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राजस्थान के संत एवं संप्रदाय

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राजस्थान की पावन भूमि भक्ति और अध्यात्म का मुख्य केंद्र रही है. यहाँ के संतों ने सामाजिक कुप्रथाओं, ऊंच-नीच और बाह्य आडंबरों का विरोध कर मानव धर्म की स्थापना की. राजस्थानी भक्ति परंपरा को मुख्य रूप से तीन धाराओं में विभाजित किया जाता है:

  1. निर्गुण भक्ति धारा: ईश्वर को निराकार (बिना रूप के) मानकर मन में आराधना करना (जैसे- संत जाम्भोजी, संत जसनाथजी, संत दादू दयाल).
  2. सगुण भक्ति धारा: ईश्वर को साकार रूप (मूर्ति रूप) में पूजना (जैसे- मीराबाई, भक्त कवि दुर्लभ).
  3. मिश्रित (सगुण-निर्गुण) धारा: जो दोनों रूपों को मानते हैं (जैसे- संत चरणदासजी, संत मावजी, संत हरिदासजी).

प्रमुख संप्रदाय एवं उनकी प्रधान पीठ

संप्रदाय का नामसंस्थापक संतप्रधान पीठ (मुख्य गद्दी)विशेष नियम / ग्रंथ
बिश्नोई संप्रदायसंत जाम्भोजीमुकाम नोखा, बीकानेर29 नियम, जम्भसागर
जसनाथी संप्रदायसंत जसनाथजीकतरियासर, बीकानेर36 नियम, सिंभूधड़ा
दादू पंथसंत दादू दयालनरेना / नारायणा, दूदू52 स्तंभ, दादू वाणी
चरणदासी संप्रदायसंत चरणदासजीदिल्ली (मूल स्थान: अलवर)42 नियम, ब्रज चरित्र
रामस्नेही संप्रदायसंत रामचरणजीशाहपुरा, भीलवाड़ाफूलडोल उत्सव, अणभैवाणी
निरंजनी संप्रदायसंत हरिदासजीगाढ़ा गाँव, डीडवाना-कुचामनकलयुग के वाल्मीकि
निष्कलंक संप्रदायसंत मावजीसाबला गाँव, डूंगरपुरचोपड़ा ग्रंथ, वागड़ के धनी
लालदासी संप्रदायसंत लालदासजीनगला जहाज, भरतपुरसांप्रदायिक सद्भाव, मेवाती वाणी
गुदड़ संप्रदायसंत दासजीदाँतड़ा, भीलवाड़ागुदड़ (फटे-पुराने कपड़े) पहनना
अलखिया संप्रदायस्वामी लालगिरिबीकानेरअलख स्तुति प्रकाश

संतों एवं संप्रदायों की विस्तृत जानकारी

1. बिश्नोई संप्रदाय — संत जाम्भोजी

  • संत जाम्भोजी का परिचय: जन्म 1451 ई. (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) को पीपासर (नागौर) में एक पंवार वंशीय राजपूत परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम लोहटजी और माता का नाम हंसादेवी था. इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है. इन्हें ‘पर्यावरण वैज्ञानिक’ भी कहा जाता है.
  • संप्रदाय की स्थापना: जाम्भोजी ने 1485 ई. में समराथल धोरा (बीकानेर) में इस संप्रदाय की स्थापना की.
  • विशेष विवरण:
    • इस संप्रदाय में कुल 29 नियम (20 + 9 = बिश्नोई) हैं, जिनमें जीव रक्षा और हरे वृक्षों (विशेषकर खेजड़ी) को न काटना सबसे मुख्य है.
    • जाम्भोजी के उपदेश स्थल को ‘साथरी’ कहा जाता है. इनके प्रमुख ग्रंथ जम्भसागर, जम्भगीता, और बिश्नोई धर्म प्रकाश हैं.
    • ऐतिहासिक संबंध: जाम्भोजी के प्रभाव में आकर दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाया था और अकाल के समय चारे की व्यवस्था की थी. जोधपुर के राजा राव जोधा और बीकानेर के राव बीका इनका अत्यधिक सम्मान करते थे.
    • खेजड़ली बलिदान (1730 ई.): जोधपुर के राजा अभयसिंह के समय अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने वृक्षों को बचाने के लिए अपना बलिदान दिया था.

2. जसनाथी संप्रदाय — संत जसनाथजी

  • संत जसनाथजी का परिचय: जन्म 1482 ई. में कतरियासर (बीकानेर) में एक जानी जाट परिवार में हुआ था. इनके गुरु का नाम गोरखनाथ था. इन्होंने मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में कतरियासर में ही जीवित समाधि ले ली थी.
  • विशेष विवरण:
    • इस संप्रदाय के अनुयायियों के लिए 36 कड़े नियम निर्धारित हैं. ये लोग जाल के वृक्ष और मोर के पंख को अत्यंत पवित्र मानते हैं.
    • अग्नि नृत्य : इस संप्रदाय के सिद्ध पुरुषों द्वारा धधकते हुए अंगारों पर किया जाने वाला ‘अग्नि नृत्य’ विश्व प्रसिद्ध है, जिसमें वे ‘फ़तेह-फ़तेह’ का उद्घोष करते हैं.
    • ऐतिहासिक संबंध: सिकंदर लोदी ने जसनाथजी के चमत्कारों से प्रभावित होकर उन्हें कतरियासर के पास 500 बीघा जमीन दान में दी थी. इनके प्रमुख ग्रंथ ‘सिंभूधड़ा’ और ‘कोण्डा’ हैं.

3. दादू पंथ — संत दादू दयाल

  • संत दादू दयाल का परिचय: इन्हें ‘राजस्थान का कबीर’ कहा जाता है. इनका जन्म 1544 ई. में अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ था, लेकिन इनकी कर्मस्थली राजस्थान रही. इन्होंने 1574 ई. में सांभर में दादू पंथ की स्थापना की.
  • प्रधान पीठ: नरेना / नारायणा (अब नया जिला दूदू, पूर्व में जयपुर).
  • विशेष विवरण:
    • दादू जी के उपदेशों की भाषा ढूंढाड़ी (सधुक्कड़ी) है. इनके उपदेश स्थल को ‘अलख दरीबा’ कहा जाता है.
    • अकबर से मुलाकात: 1585 ई. में आमेर के राजा भगवंतदास के प्रयासों से दादू दयाल ने फतेहपुर सीकरी में मुगल सम्राट अकबर से मुलाकात की थी और 40 दिनों तक धार्मिक चर्चा की थी.
    • अनोखी परंपरा: दादू पंथी लोग मृत देह को जलाते या दफनाते नहीं हैं, बल्कि उसे पशु-पक्षियों के खाने के लिए जंगल में छोड़ देते हैं. दादू जी का शव भी ‘भैंराना की पहाड़ी’ (दूदू) में रखा गया था, जिसे ‘दादू खोल’ कहते हैं.
    • 52 स्तंभ : दादू जी के कुल 152 शिष्य थे, जिनमें से 100 एकांतवासी थे और 52 मुख्य शिष्यों ने विचार फैलाए, जिन्हें ’52 स्तंभ’ कहते हैं. इनके सबसे प्रसिद्ध शिष्य संत सुंदरदास (साहित्यिक संत) और संत रज्जबजी थे. रज्जबजी आजीवन दूल्हे के वेश में रहे और दादू जी के उपदेश सुनते रहे.

4. रामस्नेही संप्रदाय

यह संप्रदाय पूरी तरह निर्गुण राम का उपासक है. इस संप्रदाय की कुल 4 प्रमुख शाखाएं हैं.

  1. शाहपुरा शाखा (प्रधान पीठ) – शाहपुरा जिला:
    • संस्थापक: संत रामचरणजी (मूल नाम: रामकृष्ण, जन्म: सोढ़ा गांव, टोंक). इनके उपदेश ‘अणभैवाणी’ ग्रंथ में संकलित हैं.
    • उत्सव: यहाँ होली के अगले दिन से प्रसिद्ध ‘फूलडोल उत्सव’ (चैत्र के कृष्ण पक्ष एकम से पंचमी) मनाया जाता है.
  2. सिंहथल शाखा – बीकानेर:
    • संस्थापक: संत हरिरामदासजी। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘निशानी’ है, जिसमें प्राणायाम और योग का वर्णन है. इन्होंने गुरु को ‘घर’ और राम को ‘हरि’ कहा (हरि गुरु मिलाप).
  3. रेण शाखा – नागौर:
    • संस्थापक: संत दरियावजी। इन्होंने राम शब्द में ‘रा’ का अर्थ राम और ‘म’ का अर्थ मोहम्मद बताकर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया.
  4. खेड़ापा शाखा – जोधपुर:
    • संस्थापक: संत रामदासजी। यह सिंहथल के संत हरिरामदासजी के शिष्य थे.

5. चरणदासी संप्रदाय — संत चरणदासजी

  • परिचय: संत चरणदासजी का जन्म डेहरा (अलवर) में हुआ था, लेकिन इस संप्रदाय की मुख्य गद्दी (प्रधान पीठ) दिल्ली में स्थित है.
  • विशेष विवरण:
    • इस संप्रदाय में कुल 42 नियम हैं. यह संप्रदाय सगुण और निर्गुण का अनूठा मिश्रण है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण की भक्ति सखी भाव से की जाती है. इस संप्रदाय के लोग पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं.
    • ऐतिहासिक भविष्यवाणी: संत चरणदासजी ने 1739 ई. में भारत पर नादिरशाह के आक्रमण की सटीक भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी.
    • महिला शिष्याएं: इनकी दो प्रसिद्ध महिला शिष्याएं दया बाई (ग्रंथ: दया बोध, विनय मालिका) और सहजो बाई (ग्रंथ: सहज प्रकाश) थीं, जिनकी रचनाएं मेवाती बोली में हैं.

6. निरंजनी संप्रदाय — संत हरिदासजी

  • परिचय: संत हरिदासजी का मूल नाम हरि सिंह सांखला था. जन्म कापड़ोद (नागौर) में हुआ था. शुरुआत में ये डकैती (लूटपाट) का कार्य करते थे, लेकिन बाद में ज्ञान प्राप्त होने पर संत बने. इसलिए इन्हें ‘कलियुग का वाल्मीकि’ कहा जाता है.
  • प्रधान पीठ: गाढ़ा गाँव (अब नया जिला डीडवाना-कुचामन, पूर्व में नागौर).
  • विशेष विवरण: इस संप्रदाय में ईश्वर को ‘अलख निरंजन’ या ‘हरी निरंजन’ कहा जाता है. इनके उपदेश ‘मंत्र राज प्रकाश’ और ‘हरिपुरुष जी की वाणी’ नामक ग्रंथों में संकलित हैं. इनकी पूजा पद्धति में नाथ पंथ और कबीर पंथ का मिश्रण मिलता है.

7. निष्कलंक संप्रदाय — संत मावजी

  • परिचय: संत मावजी को ‘वागड़ का धनी’ कहा जाता है. इनका जन्म साबला गाँव (डूंगरपुर) में हुआ था. इन्होंने ज्ञान की प्राप्ति के बाद श्रीकृष्ण के ‘कल्कि अवतार’ (विष्णु का 10वां अवतार) के रूप में निष्कलंक संप्रदाय चलाया.
  • विशेष विवरण:
    • इन्होंने ही प्रसिद्ध बेणेश्वर धाम (सोम, माही, जाखम का त्रिवेणी संगम) की स्थापना की थी, जिसे आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है.
    • चोपड़ा ग्रंथ : मावजी द्वारा वागड़ी भाषा में रचित उपदेशों के ग्रंथ ‘चोपड़ा’ कहलाते हैं. इन चोपड़ों में महायुद्धों (जैसे तीसरे विश्व युद्ध) और भविष्य की सटीक भविष्यवाणियाँ लिखी हैं. ये चोपड़ा केवल दिवाली के दिन बाहर निकाले जाते हैं.

8. लालदासी संप्रदाय — संत लालदासजी

  • परिचय: संत लालदासजी का जन्म धोलीदूब (अलवर) में एक मेव परिवार में हुआ था. यह संप्रदाय मेवात क्षेत्र (अलवर-भरतपुर) में सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा प्रतीक है.
  • प्रधान पीठ: नगला जहाज (भरतपुर). समाधि शेरपुर (अलवर) में है.
  • विशेष विवरण:
    • लालदासी संप्रदाय में दीक्षित होने की प्रक्रिया अनोखी है. दीक्षा लेने वाले व्यक्ति को गधे पर काला मुंह करके, पीठ पीछे बैठाकर पूरे गांव में घुमाया जाता है, ताकि उसके मन से अहंकार और घमंड पूरी तरह समाप्त हो जाए.
    • लालदासजी स्वयं लकड़ी काटकर जीवनयापन करते थे, वे किसी से दान नहीं लेते थे. मुगल शहजादे दारा शिकोह ने दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के संबंध में इनसे आशीर्वाद मांगा था, तब लालदासजी ने कहा था कि जो अपने भाइयों की हत्या करेगा, वही दिल्ली की गद्दी पर बैठेगा (जो कि औरंगज़ेब के संदर्भ में सच हुआ).

राजस्थान की प्रमुख महिला संत

1. मीराबाई — राजस्थान की राधा

  • परिचय: जन्म 1498 ई. में कुड़की गाँव (अब नया जिला ब्यावर, पहले पाली/नागौर सीमा) में हुआ था. इनके पिता रत्नसिंह और दादा राव दूदा थे. इनका विवाह मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ हुआ था, लेकिन विवाह के कुछ वर्ष बाद भोजराज की मृत्यु हो गई.
  • भक्ति पद्धति: मीराबाई श्रीकृष्ण को अपना पति मानकर (माधुर्य भाव/कांता भाव) भक्ति करती थीं. इनके गुरु का नाम संत रैदास (रविदास) था, जिनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में मीरा मंदिर के सामने बनी है.
  • अंतिम समय: मीराबाई अपने जीवन के अंतिम दिनों में गुजरात के द्वारका स्थित रणछोड़ राय मंदिर की मूर्ति में विलीन हो गई थीं. इनकी प्रमुख रचनाएं पदावलियाँ, गीत गोविंद की टीका, और नरसी जी रो मायरो (रत्ना खाती के सहयोग से) हैं.

2. संत राणाबाई — राजस्थान की दूसरी मीरा

  • परिचय: इनका जन्म हरनावा गाँव (अब नया जिला डीडवाना-कुचामन, पूर्व में नागौर) में एक जाट परिवार में हुआ था.
  • विशेष विवरण: इन्होंने भी मीराबाई की तरह कृष्ण भक्ति की और आजीवन कुंवारी रहकर आध्यात्मिक जीवन बिताया. फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को इन्होंने जीवित समाधि ली थी. इन्हें मारवाड़ अंचल में ‘राजस्थान की दूसरी मीरा’ के रूप में पूजा जाता है.

विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)

Q1. दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने राजस्थान के किस संत के विचारों से प्रभावित होकर गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था? (RAS Pre)

  • उत्तर: संत जाम्भोजी (बिश्नोई संप्रदाय के संस्थापक).

Q2. राजस्थान के किस संत को ‘कलियुग का वाल्मीकि’ कहा जाता है और उनकी प्रधान पीठ कहाँ स्थित है? (RPSC 2nd Grade)

  • उत्तर: संत हरीदासजी को; उनकी प्रधान पीठ गाढ़ा गाँव (डीडवाना-कुचामन) में है.

Q3. रामस्नेही संप्रदाय की ‘सिंहथल शाखा’ (बीकानेर) के संस्थापक कौन थे और उनका मुख्य ग्रंथ कौन सा है? (RSSB CET)

  • उत्तर: संत हरिरामदासजी; उनका मुख्य ग्रंथ ‘निशानी’ है.

Q4. संत मावजी द्वारा वागड़ी भाषा में लिखित उपदेशों के ग्रंथ क्या कहलाते हैं और वे किस दिन बाहर निकाले जाते हैं? (REET)

  • उत्तर: चोपड़ा (Chopra) कहलाते हैं; ये केवल दिवाली के दिन दर्शनार्थ बाहर निकाले जाते हैं.

Q5. दादू दयाल के वे प्रसिद्ध शिष्य कौन थे जो आजीवन दूल्हे के वेश में रहे और दादू वाणी का प्रचार किया? (LDC Exam)

  • उत्तर: संत रज्जबजी (सांगानेर, जयपुर).
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