद की तरह इन्होंने भी अपनी पूरी जिंदगी भूमिगत (फरार) रहकर गुजारी।
- जीवन के अंतिम तीन दशक इन्होंने ‘साधु अमरदास बैरागी’ का छद्म नाम अपनाकर मालवा और राजस्थान के जंगलों में बिताए और सन 1939 में इनका निधन हुआ
5. प्रताप सिंह बारठ (उदयपुर/शाहपुरा)
- उपनाम: – (इन्हें देश का ‘अमर युवा शहीद’ कहा जाता है)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- ये केसरी सिंह बारठ के महान पुत्र थे, जिनका जन्म उदयपुर में कविराज श्यामलदास की हवेली में हुआ था।
- इन्होंने अपने चाचा जोरावर सिंह के साथ मिलकर दिल्ली बम कांड (लॉर्ड हार्डिंग पर हमला) में सक्रिय भूमिका निभाई थी।
- इन्हें गदर आंदोलन के तहत ‘बनारस षड्यंत्र केस’ (1915) के सिलसिले में जोधपुर के आशनदा स्टेशन से धोखे से गिरफ्तार किया गया था।
- गिरफ्तारी के बाद इन्हें उत्तर प्रदेश की बरेली सेंट्रल जेल में रखा गया, जहाँ ब्रिटिश खुफिया अधिकारी सर चार्ल्स क्लीवलैंड ने इन्हें घोर शारीरिक और मानसिक यातनाएं दीं।
- क्लीवलैंड ने अन्य क्रांतिकारियों के नाम उगलवाने के लिए इनसे कहा था: “तुम्हारी मां तुम्हारे लिए बहुत रोती है, अपने साथियों के नाम बता दो ताकि तुम्हें छोड़ दिया जाए।” तब 22 वर्षीय इस वीर युवक ने ऐतिहासिक जवाब दिया: “मैं अपनी मां को हंसाने के लिए देश की हजारों माताओं को नहीं रुला सकता।”
- 24 मई 1918 को मात्र 25 वर्ष की आयु में जेल की अमानवीय यातनाओं को सहते हुए ये शहीद हो गए।
6. मोतीलाल तेजावत (उदयपुर)
- उपनाम: आदिवासियों का मसीहा, ‘बावजी’
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- उदयपुर के कोलियारी गांव के एक ओसवाल जैन परिवार में जन्मे तेजावत जी ने मेवाड़ क्षेत्र के भील, गरासिया और अन्य आदिवासियों के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
- इन्होंने आदिवासियों पर होने वाले सामंती अत्याचारों, बेगार प्रथा और भारी लगान के विरोध में साल 1921 में मातृकुंडिया (चित्तौड़गढ़) से ऐतिहासिक ‘एकी आंदोलन’ की शुरुआत की थी।
- इनके नेतृत्व में आदिवासियों ने ‘ना हकीम, ना हुकुम’ का नारा बुलंद किया।
- 7 मार्च 1922 को विजयनगर रियासत के ‘नीमड़ा गांव’ में तेजावत जी की जनसभा पर ब्रिटिश सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसे ‘नीमड़ा कांड’ कहा जाता है। इसमें 1200 से अधिक भील शहीद हुए थे। तेजावत जी के पैर में गोली लगी थी, फिर भी वे बच निकले और सालों तक भूमिगत रहे।
7. गोविंद गिरी (डूंगरपुर – बांसिया)
- उपनाम: – (इन्हें भीलों का धार्मिक व सामाजिक सुधारक कहा जाता है)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- डूंगरपुर के बांसिया गांव में बंजारा परिवार में जन्मे गोविंद गिरी स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे।
- इन्होंने आदिवासियों (भीलों) में शराबबंदी, कुप्रथाओं को मिटाने और शिक्षा का प्रसार करने के लिए साल 1883 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की।
- इनके द्वारा भील समाज में सामाजिक और आध्यात्मिक जागृति के लिए ‘भगत आंदोलन’ चलाया गया था।
- 17 नवंबर 1913 को आश्विन शुक्ल पूर्णिमा के दिन बांसवाड़ा की मानगढ़ पहाड़ी पर सम्प सभा का वार्षिक अधिवेशन चल रहा था, तभी ब्रिटिश फौज और रियासती सेना ने पहाड़ी को घेरकर मशीनगन से हमला कर दिया। इस ‘मानगढ़ नरसंहार’ में 1500 से अधिक निर्दोष भील आदिवासी शहीद हो गए, जिसे राजस्थान का ‘जलियांवाला बाग हत्याकांड’ कहा जाता है। गोविंद गिरी को गिरफ्तार कर लिया गया था।
8. जयनारायण व्यास (जोधपुर)
- उपनाम: शेर-ए-राजस्थान, लोकनायक, लक्कड़ का फक्कड़, धुन के धनी
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- जोधपुर में जन्मे जयनारायण व्यास राजस्थान के एकमात्र ऐसे नेता थे जो मनोनीत और निर्वाचित दोनों रूपों में सूबे के मुख्यमंत्री बने।
- इन्होंने मारवाड़ हितकारिणी सभा और ‘मारवाड़ प्रजामंडल’ के माध्यम से जागीरदारी प्रथा और सामंती दमन के खिलाफ उग्र आंदोलन चलाए।
- ब्यावर से इन्होंने राजस्थानी भाषा का पहला राजनीतिक पाक्षिक समाचार पत्र ‘आगीबाण’ (1932) निकाला। इसके अलावा इन्होंने ‘तरुण राजस्थान’, ‘पीप’ (अंग्रेजी) और ‘अखंड भारत’ (मुंबई से) जैसे राष्ट्रवादी अखबारों का संपादन किया।
- सामंती शासकों ने इन्हें बंदी बनाकर जालौर दुर्ग में नजरबंद रखा था। वे अपनी बेबाक लेखनी और क्रांतिकारी गीतों के लिए विख्यात थे।
9. जमनालाल बजाज (सीकर)
- उपनाम: गांधी जी के 5वें पुत्र, गुलाम नंबर 4, देश के प्रसिद्ध उद्योगपति व स्वतंत्रता सेनानी
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- सीकर के काशी का बास गांव में जन्मे बजाज जी प्रसिद्ध उद्योगपति थे, जिन्होंने अपनी अपार संपत्ति का उपयोग देश के स्वतंत्रता आंदोलन और खादी प्रचार में किया।
- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बेहद करीब होने के कारण इन्हें ‘गांधी जी का पांचवां बेटा’ माना जाता है।
- ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी थी, जिसे इन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजों को वापस लौटा दिया।
- ये खुद को ‘गुलाम नंबर 4’ कहते थे (उनके अनुसार: पहला गुलाम भारत देश, दूसरे देशी राजा-महाराजा, तीसरा सीकर की जनता और चौथे वे स्वयं)।
- इन्होंने जयपुर प्रजामंडल के पुनर्गठन में मुख्य भूमिका निभाई और वर्धा में ‘गांधी सेवा संघ’ व ‘चरखा संघ’ की स्थापना की।
10. बालमुकुंद बिस्सा (जोधपुर – पीलवा)
- उपनाम: राजस्थान का जतिन दास
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- इनका जन्म नागौर के पीलवा गांव में हुआ था, लेकिन इनकी कर्मभूमि जोधपुर रही।
- इन्होंने जोधपुर में ‘जवाहर खादी भंडार’ की स्थापना की थी, जो क्रांतिकारियों के मिलने का प्रमुख गुप्त अड्डा था।
- मारवाड़ लोक परिषद के आंदोलन के दौरान 1942 में इन्हें जेल में डाल दिया गया, जहाँ राजनीतिक कैदियों को बेहद घटिया और कीड़े मकोड़ों वाला भोजन दिया जाता था। इसके खिलाफ इन्होंने जेल में ही भूख हड़ताल शुरू कर दी।
- जेल प्रशासन की लापरवाही और भूख हड़ताल के कारण अस्वस्थ होने पर 19 जून 1942 को जोधपुर के विंडहैम अस्पताल में इनका निधन हो गया। जेल में भूख हड़ताल से शहीद होने के कारण इनकी तुलना भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी जतिन दास से की गई और इन्हें ‘राजस्थान का जतिन दास’ कहा गया।
11. सागरमल गोपा (जैसलमेर)
- उपनाम: – (जैसलमेर के अमर शहीद)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- जैसलमेर के एक कुलीन परिवार में जन्मे सागरमल गोपा ने वहाँ के तत्कालीन निरंकुश शासक महारावल जवाहर सिंह के अत्याचारों के खिलाफ डटकर आवाज उठाई थी।
- इन्होंने अपनी प्रसिद्ध क्रांतिकारी पुस्तकों ‘जैसलमेर का गुंडाराज’, ‘आजादी के दीवाने’ और ‘रघुनाथ सिंह का मुकदमा’ के जरिए रियासत की क्रूरता को बेनकाब किया।
- इस कारण इन्हें जैसलमेर से निष्कासित भी किया गया था, लेकिन पिता की मृत्यु पर वापस लौटने पर इन्हें देशद्रोह के झूठे मामले में जेल में डालकर अमानवीय यातनाएं दी गईं।
- 3 अप्रैल 1946 को जेलर गुमान सिंह ने गोपा जी के शरीर पर केरोसिन (मिट्टी का तेल) छिड़ककर उन्हें जिंदा जला दिया। अगले दिन 4 अप्रैल 1946 को इस महान देशभक्त का प्राणांत हो गया। इस बर्बर हत्याकांड की जांच के लिए बाद में ‘गोपाल स्वरूप पाठक समिति’ गठित की गई थी।
12. सेठ दामोदर दास राठी (जैसलमेर – पोकरण)
- उपनाम: सशस्त्र क्रांति का भामाशाह
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- इनका जन्म पोकरण (जैसलमेर) में हुआ था, लेकिन इनकी व्यावसायिक कर्मस्थली ब्यावर (अजमेर) थी।
- इन्होंने ब्यावर में साल 1889 में राजस्थान की पहली सूती वस्त्र मिल ‘द कृष्णा मिल्स लिमिटेड’ की स्थापना की थी।
- ये सनातन धर्म और राष्ट्रीय विचारों के पक्के समर्थक थे। इन्होंने प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस, अरविंद घोष और राव गोपाल सिंह खरवा के क्रांतिकारी नेटवर्क को भारी वित्तीय सहायता प्रदान की।
- जब देश में सशस्त्र क्रांति के लिए हथियारों और बारूद की सख्त जरूरत थी, तब इन्होंने गुप्त रूप से लाखों रुपये की मदद की, इसी कारण इन्हें भारत की ‘सशस्त्र क्रांति का भामाशाह’ कहा जाता है। इन्होंने ब्यावर में सनातन धर्म स्कूल और नवभारत विद्यालय की स्थापना भी की थी।
13. गोकुल भाई भट्ट (सिरोही – हाथल)
- उपनाम: राजस्थान का गांधी
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- सिरोही रियासत के हाथल गांव में जन्मे गोकुल भाई भट्ट राजस्थान के शीर्षस्थ कांग्रेस नेता और प्रजामंडल आंदोलन के पुरोधा थे।
- इन्होंने साल 1939 में ‘सिरोही प्रजामंडल’ की स्थापना की और रियासत में उत्तरदायी शासन के लिए संघर्ष किया।
- भारत की आजादी और राज्यों के एकीकरण के समय जब माउंट आबू को गुजरात (बॉम्बे प्रांत) में मिलाने की साजिश रची जा रही थी, तब भट्ट जी के कड़े विरोध और सत्याग्रह के कारण ही अंततः माउंट आबू को राजस्थान का हिस्सा बनाया जा सका।
- गांधीवादी मूल्यों, खादी प्रचार और मद्यनिषेध (शराबबंदी) के लिए आजीवन संघर्ष करने के कारण इन्हें ‘राजस्थान का गांधी’ नाम मिला।
14. स्वामी केशवानंद (सीकर – मंगलूणा)
- उपनाम: – (शिक्षा संत, मरुभूमि के उद्धारक)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- इनका जन्म सीकर के मंगलूणा गांव में एक साधारण ढाका जाट परिवार में हुआ था और इनके बचपन का नाम ‘बिरमा’ था। बाद में उदासीन संप्रदाय के साधु बनने पर इनका नाम केशवानंद रखा गया।
- इन्होंने अपना पूरा जीवन राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में शिक्षा के प्रसार और कुप्रथाओं के उन्मूलन में लगा दिया।
- इन्होंने संगरिया (हनुमानगढ़) में ‘ग्रामोत्थान विद्यापीठ’ की स्थापना की, जो उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में शिक्षा की अलख जगाने वाला सबसे बड़ा केंद्र बना।
- इन्होंने मरुभूमि के गांवों में लगभग 300 से अधिक पाठशालाएं और पुस्तकालय खुलवाए। शिक्षा के क्षेत्र में इस अभूतपूर्व क्रांति के कारण इन्हें जनमानस द्वारा ‘शिक्षा संत’ की उपाधि दी गई।
15. तेज कवि (जैसलमेर)
- उपनाम: – (राजस्थानी रम्मत लोक नाट्य के क्रांतिकारी जनक)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- जैसलमेर के रहने वाले तेज कवि राजस्थानी लोक नाट्य ‘रम्मत’ के अद्भुत कलाकार और क्रांतिकारी कवि थे।
- इन्होंने अपनी रम्मतों और गीतों के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय सामंतशाही पर कड़े व्यंग्य किए।
- साल 1943 में इन्होंने प्रसिद्ध रम्मत ‘स्वतंत्र बावनी’ की रचना की और इसकी एक प्रति महात्मा गांधी को भेंट स्वरूप भेजी।
- इनकी रचनाओं में ब्रिटिश विरोधी स्वर इतने तीखे थे कि अंग्रेज सरकार ने इनके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। तेज कवि डरे नहीं, बल्कि खुद गाते हुए जैसलमेर कोतवाली (पुलिस स्टेशन) पहुंच गए और बोले: “कमिश्नर खोल दरवाजा, हमें भी जेल जाना है, हिंद तेरा है न तेरे बाप का, हमारी मातृभूमि पर तूने क्यों डेरा जमाना है।”
16. श्याम जी कृष्ण वर्मा (क्रांतिकारियों के पितामह)
- उपनाम: क्रांतिकारियों का पितामह, भारत के महापुरुष
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- यद्यपि इनका मूल जन्म स्थान गुजरात (मांडवी) था, लेकिन इनकी राजनीतिक और प्रशासनिक कर्मभूमि राजस्थान की अजमेर, उदयपुर और जूनागढ़ रियासतें रहीं। वे अजमेर में म्यूनिसिपैलिटी के पहले निर्वाचित भारतीय चेयरमैन बने थे।
- इन्होंने लंदन जाकर साल 1905 में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की, जो विदेश में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारियों (जैसे वीर सावरकर, मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल) का सबसे बड़ा केंद्र बना।
- इन्होंने लंदन से ही ‘द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ नामक मासिक पत्रिका निकाली।
- भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए विदेशों में जमीन तैयार करने और युवा क्रांतिकारियों को छात्रवृत्ति व संरक्षण देने के कारण इन्हें भारतीय ‘क्रांतिकारियों का पितामह’ कहा जाता है।
17. हीरालाल शास्त्री (जोबनेर, जयपुर)
- उपनाम: – (राजस्थान के प्रथम मुख्यमंत्री)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- जयपुर के जोबनेर में जन्मे शास्त्री जी राजस्थान के एकीकरण के बाद राज्य के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री बने।
- इन्होंने सरकारी सेवा (जयपुर राज्य के गृह सचिव पद) का परित्याग कर ग्रामीण विकास और महिला शिक्षा को अपना ध्येय बनाया।
- इन्होंने साल 1935 में टोंक जिले के वनस्थली गांव में ‘जीवन कुटीर’ की स्थापना की, जो आगे चलकर आज देश-विदेश में प्रसिद्ध महिला शिक्षण संस्थान ‘वनस्थली विद्यापीठ’ के रूप में जाना जाता है।
- इन्होंने जयपुर प्रजामंडल के आंदोलनों का नेतृत्व किया और 1942 में जयपुर के प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल के साथ प्रसिद्ध ‘जेंटलमैन एग्रीमेंट’ किया, जिसके तहत जयपुर प्रजामंडल को भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रखा गया था। इनका लिखा हुआ गीत “प्रलय प्रतीक्षा नमो नमः…” बेहद लोकप्रिय हुआ।
18. बलवंत सिंह मेहता (उदयपुर)
- उपनाम: – (मेवाड़ प्रजामंडल के प्रथम अध्यक्ष, भारतीय संविधान सभा के सदस्य)
- ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
- उदयपुर में जन्मे बलवंत सिंह मेहता राजस्थान के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी और प्रजामंडल आंदोलन के वरिष्ठ नेता थे।
- 24 अप्रैल 1938 को जब माणिक्य लाल वर्मा के प्रयासों से ‘मेवाड़ प्रजामंडल’ की स्थापना हुई, तो बलवंत सिंह मेहता को इसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया।
- भारत के संविधान निर्माण के समय ये राजस्थान (मेवाड़) की तरफ से संविधान सभा के सदस्य चुने गए थे। भारतीय संविधान की मूल प्रति पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्थान के पहले व्यक्ति बलवंत सिंह मेहता ही थे।
- इन्होंने उदयपुर में ‘प्रताप सभा’ की स्थापना की और आदिवासियों व पिछड़ों के कल्याण के लिए ‘वनवासी कल्याण परिषद’ के माध्यम से रचनात्मक कार्य किए।
