मूल ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक अवधारणाएँ
- इतिहास के जनक (Father of History): यूनान (Greece) के महान दार्शनिक हेरोडोटस (Herodotus) को माना जाता है. उन्होंने लगभग 2500 वर्ष पूर्व ‘हिस्टोरिका’ (Historica) नामक अमर ग्रन्थ की रचना की थी.
- अभिलेख (Inscriptions): पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तनों पर खुदे हुए प्राचीन लेखों को अभिलेख कहते हैं.
- प्रशस्ति (Eulogy): जिन अभिलेखों में किसी शासक या राजवंश की केवल उपलब्धियों, विजयों और यशोगाथा का वर्णन होता है, उन्हें ‘प्रशस्ति’ कहते हैं (जैसे- कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति).
- एपिग्राफी (Epigraphy): अभिलेखों के वैज्ञानिक अध्ययन को ‘पुरालेखशास्त्र’ या एपिग्राफी कहा जाता है.
- पैलियोग्राफी (Paleography): प्राचीन लिपियों (Scripts) के अध्ययन को ‘पैलियोग्राफी’ कहते हैं.
- संस्कृत का पहला अभिलेख: शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ (गुजरात) अभिलेख भारत में शुद्ध संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण पहला सबसे बड़ा और प्रामाणिक अभिलेख माना जाता है.
पुरातत्व विभाग का इतिहास
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI): इसकी स्थापना ब्रिटिश काल में वर्ष 1861 में अलेक्जेन्डर कनिंघम के नेतृत्व में की गई थी. कनिंघम को ‘भारतीय पुरातत्व का जनक’ कहा जाता है.
- राजस्थान में पुरातात्विक कार्य: राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य सर्वप्रथम वर्ष 1871 में प्रारंभ करने का श्रेय ए. सी. एल. कार्लाइल (A.C.L. Carlleyle) को जाता है. इन्होंने दौसा और जयपुर क्षेत्र में पुरातात्विक खोजें की थीं.
इतिहास के स्रोतों का वर्गीकरण (Classification of Sources)
राजस्थान के इतिहास को जानने के स्रोतों को मुख्य रूप से तीन प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
┌─────────────────── इतिहास जानने के स्रोत ───────────────────┐
│ │
┌─────────────────────┼─────────────────────────────────────┐ │
1. पुरातात्विक स्रोत 2. पुरालेखागारीय स्रोत (Bahi Records) 3. साहित्यिक स्रोत │
│ │ │ │
• शिलालेख व प्रशस्तियाँ • हकीकत बही (Daily Diary) • राजस्थानी साहित्य │
• ताम्रपत्र (Copper Plates) • कमठाना बही (Construction Records) • संस्कृत साहित्य │
• सिक्के व मृदभांड • खरीता बही (Correspondence) • फारसी/अरबी साहित्य │
• फारसी अभिलेख • हुकूमत बही, तोजी बही • विदेशी विवरण │
राजस्थान के प्रमुख संस्कृत व ब्राह्मी शिलालेख
1. बरली का शिलालेख
- स्थान: भलोट माता मंदिर, बरली गाँव, अजमेर।
- समय/काल: 443 ईसा पूर्व (443 BC) – यह राजस्थान का सबसे प्राचीन और भारत का दूसरा सबसे पुराना शिलालेख है.
- भाषा एवं लिपि: प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि.
- खोजकर्ता: इसकी खोज प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने वर्ष 1912 में की थी.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह शिलालेख अजमेर के मध्यमिया (नगरी) क्षेत्र में जैन धर्म के प्रसार को प्रमाणित करता है. इसमें वीर निर्वाण संवत का उल्लेख है, जो इसे महावीर स्वामी के समय से जोड़ता है. वर्तमान में यह अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है.
2. अशोक का भाब्रू शिलालेख
- स्थान: बीजक की पहाड़ी, बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़ जिला, पूर्व में जयपुर).
- खोजकर्ता: इस शिलालेख की खोज वर्ष 1840 में कैप्टन बर्ट द्वारा की गई थी.
- भाषा एवं लिपि: यह प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण है.
- इन-डेप्थ ऐतिहासिक तथ्य:
- यह शिलालेख मौर्य सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने की सबसे बड़ी और अकाट्य पुष्टि करता है. इसमें अशोक स्वयं को ‘मगधाधिराज’ कहता है और बौद्ध धर्म के त्रिरत्न — बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता है.
- वर्तमान स्थिति: वर्ष 1840 में सुरक्षा की दृष्टि से इस चट्टानी लेख को काटकर बंगाल भेजा गया था, और वर्तमान में यह एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (कोलकाता म्यूजियम) में सुरक्षित रखा हुआ है.
3. घोसुण्डी का शिलालेख
- स्थान: घोसुण्डी गाँव (नगरी के पास), चित्तौड़गढ़।
- काल/समय: द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व (2nd Century BC) – राजस्थान के प्राचीनतम लेखों में से एक.
- भाषा एवं लिपि: इसकी भाषा संस्कृत है और लिपि Brahmmi है.
- वाचन/अध्ययन: इस लेख को सर्वप्रथम पढ़ने और इस पर विस्तृत शोध करने का श्रेय डॉ. डी. आर. भंडारकर को जाता है.
- इन-डेप्थ ऐतिहासिक तथ्य:
- यह संपूर्ण राजस्थान में वैष्णव संप्रदाय / भागवत संप्रदाय से संबंधित सबसे प्राचीन और पहला लिखित अभिलेखीय साक्ष्य है.
- इसमें गज वंश के शासक सर्वतात द्वारा ‘अश्वमेध यज्ञ’ करवाए जाने और भगवान संकर्षण (बलराम) तथा वासुदेव (कृष्ण) के मंदिर के चारों तरफ पत्थर की चारदीवारी (नारायण वाटिका) बनवाने का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है.
4. मानमोरी का अभिलेख
- स्थान: पुठोली गाँव के पास मानसरोवर झील के तट पर, चित्तौड़गढ़।
- समय/काल: 713 ई. (8वीं शताब्दी).
- लेखक व उत्कीर्णक: लेखक पुष्प और उत्कीर्णक शिवादित्य थे.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स:
- कर्नल जेम्स टॉड को यह अभिलेख मिला था. जब वे इसे इंग्लैंड ले जा रहे थे, तो जहाज का संतुलन बिगड़ने के कारण उन्होंने इसे राजपूताना के समुद्र में फेंक दिया था.
- इसमें मौर्य वंश के चार राजाओं — महेश्वर, भीम, भोज और मान का उल्लेख मिलता है. इसी अभिलेख से सिद्ध होता है कि बप्पा रावल ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजा मान मोरी से जीता था. इसमें ‘अमृत मंथन’ कथा का भी उल्लेख है.
5. नांदसा यूप-स्तम्भ लेख
- स्थान: नांदसा गाँव के तालाब के भीतर, भीलवाड़ा।
- समय/काल: 225 ई. (विक्रम संवत 282).
- स्थापना: सोमी नामक व्यक्ति द्वारा.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह एक गोल स्तंभ पर खुदा हुआ है जो तालाब के पानी में डूबा रहता है. इसमें उत्तरी भारत में पौराणिक यज्ञों (विशेषकर षष्ठिरात्र यज्ञ) के पुनरुत्थान की जानकारी मिलती है. यह मालव गणराज्य के प्रतापी शासक श्रीसोम द्वारा शक्ति विस्तार को प्रमाणित करता है.
6. बड़वा यूप अभिलेख
- स्थान: बड़वा गाँव, बारां (पूर्व में कोटा रियासत).
- समय/काल: 238-239 ई. (विक्रम संवत 295).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यहाँ से तीन यूप (यज्ञ) स्तंभ मिले हैं, जो मौखरि वंश के इतिहास को जानने का सबसे प्राचीन और एकमात्र प्रामाणिक स्रोत हैं. इसमें मौखरि महासेनापति बल के तीन पुत्रों द्वारा ‘त्रिरात्र यज्ञ’ किए जाने का लिखित साक्ष्य है.
7. नगरी का शिलालेख
- स्थान: नगरी (प्राचीन नाम: माध्यमिका), चित्तौड़गढ़।
- समय/काल: यह घोसुण्डी शिलालेख का समकालीन (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) माना जाता है.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: नगरी प्राचीन शिवि जनपद की राजधानी थी. इस शिलालेख से राजस्थान में गुप्तकालीन कला, बौद्ध विहारों की उपस्थिति और विष्णु पूजा के प्राचीन केंद्रों की पुष्टि होती है. डॉ. भण्डारकर ने यहाँ बड़े पैमाने पर उत्खनन करवाया था.
8. भ्रमरमाता का लेख
- स्थान: भ्रमरमाता मंदिर, छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़।
- समय/काल: 490 ई. (5वीं शताब्दी).
- रचयिता व उत्कीर्णक: रचयिता मित्रभव और उत्कीर्णक पूर्वा थे.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह लेख गौर वंश और औलिकर वंश के राजाओं के राजनीतिक इतिहास पर प्रकाश डालता है. यह गुप्त काल के बाद के सामंतवादी ढांचे और तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.
9. बसन्तगढ़ का शिलालेख
- स्थान: क्षेमंकरी माता (खीमल माता) मंदिर, बसन्तगढ़, सिरोही।
- समय/काल: 625 ई. (विक्रम संवत 682).
- शासक: चावड़ा वंश के शासक वरमलात के समय का.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स:
- इस शिलालेख का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्व यह है कि इसमें पहली बार ‘राजस्थानीयादित्य’ शब्द का प्रयोग हुआ है, जो इस भूभाग के लिए ‘राजस्थान’ नाम का सबसे प्राचीनतम लिखित स्रोत माना जाता है.
- इसमें सामंती व्यवस्था और दास प्रथा के शुरुआती प्रमाण मिलते हैं.
10. सांमोली का शिलालेख
- स्थान: सांमोली गाँव, उदयपुर।
- समय/काल: 646 ई. (विक्रम संवत 703).
- शासक: गुहिल वंश के प्रतापी राजा शीलादित्य के समय का.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स:
- इसमें उल्लेख है कि जावर क्षेत्र में तांबे और जस्ते की खदानों का खनन शुरू हो चुका था, जिससे वहां आर्थिक संपन्नता आई. इसमें महाजन समुदाय के मुखिया जैतक द्वारा एक देव-मंदिर बनवाने का वर्णन है.
11. अपराजित का शिलालेख
- स्थान: कुण्डेश्वर मंदिर, नागदा, उदयपुर।
- समय/काल: 661 ई. (7वीं शताब्दी).
- रचयिता व सूत्रधार: रचयिता दामोदर और उत्कीर्णक यशोभट्ट थे.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें गुहिल शासक अपराजित की सैन्य विजयों और वराह राजाओं पर उनकी जीत का वर्णन है. ओझा जी ने इस लेख के आधार पर मेवाड़ के राजाओं की वंशावली की कड़ियों को जोड़ा था.
12. कणसवा का अभिलेख
- स्थान: कणसवा गाँव के शिव मंदिर, कोटा।
- समय/काल: 738 ई. (विक्रम संवत 795).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह राजस्थान के इतिहास के लिए एक निर्णायक अभिलेख है, क्योंकि यह राजस्थान में मौर्य वंश के अंतिम राजा ‘धवल’ (Dhavala) के अस्तित्व को प्रमाणित करता है. इसके बाद राजस्थान से मौर्यों का राजनीतिक प्रभाव समाप्त हो गया था.
13. मण्डौर का अभिलेख
- स्थान: मंडौर, जोधपुर।
- समय/काल: 837 ई. (9वीं शताब्दी).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के इतिहास का प्रारंभिक दस्तावेज है. इसमें प्रतिहारों के मूल पुरुष हरिश्चंद्र (ब्राह्मण) और उनकी क्षत्रिय पत्नी भद्रा से उत्पन्न संतानों की वंशावली दी गई है.
14. घटियाला का शिलालेख
- स्थान: घटियाला, जोधपुर।
- समय/काल: 861 ई. (विक्रम संवत 918).
- शासक: प्रतिहार राजा कक्कुट के समय का.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें प्रतिहार राजा कक्कुट द्वारा मग (शकलद्वीपीय) ब्राह्मणों के सहयोग से रोहिंसकूप (घटियाला) में एक व्यापारिक केंद्र स्थापित करने का वर्णन है. यह लेख प्रतिहार काल में जाति व्यवस्था और जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाता है.
15. मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति
- स्थान: ग्वालियर।
- समय/काल: 9वीं शताब्दी (प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज के काल की).
- भाषा: शुद्ध संस्कृत.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें प्रतिहार राजवंश को लक्ष्मण का वंशज (सौमित्र) कहा गया है. इसमें नागभट्ट प्रथम द्वारा अरब आक्रमणकारियों (म्लेच्छों) को हराने और मिहिरभोज की महान सैनिक उपलब्धियों का वर्णन है.
16. प्रतापगढ़ का अभिलेख
- स्थान: प्रतापगढ़।
- समय/काल: 946 ई. (विक्रम संवत 1003).
- शासक: गुर्जर-प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल द्वितीय के समय का.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह लेख स्थानीय कर प्रणाली, कृषि व्यवस्था और सिंचाई के साधनों की विस्तृत जानकारी देता है. इसमें गुर्जर-प्रतिहारों के सामंतों द्वारा मंदिरों को दिए गए भूमि अनुदानों का कानूनी ब्योरा दर्ज है.
17. बिजौलिया का शिलालेख
- स्थान: पार्श्वनाथ जैन मंदिर, बिजौलिया, भीलवाड़ा।
- समय/काल: 3 फरवरी 1170 ई. (विक्रम संवत 1227).
- रचयिता व लेखक: रचयिता गुणभद्र थे, और इसे श्रावक लोलाक द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स:
- इसमें सांभर और अजमेर के चौहानों को ‘वत्सगोत्रीय ब्राह्मण’ बताया गया है.
- इसमें प्राचीन शहरों के ऐतिहासिक नामों की सूची मिलती है: जाबालिपुर (जालौर), शाकम्भरी (सांभर), श्रीमाल (भीनमाल), विंध्यवल्ली (बिजौलिया), और नागह्रद (नागदा). इसमें वासुदेव चौहान द्वारा 551 ई. में सांभर झील के निर्माण का भी उल्लेख है.
18. अचलेश्वर की प्रशस्ति
- स्थान: अचलेश्वर महादेव मंदिर, आबू, सिरोही।
- समय/काल: 1285 ई. (विक्रम संवत 1342).
- रचयिता: वेदशर्मा.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें आबू के परमार राजाओं और मेवाड़ के गुहिल राजाओं (समरसिंह) का इतिहास वर्णित है. इसमें राजपूतों की उत्पत्ति के अग्निकुंड सिद्धांत का समर्थन किया गया है.
19. लूणवसही / नेमिनाथ (आबू-देलवाड़ा) की प्रशस्ति
- स्थान: देलवाड़ा के जैन मंदिर, आबू, सिरोही।
- समय/काल: 1230 ई. (विक्रम संवत 1287).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इस प्रशस्ति की रचना चंडेश्वर ने की थी. यह मंदिर वस्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों द्वारा बनवाया गया था जो जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ को समर्पित है. इसमें आबू के परमार शासकों और वाघेल वंश के राजाओं की वंशावली मिलती है.
20. चीरवा का शिलालेख
- स्थान: चीरवा गाँव, उदयपुर।
- समय/काल: 1273 ई. (विक्रम संवत 1330).
- रचयिता व लेखक: रचयिता रत्नप्रभ सूरि और लेखक पाशचंद्र थे.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें मेवाड़ के चार गुहिल राजाओं — पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह, और समरसिंह की उपलब्धियों का वर्णन है. इसमें इल्तुतमिश की सेना के खिलाफ लड़े गए भूताला के युद्ध के बाद के मेवाड़ की स्थिति और सती प्रथा पर प्रकाश डाला गया है.
21. रणकपुर प्रशस्ति
- स्थान: रणकपुर के चौमुखा जैन मंदिर, पाली।
- समय/काल: 1439 ई. (विक्रम संवत 1496).
- सूत्रधार/शिल्पी: इसका शिल्पी दीपाक (देपाक) था.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें मेवाड़ के गुहिल वंश का बप्पा रावल से लेकर महाराणा कुंभा तक का पूरा इतिहास दर्ज है. इस प्रशस्ति में बप्पा रावल और कालभोज को दो अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है, जो इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है.
22. कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति
- स्थान: विजय स्तंभ, चित्तौड़गढ़ दुर्ग, चित्तौड़गढ़।
- समय/काल: 1460 ई. (विक्रम संवत 1517).
- रचयिता: इसकी शुरुआत कви अत्रि ने की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र कवि महेश ने इसे पूर्ण किया.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह महाराणा कुंभा के काल का सबसे भव्य साहित्यिक कीर्तिमान है. इसी प्रशस्ति में महाराणा कुंभा को उनकी अद्वितीय युद्ध रणनीतियों, दुर्ग निर्माण कला और राजनीतिक विद्वता के कारण ‘राजगुरु’, ‘शैल गुरु’, ‘दानगुरु’, ‘हाल गुरु’, और ‘अभिनव भर्ताचार्य’ जैसी महान उपाधियों से विभोषित और पुकारा गया है.
23. कुम्भलगढ़ की प्रशस्ति / शिलालेख
- स्थान: कुंभश्याम मंदिर, कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजसमंद।
- समय/काल: 1460 ई. (विक्रम संवत 1517).
- लेखक: इसके लेखन को भी कवि अत्रि और महेश से जोड़ा जाता है.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें महाराणा हम्मीर को ‘विषम घाटी पंचानन’ की उपाधि दी गई है. इसमें बप्पा रावल को ‘विप्र’ (ब्राह्मण) वंश का बताया गया है.
24. रायसिंह प्रशस्ति
- स्थान: जूनागढ़ दुर्ग के मुख्य द्वार (सूरज पोल), बीकानेर।
- समय/काल: 1594 ई. (विक्रम संवत 1651).
- रचयिता: जैन मुनि जयता।
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें बीकानेर के राठौड़ों का राव बीका से लेकर महाराजा रायसिंह तक का इतिहास दर्ज है. यह प्रशस्ति जूनागढ़ दुर्ग के निर्माण कार्य के पूर्ण होने की आधिकारिक घोषणा करती है.
25. आमेर का लेख
- स्थान: आमेर दुर्ग, जयपुर।
- समय/काल: 1612 ई. (विक्रम संवत 1669).
- शासक: कछवाहा राजा सवाई मानसिंह प्रथम के समय का.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इस लेख में जयपुर के कछवाहा राजवंश को आधिकारिक रूप से ‘रघुवंश तिलक’ कहा गया है (अर्थात श्रीराम के वंशज).
26. जगन्नाथराय प्रशस्ति
- स्थान: जगदीश मंदिर, उदयपुर।
- समय/काल: 1652 ई. (विक्रम संवत 1709).
- रचयिता: कृष्ण भट्ट.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह प्रथम के काल की है. इसमें महाराणा हल्दीघाटी के युद्ध, महाराणा प्रताप के संघर्ष और शाहजहाँ के समय मेवाड़ पर हुए मुगल आक्रमणों का बहुत ही सुंदर और ऐतिहासिक विवरण मिलता है.
27. राजसिंह प्रशस्ति — विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख
- स्थान: राजसमंद झील की ‘नौचौकी पाल’, राजसमंद।
- समय/काल: 1676 ई. (विक्रम संवत 1733).
- रचयिता: रणछोड़ भट्ट तैलंग।
- इन-डेप्थ ऐतिहासिक तथ्य (विश्व कीर्तिमान): यह संस्कृत भाषा में 25 बड़ी काले संगमरमर की शिलाओं पर उत्कीर्ण है. इसे विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख माना जाता है. इसमें महाराणा राजसिंह द्वारा औरंगज़ेब के खिलाफ की गई ‘मुगल-मेवाड़ संधि (1615 ई.)’ का पूरा आधिकारिक विवरण खुदा हुआ है.
राजस्थान के प्रमुख फारसी अभिलेख
28. ढाई दिन का झोंपड़ा का लेख
- स्थान: ढाई दिन का झोंपड़ा, अजमेर।
- समय/काल: इल्तुतमिश और कुतुबुद्दीन ऐबक का काल.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यहाँ लगे फारसी लेखों से इस इमारत के मस्जिद में बदलने के समय, इसके मुख्य शिल्पकार ‘अबू बक्र’ का नाम और दिल्ली सल्तनत के शुरुआती राजाओं की अजमेर विजयों का प्रामाणिक पता चलता है.
29. धाई-बी-पीर की दरगाह का लेख
- स्थान: धाई-बी-पीर की दरगाह, चित्तौड़गढ़।
- समय/काल: 1325 ई. (14वीं शताब्दी).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इस फारसी लेख की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह है कि इसमें अलाउद्दीन खिलजी को ‘संसार का रक्षक’ और ‘ईश्वर की छाया’ (जिल-इ-इलाही) जैसी भारी-भरकम उपाधियों से नवाजा गया है.
30. शाहबाद का फारसी लेख
- स्थान: शाहबाद मस्जिद, बारां।
- समय/काल: 1679 ई. (मुगल सम्राट औरंगज़ेब का काल).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें औरंगज़ेब द्वारा जनता के कल्याण के लिए स्थानीय करों को माफ करने और राहदारी (Toll Tax) समाप्त करने की शाही घोषणा दर्ज है.
राजस्थान के ऐतिहासिक ताम्रपत्र
31. धूलेव का दान-पत्र / ताम्रपत्र (679 ई.)
- स्थान: धुलेव (ऋषभदेव), उदयपुर।
- समय/काल: 679 ई. (7वीं शताब्दी).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह मेवाड़ के गुहिल राजवंश के राजा शील या शीलाদित्य के समय का माना जाता है. यह राजस्थान के सबसे प्राचीनतम ताम्रपत्रों में से एक है.
32. ब्रोच गुर्जर ताम्रपत्र (978 ई.)
- महत्व: यह अंतरराष्ट्रीय और अंतर-प्रांतीय ऐतिहासिक संबंधों को दर्शाता है.
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह ताम्रपत्र मूल रूप से गुर्जर-प्रतिहार राजवंश से संबंधित है. कनिंघम ने राजपूतों (गुर्जरों) की उत्पत्ति ‘यू-ची’ (कुषाण) जाति से सिद्ध करने का प्रयास किया था.
33. चीकली का ताम्रपत्र (1483 ई.)
- स्थान: चीकली गाँव, डूंगरपुर।
- समय/काल: 1483 ई. (15वीं शताब्दी).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें पहली बार स्थानीय लगान, सिंचाई के साधनों और मध्यकालीन समाज में प्रचलित ‘दास प्रथा’ (Slavery System) व किसानों की आर्थिक स्थिति का स्पष्ट लिखित विवरण मिलता है.
34. पुर का ताम्रपत्र (1535 ई.)
- स्थान: पुर गाँव, भीलवाड़ा।
- समय/काल: 1535 ई. (16वीं शताब्दी).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: यह चित्तौड़गढ़ के दूसरे साके (1535 ई.) के ठीक पहले का है, जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था. इसमें मेवाड़ की राजमाता रानी कर्मावती द्वारा जौहर की ज्वाला में कूदने से पहले भूमि दान दिए जाने की राजाज्ञा उत्कीर्ण है.
35. खेरादा का ताम्रपत्र (1437 ई.)
- स्थान: मेवाड़ क्षेत्र.
- समय/काल: 1437 ई. (महाराणा कुंभा का काल).
- इन-डेप्थ फैक्ट्स: इसमें उस दौर में जनता से लिए जाने वाले विभिन्न प्रकार के लाग-बाग (Taxes), धार्मिक करों की माफी और कुंभा द्वारा किए गए लोक-कल्याणकारी भूमि दानों का विवरण दर्ज है.
भाग 6: पुरालेखागारीय स्रोत एवं राजकीय बहियाँ
मध्यकाल की प्रशासनिक और राजकीय बहियों का बड़ा संकलन वर्तमान में राजस्थान राज्य अभिलेखागार (बीकानेर) में सुरक्षित है:
36. हकीकत बही
- विवरण: यह राजा या महाराजा की ऑफिशियल डेली डायरी होती थी. इसमें राजा के सुबह जागने से लेकर दरबार लगाने, उनकी यात्राओं, शिकार अभियानों, अन्य राजाओं से मुलाकातों और उत्सवों का प्रतिदिन का रिकॉर्ड होता था.
37. हुकूमत बही
- विवरण: यह राजा द्वारा जारी किए गए शाही आदेशों की नकल रखने वाला रजिस्टर होता था. मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के समय की हुकूमत बही इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है.
38. कमठाना बही
- विवरण: ‘कमठाना’ शब्द का स्थानीय अर्थ होता है — भवन या निर्माण कार्य. इस बही में रियासत के दुर्गों, महलों, छतरियों, बावड़ियों और तालाबों के निर्माण में लगने वाली सामग्री के खर्च और काम करने वाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी का पूरा हिसाब दर्ज होता था.
विशेष शब्दावली: कमठा लाग
- विवरण: मध्यकालीन राजस्थान में जब किसी दुर्ग या महल का निर्माण या मरम्मत कार्य शुरू होता था, तो उस निर्माण कार्य के खर्च को पूरा करने के लिए राजा द्वारा अपनी ही प्रजा या जागीरदारों पर एक विशेष कर लगाया जाता था, जिसे ‘कमठा लाग’ कहा जाता था.
39. खरीता बही
- विवरण: यह रियासत के विदेश मंत्रालय / राजनयिक पत्राचार का रिकॉर्ड होती थी. एक राजा द्वारा दूसरे स्वतंत्र राजा को, या मुगल सम्राट / ब्रिटिश शासकों को भेजे जाने वाले कूटनीतिक पत्रों और संधियों के मसौदों की प्रतिलिपि इस खरीता बही में संभालकर रखी जाती थी.
विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)
Q1. किस प्रशस्ति में महाराणा कुंभा को ‘राजगुरु’, ‘शैल गुरु’ और ‘अभिनव भर्ताचार्य’ जैसी उपाधियों से नवाजा गया है? (RAS Pre)
- उत्तर: कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.) में.
Q2. विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख ‘राजप्रशस्ति’ काले संगमरमर की कितनी शिलाओं पर उत्कीर्ण है और इसके रचयिता कौन थे? (RPSC 2nd Grade)
- उत्तर: 25 शिलाओं पर; इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे.
Q3. मेवाड़ की राजमाता रानी कर्मावती द्वारा जौहर में प्रवेश करने से पहले दिए गए भूमि अनुदान की जानकारी किस ताम्रपत्र से मिलती है? (RSSB CET)
- उत्तर: पुर का ताम्रपत्र (1535 ई.) से.
Q4. मध्यकाल में एक शासक द्वारा दूसरे शासक के साथ किए जाने वाले राजकीय पत्राचार के रिकॉर्ड को क्या कहा जाता था? (REET)
- उत्तर: खरीता बही।
Q5. कर्नल जेम्स टॉड ने किस ऐतिहासिक अभिलेख को भारी होने के कारण इंग्लैंड ले जाते समय समुद्र में फेंक दिया था? (LDC Exam)
- उत्तर: मानमोरी का अभिलेख (713 ई., चित्तौड़गढ़)।
