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कोटा का हाड़ा चौहान राजवंश

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चौहान राजवंश की ही एक अत्यंत प्रतापी और साहसी उप-शाखा ‘हाड़ा’ कहलाती है। नाडोल (पाली) के चौहान शासक राव लक्ष्मण के वंशज ‘राव हाड़ा (हरिराज)’ के नाम पर इस कबीले का नाम ‘हाड़ा चौहान’ पड़ा। हाड़ौती क्षेत्र पर प्रारंभ में भील शासकों का नियंत्रण था। कोटा का नाम भील शासक ‘कोटिया भील’ के नाम पर पड़ा था, जिन्हें पराजित कर हाड़ाओं ने यहाँ अपनी सत्ता स्थापित की। कोटा के शासकों की मूल उपाधि ‘राव’, ‘राव राजा’ और बाद में ‘महाराव’ हुई। इनका राजकीय प्रतीक चिन्ह ‘पचरंगा झंडा’ और कुलदेवी ‘भड़ाना माता’ (या आशापुरा माता) हैं।

1. माधोसिंह हाड़ा — स्वतंत्र कोटा रियासत के संस्थापक (1631 ई. – 1648 ई.)

  • शासनकाल: 1631 ईस्वी से 1648 ईस्वी तक।
  • इतिहास व स्वतंत्र राज्य की स्थापना:
    • इन्हें कोटा की स्वतंत्र हाड़ा रियासत का मूल पुरुष, आदि पुरुष या संस्थापक कहा जाता है। ये बूंदी के राव राजा रतन सिंह हाड़ा के द्वितीय पुत्र थे।
    • कोटा का उदय: प्रारंभ में कोटा बूंदी रियासत का ही एक हिस्सा (जागीर) था। माधोसिंह ने मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के विद्रोही पुत्र शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) के खिलाफ मुग़ल अभियानों में अद्भुत वीरता दिखाई थी।
    • स्वतंत्रता की घोषणा (1631 ई.): माधोसिंह की असाधारण सैन्य व कूटनीतिक सेवाओं से प्रसन्न होकर मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने सन 1631 ईस्वी में बूंदी से विभाजित करके कोटा को एक स्वतंत्र रियासत का दर्जा दे दिया। शाहजहाँ ने माधोसिंह को कोटा का पहला स्वतंत्र राजा स्वीकार किया और उन्हें ‘राव’ की उपाधि तथा 3000 का मनसब प्रदान किया। इन्होंने कोटा के प्रशासनिक ढांचे की मजबूत नींव रखी।

2. राव मुकुंद सिंह हाड़ा — (1648 ई. – 1658 ई.)

  • शासनकाल: 1648 ईस्वी से 1658 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक युद्ध व अबली मीणी का महल:
    • ये राव माधोसिंह के पुत्र थे। इन्होंने कछवाहा और मुग़ल सेनाओं के साथ मिलकर दक्षिण भारत के कई सैन्य अभियानों का सफल नेतृत्व किया था।
    • अबली मीणी का महल: मुकुंद सिंह को अपनी पासवान (रानी) ‘अबली मीणी’ (Abli Meeni) से अत्यधिक प्रेम था। इन्होंने अपनी इस प्रियसी के लिए कोटा में दर्रा की पहाड़ियों के बीच मुकुंदरा हिल्स में ‘अबली मीणी का महल’ बनवाया, जिसे स्थापत्य कला का सुंदर नमूना माना जाता है और इसे ‘हाड़ौती का ताजमहल’ भी कहा जाता है।
    • धर्मत का युद्ध (1658 ई.): शाहजहाँ के बेटों के बीच हुए उत्तराधिकार के युद्ध में मुकुंद सिंह ने शाही सेना (दारा शिकोह) का साथ दिया। मध्य प्रदेश के उज्जैन के पास धर्मत के युद्ध (1658 ई.) में औरंगजेब की सेना के खिलाफ लड़ते हुए राव मुकुंद सिंह अपने पांच भाइयों सहित वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनके नाम पर ही आज कोटा में ‘मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान’ (Mukundara Hills National Park) स्थित है।

3. राव जगत सिंह हाड़ा — (1658 ई. – 1683 ई.)

  • शासनकाल: 1658 ईस्वी से 1683 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: धर्मत के युद्ध में पिता की मृत्यु के बाद जगत सिंह कोटा के राजा बने। औरंगजेब ने राजा बनने के बाद इन्हें क्षमा कर दिया और अपने दक्षिण भारत के अभियानों (विशेषकर बीजापुर और गोलकुंडा) पर भेजा। जगत सिंह ने लगभग 25 वर्ष दक्षिण भारत में ही मुगलों की सेवा में बिताए। ये निःसंतान मरे, जिससे कोटा की गद्दी पर इनके भाई किशोर सिंह बैठे।

4. राव किशोर सिंह प्रथम — (1684 ई. – 1696 ई.)

  • शासनकाल: 1684 ईस्वी से 1696 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व स्थापत्य: इन्होंने मुग़ल सम्राट औरंगजेब के काल में दक्षिण भारत के अभियानों में अद्भुत पराक्रम दिखाया। आरकाट के युद्ध में ये गंभीर रूप से घायल हुए थे। इन्होंने कोटा शहर के परकोटे को मजबूत किया और अपने नाम पर कोटा में ‘किशोर सागर तालाब’ (Kishore Sagar Lake) का निर्माण करवाया, जिसके बीच में आज प्रसिद्ध ‘जगमंदिर महल’ बना हुआ है। इनका निधन भी दक्षिण भारत के अमरावती में हुआ था।

5. राव रामसिंह हाड़ा — (1696 ई. – 1707 ई.)

  • शासनकाल: 1696 ईस्वी से 1707 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व जाजऊ का युद्ध:
    • ये राव किशोर सिंह के प्रतापी पुत्र थे। इन्होंने औरंगजेब के काल में अपनी एक विशेष राजपूत सैन्य टुकड़ी तैयार की थी, जो अपनी गतिशीलता के लिए प्रसिद्ध थी।
    • जाजऊ का युद्ध (1707 ई.): औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके बेटों (मुअज्जम और आजम) के बीच आगरा के पास जाजऊ के मैदान में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। रामसिंह ने आजम का साथ दिया, जबकि बूंदी के हाड़ाओं ने मुअज्जम का साथ दिया। इस प्रकार इतिहास में पहली बार कोटा और बूंदी के हाड़ा भाई आपस में ही लड़ पड़े। रामसिंह इस युद्ध में आजम की तरफ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। मुअज्जम युद्ध जीतकर ‘बहादुर शाह प्रथम’ के नाम से दिल्ली का सम्राट बना और वह कोटा से नाराज हो गया।

6. महाराव भीमसिंह हाड़ा — ‘ब्रजनाथ’ व कोटा का नाम परिवर्तन (1707 ई. – 1720 ई.)

  • शासनकाल: 1707 ईस्वी से 1720 ईस्वी तक।
  • उपनाम व उपाधि: ‘महाराव’ (मुग़ल सम्राट फर्रुखसियर द्वारा दी गई सर्वोच्च उपाधि, इसके बाद कोटा के सभी राजा ‘महाराव’ लिखने लगे)।
  • वैष्णव संप्रदाय का प्रभाव व नंदग्राम का इतिहास:
    • भीमसिंह कोटा के इतिहास के पहले ऐसे शासक थे जो वल्लभ (वैष्णव) संप्रदाय के अत्यधिक प्रभाव में आ गए थे। ये भगवान श्री कृष्ण (श्रीनाथ जी) के इतने अनन्य भक्त बन गए कि इन्होंने अपना नाम बदलकर ‘ब्रजनाथ’ रख दिया।
    • कोटा का नाम परिवर्तन: इन्होंने भगवान कृष्ण के प्रेम में अपनी राजधानी ‘कोटा’ का नाम बदलकर ‘नंदग्राम’ कर दिया था और साबरमती नदी की तर्ज पर कोटा की चम्बल नदी का नाम बदलकर ‘यमुना’ रखने का प्रयास किया। इन्होंने कोटा के राजकीय कार्यों और मोहरों पर “श्री ब्रजनाथ जी की दुहाई” लिखना अनिवार्य कर दिया।
  • साम्राज्य विस्तार व बूंदी पर अधिकार:
    • मुग़ल सम्राट फर्रुखसियर के काल में भीमसिंह मुगलों के सबसे शक्तिशाली हिंदू सेनापति बन गए। इन्होंने फर्रुखसियर की सहायता से बूंदी रियासत पर आक्रमण किया और बूंदी को जीतकर कुछ समय के लिए कोटा के नियंत्रण में ले लिया।
    • ये बूंदी के शाही चिन्ह और महलों के प्रसिद्ध ‘नगाड़े’ उखाड़कर कोटा ले आए, जो आज भी कोटा के राजपरिवार के पास सुरक्षित हैं। इन्होंने कोटा में ‘ब्रजनाथ जी के भव्य मंदिर’ का निर्माण करवाया था। सन 1720 ई. में मुग़ल राजनीति के आंतरिक संघर्ष में ये लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

7. महाराव अर्जुन सिंह हाड़ा — (1720 ई. – 1723 ई.)

  • शासनकाल: 1720 ईस्वी से 1723 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पिता भीमसिंह की मृत्यु के बाद अर्जुन सिंह कोटा के शासक बने। इनके काल में बूंदी के शासक बुद्ध सिंह हाड़ा ने जयपुर के सवाई जयसिंह के सहयोग से पुनः बूंदी पर अपना अधिकार कर लिया और कोटा की सेना को पीछे हटना पड़ा। अर्जुन सिंह का मात्र तीन वर्ष के लघु शासनकाल के बाद निःसंतान निधन हो गया।

8. महाराव दुर्जनसाल हाड़ा — मराठों का आगमन (1723 ई. – 1756 ई.)

  • शासनकाल: 1723 ईस्वी से 1756 ईस्वी तक।
  • मराठा संघर्ष व हुरड़ा सम्मेलन:
    • ये अर्जुन सिंह के भाई थे। इनके शासनकाल में राजपूताना में मराठों (मल्हारराव होल्कर व सिंधिया) का दमन और प्रवेश बहुत तेजी से बढ़ा।
    • हुरड़ा सम्मेलन (1734 ई.): मराठों के बढ़ते आतंक को रोकने के लिए सवाई जयसिंह द्वारा भीलवाड़ा में आयोजित ऐतिहासिक ‘हुरड़ा सम्मेलन’ में महाराव दुर्जनसाल ने कोटा रियासत का प्रतिनिधित्व किया था और मराठों के खिलाफ युद्ध का संकल्प लिया था।
    • कोटा का घेरा (1738 ई.): मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और मल्हारराव होल्कर ने कोटा को चारों तरफ से घेर लिया। दुर्जनसाल ने अदम्य वीरता से मेहरानगढ़ की प्राचीर से तोपें चलाईं, लेकिन अंततः उन्हें मराठों को 10 लाख रुपये हर्जाना (चौथ) देकर संधि करनी पड़ी। यह कोटा पर मराठों का पहला बड़ा वित्तीय आघात था। ये निःसंतान मरे।

9. महाराव शत्रुसाल हाड़ा प्रथम — (1756 ई. – 1764 ई.)

  • शासनकाल: 1756 ईस्वी से 1764 ईस्वी तक।
  • भट्टवाड़ा का ऐतिहासिक युद्ध (1761 ई.) व जाला जालिम सिंह का उदय:
    • भट्टवाड़ा का युद्ध (1761 ई. – बारां): जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम रणथंभौर दुर्ग पर अपना अधिकार करना चाहते थे, जिस पर कोटा का भी रणनीतिक दावा था। माधोसिंह ने विशाल कछवाहा सेना के साथ कोटा पर आक्रमण किया।
    • जाला जालिम सिंह का उदय: इस युद्ध में कोटा की सेना का वास्तविक नेतृत्व एक युवा और अत्यंत बुद्धिमान राजपूत सेनापति ‘जाला जालिम सिंह’ (Zala Zalim Singh) कर रहा था। जालिम सिंह ने अपनी अद्भुत युद्ध नीति और बारूदी तोपों के बल पर जयपुर की विशाल सेना को भट्टवाड़ा के मैदान में गाजर-मूली की तरह काट फेंका और करारी शिकस्त दी।
    • इस ऐतिहासिक विजय के बाद जाला जालिम सिंह का कद कोटा की राजनीति में इतना अधिक बढ़ गया कि वे कोटा के ‘फॉस्टैग’ (प्रशासक / सर्वेसर्वा) बन गए। महाराव तो केवल नाममात्र के शासक रह गए, वास्तविक सत्ता जाला जालिम सिंह के हाथों में आ गई।

10. महाराव गुमान सिंह हाड़ा — (1764 ई. – 1771 ई.)

  • शासनकाल: 1764 ईस्वी से 1771 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इनके काल में जाला जालिम सिंह और राजा के बीच आंतरिक मतभेद इतने बढ़ गए कि गुमान सिंह ने जालिम सिंह को कोटा से निष्कासित (देश-निकाला) कर दिया। जालिम सिंह मेवाड़ चले गए। लेकिन जालिम सिंह के जाते ही मराठों और पिंडारियों ने कोटा को चारों तरफ से लूटकर तबाह कर दिया। विवश होकर गुमान सिंह ने अपनी मृत्युशैया पर जाला जालिम सिंह को वापस कोटा बुलाया, उनसे माफी मांगी और अपने छोटे पुत्र उम्मेद सिंह का ‘संरक्षक’ नियुक्त कर दिया।

11. महाराव उम्मेद सिंह प्रथम — अंग्रेज़ों से सहायक संधि (1771 ई. – 1819 ई.)

  • शासनकाल: 1771 ईस्वी से 1819 ईस्वी तक।
  • जाला जालिम सिंह की कूटनीति और ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि:
    • उम्मेद सिंह के शासनकाल के पूरे 48 वर्षों तक कोटा की वास्तविक सत्ता पूरी तरह जाला जालिम सिंह के हाथों में रही, जिन्हें ‘हाड़ौती का चाणक्य’ कहा जाता है। जालिम सिंह ने कोटा को मराठों और पिंडारियों की लूटपाट से बचाने के लिए अंग्रेज़ों से हाथ मिलाने की नीति अपनाई।
    • अंग्रेज़ों से सहायक संधि (26 दिसंबर 1817): जाला जालिम सिंह की कूटनीति के तहत कोटा रियासत ने 26 दिसंबर 1817 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। अंग्रेज़ों की तरफ से चार्ल्स मेटकॉफ़ ने हस्ताक्षर किए थे।
  • संधि की गुप्त पूरक शर्त (सप्लीमेंट्री क्लॉज):
    • जाला जालिम सिंह ने चालाकी से इस संधि में अंग्रेज़ों से एक अत्यंत विशिष्ट और गुप्त शर्त जुड़वाई, जिसने कोटा का इतिहास बदल दिया। शर्त यह थी कि: “कोटा के राजा हमेशा उम्मेद सिंह के वंशज (हाड़ा) ही रहेंगे, लेकिन कोटा का प्रधानमंत्री/प्रशासक (दीवान) पद हमेशा-हमेशा के लिए जाला जालिम सिंह के वंशजों के पास ही सुरक्षित रहेगा।” इस शर्त ने कोटा में ‘दोहरी शासन प्रणाली’ को जन्म दे दिया, जिससे हाड़ा राजा और जाला दीवान के बीच भविष्य में भयंकर युद्ध हुआ। उम्मेद सिंह के काल में ही कोटा चित्रशैली का सबसे बड़ा स्वतंत्र विकास (शिकार के दृश्यों के सजीव चित्र) हुआ।

12. महाराव किशोर सिंह द्वितीय — मांगरोल का युद्ध (1819 ई. – 1828 ई.)

  • शासनकाल: 1819 ईस्वी से 1828 ईस्वी तक।
  • मांगरोल का ऐतिहासिक युद्ध (1821 ई.):
    • उम्मेद सिंह की मृत्यु के बाद नए महाराणा किशोर सिंह द्वितीय ने अंग्रेजों और जाला जालिम सिंह की दोहरी गुलामी की शर्त को मानने से साफ मना कर दिया। उन्होंने अपने कछवाहा और हाड़ा सरदारों को एकत्रित कर जाला जालिम सिंह के खिलाफ विद्रोह कर दिया।
    • मांगरोल का युद्ध (1 अक्टूबर 1821 – बारां): किशोर सिंह की हाड़ा सेना और जाला जालिम सिंह (जिन्हें ब्रिटिश सेनापति कर्नल जेम्स टॉड और अंग्रेज़ी तोपखाने का पूर्ण समर्थन प्राप्त था) के बीच मांगरोल के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ। अंग्रेज़ी तोपों के आगे हाड़ाओं की तलवारें टिक नहीं पाईं। किशोर सिंह के छोटे भाई पृथ्वीसिंह इस युद्ध में मारे गए और महाराव की करारी हार हुई। किशोर सिंह भागकर नाथद्वारा (मेवाड़) चले गए। बाद में कर्नल टॉड ने कूटनीति से समझौता करवाया और किशोर सिंह को पुनः नाममात्र का राजा बनाकर कोटा लाया गया।

13. महाराव रामसिंह हाड़ा द्वितीय — 1857 की क्रांति का वीभत्स गवाह (1828 ई. – 1866 ई.)

  • शासनकाल: 1828 ईस्वी से 1866 ईस्वी तक।
  • झालावाड़ रियासत का उदय (1838 ई.):
    • हाड़ा राजाओं और जाला दीवानों के बीच लगातार बढ़ रहे आंतरिक गृहयुद्ध को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए अंग्रेज़ों ने कूटनीतिक विभाजन का रास्ता चुना।
    • झालावाड़ का निर्माण: सन 1838 ईस्वी में अंग्रेज़ों ने कोटा रियासत के 17 प्रगने (हिस्से) तोड़कर जाला जालिम सिंह के पौत्र ‘जाला मदन सिंह’ के लिए एक नए स्वतंत्र राज्य ‘झालावाड़’ (Jhalawar) का गठन कर दिया। यह अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित संपूर्ण राजस्थान की सबसे अंतिम और नवीन रियासत थी जिसकी राजधानी झालरापाटन बनाई गई। इसके बाद कोटा का आंतरिक विवाद हमेशा के लिए शांत हुआ।
  • 1857 की भयंकर सैन्य क्रांति — कोटा का विद्रोह:
    • 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय रामसिंह द्वितीय कोटा के महाराव थे। कोटा में कोई अंग्रेज़ी छावनी नहीं थी, फिर भी यहाँ राजस्थान का सबसे सुव्यवस्थित, जनव्यापी और वीभत्स विद्रोह हुआ।
    • 15 अक्टूबर 1857: कोटा की राजकीय सेना के दो प्रबुद्ध नेताओं— लाला जयदयाल (धौलपुर के वकील) और मेहराब खान (करौली के रिसालदार) के नेतृत्व में सैनिकों और आम जनता ने विद्रोह कर दिया।
    • पॉलिटिकल एजेंट बर्टन की हत्या: क्रांतिकारियों ने कोटा के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट ‘मेजर बर्टन’ (Major Burton) के बंगले को घेर लिया। जनता ने मेजर बर्टन, उनके दो बेटों और डॉक्टर सैडलर की बेरहमी से हत्या कर दी। क्रांतिकारियों ने मेजर बर्टन का सिर काटकर पूरे कोटा शहर की गलियों और बाजारों में भाले पर टांगकर सरेआम घुमाया, जो क्रांति का सबसे उग्र रूप था।
    • महाराव की नजरबंदी: क्रांतिकारियों ने महाराव रामसिंह द्वितीय को उन्हीं के ‘कोटा गढ़’ (सिटी पैलेस) के भीतर 6 महीने तक नजरबंद (कैद) करके रखा और उनसे एक जबरन परवाने पर हस्ताक्षर करवाए कि मेजर बर्टन की हत्या महाराव के आदेश पर ही हुई है।
    • करौली की सहायता व मुक्ति: मार्च 1858 ई. में अंग्रेज़ जनरल रॉबर्ट्स ने विशाल सेना के साथ कोटा को घेरा। करौली के महाराजा मदनपाल ने अपनी सेना अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजी, जिसके बाद कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त कराया गया। जयदयाल और मेहराब खान को कोटा में सरेआम फांसी दे दी गई। इस घटना में महाराव की संदिग्ध भूमिका के कारण अंग्रेजों ने रामसिंह द्वितीय की तोपों की सलामी की संख्या 17 से घटाकर 13 कर दी और उन पर भारी हर्जाना लगाया।

14. महाराव शत्रुसाल हाड़ा द्वितीय — (1866 ई. – 1889 ई.)

  • शासनकाल: 1866 ईस्वी से 1889 ईस्वी तक।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व दयानंद सरस्वती का आगमन:
    • ये रामसिंह द्वितीय के पुत्र थे। अंग्रेज़ों ने इनकी वफादारी की जांच करने के बाद इनकी तोपों की सलामी की संख्या पुनः बढ़ाकर 17 कर दी थी।
    • स्वामी दयानंद सरस्वती का आगमन: इनके शासनकाल में प्रसिद्ध समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती कोटा आए थे। उनके उपदेशों से प्रभावित होकर महाराव ने कोटा में बाल विवाह पर रोक लगाने और हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के कई प्रशासनिक प्रयास किए। इनके काल में कोटा में आधुनिक भू-राजस्व प्रणाली (Settlement) की शुरुआत हुई। ये निःसंतान मरे, जिससे कोटड़ा के जागीरदार के पुत्र उम्मेद सिंह द्वितीय को गोद लिया गया।

15. महाराव उम्मेद सिंह हाड़ा द्वितीय — आधुनिक कोटा के निर्माता (1889 ई. – 1940 ई.)

  • शासनकाल: 1889 ईस्वी से 1940 ईस्वी तक।
  • उपनाम: इन्हें ‘आधुनिक कोटा का निर्माता’ कहा जाता है। ये प्रबुद्ध और प्रगतिशील विचारों के शासक थे।
  • आधुनिक औद्योगिक सुधार:
    • इन्होंने कोटा में प्रशासनिक और ढांचागत सुधारों की झड़ी लगा दी। इन्होंने कोटा में पहली बार रेलवे लाइन (ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे) का विस्तार करवाया, जिससे कोटा देश के मुख्य व्यापारिक केंद्रों से जुड़ गया।
    • इन्होनें कोटा में आधुनिक न्याय प्रणाली के लिए ‘हाईकोर्ट’ की तर्ज पर अदालतों का गठन किया। शिक्षा के विकास के लिए इन्होंने ‘हर्बर्ट कॉलेज’ (Herbert College) की स्थापना की।
    • चम्बल पर आधुनिक सोच: आज जो हम कोटा को भारत की औद्योगिक और शैक्षणिक राजधानी (कोटा स्टोन, कोचिंग हब व चम्बल परियोजना) के रूप में देखते हैं, उसकी प्रारंभिक सिंचाई और जल दोहन की रूपरेखा महाराजा उम्मेद सिंह द्वितीय के काल में ही तैयार की गई थी। प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की सहायता के कारण इन्हें ‘जी.सी.आई.ई.’ (GCIE) की उपाधि मिली थी।

16. महाराव भीमसिंह हाड़ा द्वितीय — अंतिम शासक व राजस्थान के प्रथम उप-राजप्रमुख (1940 ई. – 1948 ई. / विलय तक)

  • शासनकाल: 1940 ईस्वी से 1948 ईस्वी (भारत संघ में पूर्ण विलय तक)।
  • भारत की आजादी, एकीकरण व खेल गौरव:
    • यह कोटा हाड़ा राजवंश के अंतिम आधिकारिक शासक थे। ये एक प्रख्यात निशानेबाज (Shooter) थे और भारतीय ओलंपिक संघ के प्रमुख सदस्यों में से एक रहे।
    • एकीकरण में ऐतिहासिक योगदान — ‘राजस्थान संघ’ (25 मार्च 1948): भारत की आजादी के समय, राजस्थान के एकीकरण के द्वितीय चरण के तहत 25 मार्च 1948 को हाड़ौती और वागड़ की 9 छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर ‘राजस्थान संघ’ (Rajasthan Sangha) का गठन किया गया।
    • महाराव भीमसिंह द्वितीय ने प्रबुद्ध देशभक्ति का परिचय देते हुए सबसे पहले अपनी रियासत का विलय भारत संघ में करने की सहर्ष घोषणा की। कूटनीतिक और आर्थिक सुदृढ़ता के कारण ‘कोटा’ को इस राजस्थान संघ की राजधानी बनाया गया
    • प्रथम राजप्रमुख: महाराव भीमसिंह द्वितीय को इस नवगठित ‘राजस्थान संघ’ का प्रथम ‘राजप्रमुख’ नियुक्त किया गया।
    • उप-राजप्रमुख पद: बाद में, जब 18 अप्रैल 1448 को उदयपुर (मेवाड़) के महाराणा भूपाल सिंह एकीकरण में शामिल हुए, तो भूपाल सिंह को ‘महाराजप्रमुख’ बनाया गया और कोटा के महाराव भीमसिंह द्वितीय को संपूर्ण राजस्थान का प्रथम ‘वरिष्ठ उप-राजप्रमुख’ (Vice-Governor) नियुक्त किया गया, वे इस पद पर 1956 तक (एकीकरण पूर्ण होने तक) रहे। इनके समय ही कोटा पूर्ण रूप से आधुनिक राजस्थान का एक प्रमुख जिला और हाड़ौती का मुख्य संभाग बना।

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