1. क्रांति के समय प्रशासनिक एवं राजनीतिक ढांचा
- गवर्नर जनरल (भारत का वायसराय): लॉर्ड कैनिंग।
- एजेंट टू द गवर्नर जनरल (AGG – राजस्थान का सर्वोच्च अंग्रेज अधिकारी): जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस (राजस्थान में एजीजी का मुख्यालय अजमेर में था, लेकिन गर्मियों में यह माउंट आबू स्थानांतरित हो जाता था)।
- प्रथम एजीजी (AGG): मिस्टर लॉकेट (1832 ई. में स्थापना)।
प्रमुख रियासतें, उनके शासक और पॉलिटिकल एजेंट (Political Agents)
| रियासत | तत्कालीन शासक | पॉलिटिकल एजेंट (P.A.) |
|---|---|---|
| मेवाड़ (उदयपुर) | महाराणा स्वरूप सिंह | मेजर शावर्स |
| मारवाड़ (जोधपुर) | महाराजा तख्त सिंह | मैक मेसन (मोंक मेसन) |
| जयपुर | महाराजा रामसिंह द्वितीय | कर्नल ईडन |
| कोटा | महाराव रामसिंह | मेजर बर्टन |
| भरतपुर | महाराजा जसवंत सिंह | मॉरिसन |
| सिरोही | महारावल शिवसिंह | जे. डी. हॉल |
2. राजस्थान की 6 सैनिक छावनियाँ (6 Military Cantonments)
क्रांति के समय राजस्थान में अंग्रेजों की 6 मुख्य सैनिक छावनियाँ थीं, जिनमें लगभग 5,000 भारतीय सैनिक थे और कोई भी अंग्रेज सैनिक नहीं था:
- नसीराबाद (अजमेर) – 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (सबसे शक्तिशाली छावनी)।
- नीमच (ग्वालियर बॉर्डर, वर्तमान एमपी में लेकिन नियंत्रण मेवाड़ के अधीन था) – मालवा-मेवाड़ राजपूताना कैवलरी।
- एरिनपुरा (पाली) – जोधपुर लीजियन।
- देवली (टोंक) – कोटा कंटिजेंट।
- ब्यावर (अजमेर) – मेएर रेजिमेंट (इसने क्रांति में भाग नहीं लिया)।
- खेरवाड़ा (उदयपुर) – भील रेजिमेंट (इसने भी क्रांति में भाग नहीं लिया)।
3. क्रांति के प्रमुख केंद्रों का विस्तृत
1. नसीराबाद का विद्रोह (राजस्थान में क्रांति का श्रीगणेश)
- तिथि: 28 मई, 1857
- नेतृत्वकर्ता: 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिक।
- विशेष पोस्टमार्टम: बैरकपुर में मंगल पांडे के विद्रोह की खबर सुनकर एजीजी जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस ने अजमेर की सुरक्षा के लिए 15वीं नेटिव इन्फैंट्री को नसीराबाद भेज दिया था। सैनिकों ने इसे अपने ऊपर अविश्वास माना। 28 मई को सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और अंग्रेज अधिकारी न्यूबरी और स्पोटिसवुड की हत्या कर दी। विद्रोही सैनिक ‘दिल्ली चलो’ के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर कूच कर गए।
2. नीमच का विद्रोह
- तिथि: 3 जून, 1857
- नेतृत्वकर्ता: मोहम्मद अली बेग और हीरासिंह।
- विशेष पोस्टमार्टम: अंग्रेज अधिकारी कर्नल एबॉट ने जब भारतीय सैनिकों को वफादारी की कसम खिलानी चाही, तो मोहम्मद अली बेग ने चुनौती दी कि— “क्या अंग्रेजों ने अवध के प्रति अपनी वफादारी निभाई? तो फिर हमसे ऐसी उम्मीद क्यों?” 3 जून को सैनिकों ने छावनी को आग लगा दी। यहाँ से भागे 40 अंग्रेज परिवारों को चित्तौड़गढ़ के डूंगला गाँव में रूघाराम जाट ने शरण दी, जिन्हें बाद में मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने सुरक्षित निकालकर उदयपुर के जग मंदिर महल में ठहराया।
3. एरिनपुरा और आऊवा का विद्रोह (सबसे भीषण संघर्ष)
- तिथि: 21 अगस्त, 1587 (एरिनपुरा में विद्रोह)।
- नारा: ‘चलो दिल्ली, मारो फिरंगी’।
- महानायक: पाली के आऊवा ठिकाने के ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत।
- विशेष पोस्टमार्टम: एरिनपुरा के विद्रोही सैनिक जब आऊवा पहुँचे, तो ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत ने उनका नेतृत्व स्वीकार किया। कुशाल सिंह के साथ आसोप, गूलर और आलणियावास के सामंत भी आ मिले। ठाकुर कुशाल सिंह ने अंग्रेजों और जोधपुर की संयुक्त सेना को दो ऐतिहासिक युद्धों में धूल चटाई:
- बिथोड़ा का युद्ध (8 सितंबर, 1857): ठाकुर कुशाल सिंह ने जोधपुर के राजा तख्त सिंह के सेनापति ओनाड़ सिंह और अंग्रेज कैप्टन हीथकोट को हराया। ओनाड़ सिंह मारा गया।
- चेलावास का युद्ध / काले-गोरे का युद्ध (18 सितंबर, 1857): इस युद्ध में क्रांतिकारियों ने जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मैक मेसन का सिर काटकर आऊवा के किले के मुख्य दरवाजे पर लटका दिया। एजीजी जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस जान बचाकर भागा।
- आऊवा का पतन: जनवरी 1858 में कर्नल होम्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने आऊवा पर कब्जा कर लिया। वे आऊवा की कुलदेवी सुगाली माता की मूर्ति (10 सिर और 54 हाथ वाली मूर्ति, जिसे ‘क्रांति की देवी’ कहा जाता है) को उठाकर अजमेर ले गए।
4. कोटा का जन-विद्रोह (सबसे नियंत्रित और सुव्यवस्थित विद्रोह)
- तिथि: 15 अक्टूबर, 1857
- नेतृत्वकर्ता: लाला जयदयाल (भटनागर) और मेहराब खाँ (रिसालदार)।
- विशेष पोस्टमार्टम: कोटा में कोई सैनिक छावनी नहीं थी, यह एक पूर्णतः जन-विद्रोह (Mass Revolt) था। क्रांतिकारियों ने कोटा के पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन और उनके दो बेटों की हत्या कर दी और मेजर बर्टन का सिर पूरे कोटा शहर में घुमाया। कोटा के महाराव रामसिंह को उनके ही महल में नजरबंद कर दिया गया और लगभग 6 महीने तक कोटा पर जनता का शासन रहा। मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स की सेना ने करौली के राजा मदनपाल के सहयोग से कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त कराया। जयदयाल और मेहराब खाँ को सरेआम फांसी दे दी गई।
5. टोंक और धौलपुर का विद्रोह
- टोंक: यहाँ का नवाब वजीरुद्दौला अंग्रेजों का वफादार था, लेकिन टोंक की सेना और जनता ने मीर आलम खाँ के नेतृत्व में विद्रोह किया। टोंक के विद्रोह में महिलाओं ने भी हथियारों के साथ भाग लिया था।
- धौलपुर: यहाँ अक्टूबर 1857 में ग्वालियर और इंदौर के क्रांतिकारियों ने रामचंद्र और हीरालाल के नेतृत्व में विद्रोह किया। धौलपुर राजस्थान की एकमात्र ऐसी रियासत थी जहाँ विद्रोह करने वाले भी बाहर के सैनिक थे और विद्रोह को दबाने वाली सेना भी पटियाला (पंजाब) से बाहर से बुलाई गई थी।
4. क्रांति के अमर शहीद एवं नायक
अमरचंद बांठिया (राजस्थान का मंगल पांडे)
- परिचय: ये मूल रूप से बीकानेर के निवासी थे, लेकिन ग्वालियर में शाही कोषाध्यक्ष (Treasurer) थे। उन्होंने अपना पूरा खजाना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और तांत्या टोपे को क्रांति के लिए दान कर दिया था। अंग्रेजों ने इन्हें ग्वालियर में सराफा बाज़ार में नीम के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी। ये 1857 की क्रांति में शहीद होने वाले राजस्थान के प्रथम व्यक्ति थे।
तांत्या टोपे का राजस्थान आगमन
- ग्वालियर के महान क्रांतिकारी तांत्या टोपे सहायता मांगने के लिए दो बार राजस्थान आए। सर्वप्रथम वे मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) के रास्ते दाखिल हुए। टोंक की जनता ने तांत्या टोपे का खुला साथ दिया था। राजस्थान में केवल बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह ने तांत्या टोपे को 10 घुड़सवारों की सहायता दी थी। (नोट: महाराजा सरदार सिंह राजस्थान के एकमात्र ऐसे राजा थे जो अपनी सेना लेकर अंग्रेजों की मदद के लिए रियासत से बाहर (पंजाब और बड़लू क्षेत्र) तक गए थे)। अंत में नरवर के सामंत मानसिंह नरूका के धोखे के कारण तांत्या टोपे पकड़े गए।
YJ Notes Special:
- क्रांति की देवी किसे कहा जाता है?: सुगाली माता (10 सिर, 54 हाथ) को, जो आऊवा के चम्पावतों की कुलदेवी हैं।
- काले-गोरे का युद्ध किसे कहते हैं?: चेलावास के युद्ध (18 सितंबर, 1857) को।
- किस पॉलिटिकल एजेंट का सिर आऊवा के किले पर लटकाया गया?: मैक मेसन का।
- किस राजा ने अपनी रियासत से बाहर जाकर अंग्रेजों की मदद की?: बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह ने।
- राजस्थान का मंगल पांडे किसे कहा जाता है?: अमरचंद बांठिया को।
- किन छावनियों ने क्रांति में भाग नहीं लिया?: ब्यावर और खेरवाड़ा ने।
