राजस्थान में किसान आंदोलनों की शुरुआत मुख्य रूप से ब्रिटिश संधियों (1818 ई.) के बाद जागीरदारों द्वारा बढ़ाए गए करों, 84 प्रकार की लाग-बाग (अवैध उपकर), लाटा-कूंता व्यवस्था (खड़ी फसल का अनुमानित कर) और बेगार प्रथा के विरोध में हुई थी। राजस्थान में किसान आंदोलन के असली जनक विजय सिंह पथिक माने जाते हैं।
1. बिजौलिया किसान आंदोलन (1897 – 1941 ई.)
- स्थान: भीलवाड़ा (मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी ठिकाना, जिसे ‘ऊपरमाल’ भी कहा जाता था)।
- विशेषता: यह भारत का सबसे लंबा (44 वर्ष) चलने वाला एकमात्र पूर्णतः अहिंसक किसान आंदोलन था।
- जाति: इसमें सर्वाधिक किसान धाकड़ जाति के जाट थे।
- पृष्ठभूमि: ऊपरमाल जागीर के संस्थापक अशोक परमार थे, जिन्हें राणा सांगा ने खानवा युद्ध (1527 ई.) की वीरता से प्रसन्न होकर यह जागीर दी थी।
यह आंदोलन मुख्य रूप से तीन चरणों में संपन्न हुआ:
प्रथम चरण (1897 – 1915 ई.) – स्थानीय नेतृत्व
- शुरुआत: 1897 ई. में गिरधारीपुरा गाँव में गंगाराम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज के अवसर पर किसान इकट्ठा हुए।
- दूत: किसानों ने अपनी फरियाद लेकर नानजी पटेल और ठाकरी पटेल को मेवाड़ महाराणा फतेहसिंह के पास भेजा।
- जांच अधिकारी: महाराणा ने जाँच के लिए हामिद हुसैन नामक अधिकारी को भेजा, जिसने शिकायतों को सही बताया, लेकिन कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
- दमनकारी कर:
- चंवरी कर (1903 ई.): जागीरदार कृष्ण सिंह ने किसानों की बेटियों की शादी पर ₹5 का कर लगाया, जिसका भारी विरोध हुआ।
- तलवार बंधाई कर (1906 ई.): नए जागीरदार पृथ्वी सिंह ने जनता पर उत्तराधिकार कर लगा दिया।
- नेतृत्वकर्ता: साधु सीताराम दास, ब्रह्मदेव और फतेहकरण चारण
द्वितीय चरण (1916 – 1923 ई.) – राष्ट्रीय पहचान
- प्रवेश: 1916 ई. में विजय सिंह पथिक (मूल नाम: भूप सिंह) इस आंदोलन से जुड़े।
- संस्थाएं: पथिक जी ने 1917 में ‘ऊपरमाल पंच बोर्ड’ (किसान पंचायत) की स्थापना की, जिसके प्रथम सरपंच मन्ना पटेल बनाए गए।
- अखबार: इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी के कानपुर से निकलने वाले ‘प्रताप’ अखबार का सहारा लिया गया।
- जांच आयोग: बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग (1919 ई.) का गठन किया गया।
- समझौता: 1922 में एजीजी (AGG) रॉबर्ट हॉलैंड के प्रयासों से एक अस्थायी समझौता हुआ, जिसमें 35 लाग-बाग माफ की गईं।
तृतीय चरण (1923 – 1941 ई.)
- नेतृत्वकर्ता: जमनालाल बजाज, हरिभाऊ उपाध्याय और माणिक्य लाल वर्मा।
- महिलाओं का योगदान: इस चरण में अंजना देवी चौधरी, नारायणी देवी वर्मा और रमा देवी ने भाग लिया।
- अंत: 1941 ई. में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. विजयराघवाचार्य और राजस्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह मेहता के प्रयासों से किसानों की ज़मीनें वापस मिलीं और 44 साल पुराना यह ऐतिहासिक संघर्ष सफलता के साथ समाप्त हुआ।
2. बेंगू किसान आंदोलन (1921 – 1925 ई.)
- स्थान: चित्तौड़गढ़ (यह भी मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी ठिकाना था)।
- शुरुआत: 1921 ई. में मेनाल (भीलवाड़ा) के ‘भैरूकुण्ड’ नामक स्थान से धाकड़ किसानों द्वारा शुरू हुआ।
- नेतृत्वकर्ता: विजय सिंह पथिक के कहने पर रामनारायण चौधरी ने इसका नेतृत्व संभाला।
- बोल्शेविक समझौता: बेंगू के ठाकुर अनूप सिंह और किसानों के बीच एक समझौता हुआ, जिसे मेवाड़ सरकार ने अमान्य घोषित करते हुए ‘बोल्शेविक समझौते’ (रूसी क्रांति से प्रेरित) की संज्ञा दी।
- गोविन्दपुरा हत्याकांड (13 जुलाई, 1923): जागीरदारों की जांच करने आए ट्रेंच (Trench) नामक अंग्रेज अधिकारी ने गोविन्दपुरा गाँव में किसानों की सभा पर गोलियां चलवा दीं। इस घटना में रूपाजी धाकड़ और कृपाजी धाकड़ नामक दो वीर किसान मौके पर ही शहीद हो गए।
3. बूँदी या बरड़ किसान आंदोलन (1922 – 1943 ई.)
- स्थान: बूँदी जिला (विशेषकर बरड़ का पथरीला क्षेत्र)।
- नेतृत्वकर्ता: राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय कार्यकर्ता पंडित नयनूराम शर्मा।
- डाबी हत्याकांड (2 अप्रैल, 1923): डाबी नामक स्थान पर किसानों की एक शांतिपूर्ण सभा हो रही थी, जहाँ बूँदी के पुलिस अधीक्षक इकराम हुसैन के आदेश पर अंधाधुंध फायरिंग की गई।
- शहादत: इस हत्याकांड में नानक जी भील (जो झंडा गीत गा रहे थे) और देवालाल गुर्जर शहीद हो गए। नानक जी भील की याद में माणिक्य लाल वर्मा ने प्रसिद्ध ‘अर्जी’ नामक लोकगीत लिखा था।
4. अलवर का नीमूचाणा किसान आंदोलन (1921 – 1925 ई.)
- स्थान: अलवर रियासत
- कारण: महाराजा जयसिंह द्वारा जंगली सूअरों को पालने और लगान की दरों में अचानक भारी बढ़ोतरी करने के विरोध में यह आंदोलन राजपूत किसानों द्वारा शुरू किया गया था।
- नीमूचाणा हत्याकांड (14 मई, 1925): अलवर के बानसूर तहसील के नीमूचाणा गाँव में किसान एकत्रित हुए थे, जहाँ कमांडर छज्जू सिंह (जिसे ‘राजस्थान का जनरल डायर’ कहा जाता है) ने मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं। इसमें सैकड़ों किसान जलकर मर गए।
- ऐतिहासिक संदर्भ: महात्मा गांधी ने अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ में इस वीभत्स घटना को “दोहरी डायरशाही” कहा और इसे जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी अधिक भयानक और क्रूर बताया।
5. शेखावाटी एवं सीकर किसान आंदोलन (1922 – 1947 ई.)
- स्थान: सीकर, झुंझुनूं और चुरू (जयपुर रियासत के अधीन सामंती क्षेत्र)।
- कारण: सीकर के नए राव राजा कल्याण सिंह द्वारा लगान की दरों में 25% से 50% तक की भारी वृद्धि।
- कटराथल महिला सम्मेलन (25 अप्रैल, 1934): सिहोट के ठाकुर द्वारा किसान महिलाओं के साथ किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में कटराथल (सीकर) में एक ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ। इसमें किशोरी देवी के नेतृत्व में 10,000 से अधिक किसान महिलाओं ने भाग लिया, जो उस दौर की एक अद्भुत घटना थी। मुख्य वक्ता उत्तमा देवी (ठाकुर देशराज की पत्नी) थीं।
- कूदण / कुंदन हत्याकांड (25 अप्रैल, 1935): कैप्टन वेब के आदेश पर सीकर के कूंदण गाँव में लगान वसूलने के दौरान गोलियां चलाई गईं। यह आंदोलन इतना चर्चित हुआ कि इसकी गूँज ब्रिटिश संसद के ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में भी सुनाई दी थी।
- जयसिंहपुरा हत्याकांड (21 जून, 1934): झुंझुनूं के जयसिंहपुरा में जागीरदार के भाई ने खेतों में काम कर रहे किसानों पर हमला किया। यह इतिहास का पहला ऐसा मामला था जहाँ किसानों की हत्या के आरोप में जागीरदारों को बाकायदा कोर्ट द्वारा सजा सुनाई गई।
6. मारवाड़ / जोधपुर किसान आंदोलन (1920 – 1947 ई.)
- स्थान: जोधपुर रियासत (नागौर, पाली, बाड़मेर क्षेत्र)।
- संस्था: जय नारायण व्यास के नेतृत्व में ‘मारवाड़ हितकारिनी सभा’ और बलदेव राम मिर्धा के प्रयासों से ‘मारवाड़ किसान सभा’ (स्थापना: 27 जून 1941, प्रथम अध्यक्ष: गुल्ला राम चौधरी) ने सामंतवाद के खिलाफ आवाज उठाई।
- तोल आंदोलन (1920-21 ई.): मारवाड़ में 100 तोले के सेर को घटाकर 80 तोले का सेर करने के विरोध में चाँदकरण सारदा और जय नारायण व्यास ने सफल आंदोलन चलाया।
- डाबड़ा हत्याकांड (13 मार्च, 1947): डीडवाना (नागौर) के डाबड़ा गाँव में मारवाड़ लोक परिषद और मारवाड़ किसान सभा का एक संयुक्त सम्मेलन हो रहा था। स्थानीय जागीरदारों ने लाठियों और बंदूकों से हमला कर दिया, जिसमें चुन्नीलाल शर्मा, रुघाराम, जग्गू जाट सहित कई किसान शहीद हो गए।
YJ Notes Special: (Quick Shortcuts)
- ट्रेन्च आयोग का संबंध किस आंदोलन से है?: बेंगू किसान आंदोलन से।
- बोल्शेविक समझौता कहाँ हुआ?: बेंगू के ठाकुर अनूप सिंह और किसानों के बीच।
- नानक जी भील किस हत्याकांड में शहीद हुए?: डाबी हत्याकांड (बूँदी) में।
- राजस्थान का जनरल डायर किसे कहते हैं?: कमांडर छज्जू सिंह को (नीमूचाणा हत्याकांड)।
- 10,000 महिलाओं का नेतृत्व किसने किया?: किशोरी देवी ने (कटराथल सम्मेलन, 1934)।
- रूपाजी और कृपाजी धाकड़ कहाँ शहीद हुए?: गोविन्दपुरा, बेंगू आंदोलन के दौरान।
