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राजस्थान की जनजातियाँ

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा राज्यों की जनजातियों को अधिसूचित (Notify) किया जाता है. राजस्थान जनजातीय जनसंख्या की दृष्टि से भारत का एक अत्यंत समृद्ध राज्य है. जनगणना 2011 के अनुसार, राजस्थान में जनजातियों (ST) की कुल जनसंख्या 92,38,534 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 13.5%

जनजातीय जनसंख्या का भौगोलिक विभाजन

  • जनसंख्या में स्थान: भारत में सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या वाले राज्यों में राजस्थान का मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र आदि के बाद चौथा स्थान है.
  • सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या वाले जिले (संख्या में): 1. उदयपुर , 2. बांसवाड़ा, 3. डूंगरपुर.
  • न्यूनतम जनजातीय जनसंख्या वाले जिले (संख्या में): 1. बीकानेर , 2. नागौर, 3. चूरू.
  • सर्वाधिक जनजातीय प्रतिशत (Percentage) वाले जिले: 1. बांसवाड़ा (76.4%) , 2. डूंगरपुर (70.8%), 3. प्रतापगढ़ (63.4%).
  • न्यूनतम जनजातीय प्रतिशत (Percentage) वाले जिले: 1. नागौर (0.3%) , 2. बीकानेर (0.3%).

प्रमुख जनजातियों का विस्तृत

राजस्थान में मुख्य रूप से मीणा, भील, गरासिया, सहरिया, डामोर, कंजर, सांसी और कथौड़ी जनजातियाँ निवास करती हैं. इनका क्रमिक और संपूर्ण विवरण नीचे दिया गया है:

1. मीणा जनजाति — सबसे बड़ी व साक्षर जनजाति

  • सामान्य परिचय: यह जनसंख्या की दृष्टि से राजस्थान की सबसे बड़ी (प्रथम) और सबसे प्राचीन व शिक्षित जनजाति है. ‘मीणा’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘मीन’ (मछली) से हुई है. ये स्वयं को भगवान विष्णु के ‘मत्स्य अवतार’ का वंशज मानते हैं.
  • मुख्य निवास क्षेत्र: जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली, और अलवर (ढूंढाड़ अंचल).
  • धार्मिक एवं साहित्यिक ग्रंथ: मीणा जाति के गुरु मुनि मगर सागर ने ‘मीण पुराण’ नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें मीणाओं के 5200 गोत्र (खाप) बताए गए हैं. इनके आराध्य देव भूरिया बाबा (गौतमेश्वर) हैं, जिनकी झूठी कसम ये लोग कभी नहीं खाते.

सामाजिक रीति-रिवाज एवं शब्दावली:

  • विभाजन: मीणा मुख्य रूप से दो भागों में बंटे हैं — जमींदार मीणा (खेती-पशुपालन करने वाले) और चौकीदार मीणा (महलों/खजाने की रखवाली करने वाले, इन्हें पुराना वासी भी कहते हैं).
  • कीकमार / टिटकारी: संकट के समय एकत्रित होने के लिए दिया जाने वाला विशेष आवाज/नाद.
  • छेड़ा फाड़ना: मीणा जाति में प्रचलित तलाक की प्रथा. इसमें पुरुष अपनी धोती का पल्लू फाड़कर स्त्री को थमा देता है.
  • नाता प्रथा : विवाहित स्त्री का अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ रहना.
  • झगड़ा राशि: नाता जाने पर नए पति द्वारा पूर्व पति को दी जाने वाली हर्जाना राशि.
  • पटेल: मीणाओं के गाँव का मुखिया ‘पटेल’ कहलाता है. इनकी सबसे बड़ी पंचायत ‘चौरासी पंचायत’ होती है.

2. भील जनजाति — सबसे प्राचीन जनजाति

  • सामान्य परिचय: यह राजस्थान की सबसे प्राचीन और मीणाओं के बाद दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है. ‘भील’ शब्द की व्युत्पत्ति द्रविड़ भाषा के ‘बील’ (जिसका अर्थ ‘धनुष’ है) से हुई है. कर्नल जेम्स टॉड ने भीलों को ‘वनपुत्र’ कहा था.
  • मुख्य निवास क्षेत्र: उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, और चित्तौड़गढ़ (भोमट व वागड़ क्षेत्र).

सामाजिक रीति-रिवाज एवं शब्दावली :

  • कु / टापरा: भीलों के घर को ‘कु’ या ‘टापरा’ कहा जाता है.
  • फला / पाल: भीलों के छोटे मोहल्ले को ‘फला’ और बड़े गाँवों को ‘पाल’ कहते हैं.
  • गमेती / पालवी: भीलों के समस्त गाँवों (पाल) का मुख्य राजा/मुखिया ‘गमेती’ कहलाता है.
  • फायरे-फायरे : भील जनजाति का प्रसिद्ध रणघोष. जब भी इन पर संकट आता है, ये ढोल बजाकर ‘फायरे-फायरे’ चिल्लाते हुए हथियारों के साथ एकत्र होते हैं.
  • पाखरिया: यदि कोई भील किसी सैनिक के घोड़े को मार देता है, तो उसे समाज में ‘पाखरिया’ कहकर सम्मानित किया जाता है।
  • भराड़ी : भीलों की लोकदेवी. विवाह के अवसर पर घर की दीवार पर भराड़ी माता का भित्तिचित्र बनाना शुभ माना जाता है.
  • हाथीवेड़ो प्रथा: भील समाज में पीपल, बांस या आम के वृक्ष को साक्षी मानकर किया जाने वाला विवाह. इसमें दूल्हा ‘हरज’ और दुल्हन ‘लाड़ी’ कहलाती है.
  • भगोरिया उत्सव: होली के अवसर पर भील युवकों द्वारा अपने लिए जीवनसाथी चुनने का विशेष मेला/उत्सव.

भीलों की कृषि पद्धतियाँ :

  1. चिमाता : पहाड़ी ढलानों पर वनों को जलाकर की जाने वाली झूमिंग (स्थानांतरित) कृषि.
  2. दजिया : मैदानी भागों में वनों को साफ करके की जाने वाली कृषि
  • पहनावा: भील पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली तंग धोती को ‘ढेपाड़ा’, घुटनों तक के लंगोट को ‘खोयतू’ और सिर के साफे को ‘पोत्या’ कहते हैं. भील महिलाओं का लाल-काले रंग का घाघरा ‘कछावू’ कहलाता है.

3. गरासिया जनजाति — तीसरी बड़ी जनजाति

  • सामान्य परिचय: यह राजस्थान की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है. ‘गरासिया’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘गरास’ (यानी टुकड़ा/भूमि) से हुई है.
  • मुख्य निवास क्षेत्र: सिरोही (विशेषकर आबूरोड और पिंडवाड़ा तहसील), इसके अलावा पाली और उदयपुर.
  • पवित्र स्थान: गरासिया जनजाति माउंट आबू की ‘नक्की झील’ को अत्यंत पवित्र मानती है. ये अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन इसी झील में करते हैं.

सामाजिक रीति-रिवाज एवं शब्दावली:

  • सहलोत: गरासिया जनजाति के मुखिया को ‘सहलोत’ या ‘पालवी’ कहा जाता है.
  • घेर: इनके घरों को ‘घेर’ कहते हैं.
  • हुर्रे : किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसकी याद में बनाया जाने वाला मिट्टी/पत्थर का स्मारक ‘हुर्रे’ कहलाता है.
  • हैलरू : गरासिया समाज के विकास और सहकारी प्रवृत्तियों के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्था.
  • विवाह के प्रकार: गरासिया समाज में मोर बंधिया (वैदिक रीति से), पहरावना (बिना फेरों के, केवल नाममात्र का विवाह) और ताणना विवाह (लड़की को भगाकर या दूल्हे द्वारा कन्या मूल्य देकर किया जाने वाला विवाह) प्रचलित हैं.
  • प्रमुख लोक नृत्य: वालर (बिना वाद्ययंत्र के किया जाने वाला नृत्य), लूर, कूद, मांदल, और जवारा.

4. सहरिया जनजाति — एकमात्र आदिम जनजाति

  • वैधानिक महत्व: यह राजस्थान की एकमात्र ऐसी जनजाति है जिसे भारत सरकार ने ‘आदिम जनजाति समूह’ (PVTG – Particularly Vulnerable Tribal Group) में शामिल किया है.
  • मुख्य निवास क्षेत्र: बारां जिले की दो तहसीलें — शाहबाद और किशनगंज (99% सहरिया यहीं रहते हैं). ‘सहरिया’ शब्द फारसी के ‘सहर’ से बना है, जिसका अर्थ जंगल होता है.
  • आराध्य देव: सहरिया जनजाति के आराध्य देव तेजाजी और कुलदेवी कोड़िया देवी हैं. इनके आदिगुरु महर्षि वाल्मीकि हैं.

सामाजिक रीति-रिवाज एवं शब्दावली:

  • सहरौल / हथाई: सहरिया जनजाति की बस्ती को ‘सहराना’ कहते हैं. बस्ती के बीच में बनी सामूहिक चौपाल को ‘हथाई’ या ‘बंगला’ कहा जाता है.
  • कोतवाल: सहरिया जनजाति के मुखिया को ‘कोतवाल’ कहते हैं।
  • कुशीला / गोपे: अनाज संग्रहण के मिट्टी के कोठड़े ‘कुशीला’ कहलाते हैं. पेड़ों पर बनाई जाने वाली मचाननुमा झोपड़ी को ‘गोपे’ या ‘टोपा’ कहते हैं.
  • धारी संस्कार : सहरिया समाज में प्रचलित पुनर्जन्म से संबंधित अनोखा संस्कार. मृत्यु के तीसरे दिन मृतक की राख को ढक कर रखा जाता है, और अगले दिन उस पर बनने वाली आकृति से पुनर्जन्म की योनि का अंदाजा लगाया जाता है.
  • कपिलधारा का मेला: केलवाड़ा (बारां) में कार्तिक पूर्णिमा को भरने वाला यह मेला ‘सहरिया जनजाति का कुंभ’ कहलाता है.
  • विशेष नियम: सहरिया समाज में कभी भी भीख मांगने की परंपरा नहीं है, और ये लोग श्राद्ध कर्म नहीं करते.

5. डामोर जनजाति

  • मुख्य निवास क्षेत्र: डूंगरपुर जिले की सीमलवाड़ा तहसील (इस क्षेत्र को डामरिया क्षेत्र भी कहते हैं).
  • विशेष विवरण:
    • इस जनजाति की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि डामोर समाज में पुरुष भी महिलाओं की तरह गहने (आभूषण) पहनते हैं
    • इनके गाँव की सबसे छोटी इकाई को ‘फला’ और मुखिया को ‘मुखी’ कहा जाता है.
    • छैला बावजी का मेला: पंचमहाल (गुजरात) में भरने वाला यह मेला डामोर जनजाति का सबसे बड़ा मेला है. राजस्थान में इनका मुख्य मेला ‘ग्यारस की रेवाड़ी का मेला’ (डूंगरपुर) है.
    • डामोर जनजाति अंधविश्वास और वनों पर कम आश्रित है, यह पूरी तरह कृषि और पशुपालन करती है. इनमें बहुविवाह का प्रचलन है और विवाह में ‘दापा’ (कन्या मूल्य) अनिवार्य रूप से दिया जाता है.

6. कथौड़ी जनजाति

  • मूल स्थान: यह मूल रूप से महाराष्ट्र की जनजाति है, जिसे उदयपुर के कोटड़ा, झाड़ोल और सराड़ा तहसीलों में बसाया गया था.
  • मुख्य कार्य: खैर के वृक्ष से ‘कत्था’ तैयार करना इनका मुख्य व्यवसाय है, जिसके कारण इनका नाम कथौड़ी पड़ा.
  • विशेष विवरण:
    • कथौड़ी जनजाति के लोग बंदर का मांस बड़े चाव से खाते हैं. ये लोग दूध का सेवन बिल्कुल नहीं करते.
    • इस जनजाति में महिलाएं और पुरुष दोनों साथ बैठकर शराब पीते हैं. महिलाएं मराठी अंदाज में जो साड़ी पहनती हैं, उसे ‘फड़का’ कहा जाता है.
    • इनके मुखिया को ‘नायक’ कहा जाता है. इनके प्रमुख वाद्ययंत्र ‘तारपी’ और ‘घोरिया’ हैं. होली और मावलिया इनके मुख्य लोक नृत्य हैं.
    • सरकारी राहत: वर्तमान में इस जनजाति की संख्या बेहद कम रह गई है, इसलिए राजस्थान सरकार मनरेगा के तहत कथौड़ी और सहरिया जनजाति को 200 दिन का रोजगार (सामान्य से 100 दिन अतिरिक्त) प्रदान करती है.

7. कंजर जनजाति

  • सामान्य परिचय: ‘कंजर’ शब्द संस्कृत के ‘काननचार’ (अर्थात जंगलों में विचरण करने वाला) से बना है. यह अपराध प्रवृत्ति के लिए जानी जाने वाली एक घुमंतू जनजाति रही है, जो वर्तमान में हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, झालावाड़) में सर्वाधिक निवास करती है.
  • धार्मिक आस्था: कंजर जाति की कुलदेवी चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर) और रक्तदंतिका माता हैं. ये ‘हाकम राजा का प्याला’ पीकर कभी झूठ नहीं बोलते.

सामाजिक रीति-रिवाज एवं शब्दावली:

  • पाती मांगना : कंजर जाति के लोग जब रात को चोरी या डकैती (अपराध) करने जाते हैं, तो उससे पहले ईश्वर/देवी से सफलता का आशीर्वाद मांगते हैं, जिसे ‘पाती मांगना’ कहा जाता है.
  • घरों के दरवाजे न होना: कंजरों के घरों में पीछे की दीवार पर खिड़की या दरवाजा होता है, लेकिन मुख्य द्वार पर किवाड़ (दरवाजे) नहीं होते, ताकि पुलिस के आने पर वे पीछे के रास्ते से आसानी से भाग सकें.
  • मरते समय शराब की बूंदें: इस समाज में मृत व्यक्ति के मुंह में शराब की बूंदें डालने की अनूठी परंपरा है. ये शवों को जलाने के बजाय दफन करते हैं.
  • लाठी: इनके मुखिया को ‘नाइक’ या पटेल कहते हैं. चकरी और धाकड़ इनके विश्व प्रसिद्ध लोक नृत्य हैं.

8. सांसी जनजाति

  • मुख्य निवास क्षेत्र: सर्वाधिक भरतपुर और अजमेर जिलों में निवास करते हैं. यह एक अत्यंत पिछड़ी और खानाबदोश जनजाति है.
  • उत्पत्ति: इसकी उत्पत्ति ‘सांसमल’ नामक व्यक्ति से मानी जाती है.
  • दो उपजातियाँ: सांसी जनजाति मुख्य रूप से दो उपजातियों में विभाजित है — बीजा (धनाढ्य/ऊंचा वर्ग) और माला (निम्न वर्ग).
  • कुकड़ी की रस्म : सांसी जनजाति की सबसे विवादित और प्रसिद्ध सामाजिक रस्म. इसके तहत विवाह के समय लड़की को अपने चरित्र की पवित्रता की परीक्षा देनी होती है.
  • विशेष तथ्य: सांसी समाज में विधवा विवाह का प्रचलन बिल्कुल नहीं है. जब भी समाज में कोई बड़ा विवाद होता है, तो ये लोग ‘हरिजन’ समाज के लोगों को अपना जज / मध्यस्थ बनाते हैं और उनका फैसला अंतिम माना जाता है. ये लोग सांड का मांस खाना पसंद करते हैं.

विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)

Q1. राजस्थान की वह एकमात्र जनजाति कौन सी है जिसे भारत सरकार ने ‘आदिम जनजाति समूह’ (PVTG) की सूची में शामिल किया है? (RAS Pre)

  • उत्तर: सहरिया जनजाति (मुख्य निवास: शाहबाद और किशनगंज, बारां).

Q2. भील जनजाति द्वारा मैदानी भागों में वनों को साफ करके की जाने वाली कृषि को क्या कहा जाता है? (RPSC 2nd Grade)

  • उत्तर: दजिया (जबकि पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली कृषि चिमाता कहलाती है).

Q3. राजस्थान की किस जनजाति में यह अनोखी परंपरा है कि पुरुष भी महिलाओं की तरह गहने (आभूषण) पहनते हैं? (RSSB CET)

  • उत्तर: डामोर जनजाति (सीमलवाड़ा, डूंगरपुर).

Q4. ‘छेड़ा फाड़ना’ (तलाक) और ‘झगड़ा राशि’ का संबंध मुख्य रूप से किस जनजाति के सामाजिक रीति-रिवाजों से है? (REET)

  • उत्तर: मीणा जनजाति से.

Q5. विवाह के समय लड़की द्वारा अपने चरित्र की पवित्रता की परीक्षा देने की ‘कुकड़ी की रस्म’ किस जनजाति में प्रचलित है? (LDC Exam)

  • उत्तर: सांसी जनजाति (भरतपुर) में.
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