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मेवाड़ का राजवंश

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1. गुहादित्य (संस्थापक) — शासनकाल: 566 ईस्वी के आसपास

  • इतिहास व महत्वपूर्ण कार्य:
    • इन्हें मेवाड़ के गुहिल वंश का मूल पुरुष, आदि पुरुष या संस्थापक माना जाता है।
    • कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, ये वल्लभी (गुजरात) के राजा शिलादित्य और रानी पुष्पावती के पुत्र थे। इनका जन्म गुफा (गुहा) में होने के कारण इनका नाम गुहादित्य पड़ा।
    • इन्होंने ईडर (गुजरात) के भील राजा मांडलिक की सहायता से 566 ईस्वी में गुहिल वंश की नींव रखी थी।

2. बप्पा रावल / कालभोज — शासनकाल: 734 ई. – 753 ई.

  • उपनाम व उपाधियाँ: बप्पा रावल, कालभोज, हिन्दू सूर्य, राजगुरु, चक्कवे (चारों दिशाओं को जीतने वाला)।
  • ऐतिहासिक योगदान व युद्ध:
    • ये हारित ऋषि के परम शिष्य थे और उनकी गाएं चराते थे। हारित ऋषि के आशीर्वाद से ही इन्हें मेवाड़ का राजपाठ मिला।
    • चित्तौड़ विजय (734 ई.): इन्होंने चित्तौड़गढ़ के अंतिम मौर्य शासक ‘मानमोरी’ को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया।
    • राजधानी: इन्होंने मेवाड़ की पहली राजधानी ‘नागदा’ (उदयपुर) को बनाया।
    • धार्मिक कार्य: नागदा के पास ‘कैलाशपुरी’ में मेवाड़ के आराध्य देव एकलिंग जी (लकुलीश) मंदिर का निर्माण करवाया।
    • सैन्य शौर्य: इन्होंने अरब आक्रमणकारियों (जैसे जुनैद) को खदेड़ते हुए गजनी (अफगानिस्तान) तक अधिकार कर लिया और वहाँ के शासक सलीम को हटाकर अपने भतीजे को गद्दी पर बिठाया। पाकिस्तान का प्रसिद्ध शहर ‘रावलपिंडी’ इन्हीं के सैन्य शिविर (Military Base) के कारण बसा था।
    • मुद्रा प्रणाली: मेवाड़ में सबसे पहले 115 ग्रेन का सोने का सिक्का बप्पा रावल ने ही चलाया था। इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने इनकी तुलना फ्रांसीसी सेनापति ‘चार्ल्स मार्टेल’ से की है।

3. अल्लट (आलू रावल) — शासनकाल: 10वीं शताब्दी के मध्य

  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
    • विदेशी विवाह: अल्लट मेवाड़ के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय विवाह किया। इन्होंने हूण राजकुमारी हरिया देवी से विवाह किया था। हरिया देवी ने मेवाड़ में ‘हर्षपुर’ नामक गांव बसाया था।
    • राजधानी परिवर्तन: इन्होंने नागदा के स्थान पर ‘आहड़’ को मेवाड़ की दूसरी व्यापारिक राजधानी बनाया।
    • प्रशासनिक सुधार: मेवाड़ के इतिहास में सबसे पहले नौकरशाही (Bureaucracy) की स्थापना करने का श्रेय अल्लट को ही जाता है। इन्होंने आहड़ में प्रसिद्ध वराह मंदिर का निर्माण करवाया था।

4. जैत्र सिंह — शासनकाल: 1213 ई. – 1253 ई.

  • उपनाम / उपाधि: रणसिंह, मेवाड़ के नव-शक्ति का संचालक।
  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
    • भूताला का युद्ध (1227 ई.): इस ऐतिहासिक युद्ध में जैत्र सिंह ने दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुतमिश की सेना को बुरी तरह पराजित किया था। हालांकि, लौटती हुई तुर्क सेना ने नागदा राजधानी को तहस-नहस कर दिया था।
    • चित्तौड़ को राजधानी बनाना: नागदा के नष्ट होने के बाद जैत्र सिंह ने सामरिक दृष्टि से सुरक्षित ‘चित्तौड़गढ़’ को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया।
    • इनके शासनकाल को डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने “मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल” कहा है।

5. तेज सिंह — शासनकाल: 1252 ई. – 1273 ई.

  • उपनाम / उपाधियाँ: परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर।
  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
    • इन्होंने दिल्ली के सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के आक्रमण को विफल किया था।
    • कला व साहित्य: इनके काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना सन 1261 ईस्वी में मेवाड़ चित्रशैली के प्रथम चित्रित ग्रंथ ‘श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि’ की रचना है। आहड़ में कमलचन्द्र नामक चित्रकार द्वारा ताड़पत्र पर यह चित्र बनाया गया था, जो राजस्थानी चित्रकला का मील का पत्थर है। इनकी पत्नी जैतल देवी ने चित्तौड़ में ‘श्याम पार्श्वनाथ मंदिर’ बनवाया था।

6. समर सिंह — शासनकाल: 1273 ई. – 1302 ई.

  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये तेज सिंह के पुत्र थे। सन 1299 ईस्वी में जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना गुजरात अभियान पर जा रही थी, तो समर सिंह ने मेवाड़ी सीमा से गुजरने के बदले खिलजी की सेना से ‘दंड’ (कर/Tax) वसूला था, जिससे खिलजी मेवाड़ से नाराज हो गया था। इनके दो पुत्र थे— रतन सिंह (जो मेवाड़ के राजा बने) और कुंभकरण (जो नेपाल चले गए और वहाँ गुहिल वंश की स्थापना की)।

7. रावल रतन सिंह — शासनकाल: 1302 ई. – 1303 ई.

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये मेवाड़ के ‘रावल शाखा’ के अंतिम शासक थे। इनका विवाह सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की अत्यंत रूपवान राजकुमारी पद्मिनी से हुआ था।
  • चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका (1303 ई.):
    • अलाउद्दीन खिलजी ने साम्राज्यवादी नीति और रानी पद्मिनी को पाने की लालसा में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
    • रतन सिंह के दो वीर सेनापति गोरा और बादल ने इस युद्ध में अद्भुत शौर्य दिखाते हुए वीरगति पाई।
    • 26 अगस्त 1303 ई. को किला खिलजी के अधीन हो गया। रावल रतन सिंह ने केसरिया किया और रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 वीरांगनाओं ने जौहर की अग्नि में आत्मोत्सर्ग किया। यह चित्तौड़ का पहला और राजस्थान का सबसे विशाल साका था।
    • मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ई. में अपने महाकाव्य ‘पद्मावत’ में इस घटना का विस्तृत वर्णन किया है। विजय के बाद खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर ‘खिज्राबाद’ रख दिया था।

8. राणा हम्मीर — शासनकाल: 1326 ई. – 1364 ई.

  • उपनाम व उपाधियाँ: मेवाड़ का उद्धारक, विषम घाटी पंचानन (विकट परिस्थितियों में सिंह के सदृश— कुंभलगढ़ प्रशस्ति में वर्णित), वीर राजा (रसिक प्रिया में)।
  • ऐतिहासिक योगदान व सिसोदिया शाखा की शुरुआत:
    • रतन सिंह की मृत्यु के बाद चित्तौड़ पर चौहानों और मुस्लिमों का अधिकार रहा। सिसोदा गांव के जागीरदार राणा हम्मीर ने 1326 ई. में बनवीर चौहान को हराकर चित्तौड़ पर पुनः हिंदुओं का अधिकार स्थापित किया।
    • चूँकि ये सिसोदा गांव के थे, इसलिए यहाँ से राजाओं को ‘राणा’ या ‘महाराणा’ कहा जाने लगा और राजवंश ‘सिसोदिया राजवंश’ कहलाया।
    • सिंगोली का युद्ध (बांसवाड़ा): हम्मीर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक (Mbt) की सेना को सिंगोली के युद्ध में करारी शिकस्त दी थी। इन्होंने चित्तौड़गढ़ में ‘बरवड़ी माता’ (अन्नपूर्णा माता) का मंदिर बनवाया, जो सिसोदिया वंश की इष्टदेवी हैं।

9. क्षेत्र सिंह (राणा खेता) — शासनकाल: 1364 ई. – 1382 ई.

  • ऐतिहासिक योगदान व महत्वपूर्ण कार्य:
    • ये राणा हम्मीर के पुत्र थे। इन्होंने अजमेर, जहाज़पुर और छप्पन के मैदान को जीतकर मेवाड़ में मिलाया।
    • मेवाड़-मालवा संघर्ष की शुरुआत: इन्होंने मालवा के सुल्तान दिलावर खां गोरी को पराजित किया, जिससे इतिहास प्रसिद्ध ‘मेवाड़-मालवा संघर्ष’ का सूत्रपात हुआ। इनकी दासी से उत्पन्न दो पुत्र ‘चाचा और मेरा’ थे, जिन्होंने आगे चलकर मेवाड़ की राजनीति में खलल डाला।

10. राणा लाखा (लक्ष्मण सिंह) — शासनकाल: 1382 ई. – 1421 ई.

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व भाग्यशाली घटनाएं:
    • जावर माइंस की खोज: इनके शासनकाल में उदयपुर के जावर में चांदी और सीसे की बहुत बड़ी खान (Mine) निकली, जिससे मेवाड़ आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध हो गया।
    • पिच्छोला झील का निर्माण: इन्हीं के काल में ‘छीतर’ या ‘पिच्छू’ नामक एक बंजारे ने अपने बैल की स्मृति में उदयपुर में प्रसिद्ध पिच्छोला झील का निर्माण करवाया था। इसी झील के पास ‘नटनी का चबूतरा’ बना हुआ है।
    • हंसाबाई से विवाह व चूंडा का बलिदान: मारवाड़ के राव चूंडा के पुत्र रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई के विवाह का नारियल राणा लाखा के पुत्र ‘कुंवर चूंडा’ के लिए भेजा था, लेकिन दरबार में मजाक के कारण वृद्ध राणा लाखा ने हंसाबाई से विवाह किया।
    • कुंवर चूंडा ने प्रतिज्ञा की कि वे जीवनभर मेवाड़ की गद्दी पर नहीं बैठेंगे और हंसाबाई की संतान ही राजा बनेगी। भीष्म जैसी प्रतिज्ञा के कारण कुंवर चूंडा को ‘मेवाड़ का भीष्म पितामह’ कहा जाता है।

11. राणा मोकल — शासनकाल: 1421 ई. – 1433 ई.

  • ऐतिहासिक योगदान व स्थापत्य:
    • ये राणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र थे। कम आयु होने के कारण प्रारंभ में कुंवर चूंडा इनके संरक्षक बने, लेकिन बाद में हंसाबाई के अविश्वास के कारण मारवाड़ के रणमल राठौड़ मेवाड़ के सर्वेसर्वा बन गए।
    • स्थापत्य: मोकल ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित त्रिभुवन नारायण मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया, जिसे आज ‘समिधेश्वर मंदिर’ या ‘मोकल का मंदिर’ कहा जाता है। इन्होंने एकलिंग जी मंदिर का परकोटा भी बनवाया था।
    • हत्या (1433 ई.): सन 1433 ई. में जब मोकल गुजरात के अहमदशाह के विरुद्ध अभियान पर ‘जीलवाड़ा’ (राजसमंद) नामक स्थान पर थे, तब चाचा और मेरा ने महपा पंवार के साथ मिलकर धोखे से राणा मोकल की हत्या कर दी।

12. महाराणा कुंभा (कुंभकरण) — शासनकाल: 1433 ई. – 1468 ई.

  • उपनाम व उपाधियाँ: अभिनव भरताचार्य (संगीत ज्ञान के कारण), हिंदू सुरताण, हाल गुरु (पहाड़ी किलों का विजेता), छाप गुरु (छापामार युद्ध का ज्ञाता), राणो रासो (साहित्यकारों का आश्रयदाता), दान गुरु, शैल गुरु।
  • ऐतिहासिक विजय व युद्ध:
    • सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुंभा ने अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम पर आक्रमण किया और उसे बुरी तरह पराजित कर छह महीने तक बंदी बनाकर रखा। इसी विजय की खुशी में कुंभा ने चित्तौड़गढ़ में 9 मंजिला ‘विजय स्तम्भ’ का निर्माण करवाया था।
    • चाम्पानेर की संधि (1456 ई.): कुंभा की शक्ति से डरकर मालवा के महमूद खिलजी और गुजरात के कुतुबुद्दीन शाह ने संयुक्त रूप से कुंभा को हराने के लिए यह संधि की थी, लेकिन कुंभा ने बदनोर के युद्ध (1457 ई.) में इन दोनों की संयुक्त सेना को कुचल दिया।
    • आवल-बावल की संधि (1453 ई.): कूटनीति के तहत हंसाबाई के प्रयासों से मेवाड़ और मारवाड़ (राव जोधा) के बीच यह संधि हुई, जिससे दोनों राज्यों की सीमा का निर्धारण (सोजत को केंद्र मानकर) हुआ।
  • कला, साहित्य व स्थापत्य का स्वर्णकाल:
    • कविराज श्यामलदास के ग्रंथ ‘वीर विनोद’ के अनुसार, मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण अकेले महाराणा कुंभा ने करवाया था। इनमें कुंभलगढ़ दुर्ग (शिल्पी- मंडन), अचलगढ़ (सिरोही), मचान दुर्ग और भोमट दुर्ग प्रमुख हैं।
    • संगीत ग्रंथ: कुंभा स्वयं एक महान वीणा वादक और संगीतकार थे। इन्होंने संगीत राज (5 भागों में विभक्त सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ), संगीत मीमांसा, संगीत सुधप्रबंध और जयदेव की गीत गोविंद पर ‘रसिक प्रिया’ नामक टीका लिखी थी। इनके काल में ही मथाई नदी के किनारे रणकपुर के जैन मंदिर (1444 खंभों का अजायबघर, शिल्पी- देपाक) का निर्माण हुआ था।
    • हत्या (1468 ई.): कुंभा के जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें ‘उन्माद’ (मानसिक रोग) हो गया था। कुंभलगढ़ के मामादेव कुंड के पास बैठे कुंभा की उनके ही ज्येष्ठ पुत्र उदा (उदयसिंह प्रथम) ने हत्या कर दी। उदा को मेवाड़ का प्रथम पितृहंता कहा जाता है।

13. राणा रायमल — शासनकाल: 1473 ई. – 1509 ई.

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: उदा के पितृहंता होने के कारण मेवाड़ी सरदारों ने उसे गद्दी से हटा दिया और कुंभा के दूसरे पुत्र रायमल को राजा बनाया। रायमल के काल में उनके बेटों— पृथ्वीराज सिसोदिया (उड़ना राजकुमार), जयमल और राणा सांगा के बीच उत्तराधिकार का भयंकर संघर्ष हुआ। अंततः सांगा को श्रीनगर (अजमेर) के करमचंद पंवार ने शरण दी और वे राजा बने। रायमल की पत्नी श्रृंगार देवी ने चित्तौड़ में ‘घोसुंडी की बावड़ी’ का निर्माण करवाया था।

14. राणा सांगा (संग्राम सिंह प्रथम) — शासनकाल: 1509 ई. – 1528 ई.

  • उपनाम / उपाधियाँ: हिन्दू पथ (हिंदू राजाओं का मार्गदर्शक), सैनिकों का भग्नावशेष (कर्नल टॉड के अनुसार, क्योंकि उनके शरीर पर युद्धों के 80 घाव थे, एक आंख, एक पैर और एक हाथ युद्ध में नष्ट हो चुके थे)।
  • ऐतिहासिक युद्ध व विजय:
    • खातोली का युद्ध (1517 ई. – बूंदी/कोटा): सांगा ने दिल्ली के लोदी वंश के सुल्तान इब्राहिम लोदी को बुरी तरह पराजित किया। इस युद्ध में सांगा का एक हाथ कट गया था।
    • बाड़ी का युद्ध (1518 ई. – धौलपुर): सांगा ने पुनः इब्राहिम लोदी के सेनापति मियां माकन को शिकस्त दी।
    • गागरोण का युद्ध (1519 ई.): मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को पराजित कर बंदी बनाया।
    • बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 – भरतपुर): सांगा ने मुगल बादशाह बाबर की सेना को करारी शिकस्त दी। यह बाबर के खिलाफ सांगा की अंतिम विजय थी।
    • खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 – भरतपुर): यह भारत के इतिहास का निर्णायक युद्ध था। बाबर ने इस युद्ध को ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) घोषित किया और ‘तमगा कर’ समाप्त किया। सांगा ने सभी राजपूत राजाओं को एकत्रित करने के लिए ‘पाती पेरवण’ परंपरा की शुरुआत की। युद्ध के मैदान में सिर पर तीर लगने से सांगा मूर्छित हो गए, जिन्हें बसवा (दौसा) ले जाया गया। बाबर ने ‘तुलुगमा युद्ध पद्धति’ और तोपखाने के बल पर यह युद्ध जीत लिया।
    • मृत्यु (30 जनवरी 1528 ई.): चंदेरी के शासक मेदिनीराय की सहायता के लिए जाते समय मेवाड़ी सरदारों ने सांगा को काल्पी (U.P) नामक स्थान पर जहर दे दिया, जिससे उनका निधन हुआ। सांगा की 32 खंभों की छतरी मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में बनी हुई है।

15. राणा रतन सिंह द्वितीय — शासनकाल: 1528 ई. – 1531 ई.

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ये राणा सांगा और धनबाई के पुत्र थे। ये स्वभाव से क्रूर और क्रोधी थे। बूंदी के सूरजमल हाड़ा के साथ अहेरिया (शिकार उत्सव) के दौरान आपसी विवाद में दोनों एक-दूसरे को मारते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

16. राणा विक्रमादित्य — शासनकाल: 1531 ई. – 1536 ई.

  • चित्तौड़गढ़ का द्वितीय साका (1535 ई.):
    • ये राणा सांगा और कर्मावती के छोटे पुत्र थे। इनके अल्पायु होने के कारण राजमाता कर्मावती शासन संभालती थीं।
    • सन 1534-35 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर भारी आक्रमण किया। कर्मावती ने दिल्ली के मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी, लेकिन समय पर सहायता नहीं मिली।
    • कर्मावती ने विक्रमादित्य और उदयसिंह को उनके ननिहाल बूंदी भेज दिया और दुर्ग की रक्षा का भार देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघसिंह को सौंपा। रावत बाघसिंह ने पाडन पोल पर लड़ते हुए केसरिया किया और रानी कर्मावती के नेतृत्व में वीरांगनाओं ने चित्तौड़ का दूसरा जौहर किया।
    • दासी पुत्र बनवीर का अधिकार: सांगा के भाई पृथ्वीराज के दासी पुत्र ‘बनवीर’ ने अवसर पाकर 1536 ई. में विक्रमादित्य की हत्या कर दी और चित्तौड़ की गद्दी पर अधिकार कर लिया।

17. महाराणा उदय सिंह द्वितीय — शासनकाल: 1537 ई. – 1572 ई.

  • पन्ना धाय का महान बलिदान: बनवीर जब छोटे राजकुमार उदयसिंह को भी मारने महल में आया, तो स्वामीभक्त धाय मां पन्ना धाय ने अपने सगे पुत्र ‘चंदन’ को उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर ने चंदन को उदयसिंह समझकर मार डाला। पन्ना धाय ने उदयसिंह को सुरक्षित बचाकर कुंभलगढ़ दुर्ग पहुँचाया, जहाँ आशा देवपुरा ने उन्हें शरण दी। 1540 ई. में ‘मावली के युद्ध’ में बनवीर को हराकर उदयसिंह राजा बने।
  • उदयपुर की स्थापना (1559 ई.): इन्होंने पहाड़ियों से घिरी सुरक्षित जगह पर उदयपुर शहर बसाया और वहाँ ‘उदयसागर झील’ तथा मोती महल का निर्माण करवाकर उदयपुर को मेवाड़ की नई स्थाई राजधानी बनाया।
  • चित्तौड़गढ़ का तृतीय साका (1567-68 ई.):
    • मुगल सम्राट अकबर ने चित्तौड़गढ़ को घेरा। सामंतों की सलाह पर उदयसिंह किले की जिम्मेदारी वीर सेनापतियों को सौंपकर गोगुंदा की पहाड़ियों में चले गए।
    • वीर जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया ने किले की रक्षा करते हुए अद्भुत वीरता दिखाई। युद्ध में जयमल के पैर में गोली लगने पर वे कल्ला जी राठौड़ के कंधों पर बैठकर लड़े (जिस कारण कल्ला जी को ‘चार हाथों वाले लोकदेवता’ कहा जाता है)।
    • जयमल और पत्ता ने केसरिया किया और पत्ता की पत्नी फूलकंवर के नेतृत्व में चित्तौड़ का तीसरा जौहर हुआ। अकबर ने विजय के बाद किले में 30,000 आम जनता का कत्लेआम करवाया था।
    • निधन: 28 फरवरी 1572 (होली के दिन) को गोगुंदा में उदयसिंह का निधन हुआ, जहाँ उनकी छतरी बनी है।

18. वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप — शासनकाल: 1572 ई. – 1597 ई.

  • उपनाम: कीका (बचपन का नाम, भीलों द्वारा प्यार से दिया गया), मेवाड़ केसरी, नrunning वीर।
  • जन्म: 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया) को कुंभलगढ़ के अंतःदुर्ग कटारगढ़ के बादल महल में हुआ था। इनकी माता का नाम जयवंता बाई (पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री) था।
  • राज्याभिषेक: उदयसिंह ने अपनी भटियानी रानी के प्रभाव में आकर जगमाल को उत्तराधिकारी बनाया था, लेकिन मेवाड़ी सरदारों ने जगमाल को हटाकर 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में प्रताप का राजतिलक किया। बाद में कुंभलगढ़ में इनका उत्सव मनाया गया, जिसमें मारवाड़ के राव चंद्रसेन भी शामिल हुए थे। अकबर ने प्रताप को अधीनता स्वीकार कराने के लिए चार दूत भेजे (ट्रिक: Jmbt – जलाल खां, मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल), लेकिन प्रताप ने झुकने से मना कर दिया।
  • हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध (18 जून 1576):
    • इसे अबुल फजल ने ‘खमनोर का युद्ध’, बदायूँनी ने ‘गोगुंदा का युद्ध’ और कर्नल टॉड ने ‘मेवाड़ की थर्मोपल्ली’ कहा है।
    • मुगल सेना का नेतृत्व आमेर के कुंवर मानसिंह प्रथम और आसफ खान कर रहे थे। प्रताप की सेना के अग्रभाग (हरावल) का नेतृत्व एकमात्र मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूरी कर रहे थे। भील सेना का नेतृत्व पुंजा भील ने किया।
    • युद्ध के दौरान प्रताप के प्रसिद्ध घोड़े ‘चेतक’ ने मानसिंह के हाथी (मर्दाना) के मस्तक पर पैर रख दिए, जिससे प्रताप ने भाले से वार किया। चेतक के घायल होने पर सादड़ी के झाला मन्ना (बीदा) ने प्रताप का राजकीय मुकुट और छत्र धारण कर केसरिया किया और प्रताप को सुरक्षित युद्ध से बाहर भेजा। चेतक की छतरी बलीचा (राजसमंद) में बनी हुई है। यह युद्ध अनिर्णायक रहा क्योंकि अकबर का मुख्य उद्देश्य प्रताप को बंदी बनाना था, जिसमें वह पूरी तरह असफल रहा।
  • दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.):
    • प्रताप ने विजयादशमी के दिन मुगलों के सैन्य थाने दिवेर पर हमला किया। प्रताप के पुत्र कुंवर अमरसिंह ने मुगल सूबेदार सुल्तान खान को भाले के एक ही प्रहार से घोड़े सहित चीर दिया था। राजपूतों की इस प्रचंड विजय के कारण कर्नल टॉड ने दिवेर के युद्ध को “मेवाड़ का मैराथन” कहा है।
    • चावंड राजधानी: प्रताप ने 1585 ई. में लूणा चावरिया को हराकर ‘चावंड’ को मेवाड़ की आपातकालीन राजधानी बनाया, जो अगले 28 वर्षों तक राजधानी रही। यहीं ‘मेवाड़ चित्रशैली’ का स्वतंत्र विकास हुआ।
    • निधन: 19 जनवरी 1597 को चावंड में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय अंदरूनी चोट के कारण इस महान वीर का प्राणांत हो गया। इनका अंतिम संस्कार बांडोली (उदयपुर) में हुआ, जहाँ केजड़ बांध के किनारे इनकी 8 खंभों की भव्य छतरी बनी हुई है।

19. अमर सिंह प्रथम — शासनकाल: 1597 ई. – 1620 ई.

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व मुगल-मेवाड़ संधि (1615 ई.):
    • ये महाराणा प्रताप के पुत्र थे। इन्होंने मुगलों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा और जहांगीर के सेनापति सुल्तान खान को पराजित किया।
    • ऐतिहासिक संधि: लगातार युद्धों से मेवाड़ की जनता और आर्थिक स्थिति पूरी तरह टूट चुकी थी। कुंवर करणसिंह और मेवाड़ी सरदारों के अत्यधिक दबाव के कारण अमर सिंह ने मजबूर होकर 5 फरवरी 1615 ई. को मुगल बादशाह जहांगीर के साथ प्रसिद्ध ‘मुगल-मेवाड़ संधि’ की।
    • संधि की शर्तें: 1) राणा कभी मुगल दरबार में स्वयं नहीं जाएगा, उसके स्थान पर कुंवर जाएगा। 2) मेवाड़ मुगलों के साथ कोई वैवाहिक संबंध नहीं बनाएगा। 3) चित्तौड़ का किला मेवाड़ को वापस मिलेगा, लेकिन वे उसकी मरम्मत नहीं करवा सकेंगे ताकि पुनः विद्रोह न हो।
    • इस संधि से दुखी होकर अमर सिंह ने राजपाठ छोड़ दिया और अपना अंतिम समय ‘नौचौकी पाल’ (राजसमंद) पर बिताया। आहड़ (उदयपुर) में महासत्यां नामक स्थान पर निर्मित पहली छतरी अमर सिंह प्रथम की ही है, इसके बाद मेवाड़ के सभी राजाओं की छतरियां यहीं बनीं।

20. करण सिंह — शासनकाल: 1620 ई. – 1628 ई.

  • ऐतिहासिक योगदान: ये मुगल दरबार में उपस्थित होने वाले मेवाड़ के पहले शासक थे। जहांगीर ने इन्हें 5000 का मनसब दिया था। इन्होंने उदयपुर की पिच्छोला झील में ‘जग मंदिर’ महलों का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया था। जब शाहजहाँ (शहजादा खुर्रम) ने अपने पिता जहांगीर के खिलाफ विद्रोह किया था, तो करण सिंह ने उसे इसी जग मंदिर महल में सुरक्षित शरण दी थी।

21. जगत सिंह प्रथम — शासनकाल: 1628 ई. – 1652 ई.

  • ऐतिहासिक व स्थापत्य योगदान:
    • इन्होंने अपने पिता द्वारा प्रारंभ किए गए ‘जग मंदिर’ महलों का निर्माण कार्य पूर्ण करवाया।
    • जगदीश मंदिर: इन्होंने उदयपुर में पंचायतन शैली में एक अत्यंत भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे ‘जगदीश मंदिर’ या ‘सपनों में बना मंदिर’ (Temple of Dreams) कहा जाता है। इस मंदिर की दीवार पर ‘जगन्नाथ राय प्रशस्ति’ उत्कीर्ण है, जिसके रचयिता कृष्ण भट्ट थे। इन्होंने चित्तौड़गढ़ दुर्ग की मरम्मत करवाकर मुगल-मेवाड़ संधि का उल्लंघन करना शुरू कर दिया था।

22. महाराणा राज सिंह प्रथम — शासनकाल: 1652 ई. – 1680 ई.

  • उपनाम व उपाधियाँ: विजय कटकातु (सेना को जीतने वाला), हाइड्रोलिक रूलर (जल प्रबंधन के कारण)।
  • ऐतिहासिक कूटनीति व औरंगजेब का विरोध:
    • ये मेवाड़ के एक अत्यंत स्वाभिमानी और कड़क राजा थे। इन्होंने चित्तौड़गढ़ के परकोटे का निर्माण कार्य तेज करवाया, जिससे नाराज होकर शाहजहाँ ने सादुल्ला खां के नेतृत्व में सेना भेजकर निर्माण गिरवा दिया था।
    • मुगल उत्तराधिकार युद्ध: शाहजहाँ के बेटों के बीच युद्ध के समय राज सिंह तटस्थ रहे, लेकिन कूटनीति से औरंगजेब का समर्थन किया। राजा बनने के बाद जब औरंगजेब ने कट्टर नीतियां अपनाईं, तो राज सिंह उसके सबसे बड़े विरोधी बन गए।
    • चारुमती विवाद (1660 ई.): किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से औरंगजेब जबरन विवाह करना चाहता था। चारुमती के धर्म की रक्षा के लिए राज सिंह ने औरंगजेब को चुनौती देकर स्वयं उससे विवाह कर लिया। इसी युद्ध के दौरान सलूंबर के रावत रतन सिंह चूंडावत की नई नवेली पत्नी हाड़ी रानी (सहज कंवर) ने युद्ध में जा रहे पति के मोह को भंग करने के लिए अपना सिर काटकर ‘सेनानी’ (निशानी) के रूप में दे दिया था (कवि मेघराज मुकुल की कविता: “चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी”)।
    • धार्मिक संरक्षण: औरंगजेब ने जब 1679 में ‘जज़िया कर’ लगाया, तो राज सिंह ने पत्र लिखकर इसका कड़ा विरोध किया। औरंगजेब द्वारा हिंदू मंदिरों को तोड़े जाने के समय राज सिंह ने आगे बढ़कर संरक्षण दिया। इन्होंने मथुरा से लाए गए भगवान कृष्ण के स्वरूपों को मेवाड़ में स्थापित कर श्रीनाथ जी मंदिर (नाथद्वारा/सिहाड़) और द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली/राजसमंद) का निर्माण करवाया।
  • राजसमंद झील व राज प्रशस्ति:
    • इन्होंने अकाल राहत कार्यों के तहत गोमती नदी के पानी को रोककर भव्य राजसमंद झील का निर्माण करवाया।
    • राज प्रशस्ति: इस झील की उत्तरी पाल (नौचौकी पाल) पर 25 काले संगमरमर के विशाल पत्थरों पर संस्कृत भाषा में विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख उत्कीर्ण करवाया, जिसे ‘राज प्रशस्ति’ कहा जाता है। इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे। इसमें बप्पा रावल से लेकर राज सिंह तक का पूरा इतिहास दर्ज है।

23. जय सिंह — शासनकाल: 1680 ई. – 1698 ई.

  • ऐतिहासिक योगदान: इन्होंने औरंगजेब के साथ पुनः समझौता कर ‘मुगल-मेवाड़ संधि’ को बहाल किया और जज़िया कर के बदले मुगलों को कुछ परगने दिए। इन्होंने गोमती, झामरी और रूपारेल नदियों के पानी को रोककर ‘जयसमंद झील’ (डेबर झील) का निर्माण करवाया, जो मीठे पानी की राजस्थान की सबसे बड़ी कृत्रिम झील है। इस झील में ‘बाबा का भकड़ा’ और ‘प्यारी’ नामक प्रसिद्ध टापू स्थित हैं।

24. अमर सिंह द्वितीय — शासनकाल: 1698 ई. – 1710 ई.

  • देबारी समझौता (1708 ई.): मारवाड़ के अजीत सिंह और जयपुर के सवाई जयसिंह को मुगलों से उनके राज्य वापस दिलाने के लिए अमर सिंह द्वितीय ने उदयपुर के ‘देबारी’ में एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता किया। अमर सिंह ने इस शर्त पर सहायता की कि सवाई जयसिंह का विवाह उनकी पुत्री ‘चन्द्रकुंवर’ से होगा और उससे उत्पन्न संतान ही जयपुर की अगली राजा बनेगी (इसी शर्त के कारण आगे चलकर जयपुर में ईश्वरी सिंह और माधोसिंह के बीच भयंकर उत्तराधिकार युद्ध हुआ था)।

25. जगत सिंह द्वितीय — शासनकाल: 1734 ई. – 1751 ई.

  • हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734): राजस्थान की रियासतों पर लगातार बढ़ रहे मराठा आक्रमणों को रोकने और सभी राजपूत राजाओं को एक मंच पर लाने के लिए भीलवाड़ा के ‘हुरड़ा’ नामक स्थान पर एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन की रूपरेखा सवाई जयसिंह ने तैयार की थी, लेकिन इसकी अध्यक्षता महाराणा जगत सिंह द्वितीय ने की थी। आपसी मतभेद और स्वार्थ के कारण यह सम्मेलन पूरी तरह असफल रहा। इन्होंने पिच्छोला झील में सुंदर ‘जग निवास’ (Lake Palace) महलों का निर्माण करवाया था।

26. भीम सिंह — शासनकाल: 1778 ई. – 1828 ई.

  • कृष्णा कुमारी विवाद: भीम सिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी के विवाह का रिश्ता पहले मारवाड़ के भीम सिंह से तय हुआ था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद रिश्ता जयपुर के जगत सिंह द्वितीय से कर दिया गया। इस बात पर मारवाड़ के नए राजा मानसिंह नाराज हो गए। जयपुर और मारवाड़ के बीच 1807 ई. में ‘गींगोली का युद्ध’ (नागौर) हुआ। अंततः अमीर खां पिंडारी के दबाव और मेवाड़ की सुरक्षा के लिए 1810 ई. में कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया गया, जो इतिहास का एक काला अध्याय है।
  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि (1818 ई.): मराठों और पिंडारियों के भयंकर लूटपाट से तंग आकर महाराणा भीम सिंह ने 13 जनवरी 1818 ई. को अंग्रेजों (Eic) के साथ सहायक संधि कर ली। मेवाड़ की तरफ से हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी ठाकुर अजीत सिंह थे और अंग्रेजों की तरफ से चार्ल्स मेटकॉफ़ थे। इसी संधि के तहत कर्नल जेम्स टॉड को मेवाड़ का पहला ‘पॉलिटिकल एजेंट’ (P.A.) बनाकर उदयपुर भेजा गया था।

27. स्वरूप सिंह — शासनकाल: 1842 ई. – 1861 ई.

  • 1857 की क्रांति में योगदान: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय ये मेवाड़ के महाराणा थे। इन्होंने क्रांतिकारियों के विरुद्ध जाकर अंग्रेजों (कप्तान शावर्स) का पूर्ण समर्थन किया था। नीमच छावनी से भागे हुए 40 अंग्रेज परिवारों को इन्होंने उदयपुर की पिच्छोला झील के ‘जग मंदिर’ में सुरक्षित ठहराया था और उनकी देखरेख के लिए बेदला के राव बख्तसिंह को नियुक्त किया था।
  • सामाजिक सुधार: इन्होंने सन 1853 ई. में मेवाड़ में खेरवाड़ा के पास भील समाज में प्रचलित ‘डाकण प्रथा’ पर कानूनी रोक लगाई। इनके काल में ही सन 1861 ई. में मेवाड़ में सती प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया। जब इनका निधन हुआ, तो इनकी पासवान ‘ऐजाबाई’ इनके साथ सती हुई थी, जो मेवाड़ के इतिहास की अंतिम सती प्रथा की घटना मानी जाती है। इन्होंने मेवाड़ में ‘स्वरूपशाही सिक्के’ भी चलाए थे।

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