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बूंदी का हाड़ा चौहान राजवंश

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राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र को ‘हाड़ौती’ कहा जाता है, जिसका नामकरण यहाँ शासन करने वाले ‘हाड़ा चौहानों’ के कारण हुआ था। हाड़ा चौहान मूल रूप से नाडोल (पाली) और जालौर के शाकंभरी चौहानों की ही एक अत्यंत वीर उप-शाखा हैं। बूंदी के शासकों की मूल उपाधि ‘राव’, ‘राव राजा’ और बाद में ‘महाराव राजा’ हुई। इनका राजकीय प्रतीक चिन्ह ‘रंग-बिरंगा मयूर ध्वज’ और ढाल रही है। इनका मूल राजवाक्य है— “शत्रुशाल्य जयति” (अर्थात् राजा शत्रुशाल की हमेशा विजय हो)। बूंदी के हाड़ा शासक स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे। इनकी कुलदेवी आशापुरा माता हैं। बूंदी को राजस्थान में ‘बावड़ियों का शहर’ (City of Stepwells) और ‘छोटी काशी’ भी कहा जाता है।

1. राव देवा (देवांग सिंह) — बूंदी रियासत के प्रतापी संस्थापक (1242 ई. – 1343 ई. तक की कड़ियाँ)

  • इतिहास व स्वतंत्र राज्य की स्थापना:
    • इन्हें संपूर्ण हाड़ौती क्षेत्र में हाड़ा चौहान राजवंश का मूल पुरुष, आदि पुरुष या संस्थापक कहा जाता है।
    • प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर ‘बूंदा भील’ के वंशज मीनाओं का शासन था, जिसके कारण इस भूभाग का नाम ‘बूंदी’ पड़ा था।
    • बूंदी पर अधिकार (1242 ई.): राव देवा ने मीना शासक जेता को एक कूटनीतिक और भीषण युद्ध में पराजित किया और 1242 ईस्वी में ‘बूंदी’ पर अधिकार कर हाड़ा राजवंश की स्वतंत्र नींव रखी।
    • इन्होंने मीनाओं के साथ सांस्कृतिक समन्वय स्थापित करने के लिए प्रारंभ में कड़े प्रशासनिक नियम बनाए और बूंदी को हाड़ौती की पहली और मुख्य राजधानी बनाया।

2. राव बरसिंह हाड़ा — तारागढ़ दुर्ग के निर्माता (1343 ई. – 1384 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • तारागढ़ दुर्ग का निर्माण (1354 ई.): इन्होंने बूंदी की सुरक्षा के लिए अरावली की एक ऊँची तीखी पहाड़ी पर समुद्र तल से 1426 फीट की ऊंचाई पर प्रसिद्ध ‘तारागढ़ दुर्ग’ का निर्माण करवाया। दूर से देखने पर इसकी आकृति टिमटिमाते तारे जैसी लगती है, इसलिए इसे तारागढ़ (स्टार फोर्ट) कहा गया।
    • तिलिस्मी किला: इस किले की गुप्त सुरंगों और रहस्यमयी बनावट के कारण इसे ‘तिलिस्मी किला’ भी कहा जाता है। (इसी किले को देखकर रडयार्ड किपलिंग ने कहा था कि इसका निर्माण भूत-प्रेतों ने किया है)।
    • मिट्टी का तारागढ़: इन्हीं के काल में मेवाड़ के राणा लाखा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक बूंदी का किला नहीं जीतेंगे, अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए उदयपुर में ‘मिट्टी का नकली तारागढ़’ बनाया गया, जिसकी रक्षा करते हुए बूंदी के वीर कुंभा हाड़ा ने नकली मलबे के लिए भी अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया था।

3. राव सुर्जन सिंह हाड़ा — मुगलों से संधि करने वाले प्रथम (1554 ई. – 1585 ई.)

  • इतिहास व प्रथम मुग़ल संधि (1569 ई.):
    • ये बूंदी के इतिहास के अत्यंत कूटनीतिज्ञ और शक्तिशाली राजा थे। प्रारंभ में ये मेवाड़ के महाराणा के अधीन रणथंभौर दुर्ग के किलेदार (गवर्नर) थे।
    • अकबर की अधीनता स्वीकार करना (1569 ई.): मुगल सम्राट अकबर ने जब रणथंभौर दुर्ग को घेरा, तो आमेर के राजा कछवाहा भगवंत दास और मानसिंह प्रथम की मध्यस्थता से सुर्जन सिंह की मुलाकात अकबर से हुई।
    • सुर्जन सिंह ने 1569 ईस्वी में अकबर की अधीनता स्वीकार की। ये हाड़ौती के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने मुगलों से संधि की
    • संधि की विशेष शर्तें: सुर्जन सिंह ने स्वाभिमान दिखाते हुए संधि में कुछ विशेष शर्तें मनवाई थीं, जैसे— 1) हाड़ा राजपूतों को मुगलों के साथ कोई वैवाहिक संबंध (पुत्री का विवाह) बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। 2) हाड़ा शासक मुगल दरबार में उपस्थित होते समय हथियार (तलवार) साथ रख सकेंगे। 3) इन्हें कभी दक्षिण भारत के आत्मघाती अभियानों पर नहीं भेजा जाएगा।
    • अकबर ने इन्हें ‘राव राजा’ की उपाधि दी और ५००० का मनसब देकर बनारस (वाराणसी) और चुनार की जागीर दी। सुर्जन सिंह ने बनारस में रहते हुए कई सुंदर घाटों और मंदिरों का निर्माण करवाया।

4. राव राजा भोज हाड़ा — (1585 ई. – 1607 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये राव सुर्जन सिंह के पुत्र थे। इन्होंने अकबर के समय मुगलों के कई कठिन सैन्य अभियानों (जैसे उड़ीसा और अहमदनगर विजय) में अपनी अदम्य वीरता दिखाई।
    • साहित्यिक प्रसंग: महाकवि चन्द्रशेखर ने इन्हीं के दरबार में रहते हुए प्रसिद्ध ऐतिहासिक महाकाव्य ‘सुर्जन चरित्र’ (Surjan Charitra) की रचना की थी, जिसमें हाड़ा राजाओं के इतिहास का भव्य वर्णन है। इनके काल में बूंदी में चित्रकला का प्रारंभिक विकास हुआ।

5. राव राजा रतन सिंह हाड़ा — कोटा रियासत का विभाजन (1607 ई. – 1631 ई.)

  • उपनाम व विशिष्ट मुग़ल उपाधि:
    • मुगल सम्राट जहांगीर के काल में रतन सिंह मुगलों के सबसे विश्वसनीय हाड़ा सेनापति थे। जब शहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) ने अपने पिता जहांगीर के खिलाफ विद्रोह किया, तो रतन सिंह ने मुगलों की तरफ से लड़कर उस विद्रोह को दबाया।
    • ‘रामराज’ व ‘सरबुलंद राय’: जहांगीर ने इनकी वफादारी से गद्गद होकर इन्हें ‘रामराज’ और ‘सरबुलंद राय’ की सर्वोच्च उपाधियों से नवाजा था।
  • कोटा रियासत का उदय (1631 ई.):
    • रतन सिंह के पुत्र माधोसिंह हाड़ा ने मुगलों की बड़ी सेवा की थी। शाहजहाँ ने राजा बनने के बाद, बूंदी की हाड़ा शक्ति को कमजोर करने और माधोसिंह को पुरस्कृत करने के लिए कूटनीति अपनाई।
    • शाहजहाँ ने 1631 ईस्वी में बूंदी रियासत का विभाजन कर दिया और उसके अंतर्गत आने वाले ‘कोटा’ को एक स्वतंत्र नई हाड़ा रियासत घोषित कर दिया और माधोसिंह को वहाँ का पहला स्वतंत्र राजा बना दिया। यहीं से हाड़ौती के इतिहास में कोटा और बूंदी दो अलग-अलग रियासतें बन गईं।

6. राव राजा शत्रुशाल (छत्रसाल) हाड़ा — सामूगढ़ के युद्ध के अमर शहीद (1631 ई. – 1658 ई.)

  • इतिहास व ऐतिहासिक बलिदान:
    • ये राव राजा रतन सिंह के पौत्र (गोपीनाथ के पुत्र) थे। शाहजहाँ के काल में इन्होंने मुगलों के काबुल, कंधार और मध्य एशिया के अभियानों का सफल नेतृत्व किया।
    • सामूगढ़ का ऐतिहासिक युद्ध (1658 ई.): जब शाहजहाँ के बेटों के बीच दिल्ली के सिंहासन के लिए क्रूर उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ा, तो शत्रुशाल ने शाही सेनापति दारा शिकोह का साथ दिया।
    • जून 1658 में औरंगजेब के खिलाफ लड़े गए ‘सामूगढ़ के युद्ध’ में शत्रुशाल ने राजपूत शौर्य की पराकाष्ठा दिखाई। ये अपने पीले वस्त्र धारण कर, हाथी पर सवार होकर औरंगजेब की तोपों के आगे कूद पड़े और अपने भाइयों व 500 हाड़ा राजपूत वीरों के साथ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनकी वीरता पर आज भी हाड़ौती में लोकगीत गाए जाते हैं। इन्होंने बूंदी में ‘रंगमहल’ की नींव रखी थी।

7. राव राजा भाव सिंह हाड़ा — कला व साहित्य का विकास (1658 ई. – 1681 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • औरंगजेब ने राजा बनने के बाद भाव सिंह की वीरता को देखते हुए इन्हें क्षमा किया और बूंदी का राजा स्वीकार किया। इन्हें दक्षिण भारत में औरंगाबाद का गवर्नर बनाया गया।
    • साहित्य का स्वर्णिम काल: भाव सिंह स्वयं साहित्य के बड़े अनुरागी थे। हिंदी के प्रकांड रीतिकाल के महान कवि महाकवि मतिराम (Matiram) इन्हीं के दरबारी कवि थे। मतिराम ने भाव सिंह के सम्मान में प्रसिद्ध छंद ग्रंथ ‘ललित ललाम’ (Lalit Lalam) और ‘छंदसार’ की रचना बूंदी दरबार में ही की थी। इनके काल को बूंदी चित्रशैली का एक अत्यंत समृद्ध काल माना जाता है।

8. राव राजा अनिरुद्ध सिंह हाड़ा — चौरासी खंभों की छतरी (1681 ई. – 1695 ई.)

  • इतिहास व स्थापत्य का मुख्य केंद्र:
    • इन्होंने औरंगजेब के समय दक्षिण भारत के अभियानों और विशेषकर थट्टा (सिंध) के विद्रोह को दबाने में मुगलों की बड़ी सहायता की।
    • चौरासी (84) खंभों की प्रसिद्ध छतरी: अनिरुद्ध सिंह के भाई ‘देवा’ ने राजा के परम वफादार और पूजनीय धाभाई (धाय भाई) की स्मृति में देवपुरा गांव (बूंदी) के पास 84 खंभों की एक अत्यंत भव्य तीन-मंजिला छतरी का निर्माण करवाया। यह छतरी आज पूरी दुनिया में बूंदी के पर्यटन का मुख्य चेहरा है, जिसकी दीवारों पर पशु-पक्षियों और कामसूत्र के बारीक चित्र उकेरे गए हैं।
    • रानी जी की बावड़ी (1699 ई.): अनिरुद्ध सिंह की छोटी रानी ‘नाथावती’ ने बूंदी में पत्थरों को काटकर स्थापत्य कला की सबसे सुंदर और गहरी सीढ़ीदार बावड़ी ‘रानी जी की बावड़ी’ का निर्माण करवाया, जिसे ‘बावड़ियों का सिरमौर’ कहा जाता है।

9. राव राजा बुद्ध सिंह हाड़ा — मेवाड़-मारवाड़ कूटनीति (1695 ई. – 1739 ई.)

  • इतिहास व बूंदी में मराठों का प्रथम आगमन:
    • मुग़ल सम्राट बहादुर शाह प्रथम ने इनकी वीरता से प्रसन्न होकर इन्हें ‘राव राजा’ की पक्की उपाधि दी। बुद्ध सिंह स्वयं उच्च कोटि के विद्वान थे, इन्होंने ‘नेह तरंग’ (Neh Tarang) नामक सुप्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी।
    • राजस्थान में मराठों का प्रथम प्रवेश (1734 ई.): बुद्ध सिंह का विवाह जयपुर के सवाई जयसिंह की बहन अमरकुंवर से हुआ था। सवाई जयसिंह ने कूटनीति से बुद्ध सिंह को हटाकर दलेल सिंह को बूंदी का राजा बना दिया।
    • इस अपमान का बदला लेने के लिए बुद्ध सिंह की रानी अमरकुंवर ने कूटनीति अपनाई। उन्होंने दक्षिण भारत के मराठा पेशवा मल्हारराव होल्कर को राखी भेजी और वित्तीय सहायता का लालच दिया। 22 अप्रैल 1734 ई. को मराठों ने पहली बार राजस्थान की धरती पर (बूंदी रियासत में) प्रवेश किया और दलेल सिंह को हराकर बुद्ध सिंह के पुत्र उम्मेद सिंह को राजा बनाया। यह घटना पूरे राजस्थान के इतिहास को बदलने वाली साबित हुई क्योंकि इसके बाद मराठों ने पूरे राजपूताना को लूटना शुरू कर दिया।

10. राव राजा उम्मेद सिंह हाड़ा — चित्रकला का चरमोत्कर्ष (1739 ई. – 1770 ई.)

  • उपनाम व ‘चित्रशाला’ का अद्भुत स्थापत्य:
    • इन्हें बूंदी के इतिहास का सबसे लोकप्रिय और कला-प्रेमी शासक माना जाता है। इन्होंने मराठों और जयपुर के खिलाफ लंबा संघर्ष कर अपनी पैतृक गद्दी हासिल की थी।
    • ‘चित्रशाला’ (उम्मेद महल) का निर्माण: इन्होंने तारागढ़ दुर्ग के भीतर विश्व प्रसिद्ध ‘चित्रशाला’ का निर्माण करवाया, जिसे आज पूरी दुनिया में “भित्ति चित्रों का स्वर्ग” (Paradise of Wall Paintings) कहा जाता है। इसकी दीवारों पर उकेरे गए हरे और नीले रंगों के चित्र (जैसे— भगवान कृष्ण की रासलीला, बादलों की गड़गड़ाहट और शिकार के दृश्य) इतने जीवंत हैं कि वे दुनिया भर के इतिहासकारों को आकर्षित करते हैं।
    • सन्यासी राजा: उम्मेद सिंह जीवन के अंतिम दिनों में राजपाठ अपने पुत्र को सौंपकर स्वयं सन्यासी (साधु) बन गए और ‘श्रीजी’ उपनाम से धार्मिक भजन लिखने लगे। सन 1770 ई. में इनका निधन हुआ।

11. राव राजा बिशन सिंह हाड़ा — अंग्रेजों से सहायक संधि (1773 ई. – 1821 ई.)

  • इतिहास व ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि:
    • इनके शासनकाल में बूंदी रियासत मराठों और पिंडारियों की लगातार लूटपाट और भारी ‘चौथ कर’ (टैक्स) से पूरी तरह खोखली और कंगाल हो चुकी थी। राज्य की रक्षा के लिए बिशन सिंह ने अंग्रेजों की शरण ली।
    • अंग्रेजों से सहायक संधि (10 फरवरी 1818): मराठों के दमन से तंग आकर राव राजा बिशन सिंह ने 10 फरवरी 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इस संधि के तहत अंग्रेजों ने बूंदी को मराठों के चंगुल से मुक्त करवाया और सुरक्षा की गारंटी दी, जिसके बदले बूंदी ने अंग्रेजों की सर्वोच्च सत्ता स्वीकार कर ली। इन्हें वन्यजीवों और खासकर चीतों (Cheetahs) के शिकार का अत्यधिक शौक था।

12. महाराव राजा राम सिंह हाड़ा — 1857 की क्रांति के विद्रोही राजा (1821 ई. – 1889 ई.)

  • 1857 की क्रांति में गुप्त विद्रोह व महाकवि सूर्यमल्ल मीसण:
    • 1857 की क्रांति में विशिष्ट योगदान: राम सिंह द्वितीय 1857 की क्रांति के समय बूंदी के शासक थे। कूटनीतिक रूप से ये संपूर्ण राजपूताना के एकमात्र ऐसे राजा थे जिन्होंने अंग्रेजों का साथ न देकर, पर्दे के पीछे से गुप्त रूप से क्रांतिकारियों का समर्थन किया था
    • इन्होंने नीमच से भागे अंग्रेज़ परिवारों को अपने यहाँ शरण देने से मना कर दिया था और कोटा के विद्रोही सैनिकों के लिए अपने राज्य के दरवाजे खोल दिए थे। इस गुप्त बगावत से अंग्रेज़ इनसे भयंकर चिढ़ गए थे और क्रांति के बाद अंग्रेज़ सरकार ने इनके सम्मान में दी जाने वाली तोपों की सलामी की संख्या घटा दी थी और इनसे बातचीत बंद कर दी थी।
  • महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (वीर सतसई):
    • राम सिंह के दरबारी कवि भारत प्रसिद्ध महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (सूर्यमल्ल मिश्रण) थे, जिन्हें राजस्थान का ‘राज्य कवि’ कहा जाता है। उन्होंने बूंदी दरबार में रहते हुए राजस्थान का सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ ‘वंश भास्कर’ (Vansh Bhaskar) और ‘वीर सतसई’ की रचना की थी।
    • वीर सतसई के दोहों ने 1857 की क्रांति में राजपूतों के भीतर राष्ट्रवाद की ऐसी प्रचंड ज्वाला सुलगवाई थी कि लोग अंग्रेजों के खिलाफ मरने-कटने के लिए तैयार हो गए थे (उनका प्रसिद्ध दोहा: “इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥” आज भी गूँजता है)। राम सिंह ने बूंदी में सामाजिक सुधार करते हुए सती प्रथा और कन्या वध पर कानूनी रोक लगाई थी।

13. महाराव राजा रघुवीर सिंह हाड़ा — (1889 ई. – 1927 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व आधुनिक सुधार:
    • इनके शासनकाल में बूंदी में आधुनिक न्याय प्रणाली और प्रशासनिक सुधार तेजी से हुए। इनके काल में ही विक्रम संवत 1956 (सन 1899-1900) में भयंकर ‘छप्पनिया अकाल’ पड़ा था।
    • रघुवीर सिंह ने अपनी प्रजा को भुखमरी से बचाने के लिए पूरे शाही अनाज के गोदाम आम जनता के लिए मुफ्त में खोल दिए थे और अकाल राहत कार्यों की अद्भुत मिसाल पेश की थी। अंग्रेज़ों ने इनके परोपकारी कार्यों को देखते हुए इन्हें ‘केसर-ए-हिंद’ और ‘K.C.I.E.’ की उपाधियाँ दी थीं। इन्होंने बूंदी में ‘रघुवीर प्रिटिंग प्रेस’ और आधुनिक स्कूलों की स्थापना की थी।

14. महाराव राजा बहादुर सिंह हाड़ा — अंतिम शासक व राजस्थान संघ का गठन (1927 ई. – 1948 ई. / विलय तक)

  • पोलो के खिलाड़ी, प्रजामंडल आंदोलन व एकीकरण:
    • यह बूंदी रियासत के अंतिम आधिकारिक शासक थे। ये एक प्रबुद्ध और आधुनिक विचारों के राजा थे और विश्व प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इन्होंने ब्रिटिश सेना की ओर से अग्रिम मोर्चे पर भाग लिया था, जिसके लिए इन्हें ‘मिलिट्री क्रॉस’ (Military Cross) मिला था।
    • इनके काल में ‘बूंदी प्रजामंडल’ (कांतिलाल के नेतृत्व में) ने उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन तेज किया, जिसका महाराजा ने बुद्धिमत्ता से सामना किया और प्रशासनिक सुधार किए।
  • राजस्थान संघ का गठन (25 मार्च 1948):
    • भारत की आजादी के समय बहादुर सिंह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपनी रियासत का विलय भारत संघ में करने का त्वरित फैसला लिया।
    • राजस्थान के एकीकरण के द्वितीय चरण के तहत 25 मार्च 1948 को हाड़ौती और वागड़ की 9 छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर ‘राजस्थान संघ’ (Rajasthan Sangh) का ऐतिहासिक गठन किया गया।
    • कूटनीतिक रूप से बूंदी के महाराजा बहादुर सिंह को इस नवगठित राजस्थान संघ का ‘उप-राजप्रमुख’ (Vice-Governor) नियुक्त किया गया (कोटा के भीमसिंह को राजप्रमुख बनाया गया था)। बाद में, 30 मार्च 1949 को ‘बृहत् राजस्थान’ के गठन के समय बूंदी पूर्ण रूप से आधुनिक राजस्थान का एक स्थाई और अभिन्न जिला बन गया।

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