1. कयादरा का युद्ध (माउंट आबू का युद्ध) – 1178 ई.
- किनके बीच: मोहम्मद गोरी बनाम चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव द्वितीय।
- विजेता: भीमदेव द्वितीय।
- विस्तृत इतिहास: मोहम्मद गोरी भारत के भीतरी हिस्सों में प्रवेश करने के लिए गुजरात के समृद्ध रास्ते से आगे बढ़ रहा था। उस समय गुजरात और दक्षिण राजस्थान के इस हिस्से पर सोलंकी वंश का राज था। राजा मूलराज द्वितीय बहुत छोटे थे, इसलिए उनकी साहसी माता राजमाता नायिका देवी ने सेना का नेतृत्व संभाला। उन्होंने सिरोही जिले में माउंट आबू की तलहटी में स्थित कयादरा नामक पहाड़ी और पथरीले इलाके में गोरी को घेरा। इस युद्ध में मूलराज के भाई भीमदेव द्वितीय ने अदम्य साहस दिखाया। अरावली की पहाड़ियों का फायदा उठाकर राजपूत सेना ने गोरी की सेना को इस कदर काटा कि गोरी अपनी जान बचाकर भागा। यह मोहम्मद गोरी की भारत में पहली करारी शिकस्त थी।
2. तराइन का प्रथम युद्ध – 1191 ई.
- किनके बीच: दिल्ली व अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय बनाम मोहम्मद गोरी।
- विजेता: पृथ्वीराज चौहान तृतीय।
- विस्तृत इतिहास: यह ऐतिहासिक युद्ध वर्तमान हरियाणा के करनाल जिले में तराइन (तरावड़ी) के मैदान में लड़ा गया, लेकिन इसका सीधा संबंध अजमेर के चौहान साम्राज्य से था। गोरी ने पंजाब के तबरहिंद (भटिंडा) किले पर कब्जा कर लिया था, जिससे पृथ्वीराज नाराज थे। युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के दिल्ली के सामंत गोविंदराज तोमर (खांडेराव) ने अपने भाले के प्रहार से मोहम्मद गोरी को बुरी तरह घायल कर दिया। गोरी के सैनिक उसे युद्ध के मैदान से भगा ले गए। राजपूत सेना ने भागती हुई गोरी की सेना का पीछा नहीं किया, जो बाद में इतिहास की एक बड़ी भूल साबित हुई।
3. तराइन का द्वितीय युद्ध – 1192 ई.
- किनके बीच: पृथ्वीराज चौहान तृतीय बनाम मोहम्मद गोरी।
- विजेता: मोहम्मद गोरी।
- विस्तृत इतिहास: अपनी पहली हार का बदला लेने के लिए गोरी अगले ही साल 1 लाख 20 हजार की सुसज्जित सेना और कुशल कूटनीति के साथ वापस आया। उसने पृथ्वीराज को संधि के जाल में उलझाया। राजपूत सेना जब सुबह के समय दैनिक कार्यों से निवृत्त हो रही थी, तब गोरी ने अचानक हमला कर दिया। राजपूत इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थे। पृथ्वीराज चौहान को सिरसा (हरियाणा) के पास सरस्वती नामक स्थान पर बंदी बना लिया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस युद्ध ने भारत में मुस्लिम सत्ता (सल्तनत काल) के द्वार खोल दिए।
4. चन्दावर का युद्ध – 1194 ई.
- किनके बीच: कन्नौज के शासक जयचंद गहड़वाल बनाम मोहम्मद गोरी।
- विजेता: मोहम्मद गोरी।
- विस्तृत इतिहास: तराइन के युद्ध के बाद गोरी ने अपनी नजरें कन्नौज के शक्तिशाली साम्राज्य पर टिका दीं। फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश) के पास चन्दावर नामक स्थान पर दोनों सेनाएं टकराईं। राजा जयचंद बहुत बहादुरी से लड़ रहे थे और राजपूत सेना जीत के करीब थी, लेकिन तभी गोरी के एक तीरंदाज का तीर सीधे जयचंद की आँख में जा लगा। राजा के हाथी से गिरते ही सेना में भगदड़ मच गई और गोरी यह युद्ध जीत गया। इस युद्ध के बाद तुर्कों का नियंत्रण गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र पर पूरी तरह स्थापित हो गया।
5. रणथम्भौर का युद्ध – 1301 ई.
- किनके बीच: हम्मीर देव चौहान बनाम दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी।
- विजेता: अलाउद्दीन खिलजी।
- विस्तृत इतिहास: रणथम्भौर के शासक हम्मीर देव चौहान अपनी ‘हठ’ और शरणागत की रक्षा के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही मंगोल सेनापति महमूद शाह को शरण दी थी और खिलजी के मांगने पर भी उसे सौंपने से मना कर दिया। खिलजी ने कई महीनों तक किले को घेरे रखा लेकिन सफलता नहीं मिली। अंत में, उसने कूटनीति चली और हम्मीर के दो सेनापतियों—रणमल और रतिपाल को किले का लालच देकर अपनी तरफ मिला लिया। गद्दारों ने गुप्त रास्ते बता दिए। युद्ध में हम्मीर देव वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी रानी रंगादेवी के नेतृत्व में महिलाओं ने राजस्थान का पहला जौहर (जल जौहर) किया। इसे रणथम्भौर का गौरवशाली साका कहा जाता है।
6. चित्तौड़ का युद्ध – 1303 ई.
- किनके बीच: रावल रतन सिंह बनाम अलाउद्दीन खिलजी।
- विजेता: अलाउद्दीन खिलजी।
- विस्तृत इतिहास: अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा, चित्तौड़ किले की भौगोलिक-व्यापारिक स्थिति और रानी पद्मिनी की सुंदरता की चाह इस युद्ध के मुख्य कारण थे। खिलजी ने जनवरी 1303 में चित्तौड़ को घेरा। लगभग 8 महीने के कड़े घेरे के बाद, राशन खत्म होने पर राजपूतों ने किले के द्वार खोल दिए। रावल रतन सिंह और उनके दो वीर सेनापति—गोरा और बादल—अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए शहीद हुए। रानी पद्मिनी ने 16,000 वीरांगनाओं के साथ चित्तौड़ का प्रथम जौहर किया। खिलजी ने इस ऐतिहासिक किले का नाम बदलकर अपने बेटे के नाम पर ‘खिज्राबाद’ रख दिया था।
7. सिवाना का युद्ध (बाड़मेर) – 1308 ई.
- किनके बीच: सातलदेव (शीतलदेव) चौहान बनाम अलाउद्दीन खिलजी।
- विजेता: अलाउद्दीन खिलजी।
- विस्तृत इतिहास: सिवाना के किले को ‘जालौर दुर्ग की कुंजी’ कहा जाता था। जालौर पर विजय पाने के लिए खिलजी को पहले सिवाना जीतना जरूरी था। यहाँ चौहान वंश के वीर योद्धा सातलदेव और सोम का शासन था। खिलजी की सेना ने लंबे समय तक प्रयास किया पर किला नहीं जीत पाई। अंत में, खिलजी ने ‘भावला’ नामक एक राजपूत सैनिक को लालच दिया, जिसने किले के पेयजल स्रोत (भांडेलाव तालाब) में गाय का रक्त मिलाकर उसे अपवित्र कर दिया। पानी की कमी के कारण राजपूतों को युद्ध करना पड़ा। सातलदेव लड़ते हुए शहीद हुए, महिलाओं ने जौहर किया और खिलजी ने सिवाना का नाम बदलकर ‘खैराबाद’ रख दिया।
8. जालौर का युद्ध – 1311-12 ई.
- किनके बीच: कान्हड़देव चौहान बनाम अलाउद्दीन खिलजी।
- विजेता: अलाउद्दीन खिलजी।
- विस्तृत इतिहास: सिवाना को जीतने के बाद खिलजी ने जालौर को घेरा, जहाँ के शासक वीर कान्हड़देव चौहान थे। कान्हड़देव के पुत्र वीरमदेव के पराक्रम की गाथाएं पूरे राजपूताना में प्रसिद्ध थीं। यहाँ भी खिलजी सीधे युद्ध में नहीं जीत पाया। उसने ‘बीका दहिया’ नाम के एक गद्दार को अपनी ओर मिलाया, जिसने किले की एक कच्ची दीवार का रहस्य मुगलों को बता दिया। कान्हड़देव और वीरमदेव लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। जालौर का नाम बदलकर ‘जलालाबाद’ किया गया।
9. सारंगपुर का युद्ध – 1437 ई.
- किनके बीच: मेवाड़ के महाराणा कुम्भा बनाम मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम।
- विजेता: महाराणा कुम्भा。
- विस्तृत इतिहास: मालवा के सुल्तान ने महाराणा कुम्भा के पिता (महाराणा मोकल) के हत्यारे ‘महपा पंवार’ को शरण दे रखी थी। कुम्भा के बार-बार मांगने पर भी सुल्तान ने उसे नहीं सौंपा। परिणामस्वरूप, दोनों सेनाओं के बीच मध्य प्रदेश के सारंगपुर में भयंकर युद्ध हुआ। महाराणा कुम्भा ने सुल्तान महमूद खिलजी को न केवल हराया, बल्कि उसे बंदी बनाकर 6 महीने तक चित्तौड़ में रखा और बाद में उदारता दिखाते हुए छोड़ दिया। इसी महान विजय के उपलक्ष्य में कुम्भा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विश्वप्रसिद्ध ‘विजय स्तम्भ’ (Victory Tower) का निर्माण करवाया था।
10. खतौली का युद्ध (कोटा) – 1517 ई.
- किनके बीच: महाराणा सांगा बनाम दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी।
- विजेता: महाराणा सांगा।
- विस्तृत इतिहास: महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) के नेतृत्व में मेवाड़ अपनी शक्ति के चरम पर था। सांगा ने अपने साम्राज्य का विस्तार खातौली तक कर लिया था, जिससे दिल्ली सल्तनत का सुल्तान इब्राहिम लोदी घबरा गया। लोदी एक बड़ी सेना लेकर आया, लेकिन सांगा की राजपूत सेना के सामने उसकी सेना टिक नहीं पाई। लोदी की करारी हार हुई और उसका एक बेटे बंदी बना लिया गया। इसी युद्ध में एक तीर लगने से महाराणा सांगा ने अपना एक हाथ और एक पैर हमेशा के लिए खो दिया था।
11. बाड़ी का युद्ध (धौलपुर) – 1518 ई.
- किनके बीच: महाराणा सांगा बनाम इब्राहिम लोदी (सेनापति मियां माखन)।
- विजेता: महाराणा सांगा।
- विस्तृत इतिहास: खतौली की हार का बदला लेने के लिए इब्राहिम लोदी ने अगले ही साल अपने दो चोटी के सेनापतियों—मियां माखन और मियां हुसैन—के नेतृत्व में एक विशाल सेना धौलपुर के बाड़ी नामक स्थान पर भेजी। महाराणा सांगा ने अपनी युद्ध कला का परिचय देते हुए मुगलों को चारों खाने चित कर दिया। इस युद्ध के बाद इब्राहिम लोदी का हौसला पूरी तरह टूट गया और सांगा का प्रभाव उत्तर भारत में और अधिक बढ़ गया।
12. गागरोन का युद्ध (झालावाड़) – 1519 ई.
- किनके बीच: महाराणा सांगा बनाम मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय।
- विजेता: महाराणा सांगा।
- विस्तृत इतिहास: मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय ने चंदेरी के राजपूत राजा मेदिनीराय पर हमला कर दिया था, जो कि महाराणा सांगा के मित्र और सामंत थे। मेदिनीराय की रक्षा के लिए सांगा गागरोन (झालावाड़ का जल दुर्ग) पहुँचे। सांगा की सेना ने मालवा और गुजरात की संयुक्त मुस्लिम सेना को धूल चटा दी। सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय को बंदी बना लिया गया। सांगा ने यहाँ भी दरियादिली दिखाई और सुल्तान का इलाज करवाकर उसे उसका आधा राज्य वापस सौंप दिया।
13. बयाना का युद्ध – फरवरी 1527 ई.
- किनके बीच: महाराणा सांगा बनाम मुगल सम्राट बाबर की सेना (सेनापति मेहंदी ख्वाजा)।
- विजेता: महाराणा सांगा।
- विस्तृत इतिहास: पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में इब्राहिम लोदी को हराने के बाद बाबर ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था, लेकिन भारत पर राज करने के लिए उसका सामना सांगा से होना तय था। बाबर के बहनोई मेहंदी ख्वाजा ने भरतपुर के बयाना किले पर कब्जा कर लिया था। महाराणा सांगा ने किले को चारों तरफ से घेर लिया और मुगलों पर जोरदार हमला किया। राजपूतों के शौर्य के आगे मुगल सैनिक टिक नहीं पाए और भाग खड़े हुए। यह बाबर के खिलाफ सांगा की अंतिम और बड़ी जीत थी। इस हार से बाबर के सैनिक इतने डर गए थे कि उन्होंने सांगा के खिलाफ दोबारा लड़ने से मना कर दिया था।
14. खानवा का युद्ध – 17 मार्च, 1527 ई.
- किनके बीच: महाराणा सांगा बनाम मुगल सम्राट बाबर।
- विजेता: बाबर।
- विस्तृत इतिहास: बयाना की हार के बाद बाबर ने इस युद्ध को ‘जिहाद’ (धर्मयुद्ध) घोषित किया। सांगा ने विदेशी आक्रांता को भगाने के लिए ‘पाती पेरवन’ परंपरा के तहत मारवाड़ से मालदेव, बीकानेर से कल्याणमल, आमेर से पृथ्वीराज कछवाहा जैसे सभी राजाओं को आमंत्रित किया। युद्ध भरतपुर की रूपवास तहसील के खानवा मैदान में हुआ। राजपूत पारंपरिक हथियारों से लड़े, जबकि बाबर के पास तोपखाना (Artillery) और तुलुगमा युद्ध पद्धति थी। युद्ध के दौरान सांगा के सिर पर तीर लगा और वे बेहोश हो गए। उनके स्थान पर झाला अज्जा ने मुकुट धारण किया। अंततः, तोपों के प्रयोग के कारण बाबर यह युद्ध जीत गया, जिसने भारत में मुगल साम्राज्य को हमेशा के लिए स्थायित्व दे दिया।
15. पाहेबा / साहेबा का युद्ध – 1541-42 ई.
- किनके बीच: जोधपुर के राव मालदेव बनाम बीकानेर के राव जैतसी।
- विजेता: राव मालदेव।
- विस्तृत इतिहास: मारवाड़ के राजा राव मालदेव अपनी ‘बावन युद्धों के विजेता’ की उपाधि के कारण अत्यंत महत्वाकांक्षी थे। उन्होंने बीकानेर रियासत पर आक्रमण कर दिया। फलोदी के पास पाहेबा के मैदान में दोनों राठौड़ सेनाएं आपस में टकराईं। इस भीषण युद्ध में बीकानेर के राजा राव जैतसी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। मालदेव ने बीकानेर पर कब्जा कर लिया और वहाँ का शासक अपने सेनापति कूंपा को बना दिया। जैतसी के पुत्र कल्याणमल ने बाद में इस हार का बदला लेने के लिए शेरशाह सूरी से मदद मांगी।
16. गिरि-सुमेल का युद्ध (जैतारण का युद्ध) – जनवरी 1544 ई.
- किनके बीच: मारवाड़ के राव मालदेव बनाम दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी।
- विजेता: शेरशाह सूरी।
- विस्तृत इतिहास: यह युद्ध पाली जिले की जैतारण तहसील के गिरी और सुमेल गाँवों के बीच हुआ। शेरशाह सूरी ने छल कपट का सहारा लेकर मालदेव के शिविर के पास नकली पत्र डलवा दिए, जिससे मालदेव को अपने महापराक्रमी सेनापतियों—जैता और कूंपा—पर गद्दारी का शक हो गया। मालदेव अपनी मुख्य सेना लेकर पीछे हट गए। लेकिन अपनी वफादारी साबित करने के लिए जैता और कूंपा मात्र 10-12 हजार सैनिकों के साथ शेरशाह की 80,000 की विशाल सेना पर टूट पड़े। राजपूतों ने ऐसा भयंकर कत्लेआम मचाया कि शेरशाह हारने ही वाला था, तभी ऐन वक्त पर जलाल खाँ जलवानी की नई टुकड़ी सूरी की मदद के लिए आ गई। जैता-कूंपा शहीद हुए। जीत के बाद शेरशाह के मुंह से ऐतिहासिक शब्द निकले: “खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतह हो गई, वरना मैं एक मुट्ठी बाजरे (मारवाड़ की बंजर भूमि) के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।”
17. हरमाड़ा का युद्ध – 1557 ई.
- किनके बीच: शेरशाह सूरी का पूर्व सेनापति हाजी खाँ पठान बनाम मेवाड़ के राणा उदयसिंह।
- विजेता: हाजी खाँ पठान।
- विस्तृत इतिहास: अजमेर के सूबेदार हाजी खाँ पठान और मेवाड़ के राणा उदयसिंह (महाराणा प्रताप के पिता) के बीच रंगराय नामक एक सुंदर नर्तकी और कुछ राजनीतिक कारणों से विवाद हो गया। अजमेर के पास हरमाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में मारवाड़ के राव मालदेव ने कूटनीतिक चाल चलते हुए राणा उदयसिंह के खिलाफ हाजी खाँ पठान का साथ दिया। मालदेव के सैन्य सहयोग के कारण हाजी खाँ यह युद्ध जीत गया और उदयसिंह को पीछे हटना पड़ा।
18. हल्दीघाटी का युद्ध – 18 जून, 1576 ई.
- किनके बीच: महाराणा प्रताप बनाम अकबर की मुगल सेना (नेतृत्वकर्ता: आमेर के कुंवर मानसिंह)।
- विजेता: अनिर्णीत / महाराणा प्रताप की नैतिक विजय।
- विस्तृत इतिहास: अकबर पूरे भारत को अपने अधीन करना चाहता था, लेकिन महाराणा प्रताप ने उसकी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। राजसमंद जिले में स्थित हल्दीघाटी के तंग दर्रे में यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ। प्रताप की सेना के अग्रभाग का नेतृत्व एकमात्र मुस्लिम सेनापति हकीम खाँ सूरी कर रहे थे, और भील सेनापति राणा पूँजा पहाड़ियों में तैनात थे। प्रताप ने अपने पराक्रमी घोड़े ‘चेतक’ पर सवार होकर मानसिंह के हाथी पर सीधा हमला किया। जब प्रताप चारों तरफ से घिर गए, तो झाला मान (झाला बीदा) ने प्रताप का राजकीय मुकुट अपने सिर पर धारण किया और प्रताप को सुरक्षित बाहर भेजा। चेतक नाला पार करते हुए शहीद हो गया। अकबर प्रताप को बंदी बनाने या झुकाने के उद्देश्य में पूरी तरह नाकाम रहा, इसलिए यह प्रताप की महान नैतिक विजय थी। कर्नल टॉड ने इसे ‘मेवाड़ की थर्मोपल्ली’ कहा है।
19. कुम्भलगढ़ का युद्ध – 1578 ई.
- किनके बीच: महाराणा प्रताप बनाम अकबर का सेनापति शाहबाज खान।
- विजेता: शाहबाज खान।
- विस्तृत इतिहास: हल्दीघाटी के बाद भी प्रताप को न पकड़ पाने से झुंझलाकर अकबर ने अपने सेनापति शाहबाज खान को तीन बार मेवाड़ भेजा। 1578 में शाहबाज खान ने कुम्भलगढ़ किले को चारों तरफ से घेर लिया। किले के भीतर पानी की कमी और रसद की किल्लत होने के कारण प्रताप ने किले की जिम्मेदारी अपने मामा भान सोनगरा को सौंपी और स्वयं पहाड़ियों की तरफ चले गए ताकि गोरिल्ला युद्ध जारी रख सकें। शाहबाज खान ने किले पर आंशिक अधिकार कर लिया, लेकिन वह प्रताप को पकड़ नहीं सका।
20. दिवेर का युद्ध – 1582 ई.
- किनके बीच: महाराणा प्रताप बनाम अकबर का काका सुल्तान खान (मुगल थाना अधिकारी)।
- विजेता: महाराणा प्रताप।
- विस्तृत इतिहास: विजयादशमी के दिन महाराणा प्रताप ने मुगलों के सबसे मजबूत केंद्र ‘दिवेर’ (राजसमंद) पर अचानक हमला कर दिया। इस युद्ध में प्रताप के पुत्र कुंवर अमर सिंह ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि उन्होंने अपने भाले के एक ही प्रहार से मुगल सेनापति सुल्तान खान और उसके घोड़े को आर-पार छेद दिया (दोनों जमीन में धंस गए)। इस दृश्य को देखकर मुगल सेना डर के मारे भाग खड़ी हुई। प्रताप ने मुगलों के 36 थानों को उठा फेंका। कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ कहा है, क्योंकि यहीं से प्रताप के विजय अभियान की दोबारा शुरुआत हुई थी।
21. मतीरे की राड़ (युद्ध) – 1644 ई.
- किनके बीच: बीकानेर के राजा कर्ण सिंह बनाम नागौर के शासक अमर सिंह राठौड़।
- विजेता: कर्ण सिंह (बीकानेर)।
- विस्तृत इतिहास: यह इतिहास का सबसे अनोखा युद्ध है, जो किसी राज्य विस्तार के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ एक ‘मतीरे’ (तरबूज) की बेल के कारण लड़ा गया था। बीकानेर रियासत के सीलवा गाँव के एक किसान के खेत में मतीरे की बेल उगी, जो बढ़ते-बढ़ते पड़ोसी रियासत नागौर के जाखणिया गाँव की सीमा में चली गई। फल नागौर की सीमा में लगा। बीकानेर का किसान कहता था कि बेल मेरी है इसलिए फल मेरा है, जबकि नागौर का किसान कहता था कि फल मेरी जमीन पर है इसलिए मेरा है। यह छोटी सी बात दोनों रियासतों के स्वाभिमान की लड़ाई बन गई। दोनों तरफ से सेनाएं आ गईं और भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें बीकानेर के राजा कर्ण सिंह की सेना विजयी रही।
22. दौराई का युद्ध (अजमेर) – 14 मार्च, 1659 ई.
- किनके बीच: औरंगजेब बनाम दाराशिकोह (मुगल उत्तराधिकार युद्ध)।
- विजेता: औरंगजेब।
- विस्तृत इतिहास: यह युद्ध अजमेर के पास दौराई नामक घाटी में लड़ा गया था। शाहजहाँ के बीमार होने के बाद उसके बेटों के बीच दिल्ली के सिंहासन के लिए ‘उत्तराधिकार का युद्ध’ चल रहा था। यह दोनों भाइयों के बीच का अंतिम और निर्णायक युद्ध था। इसमें दाराशिकोह की अंतिम रूप से हार हुई। युद्ध के बाद दाराशिकोह को बंदी बना लिया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई, जिसके बाद औरंगजेब का दिल्ली के तख्त पर निष्कंटक राज स्थापित हुआ।
23. उदयपुर की लड़ाई – 1680 ई.
- किनके बीच: मुगल सम्राट औरंगजेब बनाम मेवाड़ के महाराणा राज सिंह प्रथम।
- विजेता: महाराणा राज सिंह प्रथम।
- विस्तृत इतिहास: औरंगजेब ने जब हिंदुओं पर दोबारा ‘जज़िया कर’ लगाया और मूर्तियों को तोड़ने का आदेश दिया, तो मेवाड़ के महाराणा राज सिंह ने इसका खुलकर विरोध किया। क्रोधित होकर औरंगजेब एक विशाल सेना लेकर मेवाड़ पर चढ़ आया और उदयपुर सिटी पर कब्जा करने की कोशिश की। महाराणा राज सिंह ने झुलसी हुई धरती की नीति (Scorched Earth Policy) अपनाई, यानी उन्होंने मैदानी इलाकों को खाली करवाकर रसद सामग्री नष्ट कर दी और स्वयं सेना लेकर अरावली की पहाड़ियों में छिप गए। मुगलों की सप्लाई लाइन पूरी तरह काट दी गई। अरावली की तंग घाटियों में राजपूतों ने मुगलों को भूखा मार दिया और औरंगजेब की सेना को करारी हार का सामना करते हुए पीछे हटना पड़ा।
24. देबारी समझौता – 1708 ई.
- किनके बीच: महाराणा अमर सिंह द्वितीय (मेवाड़), सवाई जयसिंह (आमेर) और अजीत सिंह (मारवाड़)।
- विजेता: राजपूत गठबंधन की कूटनीतिक जीत।
- विस्तृत इतिहास: मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने अजीत सिंह को मारवाड़ की गद्दी से और सवाई जयसिंह को आमेर की गद्दी से बेदखल कर दिया था। अपने खोए हुए राज्यों को वापस पाने के लिए ये दोनों राजा मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह द्वितीय के पास उदयपुर के देबारी नामक स्थान पर आए। यहाँ एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। महाराणा ने इस शर्त पर मदद करना स्वीकार किया कि सवाई जयसिंह उनकी पुत्री चन्द्रकुंवारी से विवाह करेंगे और उससे उत्पन्न पुत्र ही जयपुर का अगला राजा बनेगा। इस समझौते के बाद संयुक्त राजपूत सेना ने मुगलों को खदेड़ दिया और जयसिंह व अजीत सिंह को उनके राज्य वापस मिल गए।
25. पिलसूद का युद्ध – 1715 ई.
- किनके बीच: आमेर (जयपुर) के सवाई जयसिंह बनाम मराठा सेना।
- विजेता: सवाई जयसिंह।
- विस्तृत इतिहास: मालवा क्षेत्र में मराठों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था, जो राजपूताना की सीमाओं को छू रहा था। मुगलों ने सवाई जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया था। पिलसूद नामक स्थान पर जयसिंह का सामना मराठा सरदारों से हुआ। इस शुरुआती दौर में सवाई जयसिंह की कूटनीति और तोपखाना मराठों पर भारी पड़ा। जयसिंह ने मराठों को पीछे धकेल दिया और यह उनकी एक महत्वपूर्ण सैन्य सफलता थी।
26. मंदसौर का युद्ध – 1732 ई.
- किनके बीच: सवाई जयसिंह बनाम मराठा सेना (मल्हारराव होल्कर और राणोजी सिंधिया)।
- विजेता: मराठा सेना।
- विस्तृत इतिहास: मराठे अपनी पराजय का बदला लेने और चौथ (कर) वसूलने के लिए दोबारा मालवा और राजस्थान की सीमा पर आ धमके। मंदसौर (मध्य प्रदेश) के पास सवाई जयसिंह की सेना को मराठों ने अपनी प्रसिद्ध छापामार और घेराबंदी रणनीति से चारों तरफ से घेर लिया। जयपुर की सेना की रसद रुक गई। विवश होकर सवाई जयसिंह को मराठों से संधि करनी पड़ी, उन्हें 6 लाख रुपये नकद देने पड़े और मालवा के 28 परगने मराठों को सौंपने पड़े। यहाँ से राजस्थान में मराठों का हस्तक्षेप बहुत ज्यादा बढ़ गया।
27. राजमहल का युद्ध (टोंक) – मार्च 1747 ई.
- किनके बीच: ईश्वरी सिंह बनाम उनके सौतेले भाई माधोसिंह प्रथम (जयपुर उत्तराधिकार युद्ध)।
- विजेता: ईश्वरी सिंह।
- विस्तृत इतिहास: सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद जयपुर की गद्दी के लिए उनके दो बेटों में जंग छिड़ गई। बड़े बेटे ईश्वरी सिंह नियम के अनुसार गद्दी पर बैठे, लेकिन देबारी समझौते (1708) के तहत मेवाड़ की राजकुमारी के बेटे माधोसिंह प्रथम गद्दी चाहते थे। माधोसिंह के साथ मेवाड़, बूंदी और मराठों की संयुक्त सेना थी। टोंक के राजमहल नामक स्थान पर बनास नदी के किनारे भयंकर युद्ध हुआ। ईश्वरी सिंह के कुशल सेनापति हरगोविंद नाटाणी के नेतृत्व में जयपुर की सेना ने इस विशाल गठबंधन को बुरी तरह हरा दिया। इस शानदार जीत की खुशी में ईश्वरी सिंह ने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में ‘ईसरलाट’ या ‘सरगासूली’ नामक गगनचुंबी मीनार बनवाई थी।
28. मानपुर का युद्ध – 03 मार्च, 1748 ई.
- किनके बीच: जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह बनाम अफगान आक्रांता अहमदशाह अब्दाली।
- विजेता: ईश्वरी सिंह (मुगल-राजपूत संयुक्त सेना)।
- विस्तृत इतिहास: नादिरशाह के बाद अफगान शासक अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। मुगलों की सहायता के लिए जयपुर के राजा ईश्वरी सिंह अपनी सेना लेकर पंजाब के मानपुर (सरहिंद के पास) पहुँचे। युद्ध बेहद भीषण था। इस युद्ध में मुगल सेनापति कमरुद्दीन मारा गया, जिससे मुगल सेना भागने लगी। लेकिन ईश्वरी सिंह ने अपनी राजपूत कछवाहा सेना के साथ मोर्चा संभाला और अब्दाली की सेना पर ऐसा भीषण हमला किया कि अब्दाली को पीछे हटना पड़ा। यह ईश्वरी सिंह के जीवन की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धियों में से एक थी।
29. बगरू का युद्ध – अगस्त 1748 ई.
- किनके बीच: ईश्वरी सिंह बनाम माधोसिंह प्रथम।
- विजेता: माधोसिंह प्रथम।
- विस्तृत इतिहास: राजमहल की हार से तिलमिलाए माधोसिंह प्रथम ने इस बार मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर को भारी रकम का लालच देकर अपनी तरफ कर लिया। जयपुर के पास बगरू नामक स्थान पर दोनों भाई फिर आमने-सामने हुए। मराठों की सैन्य शक्ति के आगे ईश्वरी सिंह की सेना टिक नहीं पाई और वे यह युद्ध हार गए। युद्ध के बाद एक समझौता हुआ, जिसके तहत ईश्वरी सिंह को अपने भाई माधोसिंह को 5 महत्वपूर्ण परगने देने पड़े और मराठों को भारी हर्जाना देना स्वीकार करना पड़ा।
30. पीपाड़ का युद्ध (जोधपुर) – 1750 ई.
- किनके बीच: जोधपुर के बख्तसिंह बनाम रामसिंह राठौड़।
- विजेता: रामसिंह राठौड़ (मराठों के सहयोग से)।
- विस्तृत इतिहास: मारवाड़ (जोधपुर) में भी जयपुर की तरह उत्तराधिकार की जंग चल रही थी। महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रामसिंह गद्दी पर बैठे, लेकिन उनके चाचा बख्तसिंह ने विद्रोह कर दिया। जोधपुर के पास पीपाड़ नामक स्थान पर दोनों के बीच युद्ध हुआ। रामसिंह ने मराठों (जयप्पा सिंधिया) की मदद ली थी। बख्तसिंह बहुत बहादुरी से लड़े, लेकिन मराठा सेना के हस्तक्षेप के कारण रामसिंह यह युद्ध जीतने में सफल रहे। हालांकि, मारवाड़ की यह आंतरिक कलह लंबे समय तक चलती रही।
31. भटवाड़ा का युद्ध (बारां) – 1761 ई.
- किनके बीच: कोटा रियासत (सेनापति झाली जालिम सिंह) बनाम जयपुर के महाराजा माधोसिंह प्रथम।
- विजेता: कोटा सेना (राजा शत्रुशाल / झाला जालिम सिंह)।
- विस्तृत इतिहास: जयपुर के राजा माधोसिंह प्रथम रंथमभौर के किले पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे, जिसे मुगलों ने कोटा के राजा शत्रुशाल को सौंप दिया था। माधोसिंह ने एक बड़ी सेना कोटा पर आक्रमण करने के लिए भेजी। बारां जिले के भटवाड़ा नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ। कोटा की सेना का नेतृत्व प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ और सेनापति झाला जालिम सिंह कर रहे थे। जालिम सिंह की बेजोड़ युद्ध नीति के कारण जयपुर की सेना बुरी तरह पराजित हुई। इसी युद्ध के बाद झाला जालिम सिंह का कोटा रियासत में कद बहुत बढ़ गया और वे सर्वेसर्वा बन गए।
32. कामा का युद्ध (भरतपुर) – 1768 ई.
- किनके बीच: जयपुर के राजा माधोसिंह प्रथम बनाम भरतपुर के जाट राजा जवाहर सिंह।
- विजेता: माधोसिंह प्रथम।
- विस्तृत इतिहास: भरतपुर के प्रतापी जाट राजा जवाहर सिंह ने पुष्कर (अजमेर) की यात्रा की थी। वापसी के समय उनका जयपुर रियासत की सीमा से गुजरते हुए कछवाहा राजपूतों के साथ विवाद हो गया। भरतपुर और जयपुर की सेनाओं के बीच कामा (भरतपुर) के मैदान में खूनी संघर्ष हुआ। इस युद्ध में जयपुर के राजा माधोसिंह प्रथम की सेना विजयी रही और जवाहर सिंह को पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध के कुछ समय बाद ही माधोसिंह की मृत्यु हो गई थी।
33. तुंगा का युद्ध (जयपुर) – 28 जुलाई, 1787 ई.
- किनके बीच: जयपुर-जोधपुर का संयुक्त राजपूत गठबंधन बनाम मराठा सेनापति महादजी सिंधिया।
- विजेता: राजपूत गठबंधन (सवाई प्रतापसिंह के नेतृत्व में)।
- विस्तृत इतिहास: मराठा सेनापति महादजी सिंधिया जयपुर रियासत से करोड़ों रुपये की बकाया ‘चौथ’ वसूलने के लिए सेना लेकर जयपुर के पास तुंगा नामक स्थान पर आ धमके। जयपुर के महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने कूटनीति का परिचय देते हुए जोधपुर के महाराजा विजयसिंह से गठबंधन किया। कछवाहा और राठौड़ सैनिक एक साथ मिलकर मराठों पर टूट पड़े। राजपूतों के इस अप्रत्याशित और भीषण प्रहार से महादजी सिंधिया की सेना के पैर उखड़ गए और उन्हें भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा। इस हार से बौखलाकर सिंधिया ने ऐतिहासिक कसम खाई थी कि: “अगर मैं जीवित रहा, तो इस जयपुर को धूल में मिला दूंगा।”
34. लसवारी का युद्ध (लॉसवाड़ी) – 01 नवंबर, 1803 ई.
- किनके बीच: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी (लॉर्ड लेक) बनाम मराठा (दौलतराव सिंधिया)।
- विजेता: ब्रिटिश सेना (लॉर्ड लेक)।
- विस्तृत इतिहास: यह युद्ध द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का एक निर्णायक मोड़ था, जो अलवर जिले के लसवारी गाँव के पास लड़ा गया था। महादजी सिंधिया के उत्तराधिकारी दौलतराव सिंधिया की शक्तिशाली और फ्रांसीसी तर्ज पर प्रशिक्षित सेना का सामना ब्रिटिश जनरल लॉर्ड लेक (Lord Lake) की सेना से हुआ। इस युद्ध में अलवर के तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया था। अंततः ब्रिटिश अनुशासन और तोपों की बदौलत अंग्रेजों की जीत हुई। इस युद्ध ने राजस्थान में मराठा प्रभाव को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया और राजपूत राज्यों पर ब्रिटिश प्रभुत्व (संधियों का दौर) की शुरुआत की।
35. गिंगोली का युद्ध (डिंगोली का युद्ध) – 1807 ई.
- किनके बीच: जयपुर के महाराजा जगतसिंह द्वितीय बनाम जोधपुर के महाराजा मानसिंह राठौड़।
- विजेता: जयपुर के महाराजा जगतसिंह द्वितीय।
- विस्तृत इतिहास: यह युद्ध राजस्थान के इतिहास में “कृष्णा कुमारी विवाद” के नाम से कुख्यात है। मेवाड़ के महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी की सगाई पहले जोधपुर के राजा भीमसिंह से हुई थी। लेकिन विवाह से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद महाराणा ने कृष्णा कुमारी की सगाई जयपुर के राजा जगतसिंह द्वितीय से तय कर दी। जोधपुर के नए राजा मानसिंह राठौड़ ने इसे जोधपुर का अपमान माना और युद्ध की घोषणा कर दी। नागौर के गिंगोली के मैदान में दोनों रियासतें आपस में भिड़ गईं। अमीर खाँ पिंडारी के सहयोग से जयपुर के जगतसिंह द्वितीय ने जोधपुर की सेना को बुरी तरह हरा दिया। बाद में इस कलह को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए, अमीर खाँ पिंडारी के दबाव में बेबस पिता ने 1810 में राजकुमारी कृष्णा कुमारी को जहर दे दिया।
