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राजस्थान के प्रमुख पशु मेले

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राजस्थान के प्रमुख पशु मेले : Quick Revision Notes

पशु मेले का नाममेला स्थल (स्थान)आयोजन का समय (हिंदी माह)विशेष विवरण (महत्वपूर्ण तथ्य)
श्री बलदेव पशु मेलामेड़ता सिटी (नागौर)चैत्र शुक्ल 1 से पूर्णिमानागौरी नस्ल के लिए प्रसिद्ध।
श्री वीर तेजाजी पशु मेलापरबतसर (डीडवाना)श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपदआय की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा मेला।
श्री रामदेव पशु मेलामानासर (नागौर)माघ (शुक्ल पक्ष)यहाँ नागौरी बैलों का भारी व्यापार होता है।
गोमती सागर पशु मेलाझालरापाटन (झालावाड़)वैशाख शुक्लमालवी नस्ल के पशुओं के लिए प्रसिद्ध।
चन्द्रभागा पशु मेलाझालरापाटन (झालावाड़)कार्तिक पूर्णिमाहाड़ौती क्षेत्र का प्रमुख मालवी नस्ल मेला।
पुष्कर पशु मेलापुष्कर (अजमेर)कार्तिक शुक्लसबसे रंगीन मेला; गिर (रैण्डा) नस्ल हेतु प्रसिद्ध।
श्री गोगामेड़ी पशु मेलानोहर (हनुमानगढ़)भाद्रपदसर्वाधिक लंबी अवधि तक चलने वाला मेला।
श्री जसवंत पशु मेलाभरतपुरआश्विन शुक्लहरियाणा नस्ल के पशुओं का प्रमुख केंद्र।
महाशिवरात्रि पशु मेलाकरौलीफाल्गुन कृष्णहरियाणवी नस्ल का व्यापार यहाँ प्रमुख है।
मल्लीनाथ पशु मेलातिलवाड़ा (बालोतरा)चैत्र (कृष्ण एकादशी से शुक्ल एकादशी)राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला।
बहरोड़ पशु मेलाबहरोड़ (कोटपूतली)मार्गशीर्षमुर्रा भैंसों के व्यापार के लिए विख्यात।
रघुनाथ पुरी पशु मेलासांचौरचैत्र माससांचौर क्षेत्र का प्रमुख पारंपरिक मेला।
सेवड़िया पशु मेलारानीवाड़ा (सांचौर)चैत्र शुक्लयहाँ राज्य की सबसे बड़ी दूध डेयरी स्थित है।
गधों का मेलालूणियावास (जयपुर)आश्विन (खलकाणी माता)उत्तर भारत का सबसे बड़ा गधों का मेला।

राजस्थान के प्रमुख पशु मेले : In Details

1. श्री बलदेव पशु मेला (मेड़ता सिटी, नागौर)

  • मेला स्थल: मेड़ता सिटी, नागौर।
  • आयोजन का समय: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (1) से पूर्णिमा तक।
  • इतिहास व महत्व:
    • इस मेले की शुरुआत किसान नेता और स्वतंत्रता सेनानी श्री बलदेव राम मिर्धा की स्मृति में की गई थी।
    • यह मेला चैत्र के महीने में शुरू होता है, जो नागौरी बैलों के व्यापार के लिए पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है।
  • विशेष तथ्य: इस मेले में मुख्यतः नागौरी नस्ल के बैल और गायों का भारी मात्रा में क्रय-विक्रय होता है। यह नागौर क्षेत्र के सबसे पुराने मेलों में से एक है।

2. श्री वीर तेजाजी पशु मेला (परबतसर, डीडवाना-कुचामन)

  • मेला स्थल: परबतसर (पहले यह नागौर में था, अब नए जिलों के गठन के बाद यह डीडवाना-कुचामन जिले में आता है)।
  • आयोजन का समय: श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या (या भाद्रपद शुक्ल दशमी – तेजा दशमी तक मुख्य आकर्षण)।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
    • जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह के समय इस मेले को मारवाड़ के अंतर्गत परबतसर में स्थानांतरित किया गया था। यह लोक देवता वीर तेजाजी की याद में आयोजित होता है।
  • आर्थिक महत्व: आमदनी (Revenue) और आय के मामले में यह राजस्थान के सबसे बड़े पशु मेलों में गिना जाता है। यहाँ मारवाड़ी ऊंट और नागौरी बैलों की मांग सबसे ज्यादा होती है।

3. श्री रामदेव पशु मेला (मानासर, नागौर)

  • मेला स्थल: मानासर गाँव, नागौर।
  • आयोजन का समय: माघ शुक्ल प्रतिपदा (1) से माघ पूर्णिमा तक।
  • शुरुआत और इतिहास:
    • इस मेले को व्यवस्थित रूप से शुरू करने का श्रेय जोधपुर के स्वर्गीय महाराजा उम्मेद सिंह को जाता है। उन्होंने 1940 के दशक में इसकी शुरुआत करवाई थी।
  • विशेषता: इस मेले का मुख्य आकर्षण नागौरी बैलों की दौड़ और उनकी सुंदर कद-काठी की प्रतियोगिताएं होती हैं। यहाँ दूर-दूर से व्यापारी नागौरी नस्ल के बैल खरीदने आते हैं।

4. गोमती सागर पशु मेला (झालरापाटन, झालावाड़)

  • मेला स्थल: झालरापाटन, झालावाड़ (हाड़ौती क्षेत्र)।
  • आयोजन का समय: वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13) से ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी (5) तक।
  • भौगोलिक महत्व:
    • यह मेला हाड़ौती अंचल का एक प्रमुख पशु मेला है। मध्य प्रदेश की सीमा के पास होने के कारण यहाँ अंतर-राज्यीय (inter-state) व्यापारी बहुत आते हैं।
  • मुख्य नस्ल: इस मेले में मुख्यतः मालवी नस्ल के गोवंश (गाय-बैल) का व्यापार सबसे अधिक होता है।

5. चन्द्रभागा पशु मेला (झालरापाटन, झालावाड़)

  • मेला स्थल: चन्द्रभागा नदी के तट पर, झालरापाटन (झालावाड़)।
  • आयोजन का समय: कार्तिक पूर्णिमा से मार्गशीर्ष कृष्ण पंचमी तक।
  • धार्मिक और व्यापारिक संगम:
    • कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग चन्द्रभागा नदी में पवित्र स्नान करते हैं, जिसके साथ ही यह भव्य पशु मेला शुरू होता है।
  • विशेषता: गोमती सागर मेले की तरह यहाँ भी मालवी नस्ल के पशुओं और गिर नस्ल की गायों का बाजार सजता है। हाड़ौती संस्कृति के लोक नृत्य और गीत इस मेले की रौनक बढ़ाते हैं।

6. पुष्कर पशु मेला (पुष्कर, अजमेर)

  • मेला स्थल: पुष्कर, अजमेर।
  • आयोजन का समय: कार्तिक शुक्ल अष्टमी से मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया तक (मुख्य मेला कार्तिक पूर्णिमा को)।
  • उपनाम और वैश्विक पहचान: इसे ‘राजस्थान का सबसे रंगीला मेला’ और ‘ऊंटों का मेला’ (Camel Fair) कहा जाता है।
  • विशेष तथ्य:
    • यह राजस्थान का सबसे बड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे प्रसिद्ध मेला है, जहाँ विदेशी पर्यटक भारी संख्या में आते हैं।
    • यहाँ गीर (रेंडी) नस्ल की गायों और चमकीले सजे हुए ऊंटों की प्रतियोगिताएं (जैसे कैमल डांस) होती हैं।

7. श्री गोगामेड़ी पशु मेला (नोहर, हनुमानगढ़)

  • मेला स्थल: नोहर तहसील, हनुमानगढ़।
  • आयोजन का समय: भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा से भाद्रपद पूर्णिमा तक (पूरा भाद्रपद महीना)।
  • धार्मिक जुड़ाव: यह मेला लोक देवता गोगाजी (जाहरपीर) के समाधि स्थल पर आयोजित होता है।
  • भौगोलिक विशेषता: हनुमानगढ़ जिला पंजाब और हरियाणा की सीमा के करीब है, इसलिए यहाँ हरियाणवी नस्ल के पशुओं (विशेषकर गायों और भैंसों) का व्यापार सबसे ज्यादा होता है। यह राजस्थान में सबसे लंबी अवधि तक चलने वाले मेलों में से एक है।

8. श्री जसवंत पशु मेला (भरतपुर)

  • मेला स्थल: भरतपुर।
  • आयोजन का समय: आश्विन शुक्ल पंचमी से आश्विन शुक्ल चतुर्दशी तक।
  • इतिहास: इस मेले का आयोजन भरतपुर के महाराजा जसवंत सिंह की याद में राज्य सरकार के पशुपालन विभाग द्वारा किया जाता है।
  • विशेषता: बृज क्षेत्र के प्रभाव के कारण इस मेले में हरियाणवी नस्ल के बैल और भैंसों की ‘मुर्रा नस्ल’ का व्यापार बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है। मेले के दौरान सांस्कृतिक कुश्ती और संगीत के कार्यक्रम भी होते हैं।

9. महाशिवरात्रि पशु मेला (करौली)

  • मेला स्थल: करौली।
  • आयोजन का समय: फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी (शिवरात्रि) के आसपास।
  • मौसम और महत्व: सर्दियों के अंत और वसंत की शुरुआत में होने वाला यह मेला करौली क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है।
  • मुख्य आकर्षण: यहाँ मुख्य रूप से हरियाणवी नस्ल के सुंदर और तंदुरुस्त पशुओं का व्यापार होता है। पूर्वी राजस्थान के किसानों के लिए यह मेला बीज और कृषि उपकरणों की खरीद का भी बड़ा माध्यम है।

10. मल्लीनाथ पशु मेला (तिलवाड़ा, बालोतरा)

  • मेला स्थल: तिलवाड़ा (पहले यह बाड़मेर में आता था, अब नए जिलों के अनुसार यह बालोतरा जिले में स्थित है)। यह लूणी नदी के तट पर भरता है।
  • आयोजन का समय: चैत्र कृष्ण एकादशी (11) से चैत्र शुक्ल एकादशी तक।
  • इतिहास व प्राचीनता: यह राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला माना जाता है, जिसकी शुरुआत रावल मल्लीनाथ जी के समय हुई थी।
  • पशुओं की नस्लें: यहाँ थारपारकर नस्ल की गायें, कांकरेज नस्ल के बैल, और मालानी नस्ल के बेहतरीन घोड़े (Marwari Horses) बिक्री के लिए लाए जाते हैं।

11. बहरोड़ पशु मेला (बहरोड़, कोटपूतली-बहरोड़)

  • मेला स्थल: बहरोड़ (नया जिला: कोटपूतली-बहरोड़)।
  • आयोजन का समय: मार्गशीर्ष मास (नवंबर-दिसंबर)।
  • भौगोलिक प्रभाव: अहीरवाटी क्षेत्र (हरियाणा बॉर्डर के पास) होने के कारण इस मेले की अपनी एक अलग पहचान है।
  • विशेषता: इस मेले में विशेष रूप से मुर्रा नस्ल की भैंसों (जिन्हें स्थानीय भाषा में काला सोना कहा जाता है) का सबसे बड़ा बाजार लगता है।

12. रघुनाथ पुरी पशु मेला (सांचौर)

  • मेला स्थल: सांचौर (अब यह जालौर से अलग होकर स्वतंत्र जिला बन चुका है)।
  • आयोजन का समय: चैत्र मास।
  • स्थानीय महत्व: यह मेला सांचौर और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के पशुपालकों के लिए रीढ़ की हड्डी माना जाता है। यहाँ सांचौरी नस्ल के बैलों का व्यापार खूब होता है।

13. सेवड़िया पशु मेला (रानीवाड़ा, सांचौर)

  • मेला स्थल: रानीवाड़ा, सांचौर जिला।
  • आयोजन का समय: चैत्र शुक्ल एकादशी से शुरू।
  • अनूठी विशेषता: रानीवाड़ा का यह मेला कांकरेज नस्ल के बैलों और दुधारू गायों के व्यापार के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। कांकरेज नस्ल के पशु अपनी ‘सवाई चाल’ के लिए जाने जाते हैं।

14. गधों का मेला (लूणियावास, जयपुर)

  • मेला स्थल: लूणियावास गाँव (भावगढ़ बंध्या), जयपुर ग्रामीण।
  • आयोजन का समय: आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से छठ तक (खलकाणी माता मंदिर परिसर)।
  • ऐतिहासिक और अनोखा मेला:
    • यह पूरे उत्तर भारत का सबसे बड़ा गधों और खच्चरों का मेला है। यह लगभग 500 साल पुराना ऐतिहासिक मेला है।
  • विशेष तथ्य: मान्यता है कि यहाँ खलकाणी माता की पूजा के बाद पशुओं का व्यापार शुरू होता है। यहाँ गधों की सेहत और उनकी नस्ल के आधार पर उनकी बोलियां लगती हैं।
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