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आमेर-जयपुर के कछवाहा राजवंश

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कछवाहा शब्द की उत्पत्ति भगवान श्री राम के ज्येष्ठ पुत्र ‘कुश’ के नाम से मानी जाती है। कुश के वंशज होने के कारण ये प्रारंभ में ‘कुशवाह’ कहलाए, जो आगे चलकर अपभ्रंश होकर ‘कछवाहा’ बन गया। कछवाहा राजवंश का मुख्य राजकीय ध्वज (झंडा) ‘पचरंगा’ (पांच रंगों वाला— नीला, पीला, लाल, हरा और सफेद) है। इनका मूल राजवाक्य है— “यतो धर्मस्ततो जयः” (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है)। कछवाहा शासक स्वयं को अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की मूल शाखा मानते थे।

1. दूल्हेराय / तेजकरण — कछवाहा राजवंश के आदि पुरुष (1137 ई. – 1170 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • इन्हें ढूंढाड़ (जयपुर क्षेत्र) में कछवाहा राजवंश का मूल पुरुष, आदि पुरुष या संस्थापक कहा जाता है। इनका मूल नाम ‘तेजकरण’ था, लेकिन अत्यधिक सुंदर होने के कारण इन्हें ‘दूल्हेराय’ कहा जाता था।
    • ये ग्वालियर (मध्य प्रदेश) के शासक सोढदेव के पुत्र थे। ये अपनी कर्मभूमि बदलकर ढूंढाड़ क्षेत्र (ढूंढ नदी के आसपास का इलाका) में आए।
    • प्रथम राजधानी: इन्होंने सन 1137 ईस्वी में दौसा के ‘बड़गुजरों’ को पराजित किया और ‘दौसा’ को कछवाहों की प्रथम प्रारंभिक राजधानी बनाया।
    • द्वितीय राजधानी: इसके बाद इन्होंने मांझी (जयपुर) के मीना शासकों को हराकर उसका नाम ‘रामगढ़’ रखा। रामगढ़ में कछवाहा राजवंश की कुलदेवी ‘जमुवाय माता’ का भव्य मंदिर बनवाया और ‘जमुवारामगढ़’ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।

2. काकिलदेव — आमेर को राजधानी बनाने वाले (1037 ई. के बाद)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये दूल्हेराय के पुत्र थे। इन्होंने सन 1207 ईस्वी में आमेर के ‘सुसावत मीनाओं’ को एक भीषण युद्ध में पराजित कर आमेर पर अधिकार कर लिया।
    • इन्होंने ‘आमेर’ को कछवाहों की तीसरी और सबसे दीर्घकालिक राजधानी बनाया, जो सवाई जयसिंह के काल (1727 ई.) तक मुख्य केंद्र रही। इन्होंने आमेर में कछवाहों के सबसे प्राचीन महल ‘कदमी महल’ की नींव रखी थी, जहाँ जयपुर के राजाओं का राजतिलक होता था।

3. पृथ्वीराज कछवाहा — (1503 ई. – 1527 ई.)

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • खानवा के युद्ध में योगदान: ये मेवाड़ के राणा सांगा के समकालीन थे। जब सांगा ने मुगलों (बाबर) के खिलाफ ‘पाती पेरवण’ परंपरा के तहत सभी राजपूतों को आमंत्रित किया, तो पृथ्वीराज कछवाहा अपनी सेना लेकर राणा सांगा की सहायता के लिए खानवा के युद्ध (1527 ई.) में गए थे। युद्ध के मैदान में सांगा के मूर्छित होने पर उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में इनकी मुख्य भूमिका थी।
    • ‘बारह कोटड़ी’ व्यवस्था: इनके 12 पुत्र थे। अपनी मृत्यु के बाद भाइयों में संपत्ति के विवाद को रोकने के लिए इन्होंने आमेर राज्य को 12 सामंती जागीरों (हिस्सों) में विभाजित कर दिया, जिसे जयपुर के इतिहास में ‘बारह कोटड़ी’ व्यवस्था कहा जाता है। ये गलता जी (जयपुर) के प्रसिद्ध संत कृष्णदास पयहारी के शिष्य थे।

4. राजा भारमल — मुगलों से संधि करने वाले प्रथम (1547 ई. – 1573 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व प्रथम मुग़ल संधि:
    • ये अपने भाइयों और भतीजों के आंतरिक संघर्ष को समाप्त कर आमेर के राजा बने। गृहयुद्ध से रक्षा के लिए इन्होंने मुगलों से सहायता लेने की नीति अपनाई।
    • ऐतिहासिक मुलाकात: अकबर के जियारत के समय, चगताई खां के सहयोग से भारमल की मुलाकात सांगानेर (जयपुर) में अकबर से हुई।
    • वैवाहिक संबंध (1562 ई.): भारमल संपूर्ण राजपूताना के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने स्वेच्छा से मुगलों की अधीनता स्वीकार की और उनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। इन्होंने सन 1562 ई. में सांभर (जयपुर) के स्थान पर अपनी पुत्री ‘हरखा बाई’ (इतिहास प्रसिद्ध ‘शाही बाई’ या ‘मरियम-उज-जमानी’) का विवाह मुग़ल सम्राट अकबर से किया। इसी हरखा बाई के गर्भ से आगे चलकर मुग़ल बादशाह जहांगीर (सलीम) का जन्म हुआ था। अकबर ने भारमल को ‘अमीर-उल-उमरा’ और ‘राजा’ की उपाधि दी तथा 5000 का मनसब प्रदान किया।

5. राजा भगवंत दास — (1573 ई. – 1589 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व विस्तार:
    • ये राजा भारमल के जेष्ठ पुत्र थे। इन्होंने अकबर के साथ रहकर कई बड़े सैन्य अभियानों (जैसे गुजरात और सरनाल का युद्ध) में अपनी अद्भुत वीरता दिखाई।
    • महाराणा प्रताप के पास दूत: अकबर ने जब महाराणा प्रताप को अधीन करने के लिए चार शांति दूत भेजे थे, तो सन 1573 ई. में तीसरे दूत के रूप में राजा भगवंत दास ही गोगुंदा गए थे।
    • पुत्री का विवाह: इन्होनें अपनी पुत्री ‘मानबाई’ (शाह बेगम) का विवाह अकबर के पुत्र शहजादा सलीम (जहांगीर) से किया था। इसी मानबाई की संतान ‘शहजादा खुसरो’ थी। मानबाई ने बाद में जहांगीर की शराब की आदतों से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। भगवंत दास का निधन लाहौर में हुआ था।

6. महाराजा मान सिंह प्रथम — कछवाहा वंश का सैन्य गौरव (1589 ई. – 1614 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: फर्जन्द (मुग़ल भाषा में ‘बेटा’— अकबर द्वारा दी गई सर्वोच्च उपाधि), मिर्जा राजा।
  • सैन्य अभियान व हल्दीघाटी का युद्ध:
    • मानसिंह प्रथम मात्र 12 वर्ष की आयु में अकबर की सेवा में चले गए थे। इन्होंने मुग़ल साम्राज्य के विस्तार में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। अकबर के दरबार के ‘नवरत्नों’ में मानसिंह सर्वप्रमुख थे। अकबर ने इन्हें 7000 का मनसब दिया था, जो किसी भी हिंदू राजा के लिए इतिहास में सर्वाधिक था।
    • हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई.): अकबर ने महाराणा प्रताप के विरुद्ध सैन्य अभियान का मुख्य सेनापति मानसिंह प्रथम को ही बनाया था। इन्होंने अजमेर के मैगजीन दुर्ग में युद्ध की योजना बनाई और 18 जून 1576 को हल्दीघाटी के मैदान में मुग़ल सेना का नेतृत्व किया।
    • त्रिपक्षीय सूबेदारी: इन्होंने मुगलों के तीन सबसे कठिन प्रांतों की सूबेदारी (गवर्नरी) संभाली:
      1. काबल (अफगानिस्तान): यहाँ के पांच खूंखार कबीलों को हराकर मानसिंह ने आमेर के झंडे का रंग ‘पचरंगा’ किया था।
      2. बिहार: यहाँ इन्होंने ‘मानपुर’ शहर बसाया।
      3. बंगाल: इन्होंने बंगाल के तीन हिस्सों को जीतकर मुग़ल साम्राज्य में मिलाया। बंगाल के जसोर के राजा केदार को पराजित कर ये कछवाहों की इष्टदेवी ‘शीला माता’ की काले पत्थर की चमत्कारी मूर्ति आमेर लेकर आए और वहाँ भव्य मंदिर बनवाया।
  • कला, स्थापत्य व साहित्यिक स्वर्णकाल:
    • इन्होंने सन 1592 ईस्वी में आमेर के आधुनिक, भव्य पहाड़ी दुर्ग और महलों (आमेर किला) का निर्माण शुरू करवाया। आमेर में प्रसिद्ध ‘दीवान-ए-आम’ और ‘गणेश पोल’ की नींव रखी।
    • इनके काल में ही जयपुर में ब्लू पॉटरी (Blue Pottery) कला और मीनाकारी कला का आगमन हुआ, जिसे ये लाहौर से आमेर लाए थे। इनके भाई जगन्नाथ कछवाहा की 32 खंभों की छतरी मांडलगढ़ में है। इनका निधन 1614 ई. में दक्षिण भारत के ‘इलिचपुर’ (महाराष्ट्र) में हुआ था।

7. मिर्जा राजा जयसिंह — सबसे लंबा कार्यकाल (1621 ई. – 1667 ई.)

  • उपनाम व उपाधि: मिर्जा राजा (मुग़ल बादशाह शाहजहाँ द्वारा 1638 ई. में दी गई विशिष्ट उपाधि)।
  • तीन मुग़ल बादशाहों की सेवा:
    • मिर्जा राजा जयसिंह ने कछवाहा इतिहास में सर्वाधिक 46 वर्षों तक शासन किया। इन्होंने अपने जीवनकाल में तीन बड़े मुग़ल सम्राटों— जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के काल में अपनी सेवाएं दीं और मुग़ल कूटनीति का संचालन किया।
    • पुरन्दर की ऐतिहासिक संधि (11 जून 1665): औरंगजेब ने दक्षिण भारत में मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज को नियंत्रित करने के लिए मिर्जा राजा जयसिंह को विशाल सेना के साथ दक्षिण भेजा था। जयसिंह ने कूटनीति से शिवाजी महाराज को ‘पुरन्दर के किले’ में घेर लिया। अंततः 11 जून 1665 ई. को दोनों के बीच प्रसिद्ध ‘पुरन्दर की संधि’ हुई, जिसके तहत शिवाजी को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े। इस संधि के समय प्रसिद्ध इतिहासकार बर्नियर भी उपस्थित था।
  • कला, साहित्य व स्थापत्य:
    • इन्होनें आमेर किले के भीतर विश्व प्रसिद्ध ‘शीश महल’ (दर्पण धाम) का निर्माण करवाया, जिसकी सुंदरता पर मोहित होकर कवि बिहारी ने इसे ‘दर्पण धाम’ कहा था। इसके अलावा इन्होंने ‘जयगढ़ दुर्ग’ का प्रारंभिक निर्माण कार्य करवाया।
    • दरबारी कवि बिहारी: इनके दरबार में हिंदी के प्रकांड विद्वान महाकवि बिहारी रहते थे, जिन्होंने ‘बिहारी सतसई’ (713 दोहों का महान संग्रह) की रचना की थी। जयसिंह बिहारी के प्रत्येक दोहे पर उन्हें एक सोने की अशर्फी (मोहर) इनाम में देते थे। कूटनीतिज्ञ जयसिंह का निधन बुरहानपुर (दक्षिण भारत) में एक जहर की साजिश के कारण हुआ था।

8. सवाई जयसिंह द्वितीय — जयपुर के संस्थापक (1699 ई. – 1743 ई.)

  • उपनाम व उपाधियाँ: सवाई (उनकी असाधारण बुद्धि के कारण मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा दी गई उपाधि, इसके बाद जयपुर के सभी राजा ‘सवाई’ लगाने लगे), राजराजेश्वर, चाणक्य राजा।
  • सात मुग़ल बादशाहों का काल व देबारी समझौता:
    • इन्होंने अपने जीवनकाल में औरंगजेब से लेकर मोहम्मद शाह रंगीला तक 7 मुग़ल बादशाहों का शासन देखा
    • देबारी समझौता (1708 ई.): औरंगजेब की मृत्यु के बाद अमर सिंह द्वितीय (मेवाड़) और अजीत सिंह (मारवाड़) के साथ मिलकर जयसिंह ने खोया हुआ आमेर वापस पाया। शर्त के अनुसार इन्होंने मेवाड़ की राजकुमारी चन्द्रकुंवर से विवाह किया।
  • जयपुर शहर की स्थापना (18 नवंबर 1727):
    • सवाई जयसिंह ने आमेर को छोटा और पहाड़ियों से घिरा मानकर मैदानी भाग पर एक आधुनिक सुनियोजित शहर बसाने का निर्णय लिया। 18 नवंबर 1727 को इन्होंने जोधपुर के जगन्नाथ के हाथों जयपुर शहर की नींव रखवाई।
    • प्रधान वास्तुकार: जयपुर शहर के मुख्य वास्तुकार (शिल्पी) बंगाल के महान विद्वान विद्याधर भट्टाचार्य थे। यह शहर पूरी तरह से नौ वर्गों के सिद्धांत (ग्रिड पैटर्न) और वास्तु शास्त्र के आधार पर चौड़ी व समकोण काटती सड़कों के साथ बनाया गया भारत का पहला सुनियोजित शहर था।
  • विज्ञान, खगोलशास्त्र व जंतर-मंतर:
    • सवाई जयसिंह मध्यकाल के भारत के सबसे बड़े खगोलशास्त्री (Astronomer) थे। इन्होंने देश में समय और ग्रहों की सटीक गणना के लिए 5 स्थानों पर भव्य वेधशालाओं (Jantar Mantar) का निर्माण करवाया:
      1. दिल्ली (सबसे प्राचीन, 1724 ई.)
      2. जयपुर (सबसे बड़ी वेधशाला, यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की धूपघड़ी ‘सम्राट यंत्र’ स्थित है। इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है)
      3. उज्जैन
      4. मथुरा
      5. बनारस (वाराणसी)
    • इन्होनें ग्रहों की गति जांचने के लिए ‘जीज मोहम्मदशाही’ सारणी तैयार करवाई और ‘जयसिंह कारिका’ नामक ग्रंथ लिखा।
  • स्थापत्य व अंतिम अश्वमेध यज्ञ:
    • इन्होनें जयपुर की सुरक्षा के लिए नाहरगढ़ दुर्ग (सुदर्शनगढ़) का निर्माण 1734 ई. में करवाया और जयगढ़ किले में दुनिया की सबसे बड़ी पहियों पर चलने वाली ‘जयबाण तोप’ का निर्माण करवाया। इन्होंने पिच्छोला और आमेर की तर्ज पर जयपुर के मानसागर झील में भव्य ‘जल महल’ बनवाए।
    • अश्वमेध यज्ञ: ये भारत के अंतिम ऐसे हिंदू राजा थे जिन्होंने सन 1740 ईस्वी में पूर्ण शास्त्रीय विधि-विधान से ‘अश्वमेध यज्ञ’ का आयोजन करवाया था। इस यज्ञ के प्रधान पुरोहित पुंडरीक रत्नाकर थे। इनका निधन 1743 ई. में रक्त विकार के कारण हुआ था। इनकी छतरी जयपुर की ‘गेटोर की छतरियों’ में सबसे भव्य बनी हुई है।

9. सवाई ईश्वरी सिंह — (1743 ई. – 1750 ई.)

  • ऐतिहासिक गृहयुद्ध व ईसरलाट का निर्माण:
    • सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद देबारी समझौते के कारण उनके दोनों बेटों— ईश्वरी सिंह और माधवसिंह प्रथम के बीच जयपुर के सिंहासन के लिए भयंकर गृहयुद्ध छिड़ गया।
    • राजमहल का युद्ध (1747 ई. – टोंक): ईश्वरी सिंह ने मराठों और कोटा-बूंदी की संयुक्त सेना के खिलाफ लड़ते हुए अपने छोटे भाई माधवसिंह को बुरी तरह पराजित किया।
    • ईसरलाट (सरगासूली): इस महान विजय की खुशी में ईश्वरी सिंह ने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में 7 मंजिला भव्य विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया, जिसे ‘ईसरलाट’ या ‘सरगासूली’ कहा जाता है।
    • आत्महत्या: बाद में बगरू के युद्ध (1748 ई.) में मराठों के भारी दमन और मल्हारराव होल्कर द्वारा जयपुर पर भारी हर्जाना (पैसा) थोपने तथा धन की कमी के कारण, स्वाभिमानी ईश्वरी सिंह ने दिसंबर 1750 ई. में इसी ईसरलाट (सरगासूली) से कूदकर अपनी रानियों के साथ आत्महत्या कर ली। जयपुर के इतिहास में यह सबसे दुखद घटना थी। गेटोर में इनकी छतरी नहीं है, इनका दाह संस्कार सिटी पैलेस के पीछे जयनिवास उद्यान में हुआ था।

10. सवाई माधोसिंह प्रथम — (1750 ई. – 1768 ई.)

  • मराठों का कत्लेआम व शहर की स्थापना:
    • ईश्वरी सिंह की मृत्यु के बाद मराठों के सहयोग से माधोसिंह प्रथम जयपुर के राजा बने। लेकिन मराठों ने जयपुर में आकर भयंकर लूटपाट और धन की मांग शुरू कर दी।
    • मराठों का कत्लेआम (1751 ई.): जनवरी 1751 में माधोसिंह ने कूटनीति से जयपुर शहर के सभी दरवाजे बंद करवा दिए और आम जनता को आदेश दिया। जयपुर की जनता ने लाठी-डंडों से लगभग 5000 मराठों को जयपुर की गलियों में सरेआम काट फेंका, जिससे मराठा पेशवा कांप उठे।
    • काकौड़ व भट्टवाड़ा का युद्ध: इन्होंने काकौड़ के युद्ध (1759 ई.) में मराठों को पुनः पराजित किया और भट्टवाड़ा के युद्ध (1761 ई.) में कोटा के जाला जालिम सिंह को पराजित किया।
    • सवाई माधोपुर की स्थापना (1763 ई.): इन्होंने रणथंभौर दुर्ग के पास अपनी सुरक्षा के लिए सवाई माधोपुर शहर बसाया। इन्होंने जयपुर के चाकसू में ‘शीतला माता मंदिर’ का आधुनिक विशाल निर्माण करवाया और सिटी पैलेस में ‘चंद्रमहल’ व ‘मोती डूंगरी महलों’ का विकास किया।

11. सवाई पृथ्वी सिंह — (1768 ई. – 1778 ई.)

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये सवाई माधोसिंह प्रथम के जेष्ठ पुत्र थे। जब ये गद्दी पर बैठे तब इनकी आयु मात्र 5 वर्ष की थी, इसलिए इनकी माता चूंडावत जी ने संरक्षिका के रूप में शासन संभाला। इनके काल में जयपुर की सामंतशाही कमजोर हुई और अलवर के राव राजा प्रताप सिंह ने जयपुर से अलग होकर अलवर में स्वतंत्र कछवाहा/नरूका राज्य की स्थापना की। पृथ्वी सिंह का बहुत कम उम्र में ही घोड़े से गिरने के कारण निधन हो गया।

12. सवाई प्रताप सिंह — कला व ब्रजनिधि का स्वर्णिम काल (1778 ई. – 1803 ई.)

  • उपनाम: ब्रजनिधि (इस नाम से ये भगवान कृष्ण के प्रेम में उत्कृष्ट कविताएं लिखते थे)।
  • ऐतिहासिक युद्ध व मराठा संघर्ष:
    • तुंगा का युद्ध (1787 ई. – जयपुर): प्रताप सिंह ने मारवाड़ के विजय सिंह के साथ मिलकर महादजी सिंधिया की विशाल मराठा सेना को बुरी तरह पराजित किया। हार के बाद महादजी सिंधिया ने गुस्से में कहा था: “यदि मैं जीवित रहा, तो इस जयपुर को मिट्टी में मिला दूंगा।” बाद में मराठों ने पाटन के युद्ध (1790 ई.) में जयपुर को पराजित कर भारी टैक्स वसूला था।
  • हवा महल का निर्माण (1799 ई.) — जयपुर का गौरव:
    • सवाई प्रताप सिंह का शासनकाल जयपुर के इतिहास में साहित्य, संगीत और कला का स्वर्णिम युग माना जाता है।
    • इन्होनें सन 1799 ईस्वी में जयपुर के मुख्य मार्ग पर बिना किसी नींव के, भगवान श्री कृष्ण के मुकुट के आकार में 5 मंजिला प्रसिद्ध ‘हवा महल’ का निर्माण करवाया। इसके मुख्य शिल्पी/वास्तुकार लालचन्द उस्ता थे।
    • इस महल में कुल 953 बेहद सुंदर नक्काशीदार झरोखे (खिड़कियां) बनाई गई हैं, ताकि राजपरिवार की महिलाएं बिना किसी के देखे, नीचे बाजार में निकलने वाले त्योहारों और जीण माता की झांकियों को देख सकें और ठंडी हवा का आनंद ले सकें। इसकी पांचों मंजिलों के नाम क्रमशः— शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर और हवा मंदिर हैं।
  • गंधर्व बाईसी व कला संस्कृति:
    • प्रताप सिंह के दरबार में देश के सर्वश्रेष्ठ 22 प्रकंड विद्वान, संगीतकार और कवि चौबीसों घंटे रहते थे, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘गंधर्व बाईसी’ या ‘गुणीजन खाना’ कहा जाता था। इनमें संगीत गुरु चांद खां (बुद्ध प्रकाश) प्रमुख थे। इन्होंने जयपुर में ‘राधा गोविंद संगीत सार’ नामक महान संगीत ग्रंथ की रचना के लिए एक विशाल सम्मेलन आयोजित करवाया था। इनके काल में जयपुर में ‘तमाशा लोकनाट्य’ की शुरुआत हुई।

13. सवाई जगत सिंह द्वितीय — जयपुर का बदनाम राजा (1803 ई. – 1818 ई.)

  • कृष्णा कुमारी विवाद व ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि:
    • जयपुर का बदनाम राजा क्यों?: ये स्वभाव से विलासी राजा थे। ये ‘रसकपूर’ नामक एक वेश्या (नर्तकी) के प्यार में इस कदर दीवाने थे कि इन्होंने रसकपूर को जयपुर का आधा राजपाठ सौंप दिया था और उसके नाम के सिक्के चलवाए तथा उसे अपने साथ हाथी पर बिठाकर शहर में घुमाते थे। इस आचरण के कारण जयपुर की जनता ने इन्हें ‘जयपुर का बदनाम शासक’ कहा।
    • गींगोली का युद्ध (1807 ई. – नागौर): मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी से विवाह के विवाद को लेकर जगत सिंह द्वितीय ने जोधपुर के महाराजा मानसिंह पर आक्रमण किया और गींगोली के युद्ध में मानसिंह को पराजित किया।
    • अंग्रेजों से सहायक संधि (15 अप्रैल 1818): मराठों और पिंडारियों की लगातार लूटपाट से तंग आकर सवाई जगत सिंह द्वितीय ने 15 अप्रैल 1818 ई. को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) के साथ सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर दिए, जिससे जयपुर का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया और वह ब्रिटिश छत्रछाया में आ गया।

14. सवाई राम सिंह द्वितीय — आधुनिक जयपुर के निर्माता (1835 ई. – 1880 ई.)

  • 1857 की क्रांति व ‘पिंक सिटी’ (गुलाबी रंग) का इतिहास:
    • 1857 की क्रांति में योगदान: क्रांति के समय राम सिंह द्वितीय जयपुर के महाराजा थे। इन्होंने क्रांतिकारियों के विरुद्ध जाकर अंग्रेजों का तन-मन-धन से शत-प्रतिशत समर्थन किया था। इस अटूट राजभक्ति से प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ‘सितार-ए-हिंद’ की सर्वोच्च उपाधि दी और कोटपूतली का परगना जागीर में वापस दे दिया।
    • जयपुर को गुलाबी रंग में रंगना (1876 ई.): सन 1876 ईस्वी में ब्रिटेन के प्रिंस ऑफ वेल्स ‘प्रिंस अल्बर्ट’ (और क्वीन विक्टोरिया) जयपुर के शाही दौरे पर आने वाले थे। उनके स्वागत और सम्मान के लिए महाराजा राम सिंह द्वितीय ने पूरे जयपुर शहर की सभी मुख्य इमारतों और बाजारों को एक ही रंग ‘गेरूआ रंग’ (पारंपरिक राजपूती स्वागत रंग, जिसे अंग्रेजी में ‘पिंक’ या गुलाबी कहा गया) में रंगवा दिया। तब से पूरी दुनिया में जयपुर का नाम ‘पिंक सिटी’ (Pink City) पड़ गया। प्रिंस अल्बर्ट के हाथों ही इन्होंने जयपुर में ‘अल्बर्ट हॉल म्यूजियम’ की नींव रखवाई, जो इंडो-सारसेनिक शैली का अद्भुत नमूना है।
  • सामाजिक व प्रशासनिक आधुनिक सुधार:
    • इन्हें ‘आधुनिक जयपुर का निर्माता’ कहा जाता है। इन्होंने समाज सुधारक मेजर लुडलो के प्रभाव में आकर जयपुर में सती प्रथा, दास प्रथा, बाल विवाह और कन्या वध पर कानूनी पूर्ण रोक लगाई
    • इन्होनें जयपुर में शिक्षा के विकास के लिए 1844 में ‘महाराजा कॉलेज’, ‘महारानी कॉलेज’ और ‘राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स’ (मदरसा-ए-हुनरी) की स्थापना की। जयपुर में पहली बार आधुनिक सड़कों, पानी के नलों और गैस की रोशनी की शुरुआत इन्हीं के काल में हुई थी। इन्होंने अपने नाम पर ‘रामनिवास बाग’ और ‘रामगढ़ बांध’ का निर्माण करवाया था।

15. सवाई माधोसिंह द्वितीय — ‘बब्बर शेर राजा’ (1880 ई. – 1922 ई.)

  • विश्व के सबसे बड़े चाँदी के पात्र व मुबारक महल:
    • इनके भारी भरकम शरीर और कड़क मिजाज के कारण लोग इन्हें प्यार से ‘जयपुर का बब्बर शेर’ कहते थे।
    • लंदन यात्रा व चाँदी के विशाल घड़े: सन 1902 ईस्वी में ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने के लिए माधोसिंह द्वितीय को लंदन आमंत्रित किया गया था। ये एक पक्के सनातनी हिंदू थे और समुद्र पार का पानी (विदेशी पानी) पीना पाप समझते थे।
    • इन्होंने अपनी लंदन यात्रा के लिए जयपुर के सुनारों से चाँदी के दो विशालकाय और भारी घड़े (पात्र) तैयार करवाए। इन घड़ों में पवित्र गंगाजल भरकर ये अपने साथ पानी का जहाज बुक करवाकर लंदन ले गए थे। ये दोनों चाँदी के घड़े आज भी जयपुर के सिटी पैलेस के दीवान-ए-खास में रखे हुए हैं, जिन्हें ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दुनिया के सबसे बड़े चाँदी के पात्र माना गया है।
    • स्थापत्य: इन्होंने मेहमानों के ठहरने के लिए सिटी पैलेस में स्थापत्य कला का सुंदर ‘मुबारक महल’ (मुगल, राजपूत और यूरोपीय शैली का मिश्रण) बनवाया। इन्होंने अपनी 9 प्रिय पासवान रानियों के लिए नाहरगढ़ दुर्ग के भीतर एक जैसे 9 महलों (माधवेन्द्र भवन) का निर्माण करवाया था। इन्होंने मदन मोहन मालवीय को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के निर्माण के लिए 5 लाख रुपये का गुप्त दान दिया था।

16. सवाई मान सिंह द्वितीय — अंतिम शासक व राजस्थान के प्रथम राजप्रमुख (1922 ई. – 1949 ई. / एकीकरण तक)

  • महान कूटनीति, पोलो के जादूगर व एकीकरण:
    • यह कछवाहा राजवंश के अंतिम शासक थे। यह विश्व प्रसिद्ध पोलो (Polo) खिलाड़ी थे, जिन्हें ‘पोलो का जादूगर’ कहा जाता था। इनका विवाह कूचबिहार (पश्चिमी बंगाल) की अत्यंत सुंदर राजकुमारी गायत्री देवी से हुआ था, जो बाद में भारत की प्रसिद्ध लोकसभा सदस्य बनीं और जिन्हें दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में गिना जाता था।
    • एकीकरण में योगदान: भारत की आजादी के समय इन्होंने प्रबुद्ध देशभक्ति का परिचय देते हुए स्वेच्छा से जयपुर का विलय भारत संघ में करने का निर्णय लिया। 30 मार्च 1949 को जब चारों बड़ी रियासतों (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर) को मिलाकर ‘बृहत् राजस्थान’ (Greater Rajasthan) का गठन किया गया, तो कूटनीतिक रूप से जयपुर को राजस्थान की स्थाई राजधानी घोषित किया गया।
    • प्रथम राजप्रमुख: सवाई मान सिंह द्वितीय को नवगठित राजस्थान राज्य का प्रथम और एकमात्र ‘राजप्रमुख’ (Governor की तर्ज पर) नियुक्त किया गया, वे इस पद पर 1956 तक (राजप्रमुख पद समाप्त होने तक) रहे। बाद में भारत सरकार ने इन्हें स्पेन में भारत का राजदूत (Ambassador) बनाकर भेजा था। सन 1970 ई. में लंदन में पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने के कारण इस अंतिम महाराजा का निधन हुआ।
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