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राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थल

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ऐतिहासिक किले, महल एवं स्मारक

हवामहल (जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: इसका निर्माण 1799 ई. में महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने करवाया था। इसके मुख्य वास्तुकार लालचंद उस्ता थे। भगवान कृष्ण के मुकुट जैसी दिखने वाली यह इमारत बिना किसी नींव के समतल जमीन पर खड़ी है। यह 5 मंजिला है, जिसमें 953 बेहद खूबसूरत झरोखे और खिड़कियाँ हैं। इसे राजपरिवार की रानियों के लिए शहर के उत्सव और शाही जुलूस देखने के लिए बनवाया गया था।

आमेर किला (आमेर, जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: यह ऐतिहासिक किला अरावली की ऊँची पहाड़ी पर स्थित है और हिंदू-मुगल स्थापत्य कला का एक बेजोड़ मिश्रण है। किले के भीतर बना ‘शीश महल’ अपनी बारीक काँच की पच्चीकारी के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। इसके अलावा यहाँ दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास और प्रसिद्ध शिला देवी मंदिर स्थित है।

कुम्भलगढ़ दुर्ग (केलवाड़ा, राजसमंद)

  • विस्तृत इतिहास: इस अजेय दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था, जिसके वास्तुकार मंडन थे। इस किले की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 36 किलोमीटर लंबी बाहरी दीवार है, जिसे ‘भारत की महान दीवार’ (Great Wall of India) कहा जाता है। इस दीवार पर एक साथ 4 घुड़सवार चल सकते हैं। किले के सबसे ऊपरी भाग में ‘कटारगढ़’ स्थित है, जिसे ‘मेवाड़ की आँख’ कहते हैं, जहाँ वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था।

उम्मेद भवन पैलेस (जोधपुर)

  • विस्तृत इतिहास: इसे ‘छीतर पैलेस’ भी कहा जाता है क्योंकि इसके निर्माण में ‘छीतर’ नाम के विशेष पीले बलुआ पत्थरों का प्रयोग हुआ है। इसका निर्माण महाराजा उम्मेद सिंह ने 1928 से 1943 के बीच अकाल राहत कार्य के तहत करवाया था ताकि स्थानीय जनता को रोजगार मिल सके। यह दुनिया के सबसे बड़े निजी रिहाइशों (Private Residences) में से एक है।

सज्जनगढ़ पैलेस (उदयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: उदयपुर की बांसदरा पहाड़ी पर स्थित इस खूबसूरत महल का निर्माण महाराणा सज्जन सिंह ने करवाया था। इसे मुख्य रूप से मानसून के बादलों को देखने और एक खगोलीय वेधशाला के रूप में बनवानी की योजना थी, इसीलिए इसे ‘मानसून पैलेस’ भी कहते हैं। इसे ‘मेवाड़ का मुकुटमणि’ भी कहा जाता है।

रानी पद्मिनी महल (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)

  • विस्तृत इतिहास: यह महल चित्तौड़गढ़ किले के भीतर एक सुंदर तालाब (पद्मिनी तालाब) के किनारे बना है। इतिहास के अनुसार, यही वह स्थान है जहाँ दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी को दर्पण (आईने) में रानी पद्मिनी की झलक दिखाई गई थी, जिसके बाद चित्तौड़ का पहला ऐतिहासिक साका (1303 ई.) हुआ था।

जंतर-मंतर (जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: यह जयपुर में स्थित एक ऐतिहासिक खगोलीय वेधशाला (Astronomical Observatory) है। इसका निर्माण सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1734 ई. में करवाया था। यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्यघड़ी ‘सम्राट यंत्र’ स्थित है। इसे वर्ष 2010 में यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था।

बिड़ला तारामंडल (जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जयपुर के स्टैच्यू सर्किल के पास स्थित यह आधुनिक विज्ञान और पर्यटन का एक अनूठा केंद्र है। इसका उद्घाटन 1989 में हुआ था। यह तारामंडल अपने आधुनिक प्रोजेक्टर सिस्टम के जरिए पर्यटकों को ब्रह्मांड, तारों, ग्रहों और अंतरिक्ष विज्ञान की सजीव ऑडियो-विजुअल जानकारी प्रदान करता है।

जल महल (जयपुर, डीग व उदयपुर)

  • विशेष नोट्स: राजस्थान में तीन प्रसिद्ध जल महल हैं:
    1. जयपुर का जल महल: यह आमेर रोड पर ‘मानसागर झील’ के बीच बना है। इसका निर्माण सवाई जयसिंह ने अश्वमेध यज्ञ के बाद ब्राह्मणों और रानियों के ठहरने के लिए करवाया था। यह 5 मंजिला है, जिसकी 4 मंजिलें पानी के अंदर रहती हैं।
    2. डीग के जल महल (डीग जिला, पूर्व भरतपुर): इन्हें ‘महलों की नगरी’ या ‘फव्वारों का शहर’ कहते हैं। इनका निर्माण जाट राजा बदनसिंह और सूरजमल ने करवाया था। यहाँ का ‘गोपाल भवन’ सबसे भव्य है।
    3. उदयपुर के जल महल (जग निवास व जग मंदिर): ये पिछोला झील के बीच बने हैं। मुगल शहजादे शाहजहाँ ने अपने पिता के खिलाफ विद्रोह के दिनों में ‘जग मंदिर’ महल में ही शरण ली थी।

राजस्थान की प्रसिद्ध हवेलियाँ

पटवों की हवेली (जैसलमेर)

  • विस्तृत इतिहास: यह जैसलमेर की सबसे बड़ी, सबसे भव्य और पहली हवेली है। यह 5 मंजिला इमारत है, जिसका निर्माण व्यवसायी गुमानचंद पटवा ने अपने पांच बेटों के लिए 1805 ई. में शुरू करवाया था। अपनी बारीक नक्काशी, पत्थर के काम और जालीदार झरोखों के कारण यह पूरी दुनिया में विख्यात है।

सालिम सिंह की हवेली (जैसलमेर)

  • विस्तृत इतिहास: इस हवेली का निर्माण जैसलमेर रियासत के प्रधानमंत्री सालिम सिंह ने 1815 ई. में करवाया था। इस हवेली की ऊपरी मंजिल जहाज के अग्रभाग जैसी दिखती है, इसलिए इसे ‘जहाज महल’ भी कहा जाता है। इसकी बारीक नक्काशीदार खिड़कियाँ और नौ मंजिला स्थापत्य (अब 7 मंजिलें बची हैं) इसे बेहद आकर्षक बनाती हैं।

नथमल की हवेली (जैसलमेर)

  • विस्तृत इतिहास: इस हवेली का निर्माण 19वीं शताब्दी में जैसलमेर के तत्कालीन दीवान नथमल के लिए दो सगे भाइयों (हाथी और लालू नामक वास्तुकारों) ने किया था। हवेली के मुख्य द्वार पर पीले पत्थर से बने दो विशाल हाथी पर्यटकों का स्वागत करते हैं। दोनों भाइयों ने बिना किसी पूर्व नक्शे के इसके दो अलग-अलग हिस्सों को एक समान संतुलित बनाया था।

रामगढ़ की हवेलियां (रामगढ़-शेखावाटी, सीकर)

  • विस्तृत इतिहास: शेखावाटी के इस क्षेत्र को “ओपन एयर आर्ट गैलरी” भी कहा जाता है। यहाँ पोद्दार, रूइया, खेमका और ताराचंद गोयनका जैसे प्रसिद्ध सेठों की हवेलियां हैं, जिनकी दीवारों पर बने शानदार भित्तिचित्र (Fresco Paintings) विख्यात हैं।

स्वर्ण कोठी या सुनहरी कोठी (टोंक)

  • विस्तृत इतिहास: नवाबों के शहर टोंक में स्थित यह कोठी अपनी आंतरिक कांच की पच्चीकारी, सोने की परत के काम (Gold Leafing) और बेशकीमती पत्थरों की नक्काशी के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। इसका निर्माण टोंक के नवाब वजीरुद्दौला के काल में हुआ था। इसे अंदर से देखने पर यह सोने की तरह चमकती है, इसीलिए इसे ‘शीश महल’ भी कहा जाता है।

ऐतिहासिक छतरियाँ एवं स्मारक

गेटोर की छतरियाँ (जयपुर)

  • राजवंश / इतिहास: यह जयपुर के कछवाहा राजवंश का शाही श्मशान घाट है, जो नाहरगढ़ किले की तलहटी में स्थित है। यहाँ महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय से लेकर अंतिम शासक मानसिंह द्वितीय तक की कलात्मक छतरियाँ बनी हुई हैं। इनमें सवाई जयसिंह द्वितीय की सफेद संगमरमर की छतरी सबसे भव्य है। (नोट: यहाँ केवल महाराजा ईश्वरी सिंह की छतरी नहीं है, उनकी छतरी सिटी पैलेस के ‘जय निवास उद्यान’ में बनी है)।

बड़ाबाग की छतरियाँ (जैसलमेर)

  • राजवंश / इतिहास: यह जैसलमेर के भाटी राजवंश का शाही श्मशान स्थल है। पीले बलुआ पत्थरों (Yellow Sandstone) से बनी ये छतरियाँ अपने नक्काशीदार गुंबदों और कलात्मक खंभों के लिए प्रसिद्ध हैं, जिन पर राजाओं के साथ सती होने वाली रानियों के चित्र भी उत्कीर्ण हैं।

देवकुंड की छतरियाँ (बीकानेर)

  • राजवंश / इतिहास: रिड़मलसर के पास स्थित यह स्थान बीकानेर के राठौड़ राजवंश (राव बीकाजी और राव रायसिंह का वंश) का शाही श्मशान घाट है। यहाँ महाराजा सूरत सिंह की छतरी सफेद संगमरमर से बनी है जो अपनी शिल्पकला के लिए विशेष रूप से जानी जाती है। यहाँ सती प्रथा के ऐतिहासिक प्रमाण भी अंकित हैं।

कागा की छतरियाँ (जोधपुर)

  • राजवंश / इतिहास: जोधपुर के पास स्थित यह स्थान मारवाड़ के राजघराने के सामंतों, सेनापतियों और प्रतापी पुरुषों का श्मशान स्थल था। यहाँ की लाल बलुआ पत्थर की नक्काशीदार छतरियाँ स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण हैं। यहाँ ऋषि कागभुशुंडि की तपोभूमि भी मानी जाती है।

छत्र विलास की छतरियाँ (कोटा)

  • राजवंश / इतिहास: यह कोटा के हाड़ा चौहान राजवंश के शासकों का सुंदर ऐतिहासिक उद्यान और स्मारक स्थल है। यहाँ कोटा रियासत के प्रतापी राजाओं (जैसे महाराव भीमसिंह, दुर्जनशाल) के ऊंचे और भव्य स्मारक बने हुए हैं।

क्षार बाग की छतरियाँ / सारबाग (कोटा/बूंदी बॉर्डर)

  • राजवंश / इतिहास: यह मुख्य रूप से बूंदी के हाड़ा चौहान शासकों का शाही श्मशान घाट है, जो बूंदी किले के पास स्थित है। यहाँ लगभग 66 छतरियाँ बनी हुई हैं, जिनमें बूंदी के राव राजाओं और उनकी सतियों के स्मारक हैं। यहाँ राव शत्रुशाल की छतरी पाषाण नक्काशी का अद्भुत उदाहरण है।

केसर बाग की छतरियाँ (बूंदी)

  • राजवंश / इतिहास: यह बूंदी के हाड़ा चौहान राजवंश का एक और अत्यंत प्राचीन और सुंदर श्मशान स्थल है। यहाँ बूंदी के राजाओं और राजकुमारों की 60 से अधिक कलात्मक छतरियाँ स्थित हैं, जो अरावली की पहाड़ियों से घिरी हुई हैं।

आहड़ की छतरियाँ / महासत्याँ (उदयपुर)

  • राजवंश / इतिहास: यह मेवाड़ के गुहिल/सिसोदिया राजवंश के महाराणाओं का शाही श्मशान घाट है, जिसे ‘महासत्याँ’ भी कहा जाता है। मेवाड़ की राजधानी उदयपुर स्थानांतरित होने के बाद यहाँ सबसे पहली छतरी महाराणा अमर सिंह प्रथम (महाराणा प्रताप के पुत्र) की बनी थी। यहाँ की सभी छतरियाँ सफेद पत्थरों से निर्मित हैं और गुंबदाकार शैली में बनी हैं।

चौरासी (84) खंभों की छतरी (बूंदी)

  • राजवंश / इतिहास: इस भव्य छतरी का निर्माण 1683 ई. में बूंदी के राव राजा अनिरुद्ध सिंह ने अपने धाभाई (दूध भाई) देवा की याद में करवाया था। यह दो मंजिला भव्य स्मारक है जो 84 नक्काशीदार खंभों पर टिका हुआ है। इसके खंभों और छतों पर विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों और पौराणिक दृश्यों की सुंदर कलाकृति उकेरी गई है।

जसवंत थड़ा (जोधपुर)

  • राजवंश / इतिहास: मेहरानगढ़ किले के पास स्थित इस सफेद संगमरमर के स्मारक को ‘राजस्थान का ताजमहल’ कहा जाता है। इसका निर्माण 1899 ई. में जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह ने अपने पिता महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में करवाया था। यह मारवाड़ के राठौड़ शासकों का शाही स्मारक स्थल है।

अस्सी (80) खंभों की छतरी / मूसी महारानी की छतरी (अलवर)

  • राजवंश / इतिहास: इस दो मंजिला ऐतिहासिक छतरी का निर्माण 1815 ई. में अलवर के महाराजा विनय सिंह ने अपने पिता महाराजा बख्तावर सिंह और उनकी पासवान रानी ‘मूसी महारानी’ की स्मृति में करवाया था, जो बख्तावर सिंह के साथ सती हुई थीं। इसकी पहली मंजिल लाल बलुआ पत्थर से और दूसरी मंजिल सफेद संगमरमर से बनी है।

बत्तीस (32) खंभों की छतरियाँ

  • विशेष तथ्य: राजस्थान में 32 खंभों की दो सबसे प्रसिद्ध छतरियाँ हैं
    1. माण्डलगढ़ (भीलवाड़ा): यह छतरी आमेर (जयपुर) के प्रसिद्ध सेनापति जगन्नाथ कछवाहा की है। जब वे 1611 ई. में मेवाड़ अभियान के दौरान माण्डलगढ़ में वीरगति को प्राप्त हुए, तो मुगल सम्राट जहांगीर के काल में यह विशाल छतरी बनवाई गई।
    2. रणथम्भौर (सवाई माधोपुर): रणथम्भौर दुर्ग के भीतर स्थित इस छतरी का निर्माण चौहान शासक हम्मीर देव चौहान ने अपने पिता ‘जैत्रसिंह’ (जयसिंह) के 32 वर्षों के गौरवशाली शासनकाल की याद में करवाया था। इसे ‘न्याय की छतरी’ भी कहा जाता है, क्योंकि हम्मीर देव यहीं बैठकर न्याय करते थे।

सोलह (16) खंभों की छतरी (नागौर)

  • राजवंश / इतिहास: यह छतरी मारवाड़/नागौर के राठौड़ वीर योद्धा अमर सिंह राठौड़ की है। अमर सिंह अपनी कटार के धनी माने जाते थे, जिन्होंने शाहजहाँ के भरे मुगल दरबार में सलावत खाँ का वध कर दिया था। यह सुंदर छतरी लाल पत्थरों से बनी है और अमर सिंह के अदम्य साहस का प्रतीक है।

आठ (8) खंभों की छतरी (बांडोली, उदयपुर)

  • राजवंश / इतिहास: यह राजस्थान के गौरव और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की छतरी है, जो उदयपुर जिले के बांडोली गाँव में केजड़ बांध (तालाब) के किनारे स्थित है। जनवरी 1597 में जब चावंड में प्रताप का प्राणांत हुआ, तो इसी स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

6 खंभों की छतरी (लालसोट, दौसा)

  • राजवंश / इतिहास: यह लालसोट कस्बे में स्थित बणजारों की एक अत्यंत प्राचीन छतरी है। लाल पत्थरों से बनी यह छतरी लोक वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है और स्थानीय लोक कथाओं में इसका विशेष महत्व है।

मानसिंह प्रथम की छतरी (आमेर, जयपुर)

  • राजवंश / इतिहास: अकबर के नवरत्नों में शामिल आमेर के प्रतापी राजा महाराजा मानसिंह प्रथम की यह समाधि और छतरी है, जो हाड़ीपुरा (आमेर) में स्थित है। इसमें प्रारंभिक कछवाहा-मुगल मिश्रित शैली की वास्तुकला साफ दिखाई देती है।

संत रैदास की छतरी (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)

  • राजवंश / इतिहास: महान संत और कबीर के समकालीन संत रैदास की छतरी चित्तौड़गढ़ किले में ‘मीरा मंदिर’ के ठीक सामने बनी हुई है। संत रैदास कृष्ण दीवानी मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु थे। इस छोटी सी छतरी के केंद्र में संत रैदास के चरण चिन्ह (चरण पादुका) उत्कीर्ण हैं।

गोराधाय की छतरी (जोधपुर)

  • राजवंश / इतिहास: यह मारवाड़ के इतिहास की सबसे त्यागी महिला गोराधाय का स्मारक है। गोराधाय को ‘मारवाड़ की पन्नाधाय’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने मारवाड़ के राजकुमार अजीत सिंह की जान औरंगजेब के चंगुल से बचाने के लिए अपने स्वयं के पुत्र का बलिदान दे दिया था। जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह ने अपनी इस उपकृत माता के सम्मान में इस सुंदर छतरी का निर्माण करवाया था।

प्रमुख ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर

अम्बिका माता मन्दिर (जगत, उदयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: उदयपुर के जगत गाँव में स्थित इस मंदिर को ‘मेवाड़ का खजुराहो’ कहा जाता है। यह मंदिर 10वीं शताब्दी (961 ई.) में निर्मित हुआ था और यह गुर्जर-प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर शक्ति पीठ (देवी दुर्गा) को समर्पित है।

अद्भुतनाथ मन्दिर (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)

  • विस्तृत इतिहास: चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित यह एक प्राचीन शिव मंदिर है। इसका निर्माण मेवाड़ के महाराणा रायमल के काल में हुआ था। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके गर्भगृह में स्थापित भगवान शिव की त्रिमूर्ति (तीन मुख वाली) विशाल प्रतिमा है।

कुम्भा श्याम मन्दिर (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)

  • विस्तृत इतिहास: मूल रूप से इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में प्रतिहार शासकों द्वारा एक विष्णु मंदिर के रूप में कराया गया था। बाद में महाराणा कुम्भा ने 1448 ई. में इसका जीर्णोद्धार (Reconstructed) करवाया। इसी मंदिर के परिसर के एक कोने में मीराबाई का छोटा मंदिर और उनके गुरु संत रैदास की छतरी भी स्थित है।

कालिका माता मन्दिर (चित्तौड़गढ़ दुर्ग)

  • विस्तृत इतिहास: यह चित्तौड़गढ़ किले का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। मूल रूप से यह 8वीं शताब्दी में निर्मित एक भव्य ‘सूर्य मंदिर’ (Sun Temple) था, जिसे बाद में मुस्लिम आक्रांतों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। 14वीं शताब्दी में महाराणा हम्मीर के समय यहाँ मां काली की मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यह पंचायतन शैली की वास्तुकला का सुंदर नमूना है।

जगदीश मन्दिर (उदयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: उदयपुर सिटी पैलेस के पास स्थित इस भव्य मंदिर का निर्माण 1651 ई. में महाराणा जगतसिंह प्रथम ने करवाया था। भगवान विष्णु (जगन्नाथ) को समर्पित यह मंदिर पंचायतन शैली और नागर शैली का अनूठा मिश्रण है। इसे ‘सपनों से बना मंदिर’ (Temple built out of dreams) भी कहा जाता है।

ओसियाँ के मन्दिर (ओसियाँ, जोधपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जोधपुर के ओसियाँ कस्बे को ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’ कहा जाता है। यहाँ 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच गुर्जर-प्रतिहार राजाओं द्वारा निर्मित हिंदू और जैन मंदिरों का एक विशाल समूह है। इनमें सच्चिया माता मंदिर और सूर्य मंदिर प्रमुख हैं।

कपाड़दा के जैन मन्दिर (जोधपुर)

  • विस्तृत इतिहास: कपाड़दा जैन मंदिर जोधपुर जिले की बिलाड़ा तहसील के कपाड़दा गाँव में स्थित हैं। यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है।

चामुण्डा देवी मन्दिर (मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जोधपुर के मेहरानगढ़ किले के दक्षिणी कोने पर स्थित यह मंदिर मारवाड़ के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी का स्थान है। इस मूर्ति को 1460 ई. में जोधपुर के संस्थापक राव जोधा मण्डोर से यहाँ लेकर आए थे।

दिलवाड़ा जैन मन्दिर (माउंट आबू, सिरोही)

  • विस्तृत इतिहास: सफेद संगमरमर से बने इन पांच जैन मंदिरों का समूह दुनिया भर में अपनी बारीक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इनमें दो मंदिर सबसे मुख्य हैं: पहला ‘विमल वसाही मंदिर’ (1031 ई. में आदिनाथ को समर्पित) और दूसरा ‘लून वसाही मंदिर’ (1230 ई. में 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित)। कर्नल टॉड ने इसकी तुलना ताजमहल से की थी।

अर्बूदा देवी मन्दिर (माउंट आबू, सिरोही)

  • विस्तृत इतिहास: माउंट आबू की ऊँची पहाड़ी पर एक प्राकृतिक गुफा के भीतर स्थित इस मंदिर को ‘राजस्थान की वैष्णो देवी’ कहा जाता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को लगभग 450 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। अर्बूदा देवी को माउंट आबू अंचल की रक्षक देवी माना जाता है।

अचलेश्वर महादेव मन्दिर (अचलगढ़, माउंट आबू)

  • विस्तृत इतिहास: अचलगढ़ किले के पास स्थित यह भारत का एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहाँ भगवान शिव के किसी शिवलिंग या मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि भगवान शिव के दाहिने पैर के अंगूठे की पूजा की जाती है। मंदिर के परिसर में एक विशाल गड्ढा है जिसे ‘ब्रह्म खड्ड’ कहा जाता है।

धूलेश्वर महादेव मन्दिर (माउंट आबू, सिरोही)

  • विस्तृत इतिहास: माउंट आबू के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित यह एक अत्यंत प्राचीन और शांत शिव मंदिर है। अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण बेहद विहंगम है।

गौमुख मन्दिर (माउंट आबू, सिरोही)

  • विस्तृत इतिहास: इस मंदिर का नाम यहाँ स्थित एक प्राकृतिक झरने के कारण पड़ा है, जिसका पानी संगमरमर से तराशे गए गाय के मुख से लगातार बहता रहता है। वशिष्ठ आश्रम के पास स्थित यह मंदिर पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। माना जाता है कि इसी स्थान पर ऋषि वशिष्ठ ने ‘अग्निकुंड यज्ञ’ किया था, जिससे राजपूतों के चार राजवंशों की उत्पत्ति हुई थी।

बरोली / बदोली के शिव मन्दिर एवं घटेश्वर महादेव (रावतभाटा, चित्तौड़गढ़)

  • विस्तृत इतिहास: जो भौगोलिक रूप से चित्तौड़गढ़ जिले की रावतभाटा तहसील में चंबल और बामनी नदी के संगम के पास स्थित है। यह 9वीं शताब्दी के पंचायतन शैली के 9 मंदिरों का समूह है, जिसमें सबसे प्रमुख और सुरक्षित मंदिर ‘घटेश्वर महादेव’ का है।

जम्बु मार्गेश्वर मन्दिर (बूंदी)

  • विस्तृत इतिहास: बूंदी के लाखेरी क्षेत्र के पास स्थित यह एक अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक शिव मंदिर है। महाभारत कालीन और मध्यकालीन इतिहास के संदर्भों में इस स्थान का उल्लेख ‘जम्बु मार्ग’ के रूप में मिलता है।

कर्णी माता मन्दिर (देशनोक, बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: इस विश्वप्रसिद्ध मंदिर को ‘चूहों का मंदिर’ कहा जाता है। यहाँ मंदिर परिसर में लगभग 20,000 से अधिक काले चूहे स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, जिन्हें ‘काबा’ कहा जाता है। इनमें सफेद चूहे के दर्शन को अत्यधिक शुभ माना जाता है। कर्णी माता बीकानेर के राठौड़ राजवंश और चारण समाज की कुलदेवी हैं।

भांडासर जैन मन्दिर (बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: यह जैन धर्म के 5वें तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ को समर्पित है। इसका निर्माण 15वीं शताब्दी में भांडाशाह ओसवाल नामक धनी व्यापारी ने करवाया था। इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी बात यह है कि इसकी नींव भरने में पानी की जगह 40,000 किलोग्राम शुद्ध देसी घी और नारियल का उपयोग किया गया था। गर्मियों में आज भी यहाँ की दीवारों से घी की चिकनाई महसूस की जा सकती है। इसे ‘त्रैलोक्य दीपक मंदिर’ भी कहते हैं।

चिन्तामणि जैन मन्दिर (बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: बीकानेर शहर के पुराने हिस्से में स्थित यह मंदिर जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में करवाया गया था। मंदिर के भीतर की छतों और खंभों पर की गई सोने की कारीगरी और भित्तिचित्र पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

हर मन्दिर (जूनागढ़ किला, बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: बीकानेर के प्रसिद्ध जूनागढ़ दुर्ग के भीतर स्थित यह राजपरिवार का निजी और प्रमुख देव मंदिर है। यहाँ बीकानेर के शासक नए साल, राज्याभिषेक और विशेष उत्सवों पर पूजा-अर्चना करते थे। यहाँ भगवान लक्ष्मी नारायण, शिव-पार्वती और दुर्गा माँ की सुंदर मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं।

जैमल मन्दिर / राज घराने के पूज्य स्मारक (जूनागढ़ किला, बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: जूनागढ़ किले के भीतर ‘जैमल’ और ‘फत्ता’ (चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके के महान वीर योद्धा) की वीरता के प्रतीक और राजपरिवार के पूज्य देवताओं के स्मारकों के रूप में यह छोटा मंदिर/स्थान बना हुआ है।

लक्ष्मीनारायण मन्दिर (बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: यह बीकानेर रियासत के राजदेवता (मुख्य आराध्य देव) का मंदिर है। बीकानेर के राजा स्वयं को लक्ष्मी नारायण जी का दीवान मानकर शासन करते थे (जैसे मेवाड़ के राजा एकलिंग जी को राजा मानते थे)। इस भव्य मंदिर का निर्माण महाराजा लूणकरण के काल में शुरू हुआ था।

धुनीनाथ मन्दिर (बीकानेर)

  • विस्तृत इतिहास: बीकानेर शहर में स्थित यह मंदिर नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध संतों की तपोस्थली और धुनी (पवित्र अग्नि स्थान) के रूप में विख्यात है। यहाँ संतों की समाधियाँ और प्राचीन शिव मंदिर स्थित है।

ब्रह्मा मन्दिर (पुष्कर, अजमेर)

  • विस्तृत इतिहास: यह संपूर्ण विश्व में भगवान ब्रह्मा का सबसे मुख्य और प्राचीन मंदिर है। यहाँ ब्रह्मा जी की चौमुखी (चार मुख वाली) अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पास ही पवित्र पुष्कर झील (52 घाटों वाली) स्थित है, जहाँ कार्तिक पूर्णिमा को प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मेला लगता है।

गोविन्ददेव जी का मन्दिर (जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जयपुर के सिटी पैलेस परिसर के पास स्थित यह मंदिर जयपुर राजघराने के आराध्य देव का स्थान है। जयपुर के राजा स्वयं को गोविन्ददेव जी का दीवान मानते थे। इस मंदिर के मुख्य हॉल का नाम ‘सत्संग हॉल’ है, जिसका नाम बिना किसी खंभे के दुनिया के सबसे बड़े कंक्रीट के फ्लैट रूफ के रूप में ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज है।

गणेश मन्दिर / मोती डूंगरी गणेश जी (जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जयपुर की मोती डूंगरी पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह मंदिर राजस्थान के सबसे विख्यात गणेश मंदिरों में से एक है। यहाँ स्थापित गणेश जी की विशाल प्रतिमा में गणेश जी की सूंड दाईं ओर सिंदूरी रूप मुड़ी हुई है।

हनुमान मन्दिर (गलता जी, जयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: जयपुर के पवित्र गलता तीर्थ (मंकी वैली) परिसर के पहाड़ी मार्ग पर स्थित यह प्राचीन हनुमान मंदिर भक्तों के आकर्षण का केंद्र है। अरावली की सुंदर घाटियों के बीच यह मंदिर स्थित है।

दिगंबर जैन मन्दिर (अलवर)

  • विस्तृत इतिहास: अलवर शहर के बीचों-बीच स्थित यह जैन मंदिर स्थापत्य कला और शांति का एक सुंदर केंद्र है। यह मंदिर जैन धर्म के विभिन्न तीर्थंकरों की प्राचीन और नक्काशीदार प्रतिमाओं के लिए जाना जाता है।

द्वारकाधीश मंदिर (कांकरोली, राजसमंद)

  • विस्तृत इतिहास: राजसमंद झील के किनारे स्थित यह मंदिर भी वल्लभ संप्रदाय (पुष्टि मार्गी वैष्णव संप्रदाय) का एक प्रमुख मंदिर है। यहाँ भगवान कृष्ण के द्वारकाधीश रूप की दिव्य पूजा-अर्चना की जाती है।

आभानेरी मंदिर / हर्षत माता मंदिर (दौसा)

  • विस्तृत इतिहास: 8वीं-9वीं शताब्दी के गुर्जर-प्रतिहार कालीन स्थापत्य का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। हर्षत माता का यह मंदिर मूल रूप से एक विष्णु मंदिर था। इसी मंदिर के पास ‘चाँद बावड़ी’ स्थित है, जो दुनिया की सबसे बड़ी और गहरी कलात्मक सीढ़ीदार बावड़ी (Stepwell) है।

श्रीनाथजी मंदिर (नाथद्वारा, राजसमंद)

  • विस्तृत इतिहास: यह वैष्णव संप्रदाय के ‘पुष्टि मार्ग’ का प्रधान पीठ है। यहाँ भगवान कृष्ण के 7 वर्ष के बालक रूप की पूजा होती है। औरंगजेब के समय इस मूर्ति को गोवर्धन (मथुरा) से सिहाड़ गाँव (वर्तमान नाथद्वारा) लाया गया था। यहाँ की ‘पिच्छवाई पेंटिंग्स’ पूरी दुनिया में मशहूर हैं।

मीरा बाई का मंदिर (मेड़तासिटी, नागौर)

  • विस्तृत इतिहास: कृष्ण दीवानी मीरा बाई की जन्मस्थली मेड़ता में स्थित इस मंदिर को ‘चारभुजा नाथ मंदिर’ भी कहते हैं। यहीं पर मीरा बाई अपना अधिकांश समय भगवान कृष्ण की भक्ति और भजनों में बिताती थीं।

बाबा रामदेव मंदिर (रामदेवरा, जैसलमेर)

  • विस्तृत इतिहास: लोकदेवता बाबा रामदेव (रामसा पीर) का यह मंदिर सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा प्रतीक है, क्योंकि यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समान रूप से मन्नतें मांगते हैं। यहाँ भाद्रपद माह में लगने वाले मेले का मुख्य आकर्षण भील समाज द्वारा किया जाने वाला ‘तेरहताली नृत्य’ है।

नाकोड़ा पार्श्वनाथ मंदिर (बालोतरा के पास)

  • विस्तृत इतिहास: अरावली और छप्पन की पहाड़ियों के बीच स्थित यह एक अत्यंत पवित्र जैन तीर्थस्थल है, जो 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ को समर्पित है। यहाँ स्थापित भैरव जी (नाकोड़ा भैरव) की मूर्ति चमत्कारी मानी जाती है।

सालासर बालाजी (सालासर, चुरू)

  • विस्तृत इतिहास: यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ हनुमान जी की दाढ़ी-मूंछ वाली मूर्ति स्थापित है। यहाँ भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए नारियल बांधते हैं। चैत्र और आश्विन पूर्णिमा को यहाँ बहुत बड़ा मेला भरता है।

खाटू श्यामजी (खाटू गाँव, सीकर)

  • विस्तृत इतिहास: यह मंदिर महाभारत कालीन बर्बरीक (शीश के दानी) को समर्पित है, जिन्हें कलयुग में कृष्ण के नाम ‘श्याम’ से पूजा जाता है। यहाँ का फाल्गुन लक्खी मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

सोनीजी की नसियाँ / लाल मंदिर (अजमेर)

  • विस्तृत इतिहास: यह दिगंबर जैन संप्रदाय का एक भव्य मंदिर है, जिसे ‘लाल मंदिर’ भी कहते हैं। इसके भीतर सोने से निर्मित ‘अयोध्या नगरी’ की कांच के बक्से में झांकी सजाई गई है, जिसमें जैन धर्म के तीर्थंकर के जन्म कल्याणक को सोने की कारीगरी से दर्शाया गया है।

सांवलिया जी मंदिर (मंडफिया, चित्तौड़गढ़)

  • विस्तृत इतिहास: भगवान कृष्ण (सांवलिया सेठ) का यह भव्य मंदिर भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र है। इन्हें ‘व्यापारियों के देव’ भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सांवलिया सेठ व्यापार में भक्तों के ‘बिजनेस पार्टनर’ बनते हैं, इसलिए यहाँ देश में सबसे भारी चढ़ावा आता है।

सास-बहू के प्राचीन मंदिर (कैलाशपुरी, नागदा, उदयपुर)

  • विस्तृत इतिहास: यह वास्तव में ‘सहस्रबाहु’ (हजार भुजाओं वाले विष्णु) का मंदिर है, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर ‘सास-बहू’ का मंदिर कहलाने लगा। यह 10वीं शताब्दी की बेजोड़ स्थापत्य कला और महीन मूर्तिकला का प्रतीक है।

देव सोमनाथ मंदिर (डूंगरपुर)

  • विस्तृत इतिहास: सोम नदी के तट पर स्थित यह शिव मंदिर अपनी अनूठी निर्माण शैली के लिए प्रसिद्ध है। इस तीन मंजिला मंदिर के निर्माण में कहीं भी चूने या सीमेंट (गारे) का उपयोग नहीं हुआ है, बल्कि पत्थरों को एक-दूसरे के खाँचे में फंसाकर (Interlocking Style) खड़ा किया गया है।

फखरुद्दीन की दरगाह / मज़ार-ए-फखरी (गलियाकोट, डूंगरपुर)

  • विस्तृत इतिहास: माही नदी के किनारे गलियाकोट में स्थित यह दरगाह दाऊदी बोहरा मुस्लिम संप्रदाय का सबसे पवित्र और प्रधान तीर्थ स्थल है। यहाँ सैयदी फखरुद्दीन शहीद का मज़ार है। यह स्थान ‘रमकड़ा उद्योग’ (Soapstone Toys) के लिए भी प्रसिद्ध है।

अरथूना के प्राचीन मंदिर (बाँसवाड़ा)

  • विस्तृत इतिहास: वागड़ क्षेत्र के अरथूना में 11वीं-12वीं शताब्दी के परमार शासकों द्वारा निर्मित मंदिरों का एक विशाल समूह है। यहाँ के खंडहरों में शिव, विष्णु और जैन धर्म से जुड़े कई कलात्मक मंदिर और मूर्तियां बिखरी हुई हैं।

हर्षनाथ मंदिर (सीकर)

  • विस्तृत इतिहास: सीकर की हर्ष पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसका निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था। यह मंदिर लोक देवी ‘जीण माता’ के भाई हर्ष की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है।
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