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राजस्थान के राजकीय प्रतीक और उनकी विस्तृत जानकारी

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राजस्थान के राजकीय प्रतीक : Quick Revision Notes

राजकीय प्रतीकनामवैज्ञानिक नामघोषित वर्ष
राज्य पशु (पालतू)ऊँटCamelus dromedarius2014
राज्य पशु (वन्यजीव)चिंकाराGazella bennettii1981
राज्य पक्षीगोडावणArdeotis nigriceps1981
राज्य वृक्षखेजड़ीProsopis cineraria1983
राज्य पुष्परोहिड़ाTecomella undulata1983
राज्य खेलबास्केटबॉल1948
राज्य नृत्यघूमर1986
राज्य शास्त्रीय नृत्यकत्थक
राज्य वाद्य यंत्रअलगोजा
राज्य गीतकेसरिया बालम
राज्य पोशाकजोधपुरी कोट-पेंट


प्रमुख राजकीय प्रतीक और उनकी विस्तृत जानकारी : In Details Notes

1. राज्य पशु – पालतू श्रेणी : ऊँट

ऊँट विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वैज्ञानिक नाम (Scientific Name): कैमेलस ड्रोमडेरियस (Camelus dromedarius) (यह एक कूबड़ वाले ड्रोमेडरी ऊँट का वैज्ञानिक नाम है)।
  • घोषणा का इतिहास: इसकी घोषणा 30 जून 2014 को बीकानेर में की गई थी और इसका आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन 19 सितंबर 2014 को जारी किया गया।

  • नस्लें (Breeds):
    • नाचना (जैसलमेर): यह नस्ल सुंदरता और सबसे तेज दौड़ने के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। सेना और BSF के जवान इसी का उपयोग करते हैं।
    • गोमठ (जोधपुर): यह ऊँट अपनी भारी वजन ढोने की क्षमता (बोझा ढोने) के लिए जाना जाता है।
    • बीकानेरी: यह देश की सबसे आम नस्ल है, जो कृषि कार्यों के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
  • सांस्कृतिक जुड़ाव:
    • पाबूजी महाराज: इन्हें ऊँटों का लोकदेवता माना जाता है। मारवाड़ में जब भी कोई ऊँट बीमार होता है, तो पाबूजी की ‘फड़’ का वाचन किया जाता है।
    • रेबारी / राईका: यह पारंपरिक ऊँट पालक जाति है।
  • सजावट और कला: ऊँट के श्रृंगार के समय गले में पहने जाने वाले आभूषण को गोरबंद कहा जाता है, जिस पर लोकगीत भी प्रचलित हैं। इसकी नाक में डाली जाने वाली लकड़ी की कील को ‘गिरबाण’ कहते हैं।
  • सैन्य इतिहास (गंगा रिसाला): बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के समय ऊँटों की एक विशेष टुकड़ी बनाई थी जिसे ‘गंगा रिसाला’ कहा जाता था। इसके पराक्रम को देखते हुए इसे बाद में सीमा सुरक्षा बल (BSF) के ऊँट दस्ते में शामिल किया गया।
  • डेयरी व अनुसंधान: बीकानेर में ‘उरमूल डेयरी’ भारत की एकमात्र ऊँटनी के दूध की डेयरी है। ऊँटनी का दूध इंसुलिन से भरपूर और मधुमेह (Diabetes) के रोगियों के लिए रामबाण माना जाता है। राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केंद्र (NRCC) जोहड़बीड़, बीकानेर में स्थित है।
  • कानूनी संरक्षण: राज्य सरकार ने ऊँटों के वध और तस्करी को रोकने के लिए “राजस्थान ऊँट (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम, 2015” लागू किया है।

2. राज्य पशु – वन्यजीव श्रेणी : चिंकारा

चिंकारा विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वैज्ञानिक नाम: गैज़ेला बेनेटी (Gazella bennettii)
  • घोषणा तिथि: इसे 22 मई 1981 को राज्य वन्यजीव घोषित किया गया।
  • प्रमुख क्षेत्र: यह पश्चिमी राजस्थान के शुष्क घास के मैदानों में स्वतंत्र रूप से घूमता है। जोधपुर का ‘जोधपुर जंतुआलय’ चिंकारा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त, जयपुर का नाहरगढ़ जैविक उद्यान भी इनका प्रमुख बसेरा है।
  • जिला शुभंकर: वन्यजीव संरक्षण के तहत चिंकारा को श्रीगंगानगर जिले का आधिकारिक वन्यजीव शुभंकर (Mascot) घोषित किया गया है।

3. राज्य पक्षी : गोडावण (Great Indian Bustard)

गोडावण विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वैज्ञानिक नाम: अर्डियोटिस नाइग्रिसेप्स (Ardeotis nigriceps)
  • घोषणा तिथि: 22 मई 1981
  • स्थानीय व उपनाम: अंग्रेजी में Great Indian Bustard , हिंदी में सोहन चिड़िया, हुकना, गुधनमेर और हाड़ौती अंचल में इसे ‘मालमोरड़ी’ कहा जाता है।
  • शारीरिक बनावट और व्यवहार: इसका वजन लगभग 15 से 18 किलोग्राम तक होता है। भारी शरीर के कारण यह जमीन पर ही रहना पसंद करता है और शुष्क मैदानों में शुतुरमुर्ग (Ostrich) की तरह लंबी टांगों से दौड़ता है। नर गोडावण के गले के पास एक विशेष थैली (Gular Pouch) होती है, जो प्रजनन काल में मादा को आकर्षित करने के लिए गहरी गूंजने वाली आवाज (Booming Call) उत्पन्न करती है।
  • आवास और प्रजनन क्षेत्र:
    1. राष्ट्रीय मरु उद्यान (DNP) – जैसलमेर और बाड़मेर: यह इनका सबसे बड़ा प्राकृतिक घर है।
    2. सोरसन (बारां) और सोंखलिया (अजमेर): यहाँ भी इनके छोटे समूह पाए जाते हैं।
  • संरक्षण के विशेष प्रयास :
    • प्रोजेक्ट बस्टर्ड: राजस्थान सरकार ने 5 जून 2013 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय मरु उद्यान में ‘प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ लॉन्च किया, ऐसा करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य बना।
    • कृत्रिम प्रजनन (Artificial Insemination): वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) और वन विभाग के प्रयासों से जैसलमेर के ‘सम’ में इनका ब्रीडिंग सेंटर बनाया गया है, जहाँ कृत्रिम गर्भाधान और इनक्यूबेशन के जरिए गोडावण के अंडों से चूजे तैयार कर इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है।

4. राज्य वृक्ष : खेजड़ी

खेजड़ी विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वैज्ञानिक नाम: प्रोसोपिस सिनेरेरिया (Prosopis cineraria)
  • घोषणा तिथि: 31 अक्टूबर 1983
  • उपनाम: ‘थार का कल्पवृक्ष’, ‘रेगिस्तान का गौरव’, ‘वंडर ट्री’। ग्रंथों में इसे शमी और स्थानीय भाषा में जांटी कहा जाता है। सिंधी भाषा में इसे ‘छोकड़ो’ कहते हैं।
  • धार्मिक महत्व: विजयादशमी (दशहरा) और जन्माष्टमी के पर्व पर खेजड़ी वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, लोकदेवता गोगाजी और केसरिया कुंवरजी के थान (स्थान) हमेशा खेजड़ी वृक्ष के नीचे ही बनाए जाते हैं।
  • खेजड़ली का ऐतिहासिक बलिदान (1730 ई.):
    • जोधपुर के महाराजा अभयसिंह को अपने महल के निर्माण के लिए चूना पकाने हेतु लकड़ी की आवश्यकता थी। उनके मंत्री गिरधारी दास भंडारी सैनिकों के साथ खेजड़ली गाँव पहुंचे।
    • पेड़ों को कटने से बचाने के लिए अमृता देवी बिश्नोई ने नारा दिया: “सर साठे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” (अर्थात यदि सिर कटने के बाद भी एक पेड़ बच जाता है, तो उसे सस्ता सौदा समझें)।
    • अमृता देवी की अगुवाई में बिश्नोई समुदाय के 363 लोगों (69 महिलाएं और 294 पुरुष) ने पेड़ों से लिपटकर अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। यह घटना भारतीय इतिहास में पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसने बाद में ‘चिपको आंदोलन’ को प्रेरित किया।
  • खेजड़ली दिवस व मेला: हर वर्ष 12 सितंबर को ‘खेजड़ली शहीद दिवस’ मनाया जाता है (इसकी शुरुआत 1978 से हुई थी) भाद्रपद शुक्ल दशमी के दिन यहाँ ‘विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला’ आयोजित होता है
  • पर्यावरण पुरस्कार: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को राज्य का सबसे प्रतिष्ठित ‘अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव सुरक्षा पुरस्कार’ दिया जाता है, जिसकी शुरुआत 1994 में हुई थी। प्रथम पुरस्कार गंगाराम बिश्नोई को दिया गया था
  • उपयोगिता: इसकी जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं। इसकी फलियों (सांगरी) का उपयोग पंचकूटा की प्रसिद्ध राजस्थानी सब्जी बनाने में होता है। इसकी पत्तियों (लूम) का उपयोग चारे के रूप में होता है।
  • विशेष डाक टिकट: वर्ष 1988 में खेजड़ी वृक्ष पर भारत सरकार द्वारा 60 पैसे का विशेष डाक टिकट जारी किया गया था।

5. राज्य पुष्प : रोहिड़ा

रोहिड़ा विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वैज्ञानिक नाम: टेकोमेला अनडुलेटा (Tecomella undulata)
  • घोषणा तिथि: 31 अक्टूबर 1983
  • उपनाम: इसे ‘रेगिस्तान का सागवान’ या ‘मरु शोभा’ (Marwar Teak) भी कहा जाता है
  • भौगोलिक फैलाव: यह मुख्य रूप से पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर और नागौर जिलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

6. राज्य खेल : बास्केटबॉल (Basketball)

बास्केटबॉल विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • घोषणा वर्ष: बास्केटबॉल को वर्ष 1948 में राजस्थान के आधिकारिक राज्य खेल के रूप में स्वीकार किया गया था।
  • खेल की बारीकियां: मैदान पर एक समय में दो टीमें खेलती हैं, जिनमें से प्रत्येक टीम में 5 सक्रिय खिलाड़ी (Active Players) होते हैं, जबकि 7 खिलाड़ी बेंच (सब्स्टीट्यूट) पर होते हैं। खेल का कुल समय 40 मिनट का होता है, जो 10-10 मिनट के चार क्वार्टर में बंटा होता है।
  • राजस्थान का दबदबा: आजादी के बाद के दशकों में राष्ट्रीय बास्केटबॉल प्रतियोगिताओं में राजस्थान की टीम का दबदबा रहा है। राज्य ने देश को हनुमान सिंह और खुशी राम जैसे महान बास्केटबॉल खिलाड़ी दिए हैं, जिन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
  • खेल अकादमियां (Sports Academies):
    • बालक बास्केटबॉल अकादमी: जैसलमेर में संचालित है, जहाँ जूनियर स्तर के खिलाड़ियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग दी जाती है।
    • बालिका बास्केटबॉल अकादमी: जयपुर में स्थापित है, जो महिला खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करती है।

7. राज्य नृत्य : घूमर

घूमर विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • उपनाम व उपाधियां: इसे ‘राजकीय नृत्य’, ‘राजस्थानी लोक नृत्यों का सिरमौर’, ‘नृत्यों का हृदय’ और ‘सामंतशाही नृत्य’ भी कहा जाता है।
  • नृत्य की तकनीक और ‘सवाई’: घूमर नृत्य में महिलाएं हाथों के लचकदार संचालन और पैरों की विशेष गति के साथ एक वृत्ताकार घेरे में चक्कर लेती हैं। नृत्य के दौरान पैरों की जो 8 चरणों वाली विशेष चाल या गति होती है, उसे शास्त्रीय भाषा में ‘सवाई’ कहा जाता है। इस नृत्य के साथ केवल पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, नगाड़ा और शहनाई बजाए जाते हैं।
  • अकादमी: राजस्थान में घूमर नृत्य के संरक्षण के लिए वर्ष 1986 में ‘गणगौर घूमर नृत्य अकादमी’ की स्थापना की गई थी।

8. राज्य शास्त्रीय नृत्य : कत्थक

कत्थक विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • जयपुर घराना (प्राचीनतम घराना): कत्थक नृत्य के दो मुख्य घराने हैं— जयपुर घराना और लखनऊ घराना। इनमें से जयपुर घराने को सबसे प्राचीन और ‘आदिम घराना’ माना जाता है।
  • प्रवर्तक: जयपुर घराने की नींव और इसके विकास का श्रेय भानुजी महाराज को जाता है। उन्होंने इस विधा को शिव के तांडव और राजपूती शौर्य से जोड़ा।
  • नृत्य की शैलीगत विशेषताएं: जयपुर घराने का कत्थक अपनी तकनीकी जटिलता के लिए जाना जाता है। इसमें:
    • तीव्र पदचाप (Fast Footwork): पैरों की थाप इतनी तेज होती है कि घुंघरुओं की आवाज से ही पूरे बोल स्पष्ट सुनाई देते हैं।
    • भ्रामरी (Spinning/Turns): कलाकार बिना रुके 50 से 100 चक्कर बहुत कम समय में लगाते हैं।
    • वीर रस की प्रधानता: लखनऊ घराने में जहां ‘श्रृंगार रस’ और भाव मुख्य होते हैं, वहीं जयपुर घराने में ‘वीर रस’, ‘तांडव’ और कठिन ताल का प्रदर्शन मुख्य होता है।
  • राज्याश्रय: जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह और महाराजा प्रताप सिंह के काल में इस नृत्य को भारी राज्याश्रय मिला। महाराजा प्रताप सिंह के दरबार में ‘गुणीजन खाना’ था, जिसमें देश के महान कत्थक कलाकार रहते थे।

9. राज्य वाद्य यंत्र : अलगोजा

अलगोजा विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • वाद्य का प्रकार (Category): यह संगीत के ‘सुषिर वाद्य’ (Aerophone) वर्ग में आता है, जिसका अर्थ है कि इसे फूंक मारकर (हवा के दबाव से) बजाया जाता है।
  • बनावट और वादन की कला: अलगोजा में बांस या सरकंडे से बनी दो बांसुरीनुमा नलिकाएं (Flutes) होती हैं। वादक दोनों बांसुरियों को एक साथ अपने मुंह में रखता है। वादन की तकनीक बहुत कठिन होती है क्योंकि इसमें एक बांसुरी से लगातार एक ही सूर (Base Note) निकाला जाता है, जबकि दूसरी बांसुरी के छेदों पर उंगलियां चलाकर मुख्य लोक धुन (Melody) निकाली जाती है। बजाते समय कलाकार को मुंह से हवा छोड़ते हुए नाक से सांस खींचनी पड़ती है ताकि धुन टूटने न पाए।
  • लोक समाज में महत्व: अलगोजा मुख्य रूप से राजस्थान की मीणा, भील, गुर्जर और कालबेलिया जनजातियों का प्रिय वाद्य यंत्र है। इसका उपयोग लोकगाथाओं (जैसे तेजाजी के गीत या पाबूजी के पावाड़े) के गायन के समय किया जाता है।
  • रामनाथ चौधरी (विश्व प्रसिद्ध वादक): जयपुर के पदमपुरा गाँव के रहने वाले रामनाथ चौधरी अलगोजा वादन के जादूगर कहे जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मुंह के बजाय अपने नाक से अलगोजा बजाते हैं। इस अनूठी कला के कारण उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।

10. राज्य गीत : केसरिया बालम

केसरिया बालम विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • मूल बोल: “केसरिया बालम आओ नी, पधारो म्हारे देस। नी मरुधरा री लाज राखो, आओ नी पधारो म्हारे देस।”
  • गायन शैली (मांड राग): यह गीत शुद्ध रूप से ‘मांड’ (Maand) गायकी में गाया जाता है। मांड राग पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बीकानेर) की एक विशिष्ट, अर्ध-शास्त्रीय और राजसी गायन शैली है, जो अपनी गंभीर और गूंजती हुई तानों के लिए जानी जाती है।
  • भाव और रस: यह मूलतः एक ‘विरह गीत’ और ‘स्वागत गीत’ का मिश्रण है। इसमें एक नवविवाहिता अपने परदेस गए पति (बालम) की याद में विरह वेदना व्यक्त करते हुए उसे वापस घर आने और अपने देश पधारने का आग्रह करती है।
  • इतिहास के पन्नों से प्रसिद्ध कलाकार:
    • मांगी बाई (उदयपुर): इस गीत को सबसे पहले मांड शैली में निबद्ध करके गाने का श्रेय उदयपुर की मांगी बाई को जाता है।
    • अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर): इन्हें ‘मरु कोकिला’ (Nightingale of the Desert) कहा जाता है। इन्होंने बीकानेर के महाराजा गंगासिंह के दरबार में इस गीत को गाया और इसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया। उनके इस योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। राजस्थान सरकार ने उनकी स्मृति में मांड गायिकी के क्षेत्र में पुरस्कार भी शुरू किए हैं।

11. राज्य पोशाक : जोधपुरी कोट-पेंट

जोधपुरी कोट-पेंट विस्तृत जानकारी और ऐतिहासिक महत्व

  • उद्गम और इतिहास: जोधपुरी कोट-पेंट (जिसे जोधपुर सूट भी कहा जाता है) की उत्पत्ति 19वीं सदी के अंत में जोधपुर रियासत में हुई थी। जोधपुर के तत्कालीन सर प्रताप सिंह (महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के छोटे भाई) जब इंग्लैंड दौर पर गए, तो उनका सूट केस खो गया। उन्होंने स्थानीय दर्जी से मिलकर एक विशेष राजपूती अचकन (Sherwani) को छोटा करवाकर वेस्टर्न ट्राउजर के साथ मैच किया। यह फ्यूजन इतना पसंद किया गया कि यह ‘जोधपुरी सूट’ के नाम से अमर हो गया।
  • राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मान्यता: भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जोधपुरी कोट-पेंट को ‘राष्ट्रीय औपचारिक पोशाक’ (National Formal Dress) का दर्जा दिया गया है। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक कार्यक्रमों, राजनयिकों (Diplomats) की मुलाकातों और विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करते समय भारतीय प्रतिनिधि अक्सर इसी गरिमापूर्ण पोशाक में नजर आते हैं।

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