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राजस्थान के प्रमुख लोक गीत

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राजस्थान के प्रमुख लोक गीत : Quick Revision Notes

लोक गीतक्षेत्र/अवसरगीत का भाव एवं विशेष विवरण
बिछूडोहाड़ौती (कोटा, बूंदी)इस गीत में एक स्त्री, जिसे बिच्छू ने काट लिया है, मरने से पहले अपने पति को दूसरा विवाह करने का संदेश देती है।
झोरावाजैसलमेरयह एक प्रसिद्ध विरह गीत है। प्रदेश गए पति की याद में जैसलमेर क्षेत्र की स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं।
चिरमीशेखावाटीससुराल में रह रही नवविवाहिता अपने पीहर (पिता व भाई) की याद में ‘चिरमी’ के पौधे को संबोधित कर यह गीत गाती है।
कुरजांमारवाड़कुरजां एक पक्षी है। पत्नी इस पक्षी के माध्यम से अपने परदेसी पति को संदेश भेजती है।
सूवटियामेवाड़मेवाड़ क्षेत्र की भील महिलाएँ अपने पति की याद में तोते (सूवटिया) के माध्यम से संदेश भेजती हैं।
हिचकीमेवात (अलवर, भरतपुर)ऐसी मान्यता है कि जब कोई अपना याद करता है तो हिचकी आती है। यह अपनों की याद में गाया जाने वाला गीत है।
सीठणेविवाह के अवसर परइन्हें ‘गाली गीत’ भी कहा जाता है। विवाह के समय समधी-समधन या बारातियों को हंसी-मजाक में सुनाए जाते हैं।
हरजसशेखावाटी/मारवाड़यह एक भक्ति गीत है। किसी वृद्ध की मृत्यु के अवसर पर भगवान के भजन के रूप में गाया जाता है।
मरसियामारवाड़ (विशेष व्यक्ति)किसी प्रभावशाली या प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर उसके गुणों का बखान करते हुए शोक प्रकट करने हेतु गाया जाता है।
पावणाविवाह/आगमनदामाद के पहली बार ससुराल आने पर या भोजन के समय ससुराल की महिलाओं द्वारा गाया जाता है।
कामनविवाह के अवसर परदूल्हे को बुरी नजर और जादू-टोने से बचाने के लिए यह मांगलिक गीत गाया जाता है।
गोरबंदमारवाड़/शेखावाटीगोरबंद ऊँट के गले का आभूषण होता है। इस गीत में ऊँट के श्रृंगार का वर्णन किया जाता है।
मूमलजैसलमेरलोद्रवा की राजकुमारी ‘मूमल’ और अमरकोट के राजकुमार ‘महेन्द्र’ की प्रेम कहानी पर आधारित ऐतिहासिक गीत है।
जीरा गीतजालौरइस गीत में पत्नी अपने पति से जीरे की बुवाई न करने की विनती करती है क्योंकि इसमें मेहनत ज्यादा और जोखिम अधिक होता है।
पंछीड़ामेवाड़/हाड़ौतीकिसानों द्वारा खेतों में काम करते समय और मेलों के अवसर पर गाया जाने वाला उत्साहवर्धक गीत है।
हमसीठोमेवाड़यह मेवाड़ क्षेत्र की भील जनजाति का प्रसिद्ध युगल (स्त्री-पुरुष) गीत है।
लांगुरियाकरौलीयह भक्ति गीत केला देवी के मेले में भक्तों (हनुमान जी के स्वरूप लांगुरिया) द्वारा गाया जाता है।
रसियाभरतपुर/धौलपुरब्रज क्षेत्र का प्रसिद्ध गीत जो होली के अवसर पर बम (नगाड़ा) वाद्य यंत्र के साथ गाया जाता है।
बधावा/ओल्यूंपुत्री की विदाईओल्यूं’ का अर्थ है ‘याद’। यह बेटी की विदाई के समय सहेलियों और परिवार द्वारा गाया जाने वाला कारुणिक गीत है।

राजस्थान के प्रमुख लोक गीत : In Details

1. बिछूडो

  • क्षेत्र/अंचल: हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़)।
  • अवसर व भाव: विरह और हास्य-भाव का अनूठा मिश्रण।
  • विस्तृत विवरण: इस गीत की कहानी बहुत भावुक और रोचक है। ग्रामीण परिवेश में एक पत्नी को बिच्छू काट लेता है और उसे लगता है कि अब वह नहीं बचेगी। मरते समय वह अपने पति को दुख से बचाने के लिए एक गीत गाती है, जिसमें वह अपने पति से कहती है कि मेरे मरने के बाद आप दूसरा विवाह (dusra vivah) कर लेना। हाड़ौती अंचल में महिलाओं द्वारा यह गीत बड़े चाव से गाया जाता है।

2. झोरावा

  • क्षेत्र/अंचल: जैसलमेर और मरुस्थलीय भाग।
  • अवसर व भाव: पूर्ण रूप से एक विरह गीत (Song of Separation)।
  • विस्तृत विवरण: थार के मरुस्थल में जब किसी महिला का पति आजीविका कमाने (काम के सिलसिले में) परदेश या दूर देश चला जाता है, तो पत्नी उसकी याद में तड़पते हुए ‘झोरावा’ गीत गाती है। इस गीत के माध्यम से वह अपने दिल का हाल और सूनापन बयां करती है।

3. चिरमी

  • क्षेत्र/अंचल: शेखावाटी और मालवा से सटे क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: नवविवाहिता का अपने पीहर (मायके) के प्रति स्नेह।
  • विस्तृत विवरण: विवाह के बाद जब एक लड़की पहली बार अपने ससुराल जाती है, तो उसे अपने माता-पिता और भाई की बहुत याद आती है। वह ससुराल के आंगन में लगी ‘चिरमी’ के पौधे को संबोधित करते हुए अपने भाई और पिता के आने का इंतजार करती है। यह गीत राजस्थान के पारिवारिक संस्कारों और भाई-बहन के पवित्र प्रेम को दर्शाता है।

4. कुरजां

  • क्षेत्र/अंचल: मारवाड़ (जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर क्षेत्र)।
  • अवसर व भाव: विरहणी द्वारा संदेश भेजने का गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘कुरजां’ वास्तव में एक प्रवासी पक्षी (Migratory Bird – Demoiselle Crane) है जो सर्दियों में मारवाड़ के खीचन गाँव में आता है। राजस्थानी लोक संस्कृति में विरहणी महिला इस पक्षी को अपना डाकिया/संदेसा वाहक मानती है। वह कुरजां पक्षी से मिन्नतें करती है कि वह उड़कर जाए और परदेश बैठे उसके पति को उसका प्रेम संदेश दे आए।

5. सूवटिया

  • क्षेत्र/अंचल: मेवाड़ का पर्वतीय क्षेत्र (भील जनजाति बाहुल्य)।
  • अवसर व भाव: भील महिला का विरह गीत।
  • विस्तृत विवरण: मेवाड़ की पहाड़ियों में रहने वाली भील जाति की महिलाएं इस गीत को गाती हैं। ‘सूवटिया’ शब्द का अर्थ ‘तोता’ (Parrot) होता है। जब भील पुरुष कमाने के लिए पहाड़ों से बाहर मैदानी इलाकों या मालवा जाता है, तो उसकी पत्नी तोते के माध्यम से अपने पति तक संदेश पहुंचाती है। यह गीत भील संस्कृति का मुख्य हिस्सा है।

6. हिचकी

  • क्षेत्र/अंचल: मेवात क्षेत्र (अलवर, भरतपुर)।
  • अवसर व भाव: किसी प्रियजन द्वारा याद किए जाने का अहसास।
  • विस्तृत विवरण: हमारे समाज में यह पुरानी मान्यता है कि जब हमें कोई दिल से याद करता है, तो हिचकी आती है। मेवात क्षेत्र में महिलाएं अपने पति या किसी बेहद खास प्रियजन की याद आने पर इस लोक गीत को बेहद सुरीली धुन में गाती हैं। यह काफी प्रसिद्ध और छोटा लोकगीत है।

7. सीठणे

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले ‘गाली गीत’ (Joking Songs)।
  • विस्तृत विवरण: यह राजस्थान का एक बहुत ही मजेदार और जीवंत लोक गीत है। शादी के समय जब बारात आती है और दूल्हा व बाराती भोजन (खाना) करने बैठते हैं, तब वधू (दुल्हन) पक्ष की महिलाएं सुरीली आवाज में वर पक्ष को चिढ़ाने और मजाक उड़ाने के लिए ये गीत गाती हैं। इनमें कोई कड़वाहट नहीं होती, बल्कि यह शुद्ध मनोरंजन और प्यार भरा मजाक होता है।

8. हरजस

  • क्षेत्र/अंचल: शेखावाटी, मारवाड़ और ग्रामीण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: भक्ति रस से सराबोर (Bhajan)।
  • विस्तृत विवरण: ‘हरजस’ का संधि विच्छेद करें तो इसका अर्थ होता है ‘हरि का जस’ यानी भगवान की कीर्ति। यह मुख्य रूप से सगुण भक्ति के लोकगीत हैं, जिनमें भगवान राम और कृष्ण की बाल लीलाओं और महिमा का वर्णन होता है। बुजुर्ग महिलाओं द्वारा किसी धार्मिक अनुष्ठान या वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी इसे गाने की परंपरा है।

9. मरसिया

  • क्षेत्र/अंचल: मारवाड़ अंचल।
  • अवसर व भाव: शोक गीत (Funeral Song/Elegy)।
  • विस्तृत विवरण: मारवाड़ में जब किसी विशेष, प्रभावशाली या सम्मानीय व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी वीरता, दयालुता और गुणों का बखान करते हुए जो रोने वाले गीत गाए जाते हैं, उन्हें ‘मरसिया’ कहा जाता है। यह गीत समाज में उस व्यक्ति के योगदान को याद करने के लिए गाया जाता है।

10. पावणा

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: दामाद के ससुराल आगमन पर।
  • विस्तृत विवरण: राजस्थानी भाषा में दामाद (Son-in-law) को ‘पावणा’ कहा जाता है। शादी के बाद जब नया-नया दामाद पहली बार या किसी विशेष अवसर पर अपने ससुराल आता है, तो भोजन कराते समय घर की महिलाएं उनका स्वागत और सत्कार करने के लिए ‘पावणा गीत’ गाती हैं।

11. कामन

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: विवाह के अवसर पर दूल्हे को नजर से बचाना।
  • विस्तृत विवरण: ‘कामन’ का अर्थ होता है जादू-टोना या वशीकरण। ऐसी लोक मान्यता है कि शादी के दिन दूल्हा बेहद सुंदर लगता है और उसे किसी की बुरी नजर (evil eye) लग सकती है। इसलिए, दूल्हे को टोने-टोटके और बुरी नजर से सुरक्षित रखने के लिए महिलाएं ‘कामन गीत’ गाती हैं।

12. गोरबंद

  • क्षेत्र/अंचल: मारवाड़ और शेखावाटी का रेगिस्तानी क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: ऊंट के श्रृंगार का गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘गोरबंद’ असल में ऊंट के गले का एक बहुत ही सुंदर, कांच और कौड़ियों से बना आभूषण (Necklace of Camel) होता है। रेगिस्तान के लोग अपने ऊंट को अपनी संतान जैसा प्यार करते हैं। ऊंट का यह श्रृंगार तैयार करते समय महिलाएं कताई और बुनाई के साथ-साथ इस प्रसिद्ध गीत को गाती हैं—“म्हारो गोरबंद नखरालो…”

13. मूमल

  • क्षेत्र/अंचल: जैसलमेर (लोद्रवा)।
  • अवसर व भाव: श्रृंगारिक लोक गीत (Romantic/Beauty Song)।
  • विस्तृत विवरण: यह गीत लोद्रवा (जैसलमेर) की राजकुमारी ‘मूमल’ और अमरकोट के राजकुमार ‘महेन्द्र’ की अमर और ऐतिहासिक प्रेम कहानी पर आधारित है। इस गीत में मूमल के नखशिख (सिर के बालों से लेकर पैर के अंगूठे तक) के सौंदर्य का बेहद सजीव वर्णन किया गया है। जैसलमेर के मांड गायकों द्वारा इसे विशेष रूप से गाया जाता है।

14. जीरा गीत

  • क्षेत्र/अंचल: जालौर और पश्चिमी राजस्थान।
  • अवसर व भाव: पत्नी द्वारा पति को सलाह।
  • विस्तृत विवरण: जीरा (Cumin) एक ऐसी फसल है जिसमें मेहनत बहुत लगती है और मौसम खराब होने पर नुकसान का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इसलिए, ग्रामीण महिलाएं अपने पति से मिन्नत करती हैं कि वे खेत में जीरे की बुआई न करें क्योंकि यह फसल खुशियों से ज्यादा टेंशन देती है। इसके बोल बड़े प्यारे हैं—“मत बाओ म्हारा परण्या जीरा…”

15. पंछीड़ा

  • क्षेत्र/अंचल: मेवाड़ और हाड़ौती क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: मेलों और त्योहारों के अवसर पर।
  • विस्तृत विवरण: ‘पंछीड़ा’ का अर्थ होता है पक्षी। यह किसानों और ग्रामीणों का एक सामूहिक लोक गीत है जो अलघोजा, ढोलक और मंजीरों के साथ मेलों के दौरान गाया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय माणिक्य लाल वर्मा जी ने भी किसानों में जोश भरने के लिए ‘पंछीड़ा’ नाम से एक क्रांतिकारी गीत लिखा था।

16. हमसीठो

  • क्षेत्र/अंचल: मेवाड़ का पर्वतीय क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: भील जनजाति का युगल गीत (Duet Song)।
  • विस्तृत विवरण: यह राजस्थान का एक अनोखा लोक गीत है जिसे भील स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर सामूहिक रूप से एक साथ (युगल रूप में) गाते हैं। यह पहाड़ों में काम करते समय या किसी मांगलिक उत्सव के दौरान भील संस्कृति के आपसी तालमेल को दिखाता है।

17. लांगुरिया

  • क्षेत्र/अंचल: करौली और डांग क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: कैला देवी की आराधना में भक्ति गीत।
  • विस्तृत विवरण: यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक नृत्य-गीत है। करौली में त्रिकूट पर्वत पर स्थित कैला देवी के मंदिर में भक्तों द्वारा हनुमान जी के स्वरूप ‘लांगुरिया’ को संबोधित करके यह गीत गाया जाता है। इसमें भक्ति के साथ-साथ एक अद्भुत उमंग और मस्ती होती है।

18. रसिया

  • क्षेत्र/अंचल: ब्रज क्षेत्र (भरतपुर, धौलपुर)।
  • अवसर व भाव: होली और वसंत के उत्सव पर।
  • विस्तृत विवरण: भरतपुर और धौलपुर उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र से सटे हुए हैं, इसलिए यहाँ भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम पर आधारित ‘रसिया’ गीत गाए जाते हैं। होली के दिनों में ‘बम’ नामक बड़े नगाड़े को बजाते हुए रसिया गीत गाने की परंपरा है, जिसे ‘बम रसिया’ भी कहा जाता है।

19. बधावा / ओल्यूं

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: शुभ कार्य संपन्न होने पर (बधावा) और पुत्री की विदाई पर (ओल्यूं)।
  • विस्तृत विवरण:
    • बधावा: जब घर में कोई भी शुभ काम (जैसे बेटा होना, शादी होना या गृह प्रवेश) अच्छे से पूरा हो जाता है, तो भगवान को धन्यवाद देने के लिए खुशियों का गीत ‘बधावा’ गाया जाता है।
    • ओल्यूं: ‘ओल्यूं’ शब्द का राजस्थानी में मतलब होता है ‘याद आना’। शादी के बाद जब बेटी की विदाई (Farewell) हो रही होती है, तो पूरा माहौल गमगीन हो जाता है। उस समय मां, बहनें और सहेलियां रोते हुए बेटी को विदा करने के लिए ‘ओल्यूं गीत’ गाती हैं।

21. पीपली गीत

  • क्षेत्र/अंचल: मारवाड़, शेखावाटी और बीकानेर अंचल।
  • अवसर व भाव: वर्षा ऋतु के समय गाया जाने वाला विरह गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘पीपली’ वास्तव में एक पेड़ का नाम है। रेगिस्तानी इलाकों में जब सावन के महीने में बारिश होती है और चारों तरफ हरियाली छाने लगती है, तब नवविवाहिताओं को अपने परदेश गए पति की याद सताने लगती है। वे पीपली के पेड़ के नीचे बैठकर तीज के त्योहार के आसपास इस अत्यंत सुरीले और दर्दभरे गीत को सामूहिक रूप से गाती हैं।

22. कांगसियो

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान (विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र)।
  • अवसर व भाव: श्रृंगार और महिला के दैनिक जीवन से जुड़ा गीत।
  • विस्तृत विवरण: राजस्थानी भाषा में ‘कांगसियो’ का अर्थ ‘कंघा’ (Comb) होता है। यह राजस्थान का एक बहुत ही लोकप्रिय और मधुर श्रृंगारिक लोक गीत है। इस गीत के माध्यम से एक नवविवाहिता अपने बालों को संवारने, अपने रूप-सौंदर्य और अपने पति के प्रति अपने गहरे प्रेम व आदर की भावनाओं को व्यक्त करती है।

23. काछबा गीत

  • क्षेत्र/अंचल: पश्चिमी राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: विरहणी प्रेमिका द्वारा अपने प्रेमी को संबोधित गीत।
  • विस्तृत विवरण: इस अनोखे लोक गीत में ‘काछबा’ (कछुआ) को एक प्रतीक माना गया है। विरह की अग्नि में तड़प रही प्रेमिका या पत्नी, काछबे को संबोधित करते हुए अपने दिल की तड़प बयां करती है। वह इसके माध्यम से अपने प्रियतम के आने की राह देखती है और उसे जल्द से जल्द अपने पास लौटने की गुहार लगाती है।

24. पणिहारी

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: राजस्थानी महिला के पतिव्रता धर्म और सतीत्व को दर्शाने वाला गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘पणिहारी’ उस महिला को कहते हैं जो कुएं या पनघट से पानी भरकर लाती है। इस बेहद प्रसिद्ध लोक गीत में एक बहुत सुंदर कहानी है। जब एक पणिहारी कुएं पर पानी भर रही होती है, तो एक अनजान राहगीर (जो असल में उसका पति ही होता है, लेकिन वह पहचान नहीं पाती) उसे देखकर उसके रूप की तारीफ करता है और उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता है। लेकिन पणिहारी पूरी निष्ठा से उसे मना कर देती है और अपने पति के प्रति वफादारी दिखाती है। यह गीत राजस्थान की नारी के उच्च चरित्र को सलाम करता है।

25. जच्चा और जळावण

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: पुत्र/संतान के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला मांगलिक गीत।
  • विस्तृत विवरण: जब घर में किसी बच्चे (विशेषकर पुत्र) का जन्म होता है, तो प्रसूता महिला (जिसने बच्चे को जन्म दिया है, उसे ‘जच्चा’ या ‘बचापा’ कहा जाता है) की खुशी और उसके स्वास्थ्य की कामना के लिए घर की अन्य महिलाएं इस गीत को गाती हैं। इसमें बच्चे के जन्म की खुशियां, ननद-भाभी के मजाक और लोक-रीति रिवाजों का सुंदर वर्णन होता है।

26. डूंघर

  • क्षेत्र/अंचल: मेवाड़ और वागड़ (डूंगरपुर, बांसवाड़ा) का पर्वतीय क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: विवाह के समय दूल्हे की कमियों या आदतों पर मजाक उड़ाने का गीत।
  • विस्तृत विवरण: यह एक प्रकार का मजाकिया गीत (Satirical/Joking Song) है जो वधू पक्ष की सहेलियों और महिलाओं द्वारा गाया जाता है। इसमें दूल्हे के हाव-भाव, उसकी कद-काठी या उसकी बारात की व्यवस्थाओं पर मीठी-मीठी चुटकियां ली जाती हैं, जिससे शादी के माहौल में हंसी-मजाक का रंग घुल जाता है।

27. झूंझरी

  • क्षेत्र/अंचल: ग्रामीण राजस्थान (विशेषकर कृषक समाज)।
  • अवसर व भाव: खेत में काम करते समय या अनाज पीसते समय गाया जाने वाला श्रम गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘झूंझरी’ गीत ग्रामीण महिलाओं द्वारा तब गाया जाता है जब वे घर के दैनिक काम (जैसे चक्की से अनाज पीसना या दही मथना) कर रही होती हैं। इस गीत में खोए हुए गहने, विशेष रूप से ‘झूंझरी’ (पायल या पाजेब का एक हिस्सा) के गुम हो जाने और उसे ढूंढने का बड़ा ही सजीव और प्यारा जिक्र मिलता है।

28. केसरिया बालम

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान (अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजस्थान की पहचान)।
  • अवसर व भाव: मांड गायकी शैली में गाया जाने वाला प्रसिद्ध स्वागत गीत।
  • विस्तृत विवरण: यह केवल एक लोकगीत नहीं, बल्कि राजस्थान का आधिकारिक राज्य गीत (State Song) है। इस गीत के माध्यम से परदेश से लौटे पति या किसी सम्मानीय अतिथि (Guest) का स्वागत किया जाता है। इसके बोल—“केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस…” पूरी दुनिया में राजस्थानी संस्कृति, मेहमाननवाजी (Hospitality) और पर्यटकों को आकर्षित करने का सबसे बड़ा प्रतीक हैं। इसे अल्लाजिल्लाबाई ने मांड गायकी में अमर कर दिया था।

29. सूवना / सुवना गीत

  • क्षेत्र/अंचल: मारवाड़ और शेखावाटी क्षेत्र।
  • अवसर व भाव: तोते को माध्यम बनाकर गाया जाने वाला विरह गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘सूवना’ का अर्थ ‘तोता’ होता है। घर के पिंजरे या पेड़ पर बैठे तोते को सहलाते हुए और उसे संबोधित करते हुए विरहणी नायिका अपने दिल का हाल सुनाती है। वह तोते से कहती है कि वह उड़कर जाए और उसके प्रियतम को यह संदेश दे कि उसकी याद में यहाँ कोई पल-पल तड़प रहा है।

30. लावणी गीत

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान (विशेषकर पूर्वी भाग)।
  • अवसर व भाव: नायक द्वारा नायिका को बुलाने या अपनी ओर आकर्षित करने का श्रृंगार गीत।
  • विस्तृत विवरण: ‘लावणी’ शब्द का अर्थ होता है ‘बुलाना’ या ‘आमंत्रण देना’। इस गीत में नायक (प्रेमी) अपनी प्रेमिका (नायिका) के रूप और लावण्य की तारीफ करता है और उसे उपवन या किसी एकांत स्थान पर मिलने के लिए आमंत्रित करता है। इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है।

31. इंडोणी / हिंडोल्या गीत

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: कुएं से पानी लाते समय या सावन के महीने में झूला झूलते समय।
  • विस्तृत विवरण:
    • इंडोणी: पानी का घड़ा सिर पर रखने के लिए कपड़े या मूंज से बनाई जाने वाली गद्दी को ‘इंडोणी’ कहते हैं। इंडोणी के खो जाने या उसके सुंदर श्रृंगार (कांच, मोतियों) की तारीफ में महिलाएं पानी भरते समय यह गीत गाती हैं।
    • हिंडोल्या: सावन के महीने में जब बहन-बेटियां पेड़ों पर झूला (हिंडोला) डालती हैं, तो उस उमंग और मस्ती के माहौल में ‘हिंडोल्या गीत’ गाया जाता है।

32. जळौ गीत / जला-जलाल

  • क्षेत्र/अंचल: संपूर्ण राजस्थान।
  • अवसर व भाव: बारात का डेरा देखने जाते समय वधू पक्ष की महिलाओं द्वारा।
  • विस्तृत विवरण: जब बारात लड़की के गाँव पहुंचती है और जहाँ बारात को ठहराया जाता है (जिसे ‘जनवासा’ या ‘डेरा’ कहते हैं), तब वधू पक्ष की माता, चाची, ताई और सहेलियां उत्सुकतावश दूल्हे और बारात की रौनक देखने जाती हैं। उस समय रास्ते में गाए जाने वाले गीत को ‘जळौ या जलाल गीत’ कहा जाता है।

राजस्थान की प्रमुख लोक गायन शैलियां: इतिहास, विशेषताएं एवं प्रमुख कलाकार

1. माण्ड गायन शैली

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
    • प्राचीन काल (विशेषकर 10वीं और 11वीं शताब्दी) में राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र को ‘माण्ड देश’ या ‘माण्ड क्षेत्र’ कहा जाता था। इसी क्षेत्र में विकसित होने के कारण इस विशेष गायन कला का नाम ‘माण्ड गायन शैली’ पड़ा।
    • यह मूल रूप से एक शृंगार प्रधान गायन शैली है, जिसमें प्रेम, विरह और प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य का वर्णन मिलता है। समय के साथ यह शैली राजदरबारों के संरक्षण में फली-फूली और शास्त्रीय संगीत के करीब पहुंची।
  • विशेष तथ्य: राजस्थान का सुप्रसिद्ध राज्य गीत ‘केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस’ इसी माण्ड शैली में गाया जाता है।

माण्ड गायन शैली की प्रमुख गायिकाएं (Famous Female Artists)

माण्ड शैली को देश-विदेश में पहचान दिलाने में राजस्थान की इन दिग्गज महिला कलाकारों का अमूल्य योगदान रहा है:

  • अल्ला-जिल्ला बाई (बीकानेर):
    • इन्हें ‘मरु कोकिला’ के नाम से जाना जाता है। इन्होंने ‘केसरिया बालम’ गीत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अमर कर दिया। बीकानेर महाराजा गंगासिंह के दरबार में इन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त था। इन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है।
  • गवरी देवी (पाली):
    • यह भैरवी युक्त माण्ड गायकी के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। इनकी आवाज में एक अलग ही ठहराव और गंभीर सौंदर्य देखने को मिलता है।
  • गवरी देवी (बीकानेर):
    • बीकानेर की यह मूल निवासी अपनी सादगी और शुद्ध माण्ड गायन (सादी माण्ड गायिका) के लिए जानी जाती हैं। ध्यान दें: परीक्षाओं में पाली और बीकानेर की दोनों गवरी देवी के नाम अलग-अलग विकल्पों के साथ पूछे जाते हैं।
  • मांगी बाई (उदयपुर):
    • राजस्थान के इतिहास में मांगी बाई का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है क्योंकि इन्होंने ही राजस्थान का राज्य गीत (केसरिया बालम) प्रथम बार सार्वजनिक रूप से गाया था।
  • जमीला बानो (जोधपुर):
    • जोधपुर अंचल से ताल्लुक रखने वाली जमीला बानो ने माण्ड शैली को मारवाड़ की लोक धुनों के साथ मिलाकर एक नया आयाम दिया।
  • बन्नो बेगम (जयपुर):
    • जयपुर राजघराने से जुड़ी बन्नो बेगम प्रसिद्ध दरबारी नर्तकी ‘गोहरजान’ की पुत्री हैं। इनकी गायकी में जयपुर घराने की शास्त्रीय शुद्धता साफ झलकती है।

2. मांगणियार गायन शैली

  • भौगोलिक क्षेत्र: राजस्थान का पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र, विशेषकर जैसलमेर और बाड़मेर जिले।
  • जातिगत परिचय:
    • मांगणियार वास्तव में पश्चिमी राजस्थान की एक प्रमुख संगीतकार जाति है, जिसका मुख्य पेशा ही गायन और वादन (गाना और बजाना) है।
    • यह जाति मूल रूप से सिंध प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) की रहने वाली है और धार्मिक रूप से यह एक मुस्लिम जाति है, लेकिन इनकी गायकी में हिंदू देवी-देवताओं और स्थानीय लोक देवताओं (जैसे कृष्ण और रामदेवजी) के प्रति गहरी आस्था और भजन देखने को मिलते हैं।
  • गायन की तकनीकी विशेषता:
    • मांगणियार गायन शैली अत्यंत अनूठी और जटिल है। इस गायन शैली में 6 राग और 36 रागनियों का बहुत ही सुरीला और वैज्ञानिक प्रयोग किया जाता है। इनकी तान और आलाप इतने तेज होते हैं कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता है।
  • प्रमुख वाद्य यंत्र (Instruments Used):
    • कमायचा (Kamaycha): यह एक तत् वाद्य (तार वाला यंत्र) है जो सारंगी जैसा दिखता है और मांगणियारों का सबसे मुख्य वाद्य यंत्र है।
    • खड़ताल (Khartal): लकड़ी के टुकड़ों से बना यह एक अनूठा वाद्य यंत्र है, जिसे हाथ की उंगलियों के बीच बहुत तेजी से बजाया जाता है।

मांगणियार शैली के प्रमुख कलाकार (Famous Artists)

  • सदीक खां मांगणियार: यह पूरे विश्व में प्रसिद्ध खड़ताल वादक के रूप में जाने जाते हैं। इन्होंने खड़ताल को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
  • साकर खां मांगणियार: यह भारत के प्रसिद्ध कमायचा वादक थे। कमायचा वादन में इनके अद्भुत योगदान के लिए इन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था।

3. लंगा गायन शैली

  • भौगोलिक क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर जिले।
  • जातिगत परिचय एवं विशेषता:
    • लंगा जाति का मुख्य निवास स्थान जैसलमेर-बाड़मेर के ग्रामीण अंचल हैं। बाड़मेर का ‘बड़वणा गाँव’ लंगों का गाँव कहलाता है, क्योंकि यहाँ की पूरी आबादी इस संगीत विधा से जुड़ी है।
    • मांगणियारों की तरह लंगा भी मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन इनका मुख्य कार्य राजपूतों (यजमानों) के यहाँ वंशावलियों का बखान करना और उनके मांगलिक अवसरों (जैसे शादी, जन्म) पर लोक गीत गाना है।
  • प्रमुख वाद्य यंत्र (Instruments Used):
    • लंगा जाति के गायक मुख्य रूप से कमायचा और सारंगी (सिंधी सारंगी) का प्रयोग करते हैं। इनकी गायकी में सारंगी की गूंज बहुत ही दर्दभरी और सुरीली लगती है।
    • मांगणियार शैली की तुलना में लंगा शैली थोड़ी अधिक कोमल और लोक-धुनों के ज्यादा करीब होती है।

4. तालबंदी गायन शैली

  • भौगोलिक क्षेत्र (Region): पूर्वी राजस्थान का ब्रज संस्कृति से प्रभावित क्षेत्र, विशेषकर सवाई माधोपुर, करौली, भरतपुर, धौलपुर और अलवर जिले.
  • भाषा (Language): मुख्य रूप से ब्रजभाषा में रचनाएं गाई जाती हैं.
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (History):
    • इस विशिष्ट गायन शैली का इतिहास मुगल सम्राट औरंगजेब के काल से गहरा जुड़ा हुआ है. जब औरंगजेब ने अपने साम्राज्य में संगीत और गायन पर पूरी तरह प्रतिबंध (Ban) लगा दिया था, तब मथुरा और गोवर्धन (उत्तर प्रदेश) क्षेत्र के कई शास्त्रीय संगीतकार, साधु-संत और कला के पारखी अपनी जान और कला बचाने के लिए पूर्वी राजस्थान के रियासती इलाकों में आ गए.
    • इन संतों ने यहाँ के स्थानीय कलाकारों के साथ मिलकर लोक-धुनों और शास्त्रीय रागों के मिश्रण से ‘तालबंदी शैली’ को जन्म दिया.
  • गायन की तकनीकी विशेषता (Features):
    • यह गायन शैली पूरी तरह गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है, जो लगभग 400 वर्षों से जीवित है.
    • इसमें प्राचीन कवियों की ‘पदावलियों’ (Verses) को सामूहिक रूप से (Group Singing) गाया जाता है.
    • गायन शुरू करने से पहले कलाकार बहुत ही सुंदर और संक्षिप्त ‘आलाप’ (Melodic Introduction) लेते हैं. चूंकि इसमें गायन के साथ-साथ कठिन ताल और लय का सटीक बैठना सबसे जरूरी होता है, इसीलिए इसे ‘तालबंदी’ (यानी ताल में बंधा हुआ) कहा जाता है.
  • प्रमुख वाद्य यंत्र (Instruments Used):
    • इस शैली का सबसे मुख्य और रीढ़ की हड्डी माना जाने वाला वाद्य यंत्र नगाड़ा (Nagada) है. इसके अलावा प्रस्तुति के समय हारमोनियम, ढोलक, सारंगी, तबला और झांझ का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है.

5. हवेली संगीत गायन शैली

  • प्रमुख केंद्र (Main Center): राजस्थान का नाथद्वारा (राजसमंद जिला) इसका सबसे मुख्य और ऐतिहासिक केंद्र है. इसके अलावा जयपुर, कोटा और किशनगढ़ के वैष्णव मंदिरों में भी यह शैली प्रमुखता से गाई जाती है.
  • मूल विधा: यह मुख्य रूप से वैष्णव संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) के मंदिरों में गाया जाने वाला एक बेहद पवित्र और शुद्ध भक्ति संगीत (Temple Music) है.
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (History):
    • इस गायन विधा की शुरुआत लगभग 500 वर्ष पूर्व वैष्णव संत वल्लभाचार्य जी द्वारा प्रतिपादित पुष्टिमार्ग संप्रदाय के साथ हुई थी.
    • ‘हवेली’ नाम क्यों पड़ा?: मध्यकाल में मुस्लिम शासकों के शासन के दौरान जब भव्य हिंदू मंदिरों के निर्माण पर पाबंदियां थीं, तब भगवान श्रीकृष्ण के विग्रहों (मूर्तियों) को बड़े-बड़े महलों या सुरक्षित ‘हवेलियों’ में स्थापित किया गया था. पुष्टिमार्ग में भगवान के मंदिर को आज भी ‘ठाकुर जी की हवेली’ कहा जाता है. इसी कारण इन मंदिरों/हवेलियों के भीतर गाए जाने वाले संगीत का नाम ‘हवेली संगीत’ पड़ा.
  • गायन की तकनीकी विशेषता (Features):
    • हवेली संगीत में मुख्य रूप से शास्त्रीय संगीत की ‘ध्रुपद’ और ‘धमार’ शैली का प्रयोग करके भगवान श्रीकृष्ण की अष्टयाम सेवा (दिन के आठ दर्शनों) के समय भजन और कीर्तन गाए जाते हैं.
    • इसमें सूरदास जी समेत ‘अष्टछाप’ के प्रसिद्ध आठ कवि सखाओं द्वारा रचित पदों का गायन होता है.
    • एक अनोखी मान्यता: संगीत जगत में ऐसी गहरी मान्यता है कि इस संगीत के मुख्य श्रोता कोई आम इंसान नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात भगवान श्रीकृष्ण होते हैं, इसलिए इस गायन में शुद्धता और भक्ति का स्तर अत्यधिक ऊंचा होता है.
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