बेणेश्वर मेला
- स्थान: नवाटापुरा गाँव, साबला तहसील, डूंगरपुर।
- तिथि: माघ पूर्णिमा (जनवरी-फरवरी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘आदिवासियों का कुंभ’, ‘वागड़ का पुष्कर’ और ‘भीलों का महाकुंभ’ कहा जाता है।
- यह मेला सोम, माही और जाखम नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर भरता है।
- इस मंदिर की स्थापना संत मावजी ने की थी। यहाँ विश्व का एकमात्र ऐसा खंडित शिवलिंग है जिसकी पूजा की जाती है।
बादशाह मेला
- स्थान: ब्यावर (अब नया जिला ब्यावर, पहले अजमेर)।
- तिथि: चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (धुलंडी के अगले दिन)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इस मेले में टोडरमल को एक दिन का बादशाह बनाए जाने की याद में बादशाह की सवारी निकाली जाती है।
- सवारी के आगे बीरबल की भूमिका निभाने वाला व्यक्ति ‘भैरव नृत्य’ (या मयूर नृत्य) करता है, जो परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।
बाणगंगा का मेला
- स्थान: विराटनगर (अब कोटपूतली-बहरोड़ जिला, पूर्व में जयपुर)।
- तिथि: वैशाख पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह मेला बाणगंगा नदी के किनारे भरता है। मान्यता है कि इस नदी की धारा अर्जुन ने तीर (बाण) मारकर निकाली थी।
- यहाँ बौद्ध धर्म, मौर्य काल और महाभारत काल के ऐतिहासिक अवशेष मिलते हैं।
आन्देश्वर पार्श्वनाथ मेला
- स्थान: आन्देश्वर (कुशलगढ़ तहसील), बांसवाड़ा।
- तिथि: कार्तिक पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह एक प्रसिद्ध जैन मेला है, जो भगवान पार्श्वनाथ के प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित होता है। यहाँ की मूर्तियाँ 10वीं शताब्दी की मानी जाती हैं।
भर्तृहरी का मेला
- स्थान: सरिस्का के पास, अलवर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘मत्स्य अंचल का सबसे बड़ा मेला’ कहा जाता है।
- यह कनफड़े नाथ साधुओं का प्रमुख तीर्थ स्थल है। राजा भर्तृहरी जो उज्जैन के शासक थे, उन्होंने अपनी वैराग्य जिंदगी यहाँ तपस्या करके बिताई थी।
बुड्ढा जोहड़ मेला
- स्थान: डाबला गाँव, रायसिंहनगर (अनूपगढ़ जिला, पूर्व में श्रीगंगानगर)।
- तिथि: श्रावण अमावस्या (हरियाली अमावस्या)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह राजस्थान के सिख समाज का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। यहाँ का गुरुद्वारा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र है।
चार भुजा का मेला
- स्थान: गढ़बोर, राजसमंद।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- भगवान कृष्ण (चारभुजा नाथ) को समर्पित इस मेले में ठाकुर जी की मूर्ति को विमान में बिठाकर पवित्र जलाशय में स्नान कराया जाता है, जिसे ‘जलझूलनी ग्यारस’ का मेला भी कहते हैं।
चामुण्डा माता मेला
- स्थान: मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर।
- तिथि: आश्विन नवरात्र (शारदीय नवरात्र)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- चामुंडा माता जोधपुर के राठौड़ राजवंश की इष्टदेवी हैं।
- नोट: 30 सितंबर 2008 को इस मेले में एक दुखद भगदड़ मची थी, जिसकी जांच के लिए जसराज चोपड़ा कमेटी का गठन किया गया था
दशहरा मेला
- स्थान: कोटा।
- तिथि: आश्विन शुक्ल दशमी (विजयदशमी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- कोटा का दशहरा मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है।
- इसकी शुरुआत कोटा के महाराव माधोसिंह के समय (1579 ई.) में हुई थी, लेकिन इसे भव्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्वरूप महाराव उम्मीद सिंह द्वितीय के काल में मिला।
दादूजी का मेला
- स्थान: नरेना / नारायणा (दूदू जिला, पूर्व में जयपुर)।
- तिथि: फाल्गुन शुक्ल अष्टमी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह दादू पंथ का मुख्य मेला है। नरेना में दादू जी की मुख्य गद्दी (प्रधान पीठ) स्थित है। यहाँ दादू वाणी की पूजा की जाती है।
डोल मेला
- स्थान: बारां।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे श्री जी का मेला भी कहते हैं। इस अवसर पर बारां शहर में विभिन्न अखाड़ों और झांकियों के साथ भगवान की विशाल ‘डोल यात्रा’ (सवारी) निकाली जाती है।
देवजी / देवनारायण का मेला
- स्थान: आसिंद, भीलवाड़ा (इसके अलावा देवधाम जोधपुरिया, निवाई-टोंक में भी भरता है)।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल सप्तमी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- देवनारायण जी गुर्जर समाज के आराध्य देव और विष्णु के अवतार माने जाते हैं। इनके मेले में नीम की पत्तियों और छाछ-राबड़ी का भोग लगाया जाता है।
गणेश मेला
- स्थान: रणथंभौर दुर्ग, सवाई माधोपुर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (गणेश चतुर्थी / चतरा चौथ)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह राजस्थान का सबसे बड़ा गणेश मेला है। यहाँ भगवान शिव के पुत्र गणेश जी की ‘त्रिनेत्र प्रतिमा’ (तीन आंखों वाली मूर्ति) स्थापित है। शादी का पहला निमंत्रण पत्र (कुमकुम पत्री) इसी मंदिर में भेजा जाता है।
गोगाजी का मेला
- स्थान: गोगामेड़ी, नोहर तहसील, हनुमानगढ़।
- तिथि: भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। गोगाजी को ‘जाहिर पीर’ भी कहा जाता है।
- इस मेले के दौरान ‘पीले वस्त्र’ पहने भक्त (पूरबिए) गोगाजी के भजनों पर नृत्य करते हैं। यहाँ का मुख्य मंदिर मकबरेनुमा आकृति में बना है जिस पर ‘बिस्मिल्लाह’ अंकित है।
घुश्मेश्वर महादेव मेला
- स्थान: शिवाड़, सवाई माधोपुर।
- तिथि: महाशिवरात्रि (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- मान्यता है कि यह भगवान शिव का 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। यहाँ शिवरात्रि पर बहुत विशाल और ऐतिहासिक मेला आयोजित होता है।
गणगौर मेला
- स्थान: जयपुर
- तिथि: चैत्र शुक्ल तृतीया।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- जयपुर में गणगौर माता की शाही सवारी निकाली जाती है जिसे देखने दुनिया भर से पर्यटक आते हैं। कर्नल जेम्स टॉड ने उदयपुर की गणगौर का बड़ा ही सुंदर वर्णन अपनी पुस्तक में किया है।
गौतमेश्वर मेला
- स्थान: चोटिला, शिवगंज तहसील (सिरोही) और एक अन्य मेला अरनोद (प्रतापगढ़) में भरता है।
- तिथि: वैशाख पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- गौतमेश्वर (भूरिया बाबा) मीणा जनजाति के आराध्य देव हैं। मीणा जाति के लोग कभी भी भूरिया बाबा की झूठी कसम नहीं खाते। सिरोही वाले मेले में वर्दीधारी पुलिसकर्मियों का जाना वर्जित माना जाता है।
घोटिया आम्बा मेला
- स्थान: बारीगामा गाँव, बांसवाड़ा।
- तिथि: चैत्र अमावस्या।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘वागड़ का दूसरा बड़ा मेला’ कहा जाता है। महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ बिताया था और केले के पत्तों पर भोजन किया था।
जम्भेश्वर मेला
- स्थान: मुकाम नोखा, बीकानेर।
- तिथि: वर्ष में दो बार भरता है — आश्विन अमावस्या और फाल्गुन अमावस्या।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह बिश्नोई संप्रदाय का सबसे बड़ा मेला है। यह पर्यावरण वैज्ञानिक और बिश्नोई पंथ के संस्थापक संत जाम्भोजी की समाधि स्थली है।
जीण माता का मेला
- स्थान: रेवासा, सीकर।
- तिथि: वर्ष में दो बार — चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- जीण माता चौहान वंश की कुलदेवी हैं। लोक साहित्य में जीण माता का गीत सबसे लंबा है। मेले में माता को ढाई प्याला शराब चढ़ाने की परंपरा है।
जसनाथजी का मेला
- स्थान: कतरियासर, बीकानेर।
- तिथि: आश्विन शुक्ल सप्तमी, माघ शुक्ल सप्तमी और चैत्र शुक्ल सप्तमी (मुख्य मेला आश्विन में)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह जसनाथी संप्रदाय का प्रधान मेला है। इस मेले का मुख्य आकर्षण जसनाथी सिद्धों द्वारा धधकते अंगारों पर किया जाने वाला ‘अग्नि नृत्य’ है, जिसमें वे ‘फ़तेह-फ़तेह’ का उद्घोष करते हैं।
कैला देवी का मेला
- स्थान: त्रिकूट पर्वत के पास, करौली।
- तिथि: चैत्र शुक्ल अष्टमी (चैत्र नवरात्र)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इस मेले को ‘लक्खी मेला’ भी कहा जाता है क्योंकि इसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
- कैला देवी के भक्त मेले में प्रसिद्ध ‘लांगुरिया गीत’ गाते हैं और लांगुरिया नृत्य करते हैं। माता के मंदिर के सामने बोहरा भगत की छतरी स्थित है। [1]
कपिल मुनि का मेला
- स्थान: कोलायत, बीकानेर।
- तिथि: कार्तिक पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल की यह तपोभूमि है।
- इस मेले का सबसे मुख्य आकर्षण ‘दीपदान’ परंपरा है, जहाँ श्रद्धालु कोलायत झील में दीये जलाकर तैरते हैं। इस मेले में चारण जाति के लोग भाग नहीं लेते।
केशरियानाथ जी का मेला
- स्थान: धुलेव गाँव, उदयपुर।
- तिथि: चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी के दिन)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इन्हें ऋषभदेव जी या ‘काला जी’ भी कहा जाता है। जैन धर्म के लोग इन्हें प्रथम तीर्थंकर मानते हैं, जबकि भील जनजाति के लोग इन्हें ‘काला जी’ के रूप में पूजते हैं। मूर्ति पर अत्यधिक केसर चढ़ाने के कारण इन्हें ‘केशरियानाथ जी’ कहा जाता है। भील लोग इनकी आन (कसम) खाकर झूठ नहीं बोलते।
करणी माता का मेला
- स्थान: देशनोक, बीकानेर।
- तिथि: वर्ष में दो बार — चैत्र और आश्विन नवरात्र।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इन्हें ‘चूहों वाली देवी’ कहा जाता है। मंदिर में घूमने वाले सफेद चूहों को ‘काबा’ कहते हैं, जिनके दर्शन को अत्यंत शुभ माना जाता है। करणी माता बीकानेर के राठौड़ों की कुलदेवी हैं।
खेजड़ली शहीद मेला
- स्थान: खेजड़ली गाँव, जोधपुर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी के दिन)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला (World’s Only Tree Fair) है।
- यह मेला 1730 ई. में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में खेजड़ी वृक्षों को बचाने के लिए शहीद हुए 363 लोगों की स्मृति में आयोजित किया जाता है। उस समय जोधपुर के महाराजा अभय सिंह थे।
कल्याणजी का मेला
- स्थान: डिग्गी, मालपुरा तहसील (टोंक जिला)।
- तिथि: श्रावण अमावस्या।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इन्हें ‘डिग्गी कल्याण जी’ कहा जाता है। भगवान विष्णु के रूप में इनकी पूजा होती है। मुस्लिम समुदाय के लोग इन्हें ‘कलह पीर’ के नाम से पूजते हैं। जयपुर से डिग्गी तक की पैदल लक्खी पदयात्रा बहुत प्रसिद्ध है।
लालदासजी का मेला
- स्थान: शेरपुर और धोलीदूब, अलवर (मुख्य समाधि नगला जहाज, भरतपुर में भी उत्सव होता है)।
- तिथि: आश्विन एकादशी और माघ पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- मेव संप्रदाय के आराध्य संत लालदास जी का यह प्रमुख मेला है, जो सांप्रदायिक सद्भाव का एक अनूठा उदाहरण है।
महावीर जी का मेला
- स्थान: चंदनपुर (श्री महावीरजी), करौली।
- तिथि: चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से वैशाख कृष्ण द्वितीया तक।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह राजस्थान में जैन धर्म का सबसे बड़ा मेला है। यह गंभीर नदी के किनारे आयोजित होता है।
- इस मेले की सबसे अनूठी विशेषता ‘लठमार होली’ (Lathmar Holi) और रथ यात्रा है, जिसमें रथ को हाथ लगाने का पहला अधिकार चर्मकार (दलित) समाज के गोवर्धन जी के वंशजों को होता है, जो सामाजिक समरसता दर्शाता है।
माता कुंडलीनी का मेला
- स्थान: राशमी तहसील, चित्तौड़गढ़।
- तिथि: वैशाख पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह माता कुंडलीनी के पवित्र मंदिर परिसर में आयोजित होता है। यहाँ से ठीक पास में मातृकुण्डिया तीर्थ स्थल है।
मातृकुण्डिया मेला
- स्थान: राशमी, चित्तौड़गढ़।
- तिथि: वैशाख पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘राजस्थान का हरिद्वार’ कहा जाता है। यहाँ चंद्रभागा नदी के तट पर लक्ष्मण झूला बना हुआ है। मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से मातृ-ऋण से मुक्ति मिलती है। 1921 में मोतीलाल तेजावत ने यहीं से ‘एकी आंदोलन’ की शुरुआत की थी।
मचकुण्ड मेला
- स्थान: धौलपुर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल षष्ठी (देव छठ / तीरथराज मेला)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- मचकुण्ड को ‘तीर्थों का भांजा’ (Nephew of Pilgrimages) कहा जाता है (जबकि पुष्कर को तीर्थों का मामा और देवयानी-सांभर को तीर्थों की नानी कहते हैं)। यहाँ मुख्य कुंड में स्नान का धार्मिक महत्व है।
निम्बो का नाथ मेला
- स्थान: फालना-सांडेराव मार्ग, पाली।
- तिथि: शिवरात्रि और वैशाख पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह भगवान शिव का एक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि कुंती ने यहाँ शिव की आराधना की थी और पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहाँ समय बिताया था। पाली क्षेत्र के लोग यहाँ भारी संख्या में जुटते हैं।
पुष्कर मेला
- स्थान: पुष्कर, अजमेर।
- तिथि: कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे राजस्थान का सबसे रंगीन मेला (Most Colorful Fair) और ‘ऊंटों का सबसे बड़ा मेला’ कहा जाता है।
- इसमें सर्वाधिक विदेशी पर्यटक आते हैं, इसलिए इसे ‘अंतरराष्ट्रीय मेला’ भी कहते हैं। पुष्कर में विश्व प्रसिद्ध ब्रह्मा जी का मंदिर और पवित्र पुष्कर झील स्थित है, जहाँ कार्तिक पूर्णिमा को महा-दीपदान होता है।
पदमपुरा मेला
- स्थान: शिवदासपुरा के पास, जयपुर।
- तिथि: आश्विन शुक्ल चतुर्दशी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र ‘पदमपुरा’ में आयोजित होता है, जो कि जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ और मुख्य रूप से पद्मप्रभु जी को समर्पित है। यहाँ की वास्तुकला बहुत सुंदर है।
पाण्डुपोल हनुमान मेला
- स्थान: सरिस्का अभ्यारण्य, अलवर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी और पंचमी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ हनुमान जी की शयन मुद्रा (लेटी हुई प्रतिमा) स्थापित है। माना जाता है कि भीम ने अपना घमंड चूर होने पर हनुमान जी के दर्शन इसी स्थान पर किए थे।
परशुराम महोदय मेला
- स्थान: सादड़ी के पास, अरावली की गुफा में, पाली (राजसमंद की सीमा पर)।
- तिथि: श्रावण शुक्ल छठ और सप्तमी।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘राजस्थान का अमरनाथ’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह मेला अरावली की ऊँची पहाड़ियों के बीच एक प्राकृतिक गुफा में बने शिव मंदिर में भरता है। इसकी चढ़ाई अत्यंत कठिन है।
राणी सती का मेला
- स्थान: झुंझुनू।
- तिथि: भाद्रपद अमावस्या (सती अमावस्या)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इन्हें स्थानीय लोग आदर से ‘दादी जी’ कहते हैं। इनका वास्तविक नाम नारायणी देवी था। सती प्रथा निषेध अधिनियम 1987 के बाद इस मेले पर आधिकारिक रोक लगा दी गई थी, लेकिन धार्मिक आस्था के रूप में यहाँ दर्शन जारी रहते हैं।
रामदेव जी का मेला
- स्थान: रामदेवरा (रुणेचा), पोकरण तहसील, जैसलमेर।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबे री बीज) से भाद्रपद शुक्ल एकादशी तक।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘मारवाड़ का कुंभ’ कहा जाता है। यह राजस्थान में सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा मेला है, जहाँ हिंदू उन्हें कृष्ण का अवतार मानकर और मुस्लिम उन्हें ‘रामसा पीर’ के रूप में पूजते हैं।
- इस मेले का मुख्य आकर्षण कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला ‘तेरहताली नृत्य’ है।
शीतला माता का मेला
- स्थान: सील की डूंगरी, चाकसू (जयपुर ग्रामीण जिला, पूर्व में जयपुर)।
- तिथि: चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी / बासोड़ा)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इस मेले को ‘बैलगाड़ी का मेला’ (Bullock Cart Fair) भी कहा जाता है क्योंकि ग्रामीण लोग दूर-दूर से अपनी सजी-धजी बैलगाड़ियों में यहाँ आते हैं।
- शीतला माता को चेचक की देवी और बच्चों की संरक्षिका माना जाता है। इनका वाहन गधा है और पुजारी कुम्हार जाति के होते हैं। इस दिन बासी भोजन (बासोड़ा) खाने की परंपरा है।
साहवा सिख मेला
- स्थान: साहवा, तारानगर तहसील, चूरू।
- तिथि: कार्तिक पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह राजस्थान में सिख धर्म का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। मान्यता है कि सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी और दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी दोनों ही इस स्थान पर पधारे थे।
सालेश्वर महादेव मेला
- स्थान: सालेश्वर, पाली।
- तिथि: महाशिवरात्रि और श्रावण मास के सोमवार।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह मारवाड़ क्षेत्र का एक प्राचीन प्राकृतिक शिव स्थल है जहाँ गहरी घाटियों के बीच सालेश्वर महादेव का ऐतिहासिक मेला भरता है।
सालासर हनुमान मेला
- स्थान: सालासर, सुजानगढ़ तहसील, चूरू।
- तिथि: चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती) और आश्विन पूर्णिमा।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ हनुमान जी की ‘दाढ़ी-मूंछ युक्त प्रतिमा’ (प्रतिमा के चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ है) स्थापित है। यहाँ देश भर से लाखों श्रद्धालु मन्नत का नारियल बांधने आते हैं।
सारणेश्वर महादेव मेला
- स्थान: सिरोही की पहाड़ियों में, सिरोही।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी एकादशी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह देवड़ा चौहानों के कुलदेवता सारणेश्वर महादेव का मंदिर है। यह मेला मुख्य रूप से रेबारी (देवासी) समाज का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। इस मेले में ऊंटों की मन्नत मांगी जाती है।
सोनाणा खेतलाजी मेला
- स्थान: सोनाणा गाँव, देसूरी तहसील, पाली।
- तिथि: चैत्र शुक्ल एकम (नववर्ष के पहले दिन)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- श्री खेतलाजी (भैरव जी का रूप) का यह मेला गोडवाड़ अंचल में बेहद लोकप्रिय है। यहाँ छोटे बच्चों का ‘ढूंढ’ (एक धार्मिक उत्सव) पूजने की विशेष परंपरा है।
शाकम्भरी माता मेला
- स्थान: साम्भर (जयपुर जिला) और मुख्य पीठ सकराय माता/शाकम्भरी उदयपुरवाटी (नीम का थाना जिला, पूर्व में झुंझुनू)।
- तिथि: आश्विन और चैत्र नवरात्र (मुख्य रूप से साकंभरी का मेला पौष पूर्णिमा को भी आयोजित होता है)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह सांभर के चौहान शासकों की कुलदेवी हैं। अकाल के समय इन्होंने फल, सब्जियां (शाक) उत्पन्न की थीं, जिससे इनका नाम शाकम्भरी पड़ा।
तेजाजी का मेला
- स्थान: पर्वतसर (डीडवाना-कुचामन जिला, पूर्व में नागौर)।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह राजस्थान का आय की दृष्टि से (By Revenue) सबसे बड़ा पशु मेला हुआ करता था, जिसे वीर तेजाजी पशु मेला भी कहते हैं। यहाँ मुख्य रूप से नागोरी नस्ल के बैलों का क्रय-विक्रय सर्वाधिक होता है।
तिलवाड़ा का मेला
- स्थान: तिलवाड़ा, लूणी नदी के तट पर (बालोतरा जिला, पूर्व में बाड़मेर)।
- तिथि: चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इसे ‘मल्लीनाथ पशु मेला’ कहा जाता है। यह राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला (Oldest Cattle Fair) है, जिसकी शुरुआत जोधपुर के राजा उदयसिंह के समय हुई थी। यहाँ थारपारकर और कांकरेज नस्ल के मवेशियों की भारी बिक्री होती है।
त्रिपुरा सुंदरी मेला
- स्थान: तलवाड़ा, बांसवाड़ा।
- तिथि: चैत्र और आश्विन नवरात्र।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- इन्हें स्थानीय लोग ‘तुरताई माता’ भी कहते हैं। सिंह पर सवार अठारह भुजाओं वाली माँ त्रिपुरा सुंदरी की यह पीठ पांचाल जाति की कुलदेवी है। (यह राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की आराध्य देवी भी हैं, जिसके कारण यह चर्चा में रहता है)।
तीज मेला
- स्थान: जयपुर (बड़ी तीज/सातूड़ी तीज का मेला बूंदी में भरता है)।
- तिथि: श्रावण शुक्ल तृतीया (छोटी तीज)।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- जयपुर में ‘तीज माता’ की सवारी अत्यंत धूमधाम और पारंपरिक लवाजमे के साथ निकाली जाती है। राजस्थान में एक प्रसिद्ध कहावत है: “तीज त्यौहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर” (अर्थात त्योहारों का आगमन तीज से शुरू होकर अंत गणगौर पर होता है)।
वीरपुरी का मेला
- स्थान: मण्डोर, जोधपुर।
- तिथि: श्रावण मास का अंतिम सोमवार।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- यह मेला मारवाड़ के शूरवीरों और लोक देवताओं की याद में मण्डोर उद्यान में आयोजित किया जाता है, जहाँ देवताओं की ‘शाल’ (गैलरी) बनी हुई है।
