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राजस्थान की प्रमुख लोक देवियाँ

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राजस्थान की प्रमुख लोक देवियाँ : In Details

1. करणी माता (देशनोक, बीकानेर)

  • उपनाम: चूहों वाली देवी, काबा वाली करणीजी।
  • मुख्य स्थान: देशनोक, बीकानेर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • करणी माता को हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है। इनका जन्म स्वाप गाँव (जोधपुर) में चारण परिवार में हुआ था।
    • यह बीकानेर के राठौड़ राजवंश और चारण समाज की कुलदेवी हैं।
    • बीकानेर के किले (जूनागढ़) और मेहरानगढ़ किले (जोधपुर) की नींव करणी माता के आशीर्वाद से ही रखी गई थी।
  • मुख्य विशेषता: मंदिर के प्रांगण में हजारों की संख्या में चूहे (जिन्हें काबा कहा जाता है) स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। सफेद चूहे के दर्शन को अत्यधिक शुभ और साक्षात माता का रूप माना जाता है।
  • मेला: यहाँ वर्ष में दो बार (चैत्र और आश्विन नवरात्रि) विशाल मेला भरता है।

2. शीला देवी (आमेर, जयपुर)

  • मुख्य स्थान: आमेर किला, जयपुर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • शीला देवी जयपुर के कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी हैं।
    • इतिहास: इस मूर्ति को जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम 1604 ईस्वी में बंगाल के राजा केदार को हराकर जसोर (वर्तमान बांग्लादेश) से लाए थे।
    • यह मूर्ति काले संगमरमर के पत्थर (शिला) से बनी है, जिसके कारण इनका नाम शीला देवी पड़ा।
  • मुख्य विशेषता: माता के चरणों में महिषासुर का वध करते हुए रूप अंकित है। यहाँ भक्तों को चरणामृत के रूप में मदिरा और जल का मिश्रण दिया जाता है।

3. जमवाय माता (जमवा रामगढ़, जयपुर)

  • मुख्य स्थान: जमवा रामगढ़, जयपुर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह जयपुर के कछवाहा राजवंश की कुलदेवी हैं।
    • कछवाहा वंश के संस्थापक दूल्हे राय (धोला राय) ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
    • प्राचीन काल में इस क्षेत्र को ‘मांच’ कहा जाता था, लेकिन माता के नाम पर इस जगह का नाम ‘जमवा रामगढ़’ पड़ा।

4. कैला देवी (करौली)

  • मुख्य स्थान: त्रिकूट पर्वत, करौली।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • कैला देवी करौली के यादव (जादौन) राजवंश की कुलदेवी हैं। इन्हें भगवान कृष्ण की बहन (महामाया) का अवतार माना जाता है।
    • मंदिर के ठीक सामने बोहरा भगत की छतरी बनी है, जहाँ तांत्रिक विधि से झाड़-फूंक द्वारा इलाज किया जाता है।
  • मुख्य विशेषता (लांगुरिया गीत): कैला देवी की आराधना में गाए जाने वाले भजन/गीत ‘लांगुरिया’ कहलाते हैं। यहाँ भक्त लांगुरिया नृत्य भी करते हैं।
  • मेला: चैत्र शुक्ल अष्टमी को यहाँ ‘लक्खी मेला’ भरता है, जहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

5. शीतला माता (चाकसू, जयपुर)

  • उपनाम: चेचक की देवी, सेढल माता, महामाई, बच्चों की संरक्षिका।
  • मुख्य स्थान: सील की डूंगरी, चाकसू (जयपुर)।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • इस मंदिर का निर्माण जयपुर के महाराजा माधोसिंह ने करवाया था।
    • अनोखी विशेषता: शीतला माता राजस्थान की एकमात्र ऐसी देवी हैं जिनकी खंडित मूर्ति की पूजा की जाती है।
    • वाहन और प्रतीक: माता का वाहन गधा है और पुजारी कुम्हार जाति के होते हैं।
  • परंपरा (बासोड़ा): चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतलाष्टमी) को इनकी पूजा होती है। इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता, भक्त एक दिन पहले बना ठंडा भोजन (बासोड़ा) प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

6. तनोट माता (तनोट, जैसलमेर)

  • उपनाम: थार की वैष्णो देवी, रूमाल वाली देवी, सैनिकों की देवी।
  • मुख्य स्थान: तनोट, जैसलमेर (भारत-पाकिस्तान सीमा के पास)।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा गिराए गए लगभग 3000 बम इस मंदिर परिसर में आकर भी नहीं फटे। यह चमत्कार आज भी जीवित है।
    • वर्तमान में इस मंदिर की देखरेख और पूजा-अर्चना BSF (सीमा सुरक्षा बल) के जवान करते हैं।
    • श्रद्धालु यहाँ मन्नत पूरी होने के लिए मंदिर परिसर में रूमाल बांधते हैं।

7. रानी सती (झुंझुनू)

  • उपनाम: दादी जी।
  • मुख्य स्थान: झुंझुनू।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • रानी सती का वास्तविक नाम नारायणी बाई था। इनके पति का नाम तनधन दास था, जो हिसार के नवाब के सैनिकों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
    • नारायणी बाई ने वीरता दिखाते हुए दुश्मनों का खात्मा किया और बाद में सती हो गईं।
    • यह अग्रवाल समाज की कुलदेवी हैं। यह देश का सबसे बड़ा सती मंदिर माना जाता है।
    • नोट: सती निवारण अधिनियम 1987 के बाद यहाँ भाद्रपद अमावस्या को लगने वाले मुख्य मेले पर रोक लगा दी गई थी, अब केवल धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।

8. आई माता (बिलाड़ा, जोधपुर)

  • मुख्य स्थान: बिलाड़ा, जोधपुर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • आई माता लोक देवता रामदेवजी की शिष्या थीं। इन्होंने समाज सुधार और छुआछूत मिटाने के लिए ‘आई पंथ’ चलाया था।
    • यह सीरवी जाति की कुलदेवी हैं।
  • मुख्य विशेषता: आई माता के मंदिर को ‘बडेर’ या ‘दरगाह’ कहा जाता है। मंदिर में कोई मूर्ति नहीं होती, केवल एक दीपक जलता रहता है।
    • चमत्कारी रूप से इस दीपक की लौ से काजल नहीं, बल्कि केसर टपकती है

9. जीण माता (रेवासा, सीकर)

  • मुख्य स्थान: रेवासा की पहाड़ियां, सीकर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • जीण माता को चौहान वंश की इष्टदेवी और मीणा जनजाति की आराध्य देवी माना जाता है। इनके भाई का नाम हर्ष था (जिनका मंदिर पास ही हर्ष की पहाड़ी पर है)।
  • मुख्य विशेषता:
    • लोक साहित्य में जीण माता का गीत सबसे लंबा गीत माना जाता है, जिसे कनफड़े जोगी डमरू और सारंगी के साथ गाते हैं।
    • माता को ढाई प्याला मदिरा (शराब) चढ़ाने की प्राचीन परंपरा है। औरंगजेब की सेना ने जब यहाँ हमला करना चाहा, तो माता के चमत्कार (मधुमक्खियों के हमले) से सेना भाग खड़ी हुई थी।

10. शाकम्भरी माता (सांभर, जयपुर)

  • उपनाम: चौहानों की आदि देवी, सकराय माता।
  • मुख्य स्थान: सांभर झील के पास, जयपुर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह सांभर (शाकंभरी) के चौहान राजवंश की सबसे प्राचीन कुलदेवी हैं।
    • मान्यता है कि एक बार अकाल के समय माता ने भूखों को खिलाने के लिए फल, सब्जियां (शाक) और कंदमूल उत्पन्न किए थे, जिसके कारण इनका नाम शाकम्भरी पड़ा।

11. सुगाली माता (आउवा, पाली)

  • उपनाम: 1857 की क्रांति की देवी।
  • मुख्य स्थान: आउवा, पाली।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह आउवा के ठाकुर खुशाल सिंह चम्पावत की कुलदेवी हैं।
    • ऐतिहासिक महत्व: 1857 की क्रांति के समय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए यह माता प्रेरणा का मुख्य स्रोत थीं। क्रांति के बाद अंग्रेज इस मूर्ति को अपने साथ अजमेर ले गए थे।
  • मूर्ति की विशेषता: इस अद्भुत मूर्ति के 10 सिर और 54 हाथ हैं।

12. सुंधा माता (भीनमाल, जालौर)

  • मुख्य स्थान: सुंधा पर्वत, भीनमाल (जालौर)।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • सुंधा माता के मंदिर में माता की पूरी मूर्ति नहीं है, यहाँ केवल माता के सिर की पूजा होती है, इसलिए इन्हें ‘अघटेश्वरी’ भी कहा जाता है।
  • विशेष रिकॉर्ड: इसी मंदिर परिसर में साल 2006 में राजस्थान का पहला रोप-वे (Ropeway) शुरू किया गया था। यहाँ भालू अभ्यारण्य (Bear Sanctuary) भी स्थित है।

13. स्वांगिया माता (जैसलमेर)

  • उपनाम: सांगिया माता, सुगां चिड़ी का रूप।
  • मुख्य स्थान: जैसलमेर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • स्वांगिया माता जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी हैं।
    • ‘स्वांग’ शब्द का अर्थ ‘भाला’ होता है। माता के हाथ में मुड़ा हुआ भाला है, जिसके कारण इनका नाम स्वांगिया पड़ा।
    • जैसलमेर के राजचिन्ह में सबसे ऊपर मुड़े हुए भाले और ‘सुगां चिड़ी’ (पालम चिड़िया) का चित्र अंकित है, जो माता का ही प्रतीक है।

14. त्रिपुरा सुंदरी (तलवाड़ा, बांसवाड़ा)

  • उपनाम: तुरताई माता।
  • मुख्य स्थान: तलवाड़ा, बांसवाड़ा।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह पांचाल जाति की कुलदेवी हैं। सिंह पर सवार इस माता की मूर्ति काले पत्थर की बनी है जिसके 18 हाथ हैं।
    • यह मंदिर प्राचीन काल के तीन गढ़ों (शक्तिपुरी, शिवपुरी और विष्णुपुरी) के बीच स्थित होने के कारण ‘त्रिपुरा सुंदरी’ कहलाता है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की यह आराध्य देवी हैं।

15. नागणेची माता (नगाणा, बाड़मेर)

  • मुख्य स्थान: नगाणा गाँव, बाड़मेर (मुख्य मंदिर)। जोधपुर के किले में भी इनका प्रसिद्ध मंदिर है।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • नागणेची माता मारवाड़ के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी हैं।
    • इतिहास: इस मूर्ति को राव धूहड़ कर्नाटक से लेकर आए थे और बाड़मेर के नगाणा गाँव में स्थापित किया था।
  • प्रतीक: माता की मूर्ति नीम की लकड़ी से बनी हुई है और चील पक्षी को नागणेची माता का प्रतीक रूप माना जाता है।

16. अम्बिका माता (जगत, उदयपुर)

  • मुख्य स्थान: जगत गाँव, उदयपुर।
  • महत्व व उपनाम: इस मंदिर को ‘राजस्थान का मिनी खजुराहो’ या ‘मेवाड़ का खजुराहो’ कहा जाता है।
  • वास्तुकला: यह मंदिर महामारू शैली में बना है। यहाँ की दीवारों पर नृत्य करते हुए गणपति और अप्सराओं की अत्यंत सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं। यह मंदिर शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है।

17. जिलानी माता (बहरोड़, अलवर)

  • मुख्य स्थान: बहरोड़, अलवर (अब कोटपूतली-बहरोड़ जिला)।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • जिलानी माता एक साधारण गुर्जर महिला थीं, जिन्होंने अपनी सूझबूझ और वीरता से अलवर क्षेत्र में हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बनने (धर्म परिवर्तन) से बचाया था।
    • उनके इस महान और चमत्कारी कार्य के कारण समाज ने उन्हें लोक देवी के रूप में पूजना शुरू किया।

18. दधिमती माता (गोठ-मांगलोद, नागौर)

  • मुख्य स्थान: गोठ और मांगलोद गाँव की सीमा पर, नागौर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह दाधीच (ब्राह्मण) समाज की कुलदेवी हैं।
    • यह मंदिर प्रतिहार कालीन (महामारू शैली) वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है। मान्यता है कि माता का प्राकट्य भूमि फाड़कर हुआ था।

19. लुटियाला माता (फलोदी, जोधपुर)

  • उपनाम: लुटियाला भवानी।
  • मुख्य स्थान: फलोदी (अब स्वतंत्र जिला)।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • लुटियाला माता कल्ला (ब्राह्मण) समाज की कुलदेवी हैं।
    • मंदिर के आगे ‘खेजड़ी’ का वृक्ष स्थित है, जिसके कारण इन्हें कई बार ‘खेजड़बेर राय भवानी’ भी कहा जाता है।

20. सच्चियाय माता (ओसियां, जोधपुर)

  • मुख्य स्थान: ओसियां, जोधपुर।
  • इतिहास व मान्यताएं:
    • यह ओसवाल (जैन) समाज की कुलदेवी हैं। इस मंदिर का निर्माण परमार राजा उपेन्द्र ने करवाया था।
    • ओसियां को ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’ भी कहा जाता है। इस मंदिर की वास्तुकला बहुत भव्य है और यहाँ सांप्रदायिक सौहार्द देखने को मिलता है क्योंकि इन्हें हिंदू और जैन दोनों समान रूप से पूजते हैं।

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियाँ : Quick Revision Notes

लोक देवीमुख्य स्थानविशेष टिप्पणी एवं विवरण
करणी मातादेशनोक (बीकानेर)बीकानेर के राठौड़ों की कुलदेवी। इन्हें ‘चूहों वाली देवी’ कहा जाता है। मेहरानगढ़ किले की नींव इन्होंने ही रखी थी।
शीला देवीआमेर (जयपुर)कछवाहा राजवंश की आराध्य देवी। राजा मानसिंह बंगाल से इनकी मूर्ति लाए थे। इनका मंदिर आमेर किले के भीतर है।
जमवाय माताजमवा रामगढ़ (जयपुर)जयपुर के कछवाहा राजवंश की कुलदेवी। मंदिर का निर्माण दूल्हे राय ने करवाया था।
केला देवीकरौलीकरौली के यदुवंश की कुलदेवी। इनके मंदिर में ‘लांगुरिया’ गीत गाए जाते हैं। इन्हें हनुमान जी की माता ‘अंजनी’ का अवतार माना जाता है।
शीतला माताचाकसू (जयपुर)इन्हें ‘चेचक की देवी’ और ‘सेढल माता’ भी कहते हैं। इनका वाहन गधा और पुजारी कुम्हार होता है।
तनोट मातातनोट (जैसलमेर)इन्हें ‘थार की वैष्णो देवी’ और ‘रुमाल वाली देवी’ कहा जाता है। यह भारतीय सैनिकों की आराध्य देवी हैं।
रानी सतीझुंझुनूइन्हें ‘दादी जी’ के नाम से जाना जाता है। इनका वास्तविक नाम नारायणी बाई था। यहाँ विश्व का सबसे बड़ा सती मंदिर है।
आई माताबिलाड़ा (जोधपुर)सीरवी समाज की कुलदेवी। इनके मंदिर (बढेर) में जलने वाले दीपक की लौ से केसर टपकती है।
जीण मातारेवासा (सीकर)चौहानों की आराध्य देवी। इनका लोकगीत सबसे लंबा है। इन्हें ‘मधुमक्खियों की देवी’ भी कहा जाता है।
शाकम्भरी मातासांभर (जयपुर)चौहानों की सबसे प्राचीन कुलदेवी। अकाल के समय इन्होंने फल-सब्जियाँ उत्पन्न कर लोगों की जान बचाई थी।
सुगाली माताआउवा (पाली)1857 की क्रांति की देवी। इनके 10 सिर और 54 हाथ वाली अद्भुत प्रतिमा प्रसिद्ध है।
सुंधा माताभीनमाल (जालौर)यहाँ राजस्थान का पहला रोपवे और भालू अभयारण्य है। यहाँ चामुंडा माता की ‘अघटेश्वर’ (बिना धड़) पूजा होती है।
स्वांगिया माताजैसलमेरजैसलमेर के भाटी शासकों की कुलदेवी। इनका प्रतीक ‘मुड़ा हुआ भाला’ है।
त्रिपुरा सुंदरीतलवाड़ा (बांसवाड़ा)इन्हें ‘तरतई माता’ भी कहते हैं। यह पांचाल जाति की कुलदेवी हैं और अठारह भुजाओं वाली प्रतिमा है।
नागणेची मातानगाणा (बाड़मेर)मारवाड़ के राठौड़ वंश की कुलदेवी। इनकी मूर्ति चक्राकार है और यह नीम के पेड़ को पवित्र मानती हैं।
अम्बिका माताजगत (उदयपुर)इस मंदिर को “मेवाड़ का खजुराहो” कहा जाता है। यह अपनी बारीक नक्काशी के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
जिलानी माताबहरोड़ (अलवर)इन्होंने धर्मांतरण रोककर हिंदुओं की रक्षा की थी। अलवर क्षेत्र में इनकी बहुत मान्यता है।
दधिमती मातागोठ-मांगलोद (नागौर)दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी। यह मंदिर गुप्तकालीन स्थापत्य कला का एक बेहतरीन नमूना है।
लुटियाला माताफलोदी (जोधपुर)कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी। इनके मंदिर के आगे खेजड़ी का वृक्ष होने के कारण इन्हें ‘खेजड़बेरी राय’ भी कहते हैं।
सच्चियाय माताओसियां (जोधपुर)ओसवाल समाज की कुलदेवी। इनका मंदिर उत्कृष्ट स्थापत्य कला और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है।
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