1. आभूषण, धातु एवं नक्काशी शिल्प
थेवा कला
- स्थान: प्रतापगढ़
- विस्तृत विवरण: बेल्जियम काँच (विशेषकर हरे रंग के काँच) पर सोने के महीन तारों से की जाने वाली कलात्मक नक्काशी को थेवा कला कहते हैं। यह केवल प्रतापगढ़ के राजसोनी परिवार (जैसे नाथूजी सोनी, महेश राजसोनी) तक ही सीमित है। यह पूरी तरह से गुप्त कला मानी जाती है, जिसे परिवार से बाहर किसी को नहीं सिखाया जाता।
कुन्दन कला
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: सोने और चांदी के आभूषणों के भीतर कीमती रत्नों, हीरों और पन्नों को जड़ने की कला को कुन्दन कला कहा जाता है। जयपुर इस कला का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय केंद्र है।
कोफ्तगिरी
- स्थान: उदयपुर (भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग प्राप्त), जयपुर, अलवर
- विस्तृत विवरण: फौलाद या लोहे की कठोर वस्तुओं पर सोने के पतले तारों से डिजाइन बनाकर जड़ाई करने की कला को कोफ्तगिरी कहते हैं।
तहरिशां
- स्थान: अलवर, उदयपुर
- विस्तृत विवरण: किसी धातु या लकड़ी की वस्तु पर डिजाइन को गहरा खोदकर उसमें सोने या चांदी के तारों की बारीक जड़ाई करना तहरिशां कला कहलाती है।
पीतल की खुदाई, घिसाई एवं पेंटिंग्स (मरोड़ी काम)
- स्थान: जयपुर, अलवर
- विस्तृत विवरण: पीतल के बर्तनों, प्लेटों और हुक्कों पर बारीक नक्काशी करके उनमें आकर्षक रंग भरने की कला को ‘मरोड़ी काम’ भी कहा जाता है। जयपुर इसका सबसे बड़ा केंद्र है।
जरदोजी
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: कपड़ों (जैसे मखमल या सिल्क) पर सोने और चांदी के चमकीले धागों से की जाने वाली भव्य कढ़ाई को जरदोजी कहते हैं। जयपुर के शासक इसे संरक्षण देने के लिए प्रसिद्ध थे।
तलवारें
- स्थान: सिरोही, अलवर, उदयपुर
- विस्तृत विवरण: सिरोही जिला अपनी फौलादी और धारदार तलवारों के निर्माण के लिए पूरे इतिहास में प्रसिद्ध रहा है। इसके अलावा अलवर और उदयपुर के राजघरानों के हथियारों के कारखानों में भी कलात्मक म्यान वाली तलवारें बनाई जाती थीं।
बादला
- स्थान: जोधपुर
- विस्तृत विवरण: जोधपुर का ‘बादला’ पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यह जस्ते से निर्मित पानी को ठंडा रखने का एक पारंपरिक बर्तन है, जिसके ऊपर कपड़े या लेदर (चमड़े) का सुंदर अस्तर चढ़ाया जाता है।
स्वर्ण और चांदी के आभूषण
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: जयपुर को भारत की ‘रत्न नगरी’ कहा जाता है। यहाँ सोने और चांदी के आभूषणों का बड़े पैमाने पर निर्माण और उन पर रत्नों की कटाई-घिसाई का काम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है।
2. पाॅटरी, टेराकोटा एवं मृदा शिल्प
ब्ल्यू पाॅटरी
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: चीनी मिट्टी के सफेद बर्तनों पर नीले रंग से की जाने वाली चित्रकारी को ब्लू पॉटरी कहते हैं। इसका विकास जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय के काल (स्वर्णकाल) में हुआ था। इस कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का श्रेय पद्मश्री विजेता कलाकार श्री कृपाल सिंह शेखावत को जाता है।
ब्लैक पाॅटरी
- स्थान: कोटा
- विस्तृत विवरण: कोटा की ब्लैक पॉटरी अपने काले रंग के बर्तनों और उन पर की गई आकर्षक चमकदार फिनिशिंग के लिए प्रसिद्ध है। इसके बर्तन मुख्य रूप से सजावट और दैनिक उपयोग के लिए बनते हैं।
सुनहरी पाॅटरी
- स्थान: बीकानेर
- विस्तृत विवरण: मिट्टी के बर्तनों, सुराहियों और कुप्पियों पर सोने के रंग से की जाने वाली आकर्षक नक्काशी और चित्रकारी बीकानेर की विशेषता है।
कागजी पाॅटरी (डबल कट पॉटरी / कागजी टेराकोटा)
- स्थान: अलवर
- विस्तृत विवरण: अलवर की यह पॉटरी इतनी पतली होती है कि इसका वजन कागज के समान हल्का महसूस होता है। इसमें बर्तनों पर आर-पार छेददार (कटवर्क) डिजाइन बनाई जाती है, इसलिए इसे ‘डबल कट पॉटरी’ या ‘कागजी टेराकोटा’ भी कहते हैं।
टेराकोटा शिल्प
- स्थान: मोलेला (राजसमंद), बनरावता (नागौर), महरोली (भरतपुर), बसवा (दौसा)
- विस्तृत विवरण: पकाई गई मिट्टी से मूर्तियां, बर्तन और खिलौने बनाने की कला को टेराकोटा कहते हैं. राजसमंद का मोलेला गाँव इसके लिए विश्वप्रसिद्ध है, जहाँ लोकदेवता देवनारायण जी और धर्मराज जी की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती हैं. इसके मुख्य कलाकार पद्मश्री मोहनलाल कुम्हार हैं.
रमकड़ा उद्योग
- स्थान: गलियाकोट (डूंगरपुर)
- विस्तृत विवरण: डूंगरपुर के गलियाकोट में सोपस्टोन (घिया पत्थर) को तराश कर सुंदर खिलौने, मूर्तियां, सजावटी सामान और बक्से बनाए जाते हैं, जिसे रमकड़ा उद्योग कहते हैं।
मार्बल की मूर्तियाँ
- स्थान: जयपुर, थानागाजी (अलवर)
- विस्तृत विवरण: सफेद मकराना मार्बल को तराश कर देवी-देवताओं और महापुरुषों की सजीव मूर्तियां बनाने में जयपुर का पूरे भारत में कोई सानी नहीं है।
पेपर मेसी (कुट्टी मिट्टी शिल्प)
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: कागज की लुगदी में मुल्तानी मिट्टी, गोंद और मेथी का दाना मिलाकर उसे सुखाया जाता है, और फिर उससे देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, मुखौटे और सजावटी बर्तन बनाए जाते हैं।
3. काष्ठ शिल्प एवं कठपुतली कला
काष्ठकला (लकड़ी का हस्तशिल्प)
- स्थान: बस्सी (चित्तौड़गढ़), जेठाना (डूंगरपुर)
- विस्तृत विवरण: चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव काष्ठकला का मुख्य गढ़ है, जहाँ ‘प्रभात जी सुथार’ को इस कला का जनक माना जाता है। वहीं डूंगरपुर का जेठाना गाँव लकड़ी के कलात्मक फर्नीचर के लिए प्रसिद्ध है।
लकड़ी की गणगौर, बाजोट, कावड़ और चौपड़
- स्थान: बस्सी (चित्तौड़गढ़)
- विस्तृत विवरण: यहाँ लकड़ी से बनी ईसर-गणगौर की सुंदर मूर्तियाँ, बाजोट (पूजा की चौकी), कावड़ (लकड़ी का चलंत मंदिर) और चौपड़ (पारंपरिक खेल बोर्ड) का निर्माण बड़े पैमाने पर सुथार समाज द्वारा किया जाता है।
कठपुतलियाँ
- स्थान: उदयपुर
- विस्तृत विवरण: राजस्थान में कठपुतली बनाने के लिए मुख्य रूप से ‘आडू’ की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। उदयपुर इस कला का प्रधान केंद्र है, जहाँ ‘भारतीय लोक कला मंडल’ ने कठपुतली कला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
लकड़ी के खिलौने
- स्थान: मेड़ता (नागौर)
- विस्तृत विवरण: नागौर का मेड़ता कस्बा लकड़ी के छोटे-छोटे आकर्षक खिलौने, गाड़ियां और पशु-पक्षियों की आकृतियां बनाने के लिए जाना जाता है।
तीर-कमान
- स्थान: चन्दूजी का गढ़ा (बांसवाड़ा), बोड़ीगामा (डूंगरपुर)
- विस्तृत विवरण: वागड़ क्षेत्र के ये दोनों गाँव आदिवासियों के पारंपरिक हथियार ‘तीर-कमान’ बनाने के लिए पूरे राजस्थान में विख्यात हैं।
4. वस्त्र छपाई, प्रिंट्स एवं गोटा कार्य
सांगानेरी प्रिंट (बेल-बूंटेदार छपाई)
- स्थान: सांगानेर (जयपुर)
- विस्तृत विवरण: सांगानेर की छपाई पूरी दुनिया में अपने महीन बेल-बूटों, फूलों और प्राकृतिक रंगों के प्रयोग के लिए जानी जाती है। इसमें मुख्य रूप से सफेद या हल्के रंग के कपड़े पर छपाई की जाती है।
बगरू प्रिंट
- स्थान: बगरू (जयपुर)
- विस्तृत विवरण: बगरू प्रिंट में फल-पत्तियां, पशु-पक्षियों के प्रिंट और ज्यामितीय आकृतियों को उकेरा जाता है। सांगानेरी प्रिंट के विपरीत बगरू में ‘दाबू पद्धति’ और गहरे प्राकृतिक रंगों का अधिक उपयोग होता है।
जाजम प्रिंट
- स्थान: चित्तौड़गढ़
- विस्तृत विवरण: चित्तौड़गढ़ की जाजम प्रिंट मुख्य रूप से मोटे कपड़ों पर की जाती है, जिसका उपयोग फर्श पर बिछाने वाली जाजम, दरी या ओढ़नी बनाने में होता है।
दाबू प्रिंट
- स्थान: अकोला (चित्तौड़गढ़)
- विस्तृत विवरण: कपड़े के जिस हिस्से पर छपाई नहीं करनी होती, उसे मिट्टी, मोम या गोंद की लुगदी से दबा दिया जाता है, जिसे ‘दाबू’ कहते हैं। अकोला का दाबू प्रिंट पूरे राजस्थान में विख्यात है।
अजरक प्रिंट
- स्थान: बालोतरा
- विस्तृत विवरण: इस प्रिंट में लाल और नीले रंग की प्रधानता होती है तथा कपड़े के दोनों तरफ छपाई की जाती है। इसके डिजाइन में ज्यामितीय आकृतियां होती हैं। (नोट: नए पुनर्गठन के अनुसार अब यह बालोतरा जिले का हिस्सा है)।
मलीर प्रिंट
- स्थान: बालोतरा
- विस्तृत विवरण: मलीर प्रिंट में कत्थई (ब्राउन) और काले रंग की प्रधानता होती है, जो हल्की लालिमा लिए हुए दिखती है। यह भी बालोतरा की पारंपरिक पहचान है।
लाॅडनू प्रिंट
- स्थान: लाॅडनू (नागौर)
- विस्तृत विवरण: नागौर के लाडनूं कस्बे की यह पारंपरिक प्रिंटिंग कला कपड़ों पर अपनी विशिष्ट स्थानीय कलाकृतियों के लिए जानी जाती है।
गोल्डन प्रिंट
- स्थान: कुचामन (नागौर)
- विस्तृत विवरण: कुचामन क्षेत्र में कपड़ों पर सोने के चमकीले रंगों या गिल्ट से की जाने वाली छपाई को गोल्डन प्रिंट कहा जाता है, जो मांगलिक अवसरों के परिधानों में काम आती है।
गोटे का कार्य
- स्थान: जयपुर, खण्डेला (सीकर)
- विस्तृत विवरण: ओढ़नी या साड़ियों के किनारों पर चमकीले सुनहरे रिबन लगाने की कला को गोटा कार्य कहते हैं। इसके प्रसिद्ध प्रकार हैं—लप्पा, लप्पी, किरण, गोखरू, बांकली, बिजिया, मुकेश और नक्शी।
5. पारंपरिक परिधान: ओढ़नी, पगड़ी एवं साड़ियाँ
पोमचा
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: पोमचा विशेष प्रकार की ओढ़नी होती है। पीले रंग का पोमचा पुत्र जन्म पर और गुलाबी रंग का पोमचा पुत्री के जन्म पर प्रसूता महिला द्वारा पहना जाता है।
चुनरी
- स्थान: जयपुर, जोधपुर (मारवाड़ क्षेत्र)
- विस्तृत विवरण: कपड़े पर छोटी-छोटी बिंदियों के रूप में की जाने वाली बंधेज (टाई एंड डाई) की ओढ़नी को चुनरी कहते हैं। यह सुहागिन महिलाओं का मुख्य पहनावा है।
धनक
- स्थान: जयपुर, जोधपुर
- विस्तृत विवरण: चुनरी की तरह ही बंधेज का एक प्रकार, लेकिन इसमें कपड़े पर बड़ी-बड़ी चौकोर या गोल बिंदियां बनाई जाती हैं।
लहरिया
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: कपड़े पर एक छोर से दूसरे छोर तक जाने वाली तिरछी धारियों के डिजाइन को लहरिया कहते हैं। जयपुर का लहरिया सबसे प्रसिद्ध है, जिसे विशेष रूप से ‘श्रावण मास’ और ‘तीज’ के त्योहार पर महिलाएं ओढ़ती हैं।
मोठड़े
- स्थान: जोधपुर
- विस्तृत विवरण: जब लहरिया की धारियां एक-दूसरे को आपस में काटती हुई क्रॉस बनाती हैं (यानी चेकदार डिजाइन बनाती हैं), तो उसे मोठड़ा कहा जाता है। जोधपुर के मोठड़े बहुत प्रसिद्ध हैं।
आदिवासी महिलाओं की पारंपरिक ओढ़नियाँ
- तारा भांत की ओढ़नी: इसके किनारों पर तारा जैसी आकृतियाँ बनी होती हैं। यह आदिवासी युवतियों में सबसे लोकप्रिय है।
- कैरी भांत की ओढ़नी: इसमें कच्चे आम (कैरी) जैसी सुंदर आकृतियों का पल्लू और प्रिंट होता है।
- लहर भांत की ओढ़नी: इसमें लहरदार धारियों का आकर्षक प्रिंट होता है।
- ज्वार भांत की ओढ़नी: इसमें ज्वार के दानों जैसी छोटी-छोटी बारीक बिंदियों का बैकग्राउंड होता है।
राजस्थान की प्रसिद्ध पगड़ियाँ (शाही साफे)
- मेवाड़/उदयपुर शैली: उदयशाही, भीमशाही, अमरशाही, चूणावतशाही।
- मार्वड़/जोधपुर शैली: जसवंतशाही, राठौड़ी।
- जयपुर शैली: राजाशाही (यह अपनी सतरंगी लहरिया पगड़ी के लिए प्रसिद्ध है)।
कोटा डोरिया (मसूरिया साड़ी)
- स्थान: कैथून (कोटा), मांगरोल (बारां)
- विस्तृत विवरण: सूती और रेशमी धागों के साथ सोने-चांदी के तारों को मिलाकर चौकोर चैक (खात) डिजाइन में बुनी जाने वाली साड़ियों को कोटा डोरिया या मसूरिया कहते हैं। इसे जीआई टैग भी प्राप्त है।
6. बीकानेर एवं राजसमंद की विशेष लोक कलाएँ
उस्ता कला (मुनव्वती कला)
- स्थान: बीकानेर
- विस्तृत विवरण: ऊँट की खाल पर सोने के महीन तारों से की जाने वाली नक्काशी को उस्ता कला कहते हैं। इसके सबसे प्रसिद्ध कलाकार पद्मश्री हिस्सामुद्दीन उस्ता रहे हैं। बीकानेर का उस्ता परिवार इस कला में पारंगत है।
मथैरण कला
- स्थान: बीकानेर
- विस्तृत विवरण: बीकानेर के जैन चित्रकारों (मथैरण परिवार) द्वारा धार्मिक स्थानों, महलों की दीवारों पर पुरानी पौराणिक कथाओं और देवी-देवताओं के सुंदर भित्तिचित्र बनाने की कला को मथैरण कला कहा जाता है।
पिछवाईयां
- स्थान: नाथद्वारा (राजसमंद)
- विस्तृत विवरण: नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के ठीक पीछे दीवार पर जो कपड़े पर बने बड़े धार्मिक चित्र लटकाए जाते हैं, उन्हें पिछवाई कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से कृष्ण की बाल लीलाओं का अंकन होता है।
7. चमड़ा, कालीन, नमदे एवं दरी शिल्प
नागरी एवं मोजड़ियाँ
- स्थान: जयपुर, जोधपुर
- विस्तृत विवरण: चमड़े से बनाई जाने वाली पारंपरिक राजस्थानी जूतियों को मोजड़ी या नागरी कहते हैं। जयपुर की नागरी जूती अपनी कोमलता के लिए और जोधपुर की कशीदाकारी वाली मोजड़ियाँ अपने डिजाइनों के लिए प्रसिद्ध हैं।
कशीदाकारी जूतियाँ
- स्थान: भीनमाल (जालौर)
- विस्तृत विवरण: जालौर जिले का भीनमाल कस्बा चमड़े की जूतियों पर रेशम और सोने-चांदी के धागों से की जाने वाली बारीक कशीदाकारी के लिए विशेष रूप से जाना जाता है।
बिनोटा
- विवरण: विवाह के अवसर पर दुल्हा और दुल्हन के लिए विशेष रूप से बनाई जाने वाली चमड़े की कलात्मक जूतियाँ, जिन पर जरी और गोटे का सुंदर काम होता है, उन्हें ‘बिनोटा’ कहा जाता है।
ईरानी एवं भारतीय पद्धति के कालीन
- स्थान: जयपुर, बाड़मेर, बीकानेर
- विस्तृत विवरण: जयपुर और बीकानेर की जेलों में कैदियों द्वारा बनाए जाने वाले सूती और ऊनी कालीन अपने घने बुनावट और ईरानी डिजाइनों के लिए दुनिया भर में निर्यात किए जाते हैं।
वियना व फारसी गलीचे
- स्थान: बीकानेर
- विस्तृत विवरण: बीकानेर विशेष रूप से वियना (ऑस्ट्रिया) और फारसी शैली के ऊंचे दर्जे के बारीक गलीचे बनाने के लिए जाना जाता है, जिनमें शुद्ध भेड की ऊन का प्रयोग होता है।
नमदे
- स्थान: टोंक, बीकानेर
- विस्तृत विवरण: ऊन को बिना बुने, केवल जमाकर और कूटकर जो मोटे फर्श या बिछाने के वस्त्र बनाए जाते हैं, उन्हें नमदा कहते हैं। टोंक जिला नमदा उद्योग का सबसे बड़ा केंद्र है।
लोई
- स्थान: नापासर (बीकानेर)
- विस्तृत विवरण: सर्दियों में ओढ़ने के लिए ऊन से बनाई जाने वाली हल्की, मुलायम और गर्म चादर को लोई कहते हैं। बीकानेर का नापासर कस्बा इसके लिए प्रसिद्ध है।
खेसले
- स्थान: लेटा (जालौर), मेड़ता (नागौर)
- विस्तृत विवरण: सर्दियों या हल्के मौसम में ओढ़ने के लिए मोटे सूती धागों से बनाई जाने वाली चादरों को खेसला कहा जाता है। जालौर का लेटा गाँव इसके लिए प्रसिद्ध है।
दरियाँ
- स्थान: जयपुर, अजमेर, लवाणा (दौसा), सालावास (जोधपुर), टांकला (नागौर)
- विस्तृत विवरण: सूती धागों से फर्श पर बिछाने के लिए बनाई जाने वाली रंग-बिरंगी दरी निर्माण के ये प्रमुख केंद्र हैं। नागौर का टांकला गाँव और जोधपुर का सालावास गाँव अपनी मजबूत ‘पंजा दरी’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हैं।
8. अन्य महत्वपूर्ण विविध हस्तशिल्प
लाख की चूड़ियाँ
- स्थान: जयपुर, जोधपुर
- विस्तृत विवरण: लाख को पिघलाकर उस पर कांच, नग और चमकीले रंग सजाकर बनाई जाने वाली चूड़ियाँ जयपुर और जोधपुर की प्रसिद्ध हस्तकला हैं।
लाख के आभूषण
- स्थान: उदयपुर
- विस्तृत विवरण: उदयपुर में लाख से बने कलात्मक सेट, गले के हार और कंगन बनाए जाते हैं, जो पारंपरिक पहनावे का मुख्य हिस्सा हैं.
हाथी दांत की वस्तुएँ
- स्थान: जयपुर, भरतपुर, उदयपुर, पाली
- विस्तृत विवरण: हाथी दांत को तराश कर बनाई गई चूड़ियाँ, कंघियाँ, खिलौने और कलाकृतियाँ इन जिलों की विशेषता हैं.
हाथी दांत एवं चन्दन की खुदाई, घिसाई एवं पेटिंग्स
- स्थान: जयपुर
- विस्तृत विवरण: जयपुर के कारीगर चंदन की लकड़ी और हाथी दांत पर इतनी बारीक खुदाई करते हैं कि लकड़ी के भीतर कई परतें साफ दिखाई देती हैं.
हस्तनिर्मित कागज
- स्थान: सांगानेर (जयपुर), सवाई माधोपुर
- विस्तृत विवरण: यहाँ पेड़ों की छाल और फटे कपड़ों से पर्यावरण-अनुकूल हस्तनिर्मित कागज तैयार किया जाता है. सांगानेर में कुमारप्पा हस्तनिर्मित कागज संस्थान भी स्थित है.
ऊनी कंबल
- स्थान: जयपुर, जोधपुर, अजमेर
- विस्तृत विवरण: भेडों की शुद्ध ऊन से तैयार किए जाने वाले गर्म कंबल इन क्षेत्रों की पारंपरिक कुटीर उद्योग की पहचान हैं.
