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राजस्थान की बोलियां और भाषा

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राजस्थानी भाषा का उद्भव भारोपीय भाषा परिवार से हुआ है. मूल रूप से इसका विकास शौरसेनी प्राकृत के दो रूपों — शौरसेनी अपभ्रंश (पूर्वी राजस्थान) और गुर्जर अपभ्रंश (पश्चिमी राजस्थान) के संमिश्रण से हुआ है, जिसे सम्मिलित रूप से शौरसेनी-गुर्जर अपभ्रंश कहा जाता है.

राजस्थानी भाषा का ऐतिहासिक उल्लेख

  • उद्योतन सूरि (कुवलयमाला ग्रन्थ – 778 ई.): राजस्थानी भाषा का सबसे प्राचीनतम उल्लेख जैन विद्वान उद्योतन सूरि के ग्रन्थ ‘कुवलयमाला’ में मिलता है. इसमें भारत की 18 देशी भाषाओं का वर्णन किया गया है, जिसमें राजस्थान की भाषा को ‘मरुभाषा’ कहा गया है.
  • कवि कुशल लाभ (पिंगल शिरोमणि): जैन कवि कुशल लाभ ने अपने ग्रन्थ ‘पिंगल शिरोमणि’ (और अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईन-ए-अकबरी’) में पहली बार ‘मारवाड़ी’ शब्द का प्रयोग राजस्थानी भाषा के लिए किया.

राजस्थानी साहित्य के दो मुख्य रूप: डिंगल और पिंगल

राजस्थानी भाषा के साहित्यिक रूप को दो शैलियों में विभाजित किया गया है, जहाँ से परीक्षाओं में बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं:

                            ┌─────────────────── राजस्थानी साहित्यिक शैली ───────────────────┐
                            │                                                                 │
                 ┌──────────┴──────────┐                                           ┌──────────┴──────────┐
                    डिंगल (Dingal)                                                    पिंगल (Pingal)
                    │                                                                 │
      • क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़ी रूप)                                      • क्षेत्र: पूर्वी राजस्थान (ब्रजभाषा रूप)
      • अपभ्रंश: गुर्जरी अपभ्रंश से विकसित                                            • अपभ्रंश: शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित
      • साहित्य: चारण कवियों द्वारा प्रयुक्त                                           • साहित्य: भाट कवियों द्वारा प्रयुक्त
      • प्रकृति: वीर रस प्रधान (कठिन/गंभीर)                                           • प्रकृति: शृंगार व कोमल रस प्रधान

राजस्थानी बोलियों का वर्गीकरण (Classification)

राजस्थानी बोलियों का वैज्ञानिक और प्रशासनिक वर्गीकरण अलग-अलग विद्वानों ने अपने मतों के अनुसार किया है:

1. अब्राहम ग्रियर्सन (George Abraham Grierson) — 5 प्रकार

इन्होंने अपनी पुस्तक ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ (1912) में पहली बार राजस्थानी बोलियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण किया और इसे 5 भागों में बांटा:

  1. पश्चिमी राजस्थानी: मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी, शेखावाटी.
  2. उत्तर-पूर्वी राजस्थानी: मेवाती और अहीरवाटी.
  3. मध्य-पूर्वी राजस्थानी: ढूंढाड़ी और हाड़ौती.
  4. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी: मालवी और रांगड़ी.
  5. दक्षिणी राजस्थानी: निमाड़ी.

2. एल. पी. टेसीतोरी (L. P. Tessitori) — 2 प्रकार

इटली के इस भाषा वैज्ञानिक ने राजस्थानी बोलियों को मुख्य रूप से 2 भागों में विभाजित किया:

  1. पश्चिमी राजस्थानी (मुख्यतः गुर्जरी अपभ्रंश से प्रभावित).
  2. पूर्वी राजस्थानी (मुख्यतः शौरसेनी अपभ्रंश से प्रभावित).

3. नरोत्तम स्वामी — 4 प्रकार

इन्होंने भौगोलिक दिशाओं के आधार पर इसे 4 भागों में बांटा:

  1. पश्चिमी राजस्थान: मारवाड़ी.
  2. पूर्वी राजस्थान: ढूंढाड़ी.
  3. उत्तरी राजस्थान: मेवाती.
  4. दक्षिणी राजस्थान: मालवी.

4. मोतीलाल मेनारिया — 5 प्रकार

इन्होंने राजस्थानी बोलियों को निम्नलिखित 5 मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया:

  1. मारवाड़ी
  2. ढूंढाड़ी
  3. मेवाती
  4. मालवी
  5. बागड़ी

1. पश्चिमी राजस्थान की प्रधान बोली: मारवाड़ी और उसकी उपबोलियां

मारवाड़ी को राजस्थानी बोलियों का मूल रूप माना जाता है. क्षेत्रफल की दृष्टि से यह राजस्थान की सबसे बड़ी बोली है. ‘कुवलयमाला’ में जिस मरुभाषा का उल्लेख है, वह मारवाड़ी ही है. जैन साहित्य और मीराबाई के अधिकांश पद इसी बोली में हैं.

मारवाड़ी की प्रमुख उपबोलियां:

  • मेवाड़ी (Mevadi):
    • क्षेत्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा.
    • तथ्य: यह मारवाड़ी के बाद राजस्थान की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण बोली है. महाराणा कुंभा द्वारा रचित नाटक इसी बोली में हैं.
  • बागड़ी / वागड़ी (Vagdi):
    • क्षेत्र: डूंगरपुर और बांसवाड़ा (वागड़ क्षेत्र).
    • तथ्य: इस बोली पर गुजराती भाषा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है. जॉर्ज ग्रियर्सन ने इसे ‘भीली बोली’ (Bhili Boli) कहा था.
  • शेखावाटी (Shekhavati):
    • क्षेत्र: सीकर, झुंझुनू, चूरू और नीम का थाना. इसमें मारवाड़ी और ढूंढाड़ी का संमिश्रण मिलता है.
  • गोडवाड़ी (Godvadi):
    • क्षेत्र: जालौर और पाली (गोडवाड़ क्षेत्र).
    • तथ्य: प्रसिद्ध जैन ग्रन्थ ‘बीसलदेव रासो’ इसी गोडवाड़ी बोली में रचित है.
  • देवड़ावाटी (Devdavati):
    • क्षेत्र: सिरोही क्षेत्र. इसे सिरोही की मुख्य मारवाड़ी उपबोली कहा जाता है.
  • अन्य उपबोलियां: बीकानेर, ढक्की, थली, और नागोरी.

2. पूर्वी व मध्य-पूर्वी राजस्थान की प्रधान बोली: ढूंढाड़ी और उसकी उपबोलियां

ढूंढाड़ी को ‘जयपुरी’ या ‘झाड़शाही’ बोली भी कहा जाता है. जनसंख्या की दृष्टि से यह राजस्थान में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है. संत दादू दयाल और उनके शिष्यों का संपूर्ण साहित्य ढूंढाड़ी भाषा में ही लिपिबद्ध है.

  • मुख्य क्षेत्र: जयपुर, टोंक, अजमेर, किशनगढ़ और दूदू.

ढूंढाड़ी की प्रमुख उपबोलियां

  • हाड़ौती (Hadoti):
    • क्षेत्र: कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ (हाड़ौती अंचल).
    • तथ्य: केलॉग ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी ग्रामर’ में इसे स्वतंत्र बोली माना. महाकवि सूर्यमल मिश्रण की रचनाएं (वंश भास्कर आदि) इसी हाड़ौती बोली में हैं.
  • तोरावटी (Toravati):
    • क्षेत्र: झुंझुनू का दक्षिणी भाग और सीकर का पूर्वी भाग (कांतली नदी का कछार क्षेत्र).
  • काठेड़ी (Katedi):
    • क्षेत्र: जयपुर का दक्षिणी भाग.
  • चौरासी (Chorashi):
    • क्षेत्र: जयपुर का पश्चिमी भाग और टोंक का कुछ हिस्सा.
  • नगरचोल (Nagarchol):
    • क्षेत्र: सवाई माधोपुर और टोंक का पूर्वी क्षेत्र.
  • राजावाटी (Rajavati):
    • क्षेत्र: जयपुर का पूर्वी भाग.
  • अन्य उपबोलियां: किशनगढ़ी और अजमेरी.

3. उत्तरी व उत्तर-पूर्वी राजस्थान की बोलियां

  • मेवाती (Mevati):
    • क्षेत्र: अलवर, भरतपुर, डीग और खैरथल-तिजारा (मेवात क्षेत्र).
    • तथ्य: इस बोली पर ब्रजभाषा का बहुत गहरा प्रभाव है. चरणदासी संप्रदाय की संत सजो बाई और दया बाई की रचनाएं मेवाती भाषा में ही हैं.
  • अहीरवाटी (Ahirvati):
    • क्षेत्र: कोटपूतली-बहरोड़ (बहरोड़ व मुंडावर तहसील), अलवर का राठ क्षेत्र.
    • तथ्य: इसे ‘राठ बोली’ या ‘हीरवाटी’ भी कहा जाता है. जोधराज का प्रसिद्ध महाकाव्य ‘हम्मीर रासो’ इसी बोली में लिखा गया है.

4. दक्षिणी व दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान की बोलियां

  • मालवी (Malvi):
    • क्षेत्र: प्रतापगढ़, झालावाड़ और मालवा (मध्य प्रदेश) से सटे सीमावर्ती क्षेत्र.
    • तथ्य: यह एक अत्यंत सुरीली और कोमल बोली है. इसकी मुख्य उपबोली निमाड़ी (Nimadi) है, जिसे ‘दक्षिणी राजस्थानी’ भी कहा जाता है.
  • रांगड़ी (Rangadi):
    • क्षेत्र: मालवा क्षेत्र के राजपूतों में प्रचलित.
    • तथ्य: यह मारवाड़ी और मालवी का मिश्रण (Marvadi + Malvi = Rangadi) है. यह स्वभाव में थोड़ी कर्कश (कठोर) होती है.
  • खेराड़ी (Kheradi):
    • क्षेत्र: शाहपुरा (जहाजपुर तहसील) और बूंदी का सीमावर्ती क्षेत्र.
    • तथ्य: यह मारवाड़ी, ढूंढाड़ी और हाड़ौती तीनों बोलियों का एक अनूठा मिश्रण है.

विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)

Q1. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक में डूंगरपुर-बांसवाड़ा में बोली जाने वाली वागड़ी बोली को क्या नाम दिया? (RAS Pre)

  • उत्तर: भीली बोली (Bhili Boli).

Q2. प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘बीसलदेव रासो’ राजस्थानी भाषा की किस उपबोली में रचित है? (RPSC 2nd Grade)

  • उत्तर: गोडवाड़ी बोली में (जो मारवाड़ी की उपबोली है).

Q3. महाकवि सूर्यमल मिश्रण की रचनाएं मुख्य रूप से किस बोली में लिखी गई हैं? (RSSB CET)

  • उत्तर: हाड़ौती बोली में.

Q4. रांगड़ी (Rangadi) बोली किन दो प्रमुख बोलियों का मिश्रण मानी जाती है? (REET)

  • उत्तर: मारवाड़ी और मालवी का संमिश्रण.

Q5. संत दादू दयाल और उनके शिष्यों की साहित्यिक रचनाएं किस बोली में लिपिबद्ध हैं? (LDC Exam)

  • उत्तर: ढूंढाड़ी (जयपुरी) बोली में.

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