राजस्थान के प्रमुख लोक देवता : Quick Revision Notes
| लोक देवता | मुख्य मंदिर (स्थान) | जन्म स्थल | वाहन/घोड़ा | विशेष टिप्पणी एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रामदेव जी | रूणेचा (जैसलमेर) | उडुकासमीर, शिव (बाड़मेर) | लीला घोड़ा | पंचपीरों में मुख्य। कामड़िया पंथ चलाया, तेरहताली नृत्य इन्हीं की आराधना में होता है। एकमात्र लोक देवता जो कवि भी थे (24 बाणियाँ)। | |||
| गोगा जी | गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) | ददरेवा (चूरू) | नीली घोड़ी | इन्हें ‘जाहरपीर’ (गजनवी ने कहा) और साँपों के देवता कहते हैं। इनके गुरु गोरखनाथ थे। इनके मंदिर की बनावट मकबरानुमा है। | |||
| पाबूजी | कोलू मण्ड (जोधपुर) | कोलू मण्ड (जोधपुर) | केसर कालमी | इन्हें ‘ऊँटों के देवता’ और ‘लक्ष्मण का अवतार’ मानते हैं। इनकी फड़ राजस्थान में सबसे लोकप्रिय है। | |||
| हड़बूजी | बेंगटी (जोधपुर) | भुण्डेल (नागौर) | सियार (वाहन) | ये रामदेव जी के मौसेरे भाई थे। ये शकुन शास्त्र के ज्ञाता थे। जोधपुर के ‘बेंगटी’ में इनकी गाड़ी की पूजा होती है। | |||
| मेहाजी मांगलिया | बापणी (जोधपुर) | जोधपुर | किरड़ काबरा | मारवाड़ के पंचपीरों में शामिल। इनके भोपों (पुजारियों) के वंश की वृद्धि नहीं होती, वे पुत्र गोद लेते हैं। | |||
| तेजाजी | परबतसर (नागौर) | खड़नाल (नागौर) | लीणल (घोड़ी) | इन्हें ‘काला-बाला का देवता’ और ‘धौलियावीर’ कहते हैं। साँप के डसने पर इनकी पूजा होती है। परबतसर में इनका विशाल पशु मेला लगता है। | |||
| देवनारायण जी | आसिंद (भीलवाड़ा) | गोठा दड़ावता (भीलवाड़ा) | लीलागर | गुर्जर जाति के आराध्य। इनकी फड़ सबसे लंबी है और उस पर डाक टिकट जारी हो चुका है। इनकी पूजा नीम की पत्तियों से होती है। | |||
| देव बाबा | नगला जहाज (भरतपुर) | भरतपुर | पाडा (भैंसा) | इन्हें ‘ग्वालों के देवता’ कहा जाता है। पशु चिकित्सा के ज्ञाता होने के कारण पशुपालक इन्हें पूजते हैं। | |||
| मामादेव जी | पश्चिमी राजस्थान | – | लकड़ी का तोरण | इन्हें ‘बरसात के देवता’ कहते हैं। इनका कोई मंदिर नहीं होता, गाँव के बाहर लकड़ी का एक विशिष्ट ‘तोरण’ होता है। | |||
| कल्ला जी राठौड़ | सामलिया (डूंगरपुर) | मेड़ता (नागौर) | – | इन्हें ‘चार हाथों वाले लोक देवता’ कहते हैं। चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1567) में इन्होंने अद्भुत वीरता दिखाई थी। | |||
| मल्लीनाथ जी | तिलवाड़ा (बाड़मेर) | मारवाड़ | – | इन्होंने ‘कुण्डा पंथ’ की स्थापना की। लूणी नदी के किनारे तिलवाड़ा में इनका प्रसिद्ध पशु मेला लगता है। | |||
| तल्लीनाथ जी | पांचौटा (जालौर) | शेरगढ़ (जोधपुर) | – | जालौर के प्रसिद्ध लोक देवता। इनके क्षेत्र के वनों को ‘ओरण’ कहा जाता है, जहाँ पेड़ काटना वर्जित है। | |||
| झुंझार जी | इमलोहा (सीकर) | सीकर | – | इन्होंने गौ-रक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे। इनका मंदिर ‘स्यालोदड़ा’ में खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है। | |||
| डूंगजी-जवाहरजी | सीकर | शेखावाटी | – | इन्हें ‘1857 की क्रांति के देवता’ कहते हैं। ये अमीरों को लूटकर धन गरीबों में बाँट देते थे। | |||
| केसरिया कुंवर जी | – | – | – | ये गोगाजी के पुत्र हैं। इनके थान पर सफेद रंग की ध्वजा फहराई जाती है। ये भी सर्पदंश का उपचार करते हैं। | |||
राजस्थान के प्रमुख लोक देवता : In Details
1. रामदेव जी (रामसा पीर)
- जन्म स्थल: उडुकासमीर, शिव तहसील (बाड़मेर)
- मुख्य मंदिर: रूणेचा / रामदेवरा (जैसलमेर)
- वाहन/घोड़ा: लीला घोड़ा
- पिता व माता: अजमल जी तंवर और मैणादे
- विशेष विवरण:
- इन्हें भगवान कृष्ण का अवतार और ‘साम्प्रदायिक सद्भावना के देवता’ माना जाता है।
- समाज में फैले भेदभाव को मिटाने के लिए इन्होंने कामड़िया पंथ की शुरुआत की थी।
- कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा इनके मेले में प्रसिद्ध तेरहताली नृत्य किया जाता है।
- ये एकमात्र ऐसे लोक देवता थे जो एक कवि भी थे; इनकी प्रसिद्ध रचना का नाम ‘चौबीस वाणियाँ’ है।
- इनके मेघवाल भक्तों को ‘रिखिया’ और इनकी पचरंगी ध्वजा को ‘नेजा’ कहा जाता है।
- इन्हें भगवान कृष्ण का अवतार और ‘साम्प्रदायिक सद्भावना के देवता’ माना जाता है।
2. गोगा जी (जाहरपीर)
- जन्म स्थल: ददरेवा (चूरू)
- मुख्य मंदिर: गोगामेड़ी (हनुमानगढ़)
- वाहन/घोड़ी: नीली घोड़ी (गोगा बापा)
- पिता व माता: जेवर सिंह और बाछल दे
- विशेष विवरण:
- इन्हें ‘साँपों के देवता’ और ‘गौ-रक्षक देवता’ के रूप में पूजा जाता है।
- महमूद गजनवी के साथ युद्ध करते समय इनकी वीरता को देखकर गजनवी ने इन्हें ‘जाहरपीर’ (साक्षात देवता) कहा था।
- गोगामेड़ी मंदिर का आकार मकबरेनुमा है, जिसकी मुख्य देहरी पर ‘बिस्मिल्लाह’ अंकित है।
- किसान वर्षा के बाद हल और हाली को ‘गोगा राखड़ी’ (नौ गांठों वाली राखी) बांधते हैं।
- इन्हें ‘साँपों के देवता’ और ‘गौ-रक्षक देवता’ के रूप में पूजा जाता है।
3. पाबूजी राठौड़ (प्लेग रक्षक देवता)
- जन्म स्थल: कोलू मण्ड, फलोदी (जोधपुर)
- मुख्य मंदिर: कोलू मण्ड (जोधपुर)
- वाहन/घोड़ी: केसर कालमी (काली घोड़ी)
- पिता व माता: धांधल जी राठौड़ और कमला दे
- विशेष विवरण:
- इन्हें लक्ष्मण जी का अवतार, ‘ऊंटों के देवता’ और ‘प्लेग रक्षक’ माना जाता है।
- मारवाड़ में सबसे पहले ऊंट (सांड) लाने का श्रेय पाबूजी को ही जाता है; इसलिए ऊंट बीमार होने पर रेबारी जाति इनकी पूजा करती है।
- ‘पाबूजी री फड़’ राजस्थान में सबसे लोकप्रिय फड़ है, जिसे ‘रावणहत्था’ वाद्ययंत्र के साथ बांचा जाता है।
- इन्होंने देवल चारी की गायों को छुड़ाने के लिए अपने जीजा जींदराव खींची के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए प्राण त्यागे थे।
- इन्हें लक्ष्मण जी का अवतार, ‘ऊंटों के देवता’ और ‘प्लेग रक्षक’ माना जाता है।
4. हड़बूजी सांखला
- जन्म स्थल: भुण्डेल (नागौर)
- मुख्य मंदिर: बेंगटी, फलोदी (जोधपुर)
- वाहन: सियार
- पिता: मेहराज जी सांखला
- विशेष विवरण:
- ये लोक देवता रामदेव जी के मौसेरे भाई थे और इनके गुरु का नाम भी बालीनाथ था।
- ये मारवाड़ के शासक राव जोधा के समकालीन थे और उन्होंने जोधा को मेवाड़ विजय के लिए एक कटार भेंट की थी।
- बेंगटी स्थित इनके मुख्य मंदिर में मूर्ति की जगह हड़बूजी की बैलगाड़ी की पूजा की जाती है, जिससे वे पंगु (अपाहिज) गायों के लिए चारा लाया करते थे।
- ये लोक देवता रामदेव जी के मौसेरे भाई थे और इनके गुरु का नाम भी बालीनाथ था।
5. मेहाजी मांगलिया
- जन्म स्थल: जोधपुर
- मुख्य मंदिर: बापणी (जोधपुर)
- वाहन/घोड़ा: किरड़ काबरा
- विशेष विवरण:
- ये मारवाड़ के राव चूंडा के समकालीन थे और जैसलमेर के राणंगदेव भाटी के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
- ऐसी लोक मान्यता है कि मेहाजी के भोपों (पुजारियों) के वंश की वृद्धि नहीं होती, वे बच्चे गोद लेकर अपना वंश आगे बढ़ाते हैं।
- इनका मेला भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी) को बापणी में भरता है।
- ये मारवाड़ के राव चूंडा के समकालीन थे और जैसलमेर के राणंगदेव भाटी के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
6. वीर तेजाजी (धोलिया वीर)
- जन्म स्थल: खड़नाल (नागौर)
- मुख्य मंदिर: परबतसर (नागौर)
- वाहन/घोड़ी: लीलण (सिणगारी)
- पिता व माता: ताहड़ जी और रामकुंवरी
- विशेष विवरण:
- तेजाजी जाट राजवंश के ‘धोलिया’ गोत्र से थे। इन्हें ‘काला और बाला के देवता’ तथा कृषि उपकारक देवता कहा जाता है।
- इन्होंने लाछा गूजरी की गायों को मेर के मीनाओं से छुड़ाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी।
- साँप के डसने के कारण इनका निर्वाण सुरसुरा (अजमेर) में हुआ था।
- परबतसर में भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) को राजस्थान का प्रसिद्ध तेजाजी पशु मेला आयोजित होता है।
- तेजाजी जाट राजवंश के ‘धोलिया’ गोत्र से थे। इन्हें ‘काला और बाला के देवता’ तथा कृषि उपकारक देवता कहा जाता है।
7. देवनारायण जी (उदल जी)
- जन्म स्थल: गोठा दड़ावता, आसिंद (भीलवाड़ा)
- मुख्य मंदिर: आसिंद (भीलवाड़ा)
- वाहन/घोड़ा: लीलागर
- पिता व माता: सवाई भोज और साढू माता
- विशेष विवरण:
- गुर्जर समुदाय के आराध्य देव जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
- इन्हें ‘आयुर्वेद के देवता’ के रूप में जाना जाता है; इनके मंदिरों में मूर्ति के स्थान पर नीम की पत्तियों और ईंटों की पूजा की जाती है।
- ‘देवनारायण जी की फड़’ राजस्थान की सबसे लंबी, सबसे पुरानी और सर्वाधिक चित्रों वाली फड़ है, जिसे ‘जंतर’ वाद्ययंत्र के साथ गाया जाता है। इस फड़ पर भारतीय डाक विभाग द्वारा टिकट भी जारी किया जा चुका है।
- गुर्जर समुदाय के आराध्य देव जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
8. देव बाबा
- जन्म स्थल: भरतपुर
- मुख्य मंदिर: नगला जहाज (भरतपुर)
- वाहन: पाडा (भैंसा)
- विशेष विवरण:
- इन्हें ‘ग्वालों और चरवाहों के पालनहार’ तथा पशु चिकित्सक लोक देवता माना जाता है।
- ऐसी मान्यता है कि इन्हें पशुओं के रोगों का चमत्कारी ज्ञान था।
- इनकी खुशहाली के लिए भाद्रपद शुक्ल पंचमी और चैत्र शुक्ल पंचमी को नगला जहाज में मेला भरता है जहाँ ग्वालों को भोजन कराया जाता है।
- इन्हें ‘ग्वालों और चरवाहों के पालनहार’ तथा पशु चिकित्सक लोक देवता माना जाता है।
9. मामा देव जी (वर्षा के देवता)
- मुख्य मंदिर: पश्चिमी राजस्थान (गाँव की सीमा/कांकड़ पर)
- प्रतीक चिन्ह: लकड़ी का विशिष्ट तोरण
- विशेष विवरण:
- इन्हें ‘बरसात के देवता’ के रूप में पूजा जाता है। इनका कोई पक्का मंदिर या मूर्ति नहीं होती, बल्कि गाँव के मुख्य रास्ते पर लकड़ी का एक सुंदर तोरण लगाया जाता है।
- मामादेव जी को प्रसन्न करने के लिए भैंसे की बलि देने की अनूठी परंपरा है।
- इन्हें ‘बरसात के देवता’ के रूप में पूजा जाता है। इनका कोई पक्का मंदिर या मूर्ति नहीं होती, बल्कि गाँव के मुख्य रास्ते पर लकड़ी का एक सुंदर तोरण लगाया जाता है।
10. वीर कल्ला जी राठौड़ (चार हाथों वाले देवता)
- जन्म स्थल: मेड़ता (नागौर)
- मुख्य मंदिर: सामलिया (डूंगरपुर)
- गुरु: भैरवनाथ
- विशेष विवरण:
- कल्ला जी प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई के भतीजे थे।
- चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके (1567-68 ई.) में अकबर के विरुद्ध लड़ते हुए इन्होंने अपने घायल ताऊ जयमल को अपने कंधों पर बिठाकर युद्ध लड़ा था। इस अद्भुत दृश्य के कारण इन्हें ‘चार हाथों और दो सिर वाले लोक देवता’ कहा जाता है।
- कल्ला जी प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई के भतीजे थे।
11. मल्लीनाथ जी
- जन्म स्थल: मारवाड़
- मुख्य मंदिर: तिलवाड़ा (बाड़मेर)
- पिता व माता: राव सलखा और जाणी दे
- विशेष विवरण:
- ये मारवाड़ के प्रतापी रावल राजा और चमत्कारी सिद्ध पुरुष थे। इनके नाम पर ही बाड़मेर के क्षेत्र का नाम ‘मालानी’ पड़ा।
- चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक तिलवाड़ा में मल्लीनाथ पशु मेला भरता है, जो राजस्थान के सबसे पुराने पशु मेलों में से एक है।
- ये मारवाड़ के प्रतापी रावल राजा और चमत्कारी सिद्ध पुरुष थे। इनके नाम पर ही बाड़मेर के क्षेत्र का नाम ‘मालानी’ पड़ा।
12. तल्लीनाथ जी (गाँगोदेव राठौड़)
- जन्म स्थल: शेरगढ़ (जोधपुर)
- मुख्य मंदिर: पांचौटा गाँव, पंचमुखी पहाड़ी (जालौर)
- गुरु: जलंधरनाथ
- विशेष विवरण:
- इनका वास्तविक नाम गांगदेव राठौड़ था और ये मारवाड़ के शासक राव चूंडा के भाई थे।
- इन्हें जालौर क्षेत्र में ‘ओरण के देवता’ के रूप में पूजा जाता है। जहरीला कीड़ा या साँप काटने पर इनके नाम का डोरा (ताँती) बांधा जाता है।
- इनका वास्तविक नाम गांगदेव राठौड़ था और ये मारवाड़ के शासक राव चूंडा के भाई थे।
13. झुंझार जी
- जन्म स्थल: इमलोहा (सीकर)
- मुख्य मंदिर: शालोदड़ा (सीकर)
- विशेष विवरण:
- इनका जन्म राजपूत परिवार में हुआ था। इन्होंने गाँव की रक्षा और लुटेरों से गायों व महिलाओं को बचाते हुए अपने भाइयों सहित बलिदान दिया था।
- इनके मंदिर (थान) प्रायः खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते हैं, जहाँ दूल्हा-दुल्हन और पाँच वीरों की पत्थर की मूर्तियाँ (स्तंभ) बनी होती हैं। रामनवमी को इनका मुख्य मेला भरता है।
- इनका जन्म राजपूत परिवार में हुआ था। इन्होंने गाँव की रक्षा और लुटेरों से गायों व महिलाओं को बचाते हुए अपने भाइयों सहित बलिदान दिया था।
14. डूंगजी और जवाहरजी (काका-भतीजा)
- जन्म स्थल / क्षेत्र: बाठोद-पटौदा, सीकर (शेखावाटी)
- विशेष विवरण:
- ये शेखावाटी क्षेत्र के प्रसिद्ध राजपूत कछवाहा वंश के वीर थे, जिन्हें ‘राजस्थान के रॉबिनहुड’ के नाम से जाना जाता है।
- ये धनी लोगों और अंग्रेजों की छावनियों (जैसे नसीराबाद छावनी) को लूटकर वह धन गरीब जनता और गायों के रख-रखाव में बांट देते थे। स्वतंत्रता संग्राम में इनका लोक गीतों (छावली) के माध्यम से बड़ा मान है।
15. केसरिया कुंवर जी
- विशेष विवरण:
- ये प्रसिद्ध लोक देवता गोगाजी चौहान के पुत्र थे।
- इनकी पूजा भी सपंदंश निवारक (साँप के काटने का इलाज) देवता के रूप में की जाती है।
- इनके थान (मंदिर) पर सफेद रंग की ध्वजा फहराई जाती है और भोपे सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति का जहर अपने मुंह से चूसकर बाहर निकाल देते हैं।
- ये प्रसिद्ध लोक देवता गोगाजी चौहान के पुत्र थे।
