राजस्थान की संस्कृति में जीवन के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफर को पवित्र संस्कारों और अनूठे रीति-रिवाजों में पिरोया गया है. महर्षि वेदव्यास के अनुसार मानव जीवन को पवित्र बनाने के लिए कुल 16 संस्कार निर्धारित किए गए हैं.
1. जन्म से पूर्व एवं जन्म के समय के संस्कार
गर्भाधान से लेकर बालक के जन्म और उसके शुरुआती वर्षों तक कई महत्वपूर्ण संस्कार और रीति-रिवाज निभाए जाते हैं:
A. मुख्य जन्म-पूर्व संस्कार
- गर्भाधान संस्कार: जीवन की शुरुआत का पहला संस्कार, जो संतान प्राप्ति की कामना से किया जाता है.
- पुंसवन संस्कार: गर्भधारण के तीसरे या चौथे माह में पुत्र प्राप्ति और होने वाले शिशु के मानसिक विकास के लिए किया जाने वाला संस्कार.
- सीमंतोन्नयन संस्कार: गर्भ के सातवें महीने में किया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य होने वाली माता को अमंगलकारी शक्तियों से बचाना और उसे मानसिक रूप से प्रसन्न रखना है. इसे स्थानीय भाषा में ‘आठवां पूजन’ भी कहते हैं.
B. जन्म के समय और उसके बाद के रीति-रिवाज
- जातकर्म संस्कार: बालक के जन्म पर किया जाने वाला संस्कार. इसके तहत शिशु को नाल काटने से पहले घी और शहद चटाया जाता है.
- नामकर्म संस्कार: बालक के जन्म के 11वें या 12वें दिन ब्राह्मण द्वारा उसकी राशि के आधार पर नाम रखा जाता है.
- निष्क्रमण संस्कार: जन्म के चौथे महीने में सूर्य और चंद्रमा के दर्शन कराने के लिए बालक को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है.
- अन्नप्राशन संस्कार: जन्म के छठे महीने में शिशु को पहली बार अनाज या खीर (ठोस आहार) खिलाई जाती है.
- चूड़ाकर्म / जडूला बालक के जन्म के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में उसके सिर के बाल पहली बार मुंडवाए जाते हैं. यह किसी लोक देवता के स्थान (जैसे- भैरव जी, सालासर हनुमान जी) पर ले जाकर किया जाता है. इसे ‘मुंडन’ या ‘जडूला उतारना’ कहते हैं.
- कर्णवेध संस्कार: बालक की शारीरिक व्याधियों से रक्षा और आभूषण पहनने के उद्देश्य से उसके कान बींधे (छेद किए) जाते हैं.
- उपनयन / यज्ञोपवीत संस्कार: जब बालक शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है, तब उसे जनेऊ (पवित्र धागा) धारण करवाया जाता है. इसके बाद ही उसे गुरु के पास भेजा जाता था. इसे ‘विद्यारंभ संस्कार’ का हिस्सा भी मानते हैं.
राजस्थान के विशेष जन्म-उत्सव रीति-रिवाज
- सुआवड़ / जच्चा: बच्चे को जन्म देने वाली माता को ‘जच्चा’ कहा जाता है.
- कांथा / कांसा: बच्चे के जन्म पर ननिहाल पक्ष की तरफ से जच्चा और बच्चे के लिए कपड़े व आभूषण भेजे जाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में कांथा या जामणा कहते हैं.
- जलवा पूजन / कुआं पूजन : बच्चे के जन्म के लगभग 21वें या 30वें दिन जच्चा (माता) कुएं पर जाकर पूजा करती है. इस अवसर पर स्त्रियां ‘जच्चा गीत’ या ‘होलर गीत’ गाती हैं.
- दशोटन / सूरज पूजन: बच्चे के जन्म के दसवें या ग्यारहवें दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है और घर में हवन-शुद्धि करवाई जाती है.
- आंवल-कांसल: प्रसूता को दिया जाने वाला विशेष ओषधीय आहार जो प्रसव के बाद शारीरिक रिकवरी के लिए दिया जाता है.
2. विवाह के संस्कार और रीति-रिवाज
राजस्थान में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है. विवाह से जुड़े रीति-रिवाजों की श्रृंखला बहुत लंबी और परीक्षाओं के लिए अति-महत्वपूर्ण है:
- सगाई / टीका : विवाह पक्का होने पर वर पक्ष को वधू पक्ष की ओर से नारियल, मिठाई और सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि भेजी जाती है.
- कुमकुम पत्री: विवाह का निमंत्रण पत्र. राजस्थान में पहला निमंत्रण पत्र त्रिनेत्र गणेश जी (रणथंभौर) को भेजा जाता है.
- बान बैठना : विवाह से कुछ दिन पहले वर और वधू को अपने-अपने घरों में पीठी (हल्दी, बेसन और तेल का मिश्रण) लगाई जाती है. इसके बाद वे घर से बाहर नहीं निकलते.
- विनायक पूजन: विवाह निर्विघ्न संपन्न हो, इसके लिए सबसे पहले भगवान गणेश जी की स्थापना और पूजा की जाती है.
- कांकन डोरा : विनायक पूजन के समय वर और वधू के दाहिने हाथ की कलाई पर सात गांठों वाला एक पवित्र धागा बांधा जाता है, जिसमें लोहे का छल्ला, कौड़ी और लाक बंधी होती है. यह बुरी नजर से बचाता है.
- चाक पूजने जाना : विवाह से एक या दो दिन पहले स्त्रियां मंगल गीत गाती हुई कुम्हार के घर जाती हैं और वहां मिट्टी के घड़े (चाक) की पूजा करती हैं.
- भात भरना / मायरा भरना : वधू या वर की माता का भाई (मामा) अपनी बहन के घर आकर पूरे परिवार के लिए कपड़े, गहने और उपहार लाता है. इसे ‘मायरा’ कहते हैं.
- भात नूतना: विवाह से पहले बहन अपने भाई के घर जाकर भात भरने का न्योता देती है.
- बणगोठ / बिंदौरी : विवाह से एक दिन पहले वर या वधू को सजधज कर घोड़े पर बिठाया जाता है और मोहल्ले में उनका जुलूस निकाला जाता है. इसे बिंदौरी कहते हैं (झालावाड़ की बिंदौरी बहुत प्रसिद्ध है).
- महेमद / बान गोठ: वर या वधू के रिश्तेदारों द्वारा उन्हें अपने घर बुलाकर भोजन कराया जाता है, जिसे ‘बान गोठ’ कहते हैं.
बारात प्रस्थान और फेरों के समय के नियम
- घूड़चढ़ी : बारात रवानगी से ठीक पहले दूल्हा घोड़े पर बैठता है और उसकी भाभी उसकी आंखों में काजल (काजळियो) लगाती है.
- बारात / जान: वर पक्ष के लोगों का वधू के घर जाना.
- सामेला / मधुपर्क : जब बारात वधू के गांव या घर के पास पहुंचती है, तो वधू का पिता और सगे-संबंधी बारात का स्वागत करने आते हैं, इस रस्म को ‘सामेला’ या ‘मधुपर्क’ कहते हैं.
- तोरण मारना : वधू के घर के मुख्य द्वार पर लकड़ी का बना ‘तोरण’ लटकाया जाता है. दूल्हा घोड़े पर बैठकर अपनी तलवार या नीम की छड़ी से तोरण को छूता है. यह विजय और पराक्रम का प्रतीक है.
- हथलेवा / पाणिग्रहण : फेरों के समय वर और वधू के हाथों को एक पवित्र कपड़े और हल्दी के साथ मिलाया जाता है.
- फेरे / सप्तपदी: अग्नि को साक्षी मानकर वर-वधू सात फेरे लेते हैं और सात वचन दोहराते हैं.
- कंवर कलेवा: विवाह के अगले दिन सुबह दूल्हे और उसके खास दोस्तों को ससुराल पक्ष की तरफ से विशेष नाश्ता कराया जाता है.
- रंगभरी / बढ़ार / जुआ-जुई: विवाह के बाद वर-वधू को सगे-संबंधियों से मिलवाने और शगुन देने की रस्म. जुआ-जुई के खेल में परात में पानी और दूध डालकर अंगूठी ढूंढने का खेल खिलाया जाता है.
- बड़ार का भोज : वर पक्ष की ओर से विवाह के अगले दिन अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को दिया जाने वाला प्रीतिभोज (विवाह का मुख्य भोज) ‘बड़ार’ कहलाता है
- आणो / गौना / मुकलावा : यदि बाल विवाह या कम उम्र में विवाह हो गया हो, तो लड़की के वयस्क होने पर उसे दूसरी बार ससुराल भेजा जाता है, जिसे ‘मुकलावा’ या ‘गौना’ कहते हैं.
3. मृत्यु के संस्कार और रीति-रिवाज
मानव जीवन का अंतिम संस्कार ‘अंत्येष्टि संस्कार’ कहलाता है. राजस्थान में मृत्यु से जुड़े सामाजिक रीति-रिवाजों को बहुत कड़ाई से निभाया जाता है:
- बैकुण्ठी : मृतक की देह को श्मशान ले जाने के लिए बांस से बनाई गई सीढ़ीनुमा अर्थी को ‘बैकुण्ठी’ कहते हैं. बुजुर्ग की मृत्यु होने पर बैकुण्ठी को बहुत सजाया जाता है और उस पर पैसे उछाले जाते हैं, जिसे ‘बिखेर’ कहते हैं.
- आढेटा : श्मशान के रास्ते में आधे मार्ग पर अर्थी की दिशा बदली जाती है (सिर आगे और पैर पीछे किए जाते हैं), इस रस्म को ‘आढेटा’ या ‘आधा मार्ग’ कहते हैं.
- कांधिया: अर्थी को कंधा देने वाले व्यक्ति ‘कांधिया’ कहलाते हैं.
- कपला क्रिया : दाह संस्कार के समय मुख्य मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति (प्रायः बड़ा पुत्र) जलती चिता में मृतक के सिर पर घी की आहुति देता है और बांस से सिर की हड्डी को छूता है.
- शांतवाड़ा / सातरवाड़ा: दाह संस्कार के बाद श्मशान से लौटकर सभी लोग मृतक के घर जाते हैं और वहां परिवार को ढाढस बंधाते हैं. अगले कुछ दिनों तक शोक व्यक्त करने आने वाले लोगों के बैठने की जगह को ‘सातरवाड़ा’ कहते हैं.
- तीजा: मृत्यु के तीसरे दिन मृतक की अस्थियों और राख को चिता से एकत्रित किया जाता है, जिसे ‘फूल चुनना’ कहते हैं. इन अस्थियों को पवित्र नदी (जैसे- हरिद्वार में गंगा या पुष्कर झील) में विसर्जित किया जाता है.
- पिंडदान: मृत्यु के बाद दशगात्र के नियमों के तहत मृतक की आत्मा की शांति के लिए जौ के आटे के पिंड बनाकर दान किए जाते हैं.
मृत्यु के बाद के भोज और शोक समापन
- मोसर / नुक्ता : मृत्यु के 12वें दिन ब्राह्मणों और सगे-संबंधियों को दिया जाने वाला मृत्युभोज ‘मोसर’ कहलाता है.
- जोसर : जब कोई व्यक्ति अपने जीवित रहते हुए ही स्वयं का मृत्युभोज आयोजित कर देता है, तो उसे ‘जोसर’ कहते हैं (यह कुप्रथा अब कानूनन प्रतिबंधित है).
- नारायण बलि: अकाल मृत्यु (दुर्घटना या आत्महत्या) होने पर आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला विशेष यज्ञ.
- पगड़ी की रस्म : 12वें दिन मृतक के बड़े पुत्र को समाज के सामने पगड़ी बंधवाई जाती है, जो इस बात का प्रतीक है कि अब वह घर का नया मुखिया है.
- धारीचा प्रथा: मृत्यु के कुछ समय बाद परिवार के लोग रात को साफ राख या मिट्टी फर्श पर बिछाते हैं और सुबह उस पर बनने वाले पदचिह्नों को देखकर अंदाजा लगाते हैं कि मृतक ने किस योनि में जन्म लिया है.
4. राजस्थान की प्रमुख सामाजिक कुप्रथाएं
परीक्षाओं में इन कुप्रथाओं पर लगे ऐतिहासिक प्रतिबंधों के वर्ष और रियासतों के नाम बहुत पूछे जाते हैं:
- सती प्रथा : पति की मृत्यु पर पत्नी का उसकी चिता के साथ जीवित जल जाना.
- प्रतिबंध: राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1829 में कानून बनाया. राजस्थान में सर्वप्रथम बूंदी रियासत (1822) ने इस पर रोक लगाई थी.
- लेटेस्ट फैक्ट: 1987 में सीकर के देवराला गांव में रूपकंवर सती कांड हुआ था, जिसके बाद राजस्थान सरकार ने कड़ा सती निवारण कानून बनाया.
- कन्या वध : नवजात बालिकाओं को जन्म के तुरंत बाद मार देना.
- प्रतिबंध: सर्वप्रथम कोटा रियासत (1833) और बूंदी रियासत (1834) ने इसे गैर-कानूनी घोषित किया था.
- डाकन प्रथा : ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्रियों पर तांत्रिक शक्तियों का आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित करना या मार देना.
- प्रतिबंध: सर्वप्रथम अप्रैल 1853 में मेवाड़ रियासत (खैरवाड़ा) में महाराणा स्वरूप सिंह के समय कैप्टन जे.सी. ब्रुक के प्रयासों से इस पर रोक लगाई गई.
- बाल विवाह : कम उम्र में बच्चों का विवाह कर देना. राजस्थान में सर्वाधिक बाल विवाह आखातीज (अक्षय तृतीया) के दिन होते हैं.
- प्रतिबंध: हरविलास शारदा के प्रयासों से 1929 में ‘शारदा एक्ट’ लागू हुआ.
- त्याग प्रथा: क्षत्रिय परिवारों में विवाह के अवसर पर चारण, भाट और ढोली जातियों द्वारा मुंहमांगी रकम (दक्षिणा) मांगने की प्रथा.
- प्रतिबंध: सर्वप्रथम जोधपुर रियासत (1841) ने इस पर रोक लगाने का प्रयास किया था.
- नाता प्रथा: एक विवाहित स्त्री का अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ बिना औपचारिक विवाह के रहना. इसमें नए पुरुष को पूर्व पति को हर्जाना राशि देनी होती है जिसे ‘झगड़ा राशि’ कहते हैं.
विगत परीक्षाओं में पूछे गए महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Years Questions – PYQs)
Q1. राजस्थान में ‘बड़ार’ (Badar) से क्या तात्पर्य है? (RAS Pre)
- उत्तर: विवाह के अवसर पर वर पक्ष की ओर से दिया जाने वाला प्रतिभोज.
Q2. राजस्थान की किस रियासत ने सर्वप्रथम सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया था? (RPSC 2nd Grade)
- उत्तर: बूंदी रियासत ने 1822 ई. में.
Q3. ‘जडूला’ (Tonsure) संस्कार मानव जीवन के किस श्रेणी के संस्कारों में आता है? (RSSB CET)
- उत्तर: जन्म/शैशव कालीन संस्कारों में (बालक के जीवन में पहली बार बाल काटना).
Q4. जीवित रहते हुए स्वयं का मृत्युभोज आयोजित करने की प्रथा को राजस्थान में क्या कहा जाता है? (REET)
- उत्तर: जोसर (जबकि मृत्यु के बाद 12वें दिन होने वाला भोज मोसर या नुक्ता कहलाता है).
Q5. मेवाड़ में डाकन प्रथा पर आधिकारिक रोक किस महाराणा के काल में लगाई गई थी? (LDC Exam)
- उत्तर: महाराणा स्वरूप सिंह के काल में (1853 ई. में, खैरवाड़ा).
