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मारवाड़ (जोधपुर) का राठौड़ राजवंश

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1. राव सीहा — मारवाड़ के राठौड़ वंश के मूल पुरुष (1240 ई. – 1273 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • इन्हें मारवाड़ के राठौड़ राजवंश का आदि पुरुष, मूल पुरुष या संस्थापक कहा जाता है।
    • इतिहासकार इन्हें कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल का वंशज मानते हैं।
    • ये 1240 ईस्वी के आसपास मारवाड़ आए और पाली के ‘पालीवाल ब्राह्मणों’ को मेरों और मुस्लिम लुटेरों के आतंक से मुक्ति दिलाई।
    • केंद्र: इन्होंने ‘पाली’ को अपना प्रथम प्रशासनिक केंद्र बनाया।
    • निधन: सन 1273 ईस्वी में लाखा झंवर (पाली) के युद्ध में गायों की रक्षा करते हुए मुस्लिम आक्रमणकारी सुलतान शमशुद्दीन की सेना के खिलाफ लड़ते हुए ये शहीद हो गए। बीठू (पाली) गांव में इनका स्मारक (शिलालेख) आज भी मौजूद है।

2. राव आस्थान — (1273 ई. – 1291 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये राव सीहा के पुत्र थे। इन्होंने गुहिल शासकों को पराजित कर ‘खेड़’ (बालोतरा/बाड़मेर) पर अधिकार किया और उसे राठौड़ों का नया केंद्र बनाया।
    • इन्होंने ही ईडर (गुजरात) के भील शासक को हटाकर अपने भाई सोनग को वहाँ का राजा बनाया। जलालुद्दीन खिलजी के पाली आक्रमण के समय ये वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हुए।

3. राव धूहड़ — (1291 ई. – 1309 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • कुलदेवी की स्थापना: राव धूहड़ कर्नाटक से अपनी कुलदेवी ‘चक्रेश्वरी माता’ की काष्ठ (लकड़ी) की मूर्ति लेकर मारवाड़ आए थे। इन्होंने बाड़मेर के नागाणा गांव में इस मूर्ति को स्थापित किया, जिसके कारण देवी का नाम ‘नागाणेची माता’ पड़ा, जो राठौड़ों की कुलदेवी हैं।
    • ये मंगोलों और प्रतिहारों के खिलाफ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

4. राव चूंडा — मारवाड़ में सामंतशाही के जनक (1384 ई. – 1423 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • मंडोर विजय (राजधानी): चूंडा के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब इंदा प्रतिहारों ने तुर्कों (मुस्लिमों) को मंडोर से भगाने के लिए राव चूंडा की सहायता ली। प्रतिहारों ने अपनी पुत्री का विवाह चूंडा से कर ‘मंडोर’ (जोधपुर) को दहेज में सौंप दिया। चूंडा ने मंडोर को राठौड़ों की पहली स्थाई राजधानी बनाया।
    • सामंतशाही की शुरुआत: मारवाड़ में सबसे पहले सामंती प्रथा (Jagirdari System) की शुरुआत करने का श्रेय राव चूंडा को ही जाता है।
    • इन्होंने डीडवाना, नाडोल और खाटू पर अधिकार कर मारवाड़ का विस्तार किया। सन 1423 ई. में पुंगल के भाटियों और जैसलमेर के शासकों के खिलाफ धोखे से हुए युद्ध में ये वीरगति को प्राप्त हुए। इनकी पत्नी चांदकंवर ने जोधपुर में ‘चांद बावड़ी’ का निर्माण करवाया था।

5. राव रणमल — (1427 ई. – 1438 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • राव चूंडा ने अपनी चहेती पत्नी के प्रभाव में आकर छोटे पुत्र कान्हा को राजा बना दिया था, जिससे नाराज होकर रणमल मेवाड़ (राणा लाखा के पास) चले गए।
    • मेवाड़ में प्रभाव: रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से करवाया (शर्त के अनुसार हंसाबाई की संतान मोकल मेवाड़ की राजा बनी)। मोकल के काल में रणमल मेवाड़ के सर्वेसर्वा बन गए।
    • मारवाड़ की गद्दी: कान्हा की मृत्यु के बाद रणमल ने मेवाड़ी सेना की सहायता से मंडोर पर अधिकार किया और मारवाड़ के शासक बने।
    • हत्या (1438 ई.): राणा कुंभा के काल में रणमल ने मेवाड़ के सरदारों की हत्या करवाना शुरू कर दिया था। अंततः कुंभा के निर्देश पर रणमल की प्रेमिका ‘भारमली’ की सहायता से 1438 ई. में मेवाड़ के महलों में रणमल को जहर देकर मार डाला गया।

6. राव जोधा — जोधपुर के संस्थापक (1438 ई. – 1489 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • रणमल की हत्या के समय जोधा मेवाड़ में ही थे। वे वहाँ से भागकर मारवाड़ के ‘काहुनी’ (बीकानेर) गांव में छिपे। मेवाड़ की सेना ने मंडोर पर अधिकार कर लिया था।
    • आवल-बावल की संधि (1453 ई.): जोधा ने 15 वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद मंडोर वापस जीता। राजमाता हंसाबाई के प्रयासों से राणा कुंभा और राव जोधा के बीच ऐतिहासिक ‘आवल-बावल की संधि’ हुई। इसके तहत मेवाड़-मारवाड़ की सीमा तय हुई और जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से कर दिया।
    • जोधपुर की स्थापना (1459 ई.): जोधा ने मंडोर को सामरिक दृष्टि से असुरक्षित मानकर 12 मई 1459 ई. को जोधपुर शहर की स्थापना की और इसे अपनी नई राजधानी बनाया।
    • मेहरानगढ़ दुर्ग: इन्होंने चिड़ियाटूंंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव करणी माता के हाथों रखवाई। दुर्ग की सुरक्षा के लिए राजाराम मेघवाल (राजिया भील) की बलि दी गई थी।
    • जोधा के प्रतापी पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में जंगलू प्रदेश जीतकर 1488 ई. में बीकानेर में राठौड़ वंश की स्वतंत्र शाखा स्थापित की थी।

7. राव सातल — (1489 ई. – 1492 ई.)

  • इतिहास व घुड़ला त्योहार का इतिहास:
    • कोसाना का युद्ध (1492 ई.): अजमेर के सूबेदार मल्लूं खां के सेनापति ‘घुड़ले खां’ ने मारवाड़ की पावन धरा पीपाड़ से तीजों की पूजा कर रही 140 कुंवारी कन्याओं (लड़कियों) का अपहरण कर लिया था।
    • राव सातल ने तुरंत पीछा कर कोसाना नामक स्थान पर घुड़ले खां को युद्ध में पराजित किया। सातल ने घुड़ले खां का सिर काट दिया और कन्याओं को सुरक्षित वापस लाए। कटे हुए सिर को राजा ने उन कन्याओं को सौंप दिया, जिसे लेकर वे पूरे शहर में नाचीं।
    • इसी विजय की याद में मारवाड़ में आज भी चैत्र कृष्ण अष्टमी को ‘घुड़ला त्योहार/नृत्य’ मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं छिद्रित मटके में दीपक रखकर नाचती हैं। इस युद्ध में अत्यधिक घायल होने के कारण राव सातल का देहांत हो गया।

8. राव सूजा — (1492 ई. – 1515 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये राव सातल के भाई थे। इनके काल में बीकानेर के राव बीका ने जोधपुर पर आक्रमण किया था। राव बीका राजपाठ नहीं चाहते थे, वे केवल अपने पिता राव जोधा के शाही चिन्ह (जैसे— ढाल, तलवार, पूज्य लक्ष्मी माता की मूर्ति और शाही तख्त) चाहते थे। सूजा ने माता राजमाता के कहने पर वे शाही चिन्ह राव बीका को सौंप दिए, जिसके बाद बीकानेर की सेना वापस लौटी।

9. राव गांगा — (1515 ई. – 1532 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • खानवा युद्ध में सहायता (1527 ई.): जब मेवाड़ के राणा सांगा ने मुगलों (बाबर) के खिलाफ भारत के राजाओं को आमंत्रित किया (पाती पेरवण), तो राव गांगा ने अपने पुत्र कुंवर मालदेव के नेतृत्व में 4000 राठौड़ सैनिकों की विशाल टुकड़ी राणा सांगा की सहायता के लिए खानवा के मैदान में भेजी थी।
    • इन्होंने जोधपुर में ‘गांगलाव तालाब’ और ‘गांगा की बावड़ी’ का निर्माण करवाया था।
    • रहस्यमयी मृत्यु: सन 1532 ई. में अफीम के नशे में झरोखे में बैठे राव गांगा को उनके ही पुत्र मालदेव ने नीचे धक्का दे दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इसलिए मालदेव को मारवाड़ का प्रथम पितृहंता कहा जाता है।

10. राव मालदेव — मारवाड़ का सबसे प्रतापी शासक (1532 ई. – 1562 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: हशमत वाला राजा (वैभव व गरिमा वाला शासक— फारसी इतिहासकारों द्वारा), 52 युद्धों का विजेता, हिन्दुस्तान का सबसे शक्तिशाली राजा (फरिश्ता के अनुसार)।
  • साम्राज्य विस्तार व प्रमुख युद्ध:
    • मालवेव जब गद्दी पर बैठे, तब उनके पास केवल जोधपुर और सोजत का परगना था। इन्होंने अपने बाहुबल से मारवाड़ की सीमा को हिंडौन (Folk) और फतेहपुर सीकरी तक पहुंचा दिया था।
    • पाहोबा / साहेबा का युद्ध (1541-42 ई. – बीकानेर): मालदेव ने बीकानेर के राठौड़ राजा राव जैतसी पर आक्रमण किया। जैतसी इस युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और मालदेव ने बीकानेर पर अधिकार कर लिया। जैतसी के पुत्र कल्याणमल सहायता के लिए शेरशाह सूरी के पास चले गए।
    • मेड़ता विजय: मालदेव ने मेड़ता के वीरमदेव को पराजित कर मेड़ता छीन लिया। वीरमदेव भी शेरशाह सूरी की शरण में चले गए।
  • गिरि-सुमेल का ऐतिहासिक युद्ध (जनवरी 1544):
    • बीकानेर के कल्याणमल और मेड़ता के वीरमदेव की उकसाहट पर अफगान शासक शेरशाह सूरी ने 80,000 की सेना के साथ मारवाड़ (जैतारण, पाली) पर आक्रमण किया।
    • सूरी ने कपट का सहारा लेते हुए मालदेव के परम वफादार सेनापतियों ‘जैता और कूंपा’ के शिविरों में जाली पत्र और धन रखवा दिया, जिससे मालदेव को अपने ही सेनापतियों पर संदेह हो गया और वे मुख्य सेना लेकर जोधपुर लौट गए।
    • अपनी वफादारी साबित करने के लिए जैता और कूंपा ने मात्र 10,000 राजपूत सैनिकों के साथ शेरशाह सूरी की विशाल सेना पर भूखे शेरों की तरह हमला कर दिया। राजपूतों के इस प्रचंड आक्रमण से सूरी की सेना में खलबली मच गई और सूरी हारने ही वाला था कि अचानक जलाल खां जलवानी की नई तोपची टुकड़ी वहाँ आ पहुँची।
    • जैता और कूंपा लड़ते हुए शहीद हो गए। युद्ध जीतने के बाद शेरशाह सूरी के मुंह से ऐतिहासिक वाक्य निकला था: “खुदा का शुक्र है कि फतह (विजय) हो गई, वरना मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।”
  • रूठी रानी उमादे का इतिहास: मालदेव का विवाह जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री उमादे से हुआ था। विवाह की पहली रात को ही राजा मालदेव के आचरण से नाराज होकर उमादे हमेशा के लिए रूठ गईं। उन्होंने पूरा जीवन अजमेर के तारागढ़ दुर्ग और कोसणा में बिताया। इतिहास में उन्हें ‘रूठी रानी’ कहा जाता है। मालदेव की मृत्यु पर वे उनकी पगड़ी के साथ सती (अनुमरण) हुई थीं। मालदेव ने मेहरानगढ़ में ‘चोखेलाव महल’ बनवाया था।

11. राव चन्द्रसेन — मारवाड़ का प्रताप (1562 ई. – 1581 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: मारवाड़ का प्रताप, प्रताप का अग्रगामी (पथ-प्रदर्शक), मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा
  • ऐतिहासिक संघर्ष व अकबर से लोहा:
    • ये राव मालदेव के योग्य पुत्र थे। मालदेव ने अपने बड़े बेटों (राम और उदयसिंह) को छोड़कर चन्द्रसेन को उत्तराधिकारी बनाया, जिससे दोनों भाई अकबर की शरण में चले गए।
    • नागौर दरबार (1570 ई.): अकबर ने राजपूताना के राजाओं को अधीन करने के लिए नागौर में दरबार लगाया। चन्द्रसेन भी इसमें शामिल हुए, लेकिन वहाँ अपने भाइयों और अकबर की कूटनीति को देखकर वे बिना अधीनता स्वीकार किए चुपचाप दरबार छोड़कर चले गए।
    • छापामार युद्ध: अकबर ने जोधपुर पर सेना भेजी। चन्द्रसेन जोधपुर छोड़कर भद्राजण और फिर सिवाना दुर्ग (संकटकालीन राजधानी) चले गए। उन्होंने आजीवन महलों का सुख त्याग कर जंगलों और पहाड़ियों में रहकर अकबर की मुगल सेना के खिलाफ सफल छापामार (Guerilla) युद्ध लड़ा, लेकिन कभी गुलामी स्वीकार नहीं की।
    • इन्होंने धन की कमी पड़ने पर जैसलमेर के राव हरराय को पोकरण का किला ‘ऋण’ (गिरवी) के तौर पर दिया था। सन 1581 ई. में सारण की पहाड़ियों (सिणियारी, पाली) में एक सामंत द्वारा भोजन में जहर देने के कारण इस महान वीर का प्राणांत हो गया। महाराणा प्रताप ने मुगलों से लड़ने की प्रेरणा राव चन्द्रसेन की नीति से ही ली थी।

12. मोटा राजा उदय सिंह — मुगलों से संधि करने वाले प्रथम (1583 ई. – 1595 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व कूटनीति:
    • चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद अकबर ने दो साल तक जोधपुर को ‘खालसा’ (सीधे केंद्र के नियंत्रण में) रखा। सन 1583 ई. में अकबर ने चन्द्रसेन के बड़े भाई उदय सिंह को जोधपुर का राजा बनाया। इनके भारी शरीर के कारण अकबर ने इन्हें ‘मोटा राजा’ की उपाधि दी थी।
    • मुगल-मारवाड़ वैवाहिक संबंध: मोटा राजा उदय सिंह मारवाड़ के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार की और उनके साथ वैवाहिक संबंध बनाए
    • इन्होंने अपनी पुत्री ‘मानीबाई’ (जगत गुसाईं / जोधाबाई) का विवाह अकबर के पुत्र शहजादा सलीम (जहांगीर) से किया। इसी मानीबाई से आगे चलकर मुगल बादशाह शाहजहाँ (खुर्रम) का जन्म हुआ था। इस सेवा के बदले अकबर ने इन्हें 1000 का मनसब दिया।

13. सवाई राजा सूर सिंह — (1595 ई. – 1619 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये मोटा राजा उदय सिंह के पुत्र थे। इन्होंने अकबर और जहांगीर के काल में मुगलों के कई दक्षिण और गुजरात अभियानों का सफल नेतृत्व किया। इनकी कार्यकुशलता से प्रसन्न होकर मुगल बादशाह जहांगीर ने इन्हें ‘सवाई राजा’ की विशिष्ट उपाधि दी थी और इनका मनसब बढ़ाकर 5000 कर दिया था।

14. गज सिंह प्रथम — ‘दलथम्बन’ (1619 ई. – 1638 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व उपाधि:
    • इन्होंने जहांगीर के विद्रोही पुत्र शाहजहाँ (खुर्रम) के विद्रोह को दबाने में मुगलों की अद्भुत सहायता की थी। इनकी अदम्य सैन्य वीरता से विस्मित होकर जहांगीर ने इन्हें ‘दलथम्बन’ (सेना को रोकने वाला) की उपाधि से नवाजा था।
    • गज सिंह अपनी पासवान ‘अनारा बेगम’ के अत्यधिक प्रभाव में थे। अनारा बेगम के कहने पर ही गज सिंह ने अपने वीर और बड़े पुत्र अमर सिंह राठौड़ को उत्तराधिकारी न बनाकर, छोटे पुत्र जसवंत सिंह को जोधपुर का टिकट दिया।

15. वीर अमर सिंह राठौड़ — मारवाड़ की कटार का धनी

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व मतीरे की राड़:
    • पिता द्वारा देश-निकाला मिलने पर अमर सिंह शाहजहाँ के मुगल दरबार में चले गए। शाहजहाँ ने इनकी वीरता से प्रभावित होकर इन्हें नागौर की जागीर दी और ‘राव’ की उपाधि दी।
    • मतीरे की राड़ (1644 ई.): अमर सिंह के काल में बीकानेर के राजा करनसिंह और नागौर के अमर सिंह के बीच एक तरबूज (मतीरे) की बेल को लेकर विश्व का सबसे अनोखा युद्ध हुआ, जिसे ‘मतीरे की राड़’ कहते हैं। बीकानेर के जाखणिया गांव की बेल का फल नागौर की सीमा में चला गया था, जिस पर दोनों राज्यों की सेनाएं लड़ पड़ीं।
    • मुगल दरबार में शौर्य: शाहजहाँ के साले सलावत खां ने अमर सिंह को मुगल दरबार में ‘गंवार’ कह दिया था। स्वाभिमानी अमर सिंह ने आव देखा न ताव, भरी मुगल संसद में अपनी कटार निकाली और सलावत खां की गर्दन धड़ से अलग कर दी। इसके बाद इन्होंने शाहजहाँ पर भी हमला किया, लेकिन वह बच निकला। अमर सिंह के इस शौर्य पर आज भी राजस्थान में ‘अमर सिंह राठौड़ की ख्याल’ लोकनाट्य गाया जाता है।

16. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम — (1638 ई. – 1678 ई.)

  • ऐतिहासिक युद्ध व मुगल कूटनीति:
    • गज सिंह के छोटे पुत्र जसवंत सिंह का राजतिलक आगरा में हुआ। शाहजहाँ ने इन्हें ‘महाराजा’ की उपाधि दी।
    • धर्मत का युद्ध (1658 ई. – मध्य प्रदेश): शाहजहाँ के बेटों के बीच हुए उत्तराधिकार युद्ध में जसवंत सिंह ने शाही सेना (दारा शिकोह) का साथ दिया और औरंगजेब के खिलाफ भयंकर युद्ध लड़ा। युद्ध में दारा के सेनापतियों के विश्वासघात के कारण दारा की हार हुई।
    • हाड़ी रानी जसवंतदे का स्वाभिमान: जब जसवंत सिंह धर्मत के युद्ध में हारकर वापस जोधपुर पहुँचे, तो उनकी उदयपुर की हाड़ी रानी ‘जसवंतदे’ ने मेहरानगढ़ दुर्ग के दरवाजे खोलने से मना कर दिया। रानी का कहना था कि “राजपूत या तो युद्ध के मैदान से जीतकर लौटते हैं या वीरगति पाकर, हारकर पीठ दिखाने वाले के लिए महलों में कोई जगह नहीं है।” बाद में राजा द्वारा पुनः युद्ध का प्रण लेने पर ही द्वार खोले गए।
    • खजुआ का युद्ध (1659 ई.): इस युद्ध में जसवंत सिंह ने औरंगजेब के शिविर को ही लूट लिया था, जिससे औरंगजेब हमेशा इनसे चिढ़ता था, लेकिन इनकी बड़ी सैन्य शक्ति के कारण कुछ कह नहीं पाता था।
    • साहित्यिक योगदान: जसवंत सिंह स्वयं प्रकंड विद्वान थे। इन्होंने ‘आनंद विलास’, ‘भाषा भूषण’, ‘अपरोक्ष सिद्धांत सार’ नामक ग्रंथ लिखे। इनके दरबार में प्रसिद्ध इतिहासकार मुहणौत नैणसी (मारवाड़ का अबुल फजल— मुंशी देवीप्रसाद के अनुसार) रहते थे, जिन्होंने ‘नैणसी री ख्यात’ और ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ (मारवाड़ का गजेटियर) नामक महान ग्रंथ लिखे।
    • निधन: सन 1678 ई. में जमरूद (अफगानिस्तान) में जसवंत सिंह का निधन हुआ। इनकी मृत्यु पर कट्टर मुस्लिम औरंगजेब के मुंह से निकला था: “आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया” (यानी आज मेरा सबसे बड़ा धर्म-विरोधी मारा गया)।

17. महाराजा अजीत सिंह — ‘कान का कच्चा राजा’ (1679 ई. – 1724 ई.)

  • वीर दुर्गादास राठौड़ का महान त्याग: जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उनकी कोई संतान जीवित नहीं थी। औरंगजेब ने तुरंत जोधपुर को खालसा घोषित कर दिया और जसवंत सिंह के नवजात पुत्र अजीत सिंह और उनकी रानियों को दिल्ली के ‘नूरगढ़’ में कैद कर लिया। औरंगजेब अजीत सिंह को मुस्लिम बनाना चाहता था।
  • मारवाड़ के उद्धारक वीर दुर्गादास राठौड़ (जिन्हें कर्नल टॉड ने ‘राठौड़ों का यूलिसेस’ कहा है) ने मुकुंददास खींची और ‘गोरा धाय’ (मारवाड़ की पन्नाधाय) की सहायता से औरंगजेब के चक्रव्यूह से अजीत सिंह को सुरक्षित निकाला और कालिंदी (सिरोही) के जयदेव ब्राह्मण के घर छिपाया। दुर्गादास ने अजीत सिंह को राजा बनाने के लिए मुगलों से 30 वर्षों तक लगातार युद्ध लड़ा
  • देबारी समझौता (1708 ई.): दुर्गादास के प्रयासों और मेवाड़ व जयपुर के सहयोग से अजीत सिंह ने मुगलों को भगाकर जोधपुर की गद्दी हासिल की।
  • कान का कच्चा: राजा बनने के बाद अजीत सिंह सामंतों की चुगली में आ गए और उन्होंने उस वीर दुर्गादास राठौड़ को, जिसने अपना पूरा जीवन अजीत सिंह को राजा बनाने में झोंक दिया था, देश-निकाला दे दिया। दुर्गादास उज्जैन चले गए जहाँ क्षिप्रा नदी के किनारे उनकी छतरी बनी है। इसी कारण इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने अजीत सिंह को ‘कान का कच्चा राजा’ कहा है।
  • हत्या (1724 ई.): सन 1724 ई. में अजीत सिंह के पुत्र बख्त सिंह ने सत्ता के लालच में आकर सोते हुए पिता अजीत सिंह की हत्या कर दी। बख्त सिंह मारवाड़ के द्वितीय पितृहंता कहलाए।

18. महाराजा अभय सिंह — (1724 ई. – 1749 ई.)

  • ऐतिहासिक खेजड़ली आंदोलन (1730 ई.):
    • अभेय सिंह के काल की सबसे बड़ी और विश्व प्रसिद्ध घटना 28 अगस्त 1730 (भाद्रपद शुक्ल दशमी) को जोधपुर के खेजड़ली गांव में हुई। राजा को अपने नए महलों के निर्माण के लिए चूना पकाने हेतु लकड़ी की आवश्यकता थी। राजा के हाकिम गिरधारी दास सैनिकों के साथ खेजड़ली गांव में हरे खेजड़ी के पेड़ों को काटने पहुँचे।
    • बिश्नोई संप्रदाय की महान महिला अमृता देवी बिश्नोई ने पेड़ों को काटने का कड़ा विरोध किया। जब सैनिक नहीं माने, तो अमृता देवी “सिर साठे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” (यानी सिर कटने पर भी यदि एक पेड़ बचता है तो सौदा सस्ता है) कहते हुए अपनी तीन बेटियों के साथ पेड़ से लिपट गईं। क्रूर सैनिकों ने उन्हें पेड़ों के साथ ही काट दिया।
    • इस पर्यावरण रक्षा के यज्ञ में बिश्नोई संप्रदाय के 363 स्त्री-पुरुषों ने पेड़ों से लिपटकर अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया। विश्व के इतिहास में पर्यावरण और वृक्षों की रक्षा के लिए ऐसा भयंकर और महान बलिदान कहीं नहीं मिलता। अभय सिंह ने तुरंत आदेश वापस लिया और बिश्नोईयों से माफी मांगी। आज भी यहाँ विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है।
    • अभय सिंह के दरबारी कवि करणीदान ने ‘सूरज प्रकाश’ और वीरभाण ने ‘राज रूपक’ ग्रंथ लिखा था।

19. महाराजा बख्त सिंह — (1751 ई. – 1752 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इन्होंने अपने पिता अजीत सिंह की हत्या की थी। ये नागौर के जागीरदार थे और बाद में जोधपुर के राजा बने। इन्होंने मारवाड़ की राजनीति में मराठों के बढ़ते प्रभाव को रोकने का प्रयास किया था, लेकिन इनका शासनकाल बहुत छोटा रहा।

20. महाराजा विजय सिंह — (1752 ई. – 1793 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व विजयशाही सिक्के:
    • इनके शासनकाल में मारवाड़ में मराठों (जैसे जयप्पा सिंधिया) का भयंकर दमन और आक्रमण हुआ। विजय सिंह ने तुंगा के युद्ध (1787 ई.) में जयपुर के साथ मिलकर मराठों को हराया था।
    • इन्होंने मारवाड़ में अपने नाम से ‘विजयशाही सिक्के’ चलाए थे।
    • गुलाब राय (मारवाड़ की नूरजहाँ): विजय सिंह अपनी पासवान ‘गुलाब राय’ के अत्यधिक नियंत्रण में थे। गुलाब राय का मारवाड़ के प्रशासन पर पूरा अधिकार था, जिसके कारण कवि श्यामलदास ने गुलाब राय को ‘मारवाड़ की नूरजहाँ’ कहा था।

21. महाराजा भीम सिंह — (1793 ई. – 1803 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इन्होंने गद्दी पर बैठते ही अपने सभी भाइयों की हत्या करवा दी ताकि उत्तराधिकार का कोई खतरा न रहे। इनका केवल एक भाई मानसिंह बच निकला, जिसने जालौर के दुर्ग में जाकर शरण ली। भीम सिंह की सेना ने जालौर दुर्ग को कई वर्षों तक घेरे रखा। इसी घेरे के दौरान भीम सिंह की आकस्मिक मृत्यु हो गई और मानसिंह राजा बने। भीम सिंह का विवाह मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी से तय हुआ था, लेकिन विवाह से पहले ही भीम सिंह का देहांत हो गया।

22. महाराजा मान सिंह — ‘सन्यासी राजा’ (1803 ई. – 1843 ई.)

  • उपनाम: सन्यासी राजा, नाथ संप्रदाय के अनुयायी।
  • ऐतिहासिक विवाद व ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि:
    • गींगोली का युद्ध (1807 ई. – नागौर): मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह के विवाद को लेकर जयपुर के राजा जगत सिंह द्वितीय और जोधपुर के मानसिंह के बीच यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ। अमीर खां पिंडारी की सहायता से जयपुर ने मानसिंह को हरा दिया था, लेकिन बाद में कृष्णा कुमारी को जहर देकर विवाद शांत हुआ।
    • नाथ संप्रदाय का प्रभाव: जालौर दुर्ग में घेरे के समय नाथ संप्रदाय के गुरु आयस देवनाथ ने भविष्यवाणी की थी कि मानसिंह बहुत जल्द जोधपुर के राजा बनेंगे, जो सच साबित हुई। राजा बनने के बाद मानसिंह नाथ संप्रदाय के पक्के अनुयायी बन गए। इन्होंने जोधपुर में नाथ संप्रदाय का सबसे बड़ा केंद्र ‘महामंदिर’ बनवाया।
    • अंग्रेजों से सहायक संधि (6 जनवरी 1818): मराठों के दमन से तंग आकर मानसिंह ने 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के साथ सहायक संधि कर ली।
    • साहित्यिक योगदान: ये स्वयं विद्वान थे और महामंदिर में पुस्तकालय ‘मान पुस्तक प्रकाश’ की स्थापना की। जीवन के अंतिम दिनों में अंग्रेजों की दखलअंदाजी से दुखी होकर इन्होंने राजपाठ छोड़ दिया और सन्यासी बन गए।

23. महाराजा तख्त सिंह — 1857 की क्रांति के समय शासक (1843 ई. – 1873 ई.)

  • 1857 की क्रांति में योगदान:
    • 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय तख्त सिंह मारवाड़ के महाराजा थे। इन्होंने क्रांतिकारियों के विरुद्ध जाकर अंग्रेजों का तन-मन-धन से पूर्ण समर्थन किया था
    • बिठौड़ा और चेलावास का युद्ध (सितंबर 1857): आउवा के प्रतापी ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत के नेतृत्व में जब क्रांतिकारियों ने विद्रोह किया, तो तख्त सिंह ने अपने किलेदार ओनाड़ सिंह के नेतृत्व में राजसी सेना अंग्रेजों की सहायता के लिए भेजी।
    • बिठौड़ा के युद्ध (8 सितंबर 1857) में कुशाल सिंह ने जोधपुर की राजकीय सेना को काट फेंका और ओनाड़ सिंह मारा गया। इसके बाद चेलावास के युद्ध (18 सितंबर 1857 – गोरो-कालों का युद्ध) में क्रांतिकारियों ने जोधपुर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मैक मेसन का सिर काटकर आउवा के किले के दरवाजे पर लटका दिया था, जिससे तख्त सिंह और अंग्रेज कांप उठे थे।

24. महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय — (1873 ई. – 1895 ई.)

  • स्वामी दयानंद सरस्वती की ऐतिहासिक घटना:
    • इनके शासनकाल में मारवाड़ में आधुनिक प्रशासनिक और सामाजिक सुधार तेजी से हुए। इनके प्रधानमंत्री सर प्रताप सिंह ने जोधपुर का आधुनिक विकास किया।
    • दयानंद सरस्वती का आगमन (1883 ई.): महाराजा के निमंत्रण पर प्रसिद्ध समाज सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आए थे। महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ‘नन्ही जान’ नामक एक वेश्या (नर्तकी) के अत्यधिक प्रभाव में थे। एक दिन स्वामी जी ने राजा को वेश्या के पालकी को कंधा देते देख लिया और भरे दरबार में राजा को फटकार लगाते हुए वेश्यागामी होने पर कड़े उपदेश दिए।
    • इस अपमान से तिलमिलाई ‘नन्ही जान’ ने रसोइए (जगन्नाथ) के साथ मिलकर स्वामी जी के पीने वाले दूध में पिसा हुआ कांच (जहर) मिलवा दिया। दूध पीने के बाद स्वामी जी की तबीयत भयंकर बिगड़ गई और अजमेर ले जाते समय 30 अक्टूबर 1883 को दीवाली के दिन अजमेर में उनका प्राणांत हो गया। इस घटना से दुखी होकर राजा ने जोधपुर में कई सुधार किए। इन्हीं के काल में जोधपुर में ‘जसवंत कॉलेज’ और ‘बालसमंद झील’ का विकास हुआ।

25. महाराजा सरदार सिंह — (1895 ई. – 1911 ई.)

  • ऐतिहासिक स्थापत्य व योगदान:
    • इन्होंने अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय की पावन स्मृति में मेहरानगढ़ की तलहटी में सफेद संगमरमर से भव्य ‘जसवंत थड़ा’ का निर्माण कार्य पूर्ण करवाया, जिसे ‘राजस्थान का ताजमहल’ कहा जाता है।
    • इन्होंने चीन के ‘बॉक्सर्स विद्रोह’ को दबाने के लिए अंग्रेजों की सहायता हेतु अपनी प्रसिद्ध ‘जोधपुर लांसर्स’ (कैवेलरी सेना) भेजी थी, जिससे खुश होकर अंग्रेजों ने इन्हें चीन का सैन्य पदक दिया था। इन्हीं के नाम पर जोधपुर का प्रसिद्ध ‘सरदार मार्केट’ (घंटाघर) बना हुआ है।

26. महाराजा सुमेर सिंह — (1911 ई. – 1918 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये सरदार सिंह के पुत्र थे। अल्पायु होने के कारण इनके काल में भी सर प्रताप सिंह ने मारवाड़ का शासन संभाला। इन्होंने प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के दौरान अपनी जोधपुर लांसर्स सेना के साथ फ्रांस और काबुल के मैदानों में अंग्रेजों की तरफ से भाग लिया था। इनका बहुत कम उम्र में ही निधन हो गया था।

27. महाराजा उम्मेद सिंह — आधुनिक जोधपुर के निर्माता (1918 ई. – 1947 ई.)

  • उम्मेद भवन पैलेस (छीतर पैलेस):
    • इन्हें ‘आधुनिक जोधपुर का निर्माता’ कहा जाता है।
    • इन्होंने जोधपुर में अकाल राहत कार्यों (Famine Relief) के तहत अपनी जनता को रोजगार देने के लिए विश्व के सबसे बड़े आवासीय महलों में से एक ‘उम्मेद भवन पैलेस’ का निर्माण करवाया। इस महल के निर्माण में ‘छीतर’ के पत्थरों का प्रयोग होने के कारण इसे ‘छीतर पैलेस’ भी कहा जाता है।
    • इन्होंने मारवाड़ की जीवनदायिनी जल परियोजना ‘जवाई बांध’ (सुमेरपुर, पाली) की आधारशिला रखी थी, जिसे ‘मारवाड़ का अमृत सरोवर’ कहा जाता है। मारवाड़ में आधुनिक शिक्षा, वायुसेना (जोधपुर फ्लाइंग क्लब) और रेलवे का सबसे बड़ा विकास इन्हीं के काल में हुआ था।

28. महाराजा हनुमंत सिंह — एकीकरण के समय अंतिम शासक (1947 ई. – 1949 ई. / विलय तक)

  • भारत संघ में विलय और पाकिस्तान की साजिश:
    • भारत की आजादी और राजस्थान के एकीकरण के समय ये मारवाड़ के अंतिम शासक थे।
    • हनुमंत सिंह भारत संघ में शामिल नहीं होना चाहते थे। वे मोहम्मद अली जिन्ना और भोपाल के नवाब के बहकावे में आकर जोधपुर रियासत का विलय पाकिस्तान में करना चाहते थे। जिन्ना ने इन्हें एक कोरे कागज पर अपनी सभी शर्तें लिखने की खुली छूट (Blank Cheque) दे दी थी।
    • इस गुप्त साजिश की भनक भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन को लग गई। पटेल ने कूटनीति का परिचय देते हुए हनुमंत सिंह को दिल्ली बुलाया। दिल्ली के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के सामने हनुमंत सिंह ने गुस्से में आकर वी.पी. मेनन पर अपनी ‘पेन-पिस्तौल’ (Pen-Pistol) तान दी थी और जान से मारने की धमकी दी थी।
    • अंततः माउंटबेटन और पटेल के कड़े रुख और कूटनीतिक दबाव के आगे झुकते हुए हनुमंत सिंह ने 9 अगस्त 1947 ई. को भारत के विलय पत्र (Instrument of Accession) पर दस्तखत कर दिए। बाद में 30 मार्च 1949 को ‘बृहत् राजस्थान’ के गठन के समय जोधपुर पूर्ण रूप से राजस्थान का हिस्सा बन गया।
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