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राजस्थान के प्रमुख अभिलेख एवं शिलालेख

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1. प्राचीनतम एवं मौर्य/गुप्त कालीन अभिलेख

बड़ली का शिलालेख

  • स्थान: भिलोत माता मंदिर, बड़ली गाँव (जिला: अजमेर)
  • समय: 443 ईसा पूर्व (वि.सं. 543)
  • खोजकर्ता/अध्ययन: महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचंद ओझा।
  • विशेष विवरण: यह राजस्थान का सबसे प्राचीन और भारत का दूसरा सबसे प्राचीन शिलालेख है। इसकी लिपि ब्राह्मी और भाषा प्राकृत-संस्कृत मिश्रित है। यह मुख्य रूप से जैन धर्म के प्रसार की जानकारी देता है. वर्तमान में यह अजमेर संग्रहालय में सुरक्षित है.

घोसुण्डी का शिलालेख

  • स्थान: घोसुण्डी गाँव (चित्तौड़गढ़)
  • समय: द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व।
  • वाचन/समीक्षा: सर्वप्रथम डॉ. डी. आर. भंडारकर ने इसे पढ़ा था.
  • विशेष विवरण: यह राजस्थान में वैष्णव या भागवत संप्रदाय का उल्लेख करने वाला सबसे प्राचीन प्रामाणिक अभिलेख है. इसकी भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है. इसमें राजा सर्वतात द्वारा अश्वमेध यज्ञ करवाए जाने और विष्णु मंदिर के चारों ओर चारदीवारी (गजवंश) बनाने का वर्णन है.

भाब्रू का शिलालेख (बैराठ/विराट नगर अभिलेख)

  • स्थान: बीजक की पहाड़ी, बैराठ (विराट नगर, कोटपूतली-बहरोड़ जिला, पूर्व में जयपुर)
  • समय: 250 ईसा पूर्व (खोज वर्ष: 1840 ई. में कैप्टन बर्ट द्वारा).
  • विशेष विवरण: यह मौर्य सम्राट अशोक का सबसे प्रसिद्ध अभिलेख है, जिससे अशोक के बौद्ध धर्म के प्रति अगाध आस्था (बुद्ध, धम्म, संघ) का प्रामाणिक प्रमाण मिलता है. वर्तमान में यह शिलाखंड कोलकाता के ‘एशियाटिक सोसाइटी संग्रहालय’ में सुरक्षित है.

मानमोरी का अभिलेख

  • स्थान: मानसरोवर झील के पास, चित्तौड़गढ़
  • समय: 713 ईस्वी (8वीं शताब्दी).
  • विशेष विवरण: इस अभिलेख को इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड इंग्लैंड ले जा रहे थे, लेकिन वजन अधिक होने के कारण उन्होंने इसे समुद्र में फेंक दिया था। इसमें चित्तौड़ के प्राचीन मौर्य शासकों (महेश्वर, भीम, भोज और राजा मान) का वर्णन मिलता है। इससे यह प्रमाणित होता है कि चित्तौड़ का किला मूल रूप से मौर्यों द्वारा निर्मित था.

2. मेवाड़ के गुहिल/सिसोदिया वंश के अभिलेख

सारणेश्वर प्रशस्ति (साडेश्वर अभिलेख)

  • स्थान: सारणेश्वर महादेव मंदिर का सभामंडप, आहड़ गाँव (उदयपुर)
  • समय: 953 ईस्वी (अल्लट के काल का)
  • समीक्षा: इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा.
  • विशेष विवरण: यह अभिलेख मूल रूप से आहड़ के प्रसिद्ध ‘वराह मंदिर’ में लगा हुआ था. इससे मेवाड़ के शासक अल्लट (आलू रावल) द्वारा आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाने, वहाँ वराह मंदिर का निर्माण करने और मेवाड़ में सर्वप्रथम नौकरशाही (Bureaucracy/Officials) की शुरुआत करने की प्रामाणिक जानकारी मिलती है. इसमें स्थानीय व्यापार कर (लाग-बाग) का भी वर्णन है.

चीरवे का शिलालेख

  • स्थान: चीरवा गाँव (उदयपुर)
  • समय: 1273 ईस्वी (1330 वि.सं.)
  • विशेष विवरण: यह मेवाड़ के गुहिल वंशीय शासक समर सिंह के समय का है. इसमें बप्पा रावल, पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह और समर सिंह की सैन्य उपलब्धियों का सुंदर वर्णन है. इसके रचयिता रत्नप्रभ सूरी और शिल्पी देल्हण थे. यह तत्कालीन सामाजिक जीवन, सती प्रथा और ग्रामीण प्रशासन (तलरक्ष पद) पर गहरा प्रकाश डालता है.

रसिया की छतरी का शिलालेख

  • स्थान: चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पीछे के द्वार के पास
  • समय: 1274 ईस्वी.
  • विशेष विवरण: इसमें बप्पा रावल से लेकर नरवर्मा तक के गुहिल शासकों की वंशावली और उनकी धार्मिक सहिष्णुता का उल्लेख है. इस लेख में 13वीं शताब्दी के जनजीवन, समाज, और ताज्जुब की बात यह कि उस समय रानी द्वारा उपयोग किए जाने वाले सौंदर्य प्रसाधनों (Cosmetics) का बहुत ही रोचक विवरण मिलता है. इसके लेखक प्रियगुप और सूत्रधार सज्जन थे.

आबू का अचलेश्वर शिलालेख (आबू का लेख)

  • स्थान: अचलेश्वर महादेव मंदिर, माउंट आबू (सिरोही)
  • समय: 1285 ईस्वी।
  • विशेष विवरण: इसमें मेवाड़ के गुहिल वंश के बप्पा रावल से लेकर समर सिंह तक के राजाओं का वर्णन है. इस शिलालेख से पता चलता है कि बप्पा रावल को हारीत ऋषि के आशीर्वाद से राज्य मिला था. इसके लेखक शुभचंद्र और उत्कीर्णकर्ता कर्मसिंह थे. इसमें आबू के प्राकृतिक वातावरण का भी सुंदर चित्रण है.

गंभीरी नदी के पुल का लेख

  • स्थान: गंभीरी नदी का प्राचीन आर्च पुल, चित्तौड़गढ़
  • समय: 13वीं-14वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (अलाउद्दीन के बेटे खिज्र खान द्वारा पुल निर्माण के समय की शिलाएँ).
  • विशेष विवरण: इसमें मेवाड़ शासक समर सिंह और उनकी माता जयतल्ल देवी की धार्मिक और जनकल्याणकारी प्रवृत्तियों का वर्णन मिलता है, जिन्होंने चित्तौड़ में जैन मंदिरों को दान दिया था.

चित्तौड़ के पार्श्वनाथ मंदिर का लेख (अद्भुतजी मंदिर लेख)

  • स्थान: चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर पार्श्वनाथ जैन मंदिर.
  • समय: 13वीं शताब्दी.
  • विशेष विवरण: यह लेख मेवाड़ में जैन धर्म के प्रभाव और राजाओं द्वारा जैन संप्रदाय को दिए गए भूमि अनुदानों की प्रामाणिक पुष्टि करता है. इसमें समर सिंह के शासनकाल की धार्मिक सहिष्णुता की जानकारी मिलती है.

श्रृंगी ऋषि का शिलालेख

  • स्थान: श्रृंगी ऋषि नामक पवित्र स्थान, एकलिंगजी के पास (उदयपुर)
  • समय: 1428 ईस्वी।
  • विशेष विवरण: यह महाराणा मोकल के समय का संस्कृत भाषा का सुंदर लेख है. इसमें मेवाड़ के राणा हम्मीर, क्षेत्र सिंह (खेता) और लक्ष्मण सिंह (राणा लाखा) की त्रिस्तरीय उपलब्धियों और युद्धों का वर्णन है. इसमें लाखा द्वारा गया तीर्थ पर हिंदुओं से लिया जाने वाला ‘कर’ समाप्त करवाने और मोकल द्वारा अपनी पत्नी गोरम्बिका की याद में बावड़ी बनवाने का उल्लेख है. इसके कवि योगेश्वर थे.

समिधेश्वर मंदिर का शिलालेख (त्रिभुवन नारायण मंदिर लेख)

  • स्थान: समिधेश्वर महादेव मंदिर, चित्तौड़गढ़ दुर्ग
  • समय: 1428 ईस्वी (पुनर्निर्माण काल).
  • विशेष विवरण: यह मंदिर मूल रूप से परमार राजा भोज द्वारा ‘त्रिभुवन नारायण मंदिर’ के रूप में बनाया गया था, जिसका महाराणा मोकल ने जीर्णोद्धार कराया. यह शिलालेख मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश और मालवा के परमार वंश के बीच के ऐतिहासिक और कूटनीतिक संबंधों की अद्भुत जानकारी देता है.

कुंभलगढ़ का शिलालेख

  • स्थान: कुंभलगढ़ दुर्ग का मामादेव मंदिर, केलवाड़ा (राजसमंद)
  • समय: 1460 ईस्वी.
  • विशेष विवरण: यह कुल 5 शिलाओं पर उत्कीर्ण गुहिल वंश का सबसे महत्वपूर्ण इतिहास है, जिसके लेखन में स्वयं महाराणा कुंभा का योगदान माना जाता है (प्रशस्तिकार कान्हा व्यास). इसी शिलालेख में महाराणा हम्मीर को उनके अदम्य साहस के कारण ‘विषम घाटी पंचानन’ (संकट काल में सिंह के समान) की महान उपाधि दी गई है.

रणकपुर प्रशस्ति

  • स्थान: चौमुखा जैन मंदिर, रणकपुर (पाली)
  • समय: 1439 ईस्वी (1496 वि.सं.).
  • प्रशस्तिकार: सूत्रधार/वास्तुकार देपाक (दीपा).
  • विशेष विवरण: इस प्रशस्ति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बप्पा रावल और कालभोज को दो अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है (जबकि अन्य अभिलेखों में ये एक ही नाम माने गए हैं). इसमें मेवाड़ के राजवंश और रणकपुर मंदिर के निर्माता धरणकशाह की धार्मिक यात्रा का सुंदर वर्णन है.

कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति

  • स्थान: विजय स्तम्भ/कीर्ति स्तम्भ की अंतिम मंजिल, चित्तौड़गढ़
  • समय: 1460 ईस्वी.
  • प्रशस्तिकार: कवि अत्रि और उनके पुत्र महेश भट्ट (कवि अत्रि की मृत्यु के बाद उनके पुत्र महेश भट्ट ने इसे पूरा किया था).
  • विशेष विवरण: इसमें महाराणा कुंभा की सभी सैन्य विजयों (जैसे मालवा और गुजरात विजय) और कुंभा द्वारा रचित महान ग्रंथों (चंडी शतक, संगीत राज, सूड़ प्रबंध) की प्रामाणिक सूची दी गई है. इसमें कुंभा को ‘दानगुरु’, ‘शैल गुरु’ और ‘राजगुरु’ कहा गया है.

3. चौहान, प्रतिहार एवं बीकानेर राजवंश के अभिलेख

बिजोलिया का शिलालेख

  • स्थान: पार्श्वनाथ जैन मंदिर के पास, बिजोलिया (भीलवाड़ा)
  • समय: 1170 ईस्वी (1226 वि.सं.).
  • लेखक/शिल्पी: इसके रचयिता गुणभद्र थे और कायस्थ केशव ने इसे खोदा था.
  • विशेष विवरण: यह सांभर और अजमेर के चौहानों का सबसे प्रामाणिक इतिहास है. इसी शिलालेख में चौहानों को ‘वत्सगोत्रीय ब्राह्मण’ बताया गया है. इसमें वासुदेव चौहान द्वारा 551 ई. में सांभल झील के निर्माण का वर्णन है. साथ ही, इसमें राजस्थान के प्राचीन शहरों के नाम मिलते हैं, जैसे— जाबालिपुर (जालौर), शाकंभरी (सांभर), श्रीमाल (भीनमाल), और विंध्यवल्ली (बिजोलिया).

प्रतापगढ़ का अभिलेख

  • स्थान: प्रतापगढ़
  • समय: 946 ईस्वी.
  • विशेष विवरण: यह गुर्जर-प्रतिहार राजवंश का एक बेहद महत्वपूर्ण लेख है. इसमें प्रतिहार नरेश महेन्द्रपाल और महासामंत भरतभट्ट की सैन्य उपलब्धियों का वर्णन है. यह तत्कालीन कर प्रणाली, कृषि व्यवस्था और मंदिरों को दी जाने वाली भूमि (देव-दाय) की सटीक जानकारी देता है.

कुमारपाल का अभिलेख

  • स्थान: माउंट आबू (सिरोही)
  • समय: 1161 ईस्वी (1218 वि.सं.).
  • विशेष विवरण: यह सोलंकी (चालुक्य) राजा कुमारपाल के समय का है, जो आबू के परमार शासकों की संपूर्ण वंशावली और उनके राजनीतिक प्रभाव की प्रामाणिक जानकारी देता है.

देलवाड़ा का शिलालेख

  • स्थान: देलवाड़ा जैन मंदिर, सिरोही
  • समय: 1334 ईस्वी.
  • विशेष विवरण: स्थापत्य कला के साथ-साथ यह भाषाई दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस शिलालेख में पहली बार प्राचीन मेवाड़ी/राजस्थानी भाषा का प्रयोग किया गया है, जो उस समय के स्थानीय जनजीवन की बोलचाल की मुख्य भाषा थी. इससे मंदिर के कर और वित्तीय प्रबंधन की जानकारी मिलती है.

रायसिंह की प्रशस्ति (जूनागढ़ प्रशस्ति)

  • स्थान: जूनागढ़ दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वार (सूरज पोल) पर, बीकानेर
  • समय: 1593 ईस्वी.
  • रचयिता: जैन मुनी जैता.
  • विशेष विवरण: इसमें बीकानेर के संस्थापक राव बीका से लेकर महाराजा रायसिंह तक के सभी राठौड़ शासकों की वंशावली और उनकी महान सैन्य उपलब्धियों का वर्णन है. इसमें रायसिंह द्वारा जूनागढ़ दुर्ग के निर्माण की सही तिथि और विवरण दर्ज है.

4. राजस्थान का सबसे प्राचीन फारसी अभिलेख

अजमेर का फारसी शिलालेख

  • स्थान: अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद के मुख्य गुंबद की दीवार के पीछे, अजमेर.
  • समय: 1200 ईस्वी के आसपास.
  • विशेष विवरण: यह राजस्थान में फारसी भाषा का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक अभिलेख माना जाता है. यह इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि करता है कि मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित ‘संस्कृत कंठाभरण पाठशाला’ को तुड़वाकर इस मस्जिद का निर्माण करवाया था.

YJ Notes Special: (Exam Pointers)

  • चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताने वाला लेख: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.).
  • कर्नल टॉड ने किस अभिलेख को समुद्र में फेंका था?: मानमोरी का अभिलेख (713 ई.).
  • बप्पा और कालभोज को अलग-अलग बताने वाली प्रशस्ति: रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई.).
  • मेवाड़ में पहली बार नौकरशाही का वर्णन: सारणेश्वर/साडेश्वर प्रशस्ति (953 ई.).
  • राणा हम्मीर को ‘विषम घाटी पंचानन’ कहाँ कहा गया?: कुंभलगढ़ शिलालेख (1460 ई.).
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