राजस्थानी साहित्य की प्रमुख विधाएँ
प्राचीन काल में राजाओं के आश्रय में रहने वाले चारण, भाट और जैन विद्वानों ने इतिहास और घटनाओं को अलग-अलग प्रारूपों में लिखा, जिन्हें साहित्य की विधाएँ कहा जाता है:
1. रासो
- क्या होता है? ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘रास’ या ‘रसायन’ से मानी जाती है। राजाओं के आश्रित चारण कवियों द्वारा अपने राजाओं की कीर्ति, विजय, युद्धों और प्रेम प्रसंगों को बढ़ा-चढ़ाकर (अतिशयोक्तिपूर्ण) पद्य रूप में लिखना ‘रासो’ कहलाता है।
- विशेषता: इसमें वीर रस और शृंगार रस की प्रधानता होती है। इसमें इतिहास के साथ-साथ कल्पना का बहुत अधिक समावेश होता है।
- प्रमुख उदाहरण: पृथ्वीराज रासो, हम्मीर रासो, बीसलदेव रासो, खुमाण रासो।
2. ख्यात
- क्या होता है? ‘ख्यात’ शब्द संस्कृत के ‘ख्याति’ से बना है। मध्यकाल में राजाओं ने अपने राजवंश की कीर्ति, वंशावली और ऐतिहासिक गौरव को संजोने के लिए गद्य रूप में जो इतिहास लिखवाया, उसे ख्यात कहते हैं।
- विशेषता: रासो की तुलना में ख्यात को अधिक ऐतिहासिक और प्रामाणिक माना जाता है, क्योंकि इसमें तिथियों और वंशावलियों का सटीक विवरण होता है।
- प्रमुख उदाहरण: मुहणौत नैणसी री ख्यात, दयालदास री ख्यात, बांकीदास री ख्यात।
3. वचनिका
- क्या होता है? यह गद्य और पद्य मिश्रित (चंपू काव्य) रचना होती है, जिसमें अंत्यानुप्रास का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें संस्कृत और अपभ्रंश के शब्दों की प्रधानता होती है।
- विशेषता: यह मूल रूप से युद्धों और वीरों के बलिदान के बाद उनकी प्रशंसा में लिखी जाने वाली तुकबंदी युक्त गद्य रचना है।
- प्रमुख उदाहरण: अचलदास खींची री वचनिका (रचयिता: शिवदास गाडण) — यह राजस्थानी साहित्य की पहली और सबसे प्रसिद्ध वचनिका है।
4. विगत्
- क्या होता है? ‘विगत्’ का शाब्दिक अर्थ होता है — ‘विस्तृत विवरण’ यह किसी रियासत या क्षेत्र का पूरी तरह से प्रशासनिक, भौगोलिक और सांख्यिकीय विवरण होता है।
- विशेषता: इसे मध्यकाल का ‘गजेटियर’ या सरकारी रिकॉर्ड बुक कहा जा सकता है। इसमें कर, फसलों और जनसंख्या का ब्योरा होता है।
- प्रमुख उदाहरण: मारवाड़ रा परगना री विगत (मुहणौत नैणसी)।
5. दवावैत
- क्या होता है? यह उर्दू और फारसी के प्रभाव से विकसित हुई राजस्थानी विधा है। इसमें कलात्मक गद्य के रूप में राजाओं की प्रशंसा की जाती है। इसकी शैली कथावाचन जैसी होती है।
- प्रमुख उदाहरण: महाराणा प्रताप री दवावैत, राजा मानसिंह री दवावैत।
6. वेली / वेलि
- क्या होता है? छंदों के माध्यम से राजाओं, लोकदेवताओं या ऐतिहासिक चरित्रों के पराक्रम, धार्मिक भक्ति या प्रेम का वर्णन करना वेली कहलाता है। वेलि का अर्थ बेल भी होता है, जो इतिहास को आगे बढ़ाती है।
- प्रमुख उदाहरण: वेलि किसन रूक्मणी री (पृथ्वीराज राठौड़)।
7. प्रकाश और रूपक
- प्रकाश: किसी विशिष्ट शासक की कीर्ति या किसी ऐतिहासिक घटना पर प्रकाश डालने वाला काव्य (जैसे- सूरज प्रकाश, पाबू प्रकाश)।
- रूपक: किसी राजा के गुणों और उसके जीवन की रूपरेखा को छंदों में ढालना (जैसे- राजरूपक, गजगुणरूपक)।
राजस्थानी साहित्य का काल-विभाजन
राजस्थानी साहित्य के विकास को मुख्य रूप से तीन चरणों में समझा जाता है:
┌─────────────────── राजस्थानी साहित्य का इतिहास ───────────────────┐
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┌──────────┴──────────┐ ┌──────────┴──────────┐ ┌──────────┴──────────┐
आदिकाल (वीरगाथा काल) मध्यकाल (भक्ति व शृंगार काल) आधुनिक काल (देशभक्ति काल)
• समय: 11वीं से 15वीं सदी • समय: 16वीं से 19वीं सदी • समय: 19वीं सदी से वर्तमान
• प्रधानता: वीर रस, जैन साहित्य • प्रधानता: कृष्ण भक्ति, चारण साहित्य • प्रधानता: अंग्रेजों का विरोध, सामाजिक सुधार
महाग्रंथों का ऐतिहासिक विश्लेषण
1. पृथ्वीराज रासो
- लेखक: चन्दबरदाई (मूल नाम: पृथ्वीभट्ट, जो पृथ्वीराज चौहान तृतीय के सखा और राजकवि थे)।
- विधा व शैली: यह रासो विधा का ग्रंथ है, जो पिंगल शैली में लिखा गया है। इसमें वीर रस और शृंगार रस का अद्भुत मिश्रण है।
- डीप फैक्ट्स: इसमें 69 समय (अध्याय) और 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है, जिसके कारण डॉ. नामवर सिंह ने चन्दबरदाई को ‘छंदों का राजा’ कहा था। इसमें राजपूतों की उत्पत्ति का अग्निकुंड सिद्धांत मिलता है। चन्दबरदाई की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जल्हण ने इसे पूरा किया। कर्नल टॉड ने इसका एक भाग ‘द ट्राइब्स ऑफ राजस्थान’ नाम से अंग्रेजी में अनुवादित किया था।
2. पृथ्वीराज विजय
- लेखक: जयानक भट्ट (कश्मीर के महाकवि जो पृथ्वीराज तृतीय के दरबार में आए थे)।
- विधा व शैली: संस्कृत महाकाव्य।
- डीप फैक्ट्स: इसकी रचना अजमेर की पुष्कर झील के किनारे हुई थी। यह ग्रंथ चौहानों के इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है क्योंकि इसमें ऐतिहासिक तिथियाँ सटीक हैं। इसमें पृथ्वीराज के पूर्वजों (जैसे विग्रहराज चतुर्थ) की विजयों का सुंदर उल्लेख है। यह ग्रंथ तराइन के दूसरे युद्ध (1192) से पहले ही समाप्त हो जाता है।
3. बीकानेर रा राठौड़ां री ख्यात
- लेखक: दयालदास सिढायच।
- विधा व शैली: ख्यात विधा (ऐतिहासिक गद्य)।
- डीप फैक्ट्स: यह बीकानेर के महाराजा रतन सिंह के आदेश पर लिखना शुरू हुआ और महाराजा सरदार सिंह के समय तक पूरा हुआ। यह दो खंडों में है। यह ग्रंथ जोधपुर के राठौड़ों के मूल पुरुष ‘राव सीहा’ से लेकर बीकानेर के राजाओं तक का पूरा क्रॉनिक इतिहास प्रस्तुत करता है। इसमें बीकानेर के सामंती नियमों (Feudal Rules) की गहरी जानकारी मिलती है।
4. हम्मीर रासो
- लेखक: जोधराज (18वीं सदी में नीमराणा के राजा चंद्रभान के आश्रय में) और इसका सबसे प्राचीन रूप 14वीं सदी में सारंगधर (सारंगदेव) ने लिखा था।
- विधा व शैली: रासो विधा (अहीरवाटी और ढूंढाड़ी मिश्रित डिंगल)।
- डीप फैक्ट्स: इसमें रणथंभौर के हम्मीर देव चौहान की शरणागत वत्सलता का वर्णन है, जिन्होंने अलाउद्दीन खिलजी के बागी मंगोल सेनापति ‘महमूद शाह’ को शरण दी थी। यह ग्रंथ हम्मीर के उस प्रसिद्ध कथन को चरितार्थ करता है: “तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।”
5. खुमाण रासो
- लेखक: दलपत विजय।
- विधा व शैली: रासो विधा (पिंगल भाषा, जिसमें 5000 से अधिक छंद हैं)।
- डीप फैक्ट्स: इसमें मेवाड़ के बप्पा रावल से लेकर महाराणा राजसिंह तक का इतिहास दर्ज है। इसका मुख्य आकर्षण मेवाड़ के शासक खुमाण द्वितीय और बगदाद के खलीफा अल-मामू के बीच हुआ भीषण युद्ध है। आरपीएससी ने एक बार पूछा था कि किस रासो में बप्पा रावल के सैन्य अभियानों का वर्णन है, तो जवाब खुमाण रासो है।
6. ढोला मारू रा दूहा
- लेखक: मूल रूप से कवि कल्लोल (14वीं सदी)। बाद में 1561 ई. में जैन कवि कुशललाभ ने इसमें कुछ चौपाइयां जोड़कर इसे नया स्वरूप दिया।
- विधा व शैली: लोक-काव्य / प्रेमाख्यान (डिंगल भाषा, शृंगार रस)।
- डीप फैक्ट्स: यह पश्चिमी राजस्थान की सबसे लोकप्रिय प्रेम कहानी है। इसमें नरवर के राजा नल के पुत्र ढोला (सलहकुमार) और पूगल की राजकुमारी मारवणी के बाल-विवाह का वर्णन है। विवाह के समय दूल्हा 3 वर्ष का और दुल्हन डेढ़ (1.5) वर्ष की थी। यह राजस्थान के लोक-साहित्य का अनमोल रत्न है।
7. गजगुणरूपक
- लेखक: केशवदास गाडण।
- विधा व शैली: रूपक विधा (डिंगल भाषा)।
- डीप फैक्ट्स: इसमें मारवाड़ (जोधपुर) के महाराजा गजसिंह प्रथम के शासनकाल, उनके शौर्य, मुगल दरबार में उनके ऊंचे रसूख और उनकी द्वारका व अन्य धार्मिक तीर्थयात्राओं का काव्यमय वर्णन है।
8. सूरज प्रकाश
- लेखक: करणीदान कविया।
- विधा व शैली: प्रकाश विधा (ऐतिहासिक वीर रस काव्य)।
- डीप फैक्ट्स: जोधपुर महाराजा अभय सिंह के दरबारी कवि करणीदान ने इसमें राठौड़ वंश का इतिहास लिखा। इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा 1730 ई. का अहमदाबाद युद्ध है, जिसमें अभय सिंह ने बुलंद खान को हराया था। इस ऐतिहासिक ग्रंथ को सुनने के बाद महाराजा ने कवि को ‘लाख पसाव’ (एक लाख रुपये का शगुन) और जागीर दी थी।
9. पद्मावत
- लेखक: मलिक मोहम्मद जायसी (प्रसिद्ध सूफी संत)।
- विधा व शैली: सूफी प्रेमाख्यान / महाकाव्य (ठेठ अवधी भाषा)।
- डीप फैक्ट्स: इसमें 1303 ई. के चित्तौड़गढ़ आक्रमण, रावल रतन सिंह की वीरता, गोरा-बादल के बलिदान और रानी पद्मिनी के जौहर का वृत्तांत है। यह घटना 1303 की है, लेकिन जायसी ने इसकी रचना 237 साल बाद 1540 ई. में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी के समय की थी। इसी ग्रंथ के कारण चित्तौड़ का इतिहास पूरे भारत में लोकप्रिय हुआ।
10. हम्मीर महाकाव्य
- लेखक: नयनचंद्र सूरी (जैन विद्वान)।
- विधा व शैली: संस्कृत महाकाव्य।
- डीप फैक्ट्स: यह ग्रंथ रणथंभौर के चौहानों का इतिहास जानने का सबसे प्रामाणिक जैन स्रोत है। इसमें 11 जुलाई 1301 ई. को हुए रणथंभौर के साके और रानी रंगादेवी के नेतृत्व में हुए राजस्थान के प्रथम ‘जल जौहर’ का प्रामाणिक ऐतिहासिक विवरण मिलता है। आरपीएससी ग्रेड-2 में पूछा गया था कि कौन सा ग्रंथ चौहानों को ‘सूर्यवंशी’ बताता है, तो उत्तर ‘हम्मीर महाकाव्य’ है।
11. वेलि किसन रूक्मणी री
- लेखक: पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर के राव कल्याणमल के पुत्र, जिन्हें अकबर ने गागरोन दुर्ग की जागीर दी थी)।
- विधा व शैली: वेलि विधा (उत्तरी मारवाड़ी / डिंगल भाषा)।
- डीप फैक्ट्स: गागरोन के किले में बैठकर लिखे गए इस धार्मिक-शृंगारिक ग्रंथ में श्री कृष्ण और रुक्मणी के विवाह का वर्णन है। कवि दुरसा आढ़ा ने इसे सुनकर इसे ‘पांचवां वेद और उन्नीसवां पुराण’ कहा था। इटली के विद्वान एल. पी. टेसीतोरी ने पृथ्वीराज को ‘डिंगल का हेरोस’ कहा। कर्नल टॉड के अनुसार, इस ग्रंथ में दस हजार घोड़ों का बल है।
12. काान्हड़देव प्रबन्ध
- लेखक: महाकवि पद्मनाभ।
- विधा व शैली: प्रबंध काव्य / मध्यकालीन महाकाव्य (पुरानी राजस्थानी/डिंगल)।
- डीप फैक्ट्स: इसे मध्यकाल का सबसे बेहतरीन ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें जालौर के सोनगरा चौहान कान्हड़देव और उनके बेटे वीरमदेव की वीरता का वर्णन है। इसमें 1311-12 ई. के जालौर के साके और अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा व वीरमदेव के एकतरफा प्रेम की ऐतिहासिक दास्तान है।
13. राजरूपक
- लेखक: वीरभाण रत्नू।
- विधा व शैली: रूपक विधा (शुद्ध डिंगल भाषा)।
- डीप फैक्ट्स: यह जोधपुर महाराजा अभय सिंह के काल में लिखा गया। इसमें ‘सूरज प्रकाश’ की तरह ही 1730 ई. के अहमदाबाद युद्ध का आँखों देखा राजपूत पक्ष का विवरण है। इसकी प्रस्तावना में डिंगल भाषा के व्याकरण के नियमों को बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है।
14. कुवलयमाला
- लेखक: आचार्य उद्योतन सूरि (जैन भिक्षु)।
- विधा व शैली: प्राकृत गद्य-पद्य (चंपू कथा)।
- डीप फैक्ट्स: इसकी रचना 778 ई. में गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज के समय जाबालिपुर (जालौर) में हुई थी। राजस्थानी भाषा के विद्यार्थियों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है क्योंकि इसमें पहली बार भारत की 18 देशी भाषाओं की लिस्ट में राजस्थान की भाषा को ‘मरुभाषा’ कहकर पुकारा गया।
15. वंश भास्कर / वीर सतसई / छंद मयूख
- लेखक: महाकवि सूर्यमल मिश्रण (बूंदी के महाराजा रामसिंह के दरबारी कवि, राजस्थान के आधिकारिक ‘राज्य कवि’)।
- विधा व शैली: ऐतिहासिक डिंगल महाकाव्य (हाड़ौती का पुट)।
- डीप फैक्ट्स:
- वंश भास्कर: बूंदी राज्य का पद्यमय इतिहास। सूर्यमल की मृत्यु के बाद उनके बेटे मुरारीदान ने इसे पूरा किया।
- वीर सतसई: 1857 की क्रांति पर लिखा गया पहला वीर रस का ग्रंथ, जो सोए हुए राजपूत राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ जगाने के लिए लिखा गया था (“इला न देनी आपणी…”)।
- छंद मयूख: छंद और व्याकरण शास्त्र की एक प्रामाणिक रचना।
16. ब्रजनिधि ग्रंथावली
- लेखक: जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह (हवामहल के निर्माता)।
- विधा व शैली: कृष्ण भक्ति काव्य (ब्रजभाषा)।
- डीप फैक्ट्स: महाराजा प्रताप सिंह भगवान कृष्ण के परम भक्त थे और कविताएँ लिखते समय अपना नाम ‘ब्रजनिधि’ रखते थे। उनकी सभी लघु रचनाओं के संग्रह को ब्रजनिधि ग्रंथावली कहा जाता है। इनके दरबार में गुणीजनों की एक मंडली रहती थी जिसे ‘गंधर्व बाईसी’ कहा जाता था।
17. बीसलदेव रासो
- लेखक: नरपति नाल्ह (12वीं सदी)।
- विधा व शैली: रासो विधा (गोडवाड़ी बोली मिश्रित राजस्थानी, वियोग शृंगार रस)।
- डीप फैक्ट्स: यह चार खंडों का एक विरह-काव्य है। इसमें अजमेर के राजा विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) और परमार राजा भोज की बेटी राजमती के विवाह, दोनों के बीच अहंकार का टकराव, बीसलदेव का रूठकर 12 वर्ष के लिए उड़ीसा जाना और राजमती के विरह का बेहद मार्मिक वर्णन है। यह वीर रस का ग्रंथ नहीं है, यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है जो परीक्षा में पूछी जाती है।
18. अचलदास खींची री वचनिका
- लेखक: शिवदास गाडण।
- विधा व शैली: वचनिका विधा (गद्य-पद्य मिश्रित चंपू शैली)।
- डीप फैक्ट्स: यह राजस्थानी साहित्य की सबसे पहली प्रामाणिक वचनिका है। इसमें गागरोन दुर्ग के राजा अचलदास खींची और मांडू के सुल्तान होशंगशाह के बीच 1423 ई. में हुए युद्ध और गागरोन के प्रथम साके का आंखों देखा वीर रस से ओतप्रोत विवरण है।
19. राव जैतसी रो छंद
- लेखक: बीठू सूजा (सूजा जी)।
- विधा व शैली: छंद काव्य (डिंगल भाषा, 401 छंद)।
- डीप फैक्ट्स: इसमें बीकानेर के राजा राव जैतसी और बाबर के बेटे व लाहौर के शासक कामरान के बीच 1534 ई. में हुए ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन है, जिसमें जैतसी की छोटी सी राजपूत सेना ने मुगलों को करारी शिकस्त दी थी। इसमें बीकानेर के शुरुआती संस्थापकों का भी इतिहास है।
20. पाथल और पीथल
- लेखक: कन्हैयालाल सेठिया (सुजानगढ़, चूरू के निवासी। इन्हें राजस्थानी भाषा का भीष्म पितामह कहा जाता है)।
- विधा व शैली: आधुनिक राजस्थानी कविता।
- डीप फैक्ट्स: इसमें ‘काल्पनिक और ऐतिहासिक संवाद’ है। पाथल का अर्थ है महाराणा प्रताप और पीथल का अर्थ है बीकानेर के कवि पृथ्वीराज राठौड़। जब महाराणा प्रताप जंगलों में घास की रोटी खाते हैं और उनके विचलित होने की खबर अकबर के दरबार में पहुँचती है, तब पीथल (पृथ्वीराज) उन्हें पत्र लिखकर उनका स्वाभिमान वापस जगाते हैं। सेठिया जी की अन्य कृतियाँ ‘लीलटांस’ और ‘धरती धोरां री’ हैं।
21. चेतावणी रा चूंगट्या
- लेखक: क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट।
- विधा व शैली: सोरठा काव्य (डिंगल भाषा, कुल 13 सोरठे)।
- डीप फैक्ट्स: 1903 ई. में मेवाड़ के महाराणा फतह सिंह जब लॉर्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में शामिल होने जा रहे थे, तब केसरी सिंह बारहट ने उनके गौरवशाली इतिहास को याद दिलाने के लिए यह 13 सोरठे लिखे थे। इन्हें पढ़कर महाराणा का स्वाभिमान जाग उठा और वे दिल्ली पहुँचने के बावजूद दरबार में शामिल हुए बिना उदयपुर लौट आए।
22. वीर विनोद
- लेखक: कविराज श्यामलदास (मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह के राजकवि)।
- विधा व शैली: आधिकारिक गद्य इतिहास।
- डीप फैक्ट्स: यह मेवाड़ रियासत का सबसे विशाल और प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ है। ब्रिटिश सरकार ने श्यामलदास को ‘केसर-ए-हिंद’ और महाराणा ने ‘कविराज’ की उपाधि दी थी। इसी ग्रंथ में श्यामलदास ने लिखा है कि मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्ग अकेले महाराणा कुंभा ने बनवाए थे।
23. हम्मीर हठ और सुर्जन चरित
- लेखक: कवि चंद्रशेखर।
- विधा व शैली: संस्कृत और पिंगल काव्य।
- डीप फैक्ट्स: चंद्रशेखर बूंदी के हाड़ा राजा सुर्जन सिंह के दरबारी कवि थे। हम्मीर हठ में रणथंभौर के राजा हम्मीर के अदम्य साहस और हठ का वर्णन है। सुर्जन चरित में बूंदी के राव सुर्जन हाड़ा के जीवन और उनके समय 1569 ई. में अकबर के साथ हुई ऐतिहासिक संधि का पूरा राजनीतिक ब्योरा मिलता है।
24. बांकीदास री ख्यात
- लेखक: बांकीदास आसिया (जोधपुर महाराजा मान सिंह के राजकवि और काव्य-गुरु)।
- विधा व शैली: ख्यात विधा (फुटकर ऐतिहासिक बातें)।
- डीप फैक्ट्स: यह पारंपरिक ख्यातों जैसी लंबी कहानी नहीं है, बल्कि इसमें इतिहास की 2000 से अधिक छोटी-छोटी बातें और ऐतिहासिक तथ्य लिखे गए हैं। बांकीदास ने 1857 की क्रांति की आहट के समय अंग्रेजों के खिलाफ राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति गीत लिखा था — “आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर, अहां खींची लीन्हा ठाकुराँ रा प्राण।”
25. राजस्थानी कहांवता
- लेखक: मुरलीधर व्यास।
- विधा व शैली: लोक-साहित्य संकलन।
- डीप फैक्ट्स: यह राजस्थान की संस्कृति का बहुत बड़ा दस्तावेज है। इसमें मारवाड़ और पूरे राजस्थान में सदियों से बोली जाने वाली कहावतों, मुहावरों और लोकोक्तियों का पहला सबसे बड़ा लिखित संग्रह तैयार किया गया। इसमें कृषि और मौसम संबंधी पारंपरिक ज्ञान (जैसे डांक और भड्डरी के वचन) को सहेजा गया है।
26. राजस्थानी शब्दकोश
- लेखक: पद्मश्री सीताराम लालास (जोधपुर)।
- विधा व शैली: भाषाई एनसाइक्लोपीडिया / डिक्शनरी।
- डीप फैक्ट्स: यह राजस्थानी भाषा का सबसे पहला और प्रामाणिक शब्दकोश (Dictionary) है, जो 9 विशाल खंडों में फैला है। इसमें राजस्थानी के 2 लाख से अधिक शब्दों का अर्थ समझाया गया है। इस महान कार्य के लिए एन्साइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटेनिका ने इन्हें ‘राजस्थानी जुबां की मशाल’ का खिताब दिया था। इन्हें राजस्थानी भाषा का ‘पाणिनी’ भी कहते हैं।
27. मारवाड़ रे परगना री विगत
- लेखक: मुहणौत नैणसी (जोधपुर महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के दीवान)।
- विधा व शैली: विगत् विधा (प्रशासनिक एवं सांख्यिकीय इतिहास)।
- डीप फैक्ट्स: इस ग्रंथ को ‘राजस्थान का गजेटियर’ कहा जाता है। इसमें मारवाड़ रियासत के सभी 6 परगनों की गाँव-वार जनसंख्या, जातिगत आंकड़े, कुओं की संख्या, फसलों का प्रकार और राजस्व का पूरा लेखा-जोखा है। नैणसी ने राजस्थान में पहली बार जनगणना के आंकड़े दर्ज किए थे। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को ‘राजपूताने का अबुल फजल’ कहा था।
28. संगत रासो
- लेखक: गिरधर आसिया।
- विधा व शैली: रासो विधा (डिंगल भाषा, 943 छंद)।
- डीप फैक्ट्स: इस रासो ग्रंथ में महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्त सिंह (शक्ति सिंह) के जीवन, उनकी वीरता और उनके वंशजों का इतिहास है। इसमें हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप और शक्त सिंह के भावुक मिलन की उस प्रसिद्ध लोक-कथा का प्रामाणिक विवरण है, जब शक्त सिंह अपना घोड़ा प्रताप को दे देते हैं।
29. नृत्यरत्नकोष
- लेखक: महाराणा कुंभा।
- विधा व शैली: शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य ग्रंथ (संस्कृत)।
- डीप फैक्ट्स: महाराणा कुंभा द्वारा रचित संगीत का सबसे बड़ा महाग्रंथ ‘संगीतराज’ है, जो पांच भागों (रत्नकोष) में बंटा है। नृत्यरत्नकोष इसी संगीतराज का पांचवां और अंतिम भाग है, जिसमें मध्यकालीन भारतीय नृत्य कला, मुद्राओं और राजस्थान के लोक-नृत्यों का शास्त्रीय आधार समझाया गया है।
30. ललित विग्रहराज
- लेखक: महाकवि सोमदेव।
- विधा व शैली: संस्कृत नाटक।
- डीप फैक्ट्स: यह अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) के दरबारी कवि सोमदेव द्वारा रचित नाटक है। इसमें विग्रहराज और इंद्रपुरी की राजकुमारी देसलदेवी के प्रेम प्रसंग और राजा द्वारा म्लेच्छों (तुर्कों) को हराने की कहानी है। इस नाटक की कुछ पंक्तियाँ आज भी अजमेर की ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ नामक इमारत के पत्थरों पर खुदी हुई हैं।
31. एकलिंग महात्म्य
- लेखक: मुख्य रूप से कान्हा व्यास (महाराणा कुंभा के दरबारी कवि), लेकिन इसका पहला भाग जिसे ‘राजवर्णन’ कहते हैं, स्वयं महाराणा कुंभा ने लिखा था।
- विधा व शैली: ऐतिहासिक एवं धार्मिक महाकाव्य (संस्कृत)।
- डीप फैक्ट्स: यह मेवाड़ के कुलदेवता एकलिंगनाथ जी (शिव) के मंदिर और मेवाड़ के गुहिल वंश का इतिहास बताता है। इसमें बप्पा रावल की पौराणिक कथाओं से लेकर कुंभा के समय तक की पूरी वंशावली शुद्ध रूप से दर्ज है, जो मेवाड़ के राजाओं के क्रम को समझने का सबसे प्रामाणिक स्रोत है।
32. भाषा भूषण
- लेखक: मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह प्रथम।
- विधा व शैली: अलंकार शास्त्र / व्याकरण ग्रंथ (ब्रजभाषा)।
- डीप फैक्ट्स: महाराजा जसवंत सिंह एक महान योद्धा होने के साथ-साथ उच्च कोटि के साहित्यकार थे। इस ग्रंथ में कुल 212 दोहे हैं, जिसमें हिंदी और राजस्थानी कविता के अलंकारों को बहुत ही सरल उदाहरणों के साथ समझाया गया है। इनके अन्य ग्रंथ ‘आनंद विलास’ और ‘प्रबोध चंद्रोदय नाटक’ हैं।
विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)
Q1. राजस्थानी साहित्य की किस विधा में गद्य और पद्य का संमिश्रण होता है और अंत्यानुप्रास मिलता है? (RAS Pre)
- उत्तर: वचनिका (जैसे: अचलदास खींची री वचनिका)।
Q2. सीताराम लालास द्वारा रचित ‘राजस्थानी शब्दकोश’ कितने खंडों में विभाजित है और इसमें कितने शब्द हैं? (RPSC 2nd Grade)
- उत्तर: 9 बड़े खंडों में विभाजित है और इसमें 2 लाख से अधिक शब्द शामिल हैं।
Q3. किस रासो ग्रंथ को ‘वियोग शृंगार रस’ का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है, जो वीर रस का नहीं है? (RSSB CET)
- उत्तर: बीसलदेव रासो (लेखक: नरपति नाल्ह)।
Q4. मुहणौत नैणसी की किस कृति को ‘राजस्थान का गजेटियर’ कहा जाता है? (REET)
- उत्तर: मारवाड़ रे परगना री विगत (इसमें गाँव-वार प्रशासनिक और सांख्यिकीय आंकड़े दर्ज हैं)।
Q5. ‘डिंगल का हेरोस’ पृथ्वीराज राठौड़ को किसने कहा था और उनकी प्रसिद्ध कृति कौन सी है? (LDC Exam)
- उत्तर: इटली के भाषा वैज्ञानिक एल. पी. टेसीतोरी ने कहा था; उनकी प्रसिद्ध कृति ‘वेलि किसन रूक्मणी री’ है।
